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सुख-दुख

वीआईपी की मौत के बताए गए कारणों पर यकीन नहीं होता, न कभी जांच होती है!

संजय कुमार सिंह-

वीआईपी की जान इतनी सस्ती क्यों है… बहुत पुरानी बात है। एक पीआर कंपनी के बुलावे पर दिल्ली के कुछ पत्रकारों के साथ मैं अहमदाबाद पहुंचा तो पता चला प्लांट विजिट पर जाना है जो 600 किमी दूर था। मुझे बताया गया, सड़क अच्छी है और बिहार की तरह 12 घंटे नहीं लगेंगे। लेकिन मैं सड़क पर कार से उड़ने को तैयार नहीं हुआ।

सब लोग अहमदाबाद के होटल में खा-पीकर तय कार्यक्रम के अनुसार अगले दिन की फ्लाइट से वापस दिल्ली आ गए। खबर जो छप सकती थी छप गई।

कंपनी हमारे लिए विमान की व्यवस्था नहीं कर पाई और हम सड़क मार्ग से (कम समय में) जाने-आने के लिए तैयार नहीं हुए। जब भी विमान दुर्घटना में किसी वीआईपी की मौत होती है मुझे लगता है उस दिन जल्दबाजी में हमें उड़ान भरने की अनुमति मिल गई होती तो क्या पता….

और नहीं मिली तभी हम बच गए। ये कैसे होता है कि वीआईपी विमान दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं और आम लोगों को अनुमति नहीं मिलती है। यह अलग बात है कि वीआईपी की मौत के बताए गए कारणों पर यकीन नहीं होता। कभी जांच नहीं होती… कभी हत्या आरोपी भाई हो तब भी।

कुछ लोग इसे प्राकृतिक न्याय मानते हैं लेकिन प्रकृति (यानी भगवान) पर मुझे इतना भरोसा नहीं है। खासकर अरावली की पहाड़ियों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले और फिर पलट दिए जाने तथा कुत्तों पर सुनवाई के दौरान दिए गए तर्कों और हुई बातचीत के बाद।

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