ईरान पर हुए हमलों को लेकर अमेरिकी मीडिया में जिस तरह की रिपोर्टिंग सामने आ रही है, उसने युद्ध और पत्रकारिता—दोनों पर नई बहस छेड़ दी है। अमेरिकी चैनलों और अख़बारों ने अपनी ही सरकार और सेना की कार्रवाई की पड़ताल करते हुए यह तक दिखाया कि हमलों में स्कूल, अस्पताल और जिम जैसे नागरिक ठिकाने भी तबाह हुए और एक मिसाइल हमले में दर्जनों नहीं बल्कि बड़ी संख्या में बच्चों की मौत का दावा किया जा रहा है। यानी वहां पत्रकारिता का मतलब सत्ता के साथ खड़े होकर तालियां बजाना नहीं, बल्कि उसके फैसलों की जांच करना भी है।
इसके बरक्स भारत में अक्सर तस्वीर उलटी दिखती है—जहां सैन्य कार्रवाई या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी असुविधाजनक खबरें सामने आते ही सवाल पूछने वालों पर दबाव बन जाता है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर पत्रकारिता की असली कसौटी क्या है—सत्ता का साथ या सच का साथ।
प्रकरण पर अजीत अंजुम का ट्वीट-
अमेरिकी मीडिया बता रहा है कि कैसे ईरान पर हुए हमले में स्कूल , अस्पताल और जिम को तबाह कर दिया गया. अमेरिकी मीडिया ने ही ये भी बताया कि कैसे अमेरिकी मिसाइल ने ईरान में स्कूल को निशाना बनाकर 165 बच्चों की जान ले ली. ट्रंप की मक्कारी और झूठ की पोल अमेरिकी मीडिया ही खोल रहा है. वहां देशभक्ति मतलब ये नहीं होता कि सरकार और सेना की गलतियों पर परदा डालो और भक्ति की भाँग खाकर सरकार का चीयर लीडर बन जाओ. हालांकि वहां के मीडिया पर भी बहुत सवाल हैं फिर भी….
ये मानना पड़ेगा कि अमेरिका का मीडिया वहां के सनकी राष्ट्रपति को भी नहीं बख्शता है. सेना पर भी सवाल उठाता है. हमले की मंशा पर भी सवाल उठाता है.
दूसरी तरफ़ हमारे यहां का मीडिया है. अव्वल तो कोई ऐसी हिम्मत करता नहीं. अगर कोई करता है तो सरकार उसके ख़िलाफ़ मुकदमे दर्ज करने लगती है. यही ऑपरेशन सिंदूर के समय हुआ. द हिंदू ने अगर बता दिया कि पाकिस्तान की जवाबी कार्रवाई में हमारा विमान गिरा है तो उसे कुछ ही देर में ट्विट डिलीट करना पड़ा. कई दिनों तक किसी की हिम्मत नहीं हुई कि हकीकत बताए. क्या ही कहा जाए…
क्या है सीएनएन की नई रिपोर्ट में?-
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच एक नई जांच में दावा किया गया है कि अमेरिका और इज़राइल के हमलों से ईरान में सैन्य ठिकानों के साथ-साथ कई नागरिक ढांचे भी प्रभावित हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय समाचार नेटवर्क CNN की इन्वेस्टिगेशन टीम ने वीडियो फुटेज और सैटेलाइट तस्वीरों के फॉरेंसिक विश्लेषण के आधार पर यह निष्कर्ष सामने रखा है।
रिपोर्ट के अनुसार, CNN की जांच टीम, जिसमें पत्रकार Katie Polglase भी शामिल हैं, ने सोशल मीडिया पर उपलब्ध वीडियो, स्थानीय रिपोर्ट और सैटेलाइट इमेजरी का विश्लेषण किया। इस विश्लेषण में कई ऐसे हमलों की पुष्टि की गई जिनके लक्ष्य सैन्य या रणनीतिक ठिकाने थे, लेकिन उनके आसपास मौजूद अस्पताल, स्कूल और खेल परिसर भी बुरी तरह प्रभावित हुए।
जांच में बताया गया है कि कुछ हमलों के बाद पास के अस्पतालों की इमारतों को नुकसान पहुंचा, खिड़कियां टूट गईं और चिकित्सा सेवाओं को अस्थायी रूप से रोकना पड़ा। एक स्थान पर स्थित प्राथमिक विद्यालय भी मिसाइल हमले की चपेट में आ गया, क्योंकि वह एक सैन्य परिसर के करीब था।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि एक अन्य घटना में एक जिम या स्पोर्ट्स हॉल पर हमले के कारण वहां मौजूद खिलाड़ियों को भी नुकसान पहुंचा। सैटेलाइट तस्वीरों में बड़े क्रेटर दिखाई देने से संकेत मिलता है कि हमलों में भारी क्षमता वाले बमों का इस्तेमाल किया गया, जिनका प्रभाव आसपास की इमारतों तक फैल गया।
CNN की जांच के मुताबिक, घनी आबादी वाले इलाकों में किए गए इन हमलों के कारण नागरिक ढांचे को भी नुकसान हुआ है, जिससे आम लोगों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। हालांकि अमेरिका या इज़राइल की ओर से इस जांच पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह बहस तेज हो गई है कि सैन्य लक्ष्यों पर हमलों के दौरान नागरिक ढांचे को होने वाले नुकसान को किस तरह रोका जाए।



