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अरुण कुमार सिंह मुन्ना (पार्ट 1) : एक माह जेल काटकर वापस लौटे तो वे विश्वविद्यालय में हीरो हो चुके थे!

उन दिनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय का अध्यक्ष वही बनता था जो छात्र नेता हड़ताल के बाद गिरफ्तार होकर जेल जाता था!

बद्री प्रसाद सिंह-

इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री, उत्तर प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष, हमारे बड़े भाई एवं मार्गदर्शक अरुण कुमार सिंह मुन्ना जी का निधन २० अप्रैल को प्रयागराज के एक नर्सिंग होम में हुआ था। उनके निधन से पूरा परिवार मर्माहत व शोकाकुल है। उनके संबंध में कुछ जानकारी आज साझा कर रहा हूँ।

जनपद जौनपुर के मछलीशहर तहसील के ग्राम रामनगर में तहसील के सबसे बड़े जमींदार ठाकुर नारायनपाल सिंह जी के घर २७ जनवरी १९४५ की एक ख़ुशनुमा शाम को उनके सुपुत्र प्रताप बहादुर सिंह को एक पुत्र रत्न प्राप्त हुआ जिसका नामकरण अरुण कुमार के रूप में हुआ जिसे दुलार वश मुन्ना कहा जाने लगा। मुन्ना जब थोड़ा बड़े हुए तो उन्हें उनकी नि:संतान बुआ अपने साथ अपने घर ताजपुर, कुंडा प्रतापगढ़ ले आयीं, जहाँ उनकी प्रारम्भिक शिक्षा से लेकर इंटर तक की शिक्षा हुई। विद्यालय में प्रधानाध्यापक ने उनकी जन्मतिथि २० फरवरी १९४७ अंकित की गई जो कालान्तर सर्वमान्य हो गई। स्वस्थ शरीर और चपल बुद्धि के कारण विद्यालय में वह अपने सहपाठियों के नेता बन गये।

वर्ष १९६३ में अरुण जी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बीए में प्रवेश लिया और हालैड हाल छात्रावास में आवासित हुए जहां उनके दो चचेरे बड़े भाई- नागेंद्र बहादुर व सुरेंद्र बहादुर सिंह पहले से ही थे। अपने बलिष्ठ शरीर, दमदार आवाज़, खेलों में रुचि तथा निर्भीक स्वभाव के कारण वह अपने साथियों के चहेते बने और शीघ्र ही विश्वविद्यालय के कला संकाय में मुन्ना जी एक चर्चित चेहरा बन गए। एम ए करने के बाद क़ानून के छात्र बने और वर्ष १९६८ में विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के उपाध्यक्ष पद का चुनाव लड़ कर रिकार्ड मतों से विजयी हुए।

उन दिनों विश्वविद्यालय में सितंबर-अक्टूबर में प्रतिवर्ष छात्र नेता हड़ताल कर विश्वविद्यालय अनिश्चितकालीन बंद कराते थे व छात्र नेता गिरफ्तार होकर जेल जाते थे। घर के संस्कार के कारण वह छात्र आंदोलन में जेल न जाकर इलाहाबाद के बाहर चले गए। वर्ष १९६९ में वह छात्रसंघ के अध्यक्ष के पद का चुनाव लड़े लेकिन उपाध्यक्ष रहते जेल न जाने के कारण उन पर छात्र हित के संघर्ष से पलायन करने का आरोप लगा कर समाजवादी युवजन सभा (SYS) के प्रत्याशी अशोक सारस्वत विजयी हुए। उस समय पूर्वी उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों में SYS का बोलबाला था।

स्वर्गीय अरुण कुमार सिंह मुन्ना

वर्ष १९७० में छात्र संघ का चुनाव ही नहीं हुआ और वह क़ानून के स्नातक बन गए। वर्ष १९७१ में मुन्ना भाई के साथियों ने उन्हें समझाया कि अगर वह अध्यक्ष बनना चाहते हैं तो जेल जाने से परहेज न करें। उन दिनों छात्र अराजकता को रोकने के लिए विश्वविद्यालय परिसर में पुलिस व पीएसी लगी हुई थी। एक दिन यकायक अरुण जी १२ बजे दिन में कुछ साथियों के साथ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में आए और उसके पोर्टिको पर चढ़ गए। तभी उनके समर्थक शोर मचाते हुए पोर्टिको के नीचे अपने साथियों के साथ एकत्र होकर अरुण कुमार मुन्ना ज़िंदाबाद के नारे लगाने लगे।

शोर सुनकर पुलिस तथा पीएसी ने आकर हिंदी विभाग को घेर लिया। मुन्ना जी अपनी दमदार आवाज़ में आधे घंटे ओजस्वी भाषण देकर १४ फ़ीट ऊँचे पोर्टिको से कूद कर कुलपति कार्यालय की तरफ अपने समर्थकों के साथ भागे। उन्हें गिरफ़्तार करने के लिए पुलिस पीछे-पीछे भाग रही थी लेकिन वह कुलपति कार्यालय पहुँच कर वहाँ हंगामा कर अपनी गिरफ़्तारी दी। गिरफ़्तारी का यह ड्रामा पूर्व नियोजित था। मैं तब एम ए दर्शन शास्त्र का छात्र था और हम अपने साथियों के साथ पहले से ही हिंदी विभाग के पास खड़े थे और मुन्ना भाई के साथ दौड़ में शामिल रहे थे।

लगभग एक माह जेल में रहकर जब वापस वह लौटे, तब तक वह विश्वविद्यालय के “हीरो “ हो चुके थे। वर्ष १९७१ के छात्र संघ के चुनाव में वह अध्यक्ष पद के लिए कांग्रेस पार्टी से चुनाव लड़े, उनके प्रतिद्वंदियों में जगदीश चंद्र दीक्षित व सुशील कुमार शर्मा थे। उस समय उनके अलावा हम चार भाई विश्वविद्यालय में थे- जगदीश बहादुर सिंह, कमलेश कुमार सिंह, किरण कुमार सिंह तथा मैं। हमने १९६९ में मुन्ना भाई के लिए छात्रावासों व विभिन्न विभागों में घूम-घूम कर वोट मांगा था।

वर्ष १९७१ के चुनाव में मुन्ना भाई का ऐसा माहौल बना कि वह आसानी से अध्यक्ष बन गए। विश्वविद्यालय छात्रसंघ के इतिहास में पहली बार SYS का उम्मीदवार पराजित हुआ और युवा कांग्रेस का प्रत्याशी विजयी बना। उनके कार्यकाल में छात्रसंघ भवन में तत्कालीन युवा तुर्क नेता एवं सांसद मा. चंद्र शेखर जी का भाषण हुआ था।

मुन्ना जी के छोटे भाई का नाम किरण कुमार सिंह है व उनके चार बहनें थी। ननिहाल आज़मगढ़ के महुआपार गांव के बाबू गौरी शंकर सिंह के घर था जो ब्रिटिश हुकूमत में कोतवाल रहे थे। भाई की शादी चंदौली जनपद के कैलावर गांव में पूर्व विधायक ठाकुर राज नारायण सिंह की पुत्री से १९६९ में हुई थी। भाई को एक पुत्री व दो पुत्र अभिषेक कुमार सिंह आशू व अभिनव कुमार सिंह सोनू हैं। आशू राजनीति में सक्रिय हैं तथा सोनू उच्च न्यायालय में अधिवक्ता हैं।

वर्ष १९७४ में उन्हें युवा कांग्रेस का राष्ट्रीय महामंत्री बनाया गया और उसी वर्ष उन्हें विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए वारसा पैक्ट के ९ देशों – सोवियत रूस, यूगोस्लाविया, हंगरी, चेकोस्लोवाकिया आदि में भेजा गया जहां उन्होंने इन देशों की संस्कृति, शासन पद्धति व आर्थिक समस्याओं की जानकारी प्राप्त की। महामंत्री होने ने कारण देश के विभिन्न प्रांतों में भ्रमण कर वहाँ की राजनीति को समझा व जाना और तत्समय के शीर्ष कांग्रेसी नेताओं के संपर्क में आए। अपने शानदार व्यक्तित्व एवं दमदार आवाज़ के कारण राष्ट्रीय कांग्रेस में शीघ्र ही लोकप्रिय हो गये।

लेखक बद्री प्रसाद सिंह रिटायर आईपीएस अधिकारी और दिवंगत अरुण कुमार सिंह मुन्ना के छोटे भाई हैं।

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