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‘बंसल मर्डर्स’ से पर्दे पर उतरा मीडिया का सच: खबरें नहीं, हित तय करते हैं एजेंडा!

पंकज शुक्ला-

नेटफ्लिक्स की नई हिंदी फ़िल्म ‘रात अकेली है: बंसल मर्डर्स’ का क्लाइमेक्स मेरे गृह जनपद उन्नाव में घटता है, उमाशंकर दीक्षित ज़िला पुरुष चिकित्सालय में। इस अस्पताल में भर्ती मीडिया घराने में काम करने वाला एक चौकीदार बताता है कि क़त्ल की रात क्या हुआ?

कहानी कानपुर के एक मीडिया घराने की है। मीडिया घराने के हिस्सेदार रहे दो परिवारों के बीच विवाद है। एक को अख़बार मिला है, दूसरे को चलाने को चैनल और कहानी घटित हो रही है साल 2004 में। याद आया कुछ? देश का शायद ही ऐसा कोई पारिवारिक मीडिया घराना बचा हो जिसमें स्वामित्व को लेकर विवाद न हुए हों। ऐसे एक विवाद को मैंने भी बहुत क़रीब से देखा है।

फ़िलहाल बात ‘रात अकेली है: बंसल मर्डर्स’ की। नेटफ्लिक्स की ‘रात अकेली है’ फ्रेंचाइज़ी विकसित करने की ये कोशिश अच्छी है और जो बात इस फ़िल्म की अब तक सुर्खियों में आने से बची रही, वह ये कि मीडिया घरानों का अपनी संपत्तियां बढ़ाने का लालच ही उनको समाचारों को लेकर समझौते करने पर मजबूर कर रहा है।

और, फ़िल्म ये भी बताती है कि इसी के चलते मीडिया अब वह ख़बरें नहीं दिखाता जो वाक़ई ‘ख़बर’ होती है। एक ही हादसे में बीमार हुए एक बच्चे को लंदन तक का इलाज मिलता है, और दूसरे बच्चे को वहीं कानपुर में नाले किनारे उग आई बस्तियों में छोड़ दिया जाता है, मरने के लिए!

ये कहानी भारत और इंडिया की है। एक इंडिया है जिसमें लोग AQI 600 तक चले जाने पर भी घरों में एयर प्यूरीफ़ायर लगाकर रह लेते हैं, दूसरा भारत हैं जहां लोग मुंह पर मास्क बांधकर भी काम पर जाने को मजबूर है। हाईकोर्ट चिल्ला रहा है कि जीएसटी कम कर दो, एयर प्यूरीफ़ायर पर, लेकिन ऐसा कुछ हुआ तो ख़बर तो कहीं दिखी नहीं। न ही कोई रिपोर्टर किसी मंत्री के मुंह के सामने माइक लगाकर पूछ ही रहा है कि कब होगा अदालत के इस आदेश पर अमल?

डर ये भी है कि रिपोर्टर को उत्तर में ‘घंटा’ सुनने को मिल सकता है! लेकिन, मंत्रियों को ये नहीं भूलना चाहिए कि उनके पहले भी जो इस शख़्स यहां तख़्तानशीं था, उसे भी अपने ख़ुदा होने का इतना ही यक़ीं था! फ़िल्म ‘रात अकेली है’ एक अच्छी सस्पेंस थ्रिलर है। हालांकि, जो भी नामचीन कलाकार फ़िल्म में हैं, उनका अभिनय वैसा ही है, जैसा वह अब तक हर दूसरी फ़िल्म में करते आए हैं।

हां,चौकीदार और चालक की भूमिका करने वाले नवोदित अभिनेता रहाओ बाली का काम इस फ़िल्म में कमाल का है। कोई हुनरमंद इंसान जब टाइमपास टाइप काम देकर हाशिये पर छोड़ दिया जाता है, तो उसके भीतर उबलता ज्वालामुखी अक्सर लोगों को दिखता नहीं है। रहाओ रंगमंच के मंजे हुए कलाकार हैं, और इस स्थिति को उन्होंने बेहतरीन तरीक़े से दर्शाया भी है। अदिति भी छोटे से किरदार में अपना असर छोड़ने में सफल रहीं।

हनी त्रेहन की ये फ़िल्म शुरू में धैर्य की परीक्षा लेती है, लेकिन एक बार गति पकड़ने के बाद सवारी का आनंद भी देती है। स्मिता सिंह हिंदी सिनेमा में कथानकों का एक नया विस्तार सामने ला रही है, उन्हें बहुत साधुवाद। वैसे, कानपुर की घटना में घायल मरीज़ उन्नाव इलाज कराने क्यों लाया जाएगा, सोचने वाली बात है? दोनों की कमिश्नरी अलग अलग है, पुलिस प्रशासन भी..! जटिल यादव बयान लेने यूं तुरत फुरत कानपुर से उन्नाव नहीं आ सकते। जै जै..!

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