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आज के अखबार : चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में जल्दबाजी और मुख्यमंत्री में निश्चिंतता दोनों खबर नहीं है

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों को देखने से लगता है कि खबरों की परिभाषा ही बदल गई है। आप जानते हैं कि दिल्ली के मुख्यमंत्री के चयन में सामान्य से ज्यादा देरी हो चुकी है और अभी तक नाम की घोषणा नहीं हुई है। दूसरी तरफ मुख्य चुनाव आयुक्त का चयन भारी जल्दबाजी में आधी रात को किया गया। आज दोनों ही खबरें अखबारों में नहीं के बराबर हैं और वैसे तो नहीं ही हैं जैसे होनी चाहिये। उदाहरण के लिए अकेले द टेलीग्राफ ने चुनाव आयोग (आयुक्त) की खबर को लीड बनाया है और उसके साथ राहुल गांधी की प्रतिक्रिया छापी है जो केंद्र सरकार की कार्रवाई को सुप्रीम कोर्ट का असम्मान बताती है। मुख्यमंत्री की नियुक्ति में देरी को तो अब आम बात मान लिया गया है और जो स्थितियां हैं उसमें भाजपा आलाकमान मुख्यमंत्री की घोषणा वैसे ही करेगा जैसे किसी राज्यपाल की होती है। विधायकों में से किसी को मुख्यमंत्री बनाया जाये तो ठीक है वरना कानूनन पार्टी किसी को भी मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला सकती है और छह महीने से ज्यादा पद पर बने रहने के लिए उसे इस बीच विधानसभा का सदस्य बनना होगा। बहुमत का एक मतलब यह भी है लेकिन मुद्दा यह नहीं है। मुद्दा यह है कि 2014 की कथित आजादी से पहले जब देश संविधान के अनुसार चलता था और इमरजेंसी भी घोषित की गई थी तब विधायक दल अपना नेता चुनता था और वही मुख्यमंत्री होता था। आप कह सकते हैं कि कांग्रेस आलाकमान भी विधायकों पर मुख्यमंत्री थोपता रहा है पर मेरा मानना है कि एक गलती से दूसरी गलती सही नहीं हो जाती है और ना एक के गलती करने पर जरूरी है कि दूसरा भी करे। मेरे लिये तो यह सब मुद्दा नहीं है। मेरा मुद्दा यह है कि अब यह सब खबर भी नहीं है। आप इसे विकास मान सकते हैं।

दूसरी ओर, मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में जल्दबाजी और आधी रात की कार्रवाई भी सामान्य है। उसपर विपक्ष के नेता की प्रतिक्रिया को भी तवज्जो नहीं मिली है। द हिन्दू, इंडियन एक्सप्रेस में यह सिंगल कॉलम की खबर है। शीर्षक है, मुख्य चुनाव आयुक्त पर आधी रात का निर्णय असम्मानजनक, शिष्टाचार के खिलाफ है। कहने की जरूरत नहीं है कि मुख्यमंत्री का पद खाली है चल रहा है और चुनाव आयुक्त का पद भरना जरूरी है – यह और कुछ हो न हो, खबर तो है। लेकिन पहले पन्ने पर कुछ नहीं है। मेरा मतलब सिर्फ इससे है कि पद खाली रहता तो आसमान नहीं गिर जाता और जल्दबाजी की गई है तो खबर है। लेकिन आजकल सरकार जो करे मीडिया सवाल नहीं करता। कोई और भी न करे इसलिए खबर भी नहीं देता है। आप निश्चित रहिये सरकार ठीक कर रही है, संविधान का पालन हो रहा है। वास्तविकता यह है कि जल्दबाजी अगर करनी ही थी तो मुख्यमंत्री के पद के लिए होनी चाहिये थी ताकि जो भी शपथ लेगा वह कल होने वाले शपथग्रहण समारोह के लिए अपने मेहमानों को आमंत्रित तो कर पाता।

आज के अखबारों में खबर है कि शपथग्रहण समारोह कल होगा। नवोदय टाइम्स ने शीर्षक में बताया है 11 बजे। यानी 24 घंटे से भी कम समय रह गया है। दि एशियन एज में यह पहले पन्ने पर पांच कॉलम की खबर है और शीर्षक के अनुसार दिल्ली के मुख्यमंत्री का रामलीला मैदान में ‘भव्य’ शपथग्रहण (समारोह) कल है। इसमें यह भी बताया गया है कि छह मंत्रियों को भी शपथ दिलाया जाना तय है। यह वैसे ही है कि कल फलाने जी के महल में भव्य शादी है। जो भी हो, यह खबर नहीं है और यही चिन्ता की बात है। शपथ किसे लेना है यह तय नहीं है तो जिन्हें बुलाया जायेगा वे शपथग्रहण करने वालों के मेहमान नहीं होंगे, भारतीय जनता पार्टी, दिल्ली और केंद्र सरकार के मेहमान होंगे। अमूमन, ऐसे कार्यक्रमों में मेहमानों की सूची शपथ लेने वाला ही तय करता है। पार्टी के नेता और सरकारी पदाधिकारी तो किसी के लिये भी वही होंगे ही। यही नहीं, कोई भी निमंत्रण पर्याप्त समय पूर्व दिया जाना चाहिये और जब सब तय है तो हो सकता है दे भी दिया गया हो। भले ही, सार्वजनिक तौर पर, सरकारी खर्चे पर हो रहे कार्यक्रम के अतिथि निजी नहीं हो सकते हैं पर जो स्थितियां हैं उसमें मुख्यमंत्री के परिवार के और दूसरे करीबी लोगों को बुलाने और उनके शामिल होने का समय ही नहीं है तो खबर यह भी है। जिसे मुख्यमंत्री बनाया जा रहा है उसकी पंसद और प्राथमिकताओं का पार्टी कितना ख्याल रखती है यह सब समझा जा सकता है। 

यह इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि नरेन्द्र मोदी ने अपने पहले शपथग्रहण समारोह में तो नवाज शरीफ को भी बुला लिया था लेकिन उन्हीं के नेतृत्व में पार्टी संगठन ने दिल्ली के भावी मुख्यमंत्री को अपने मेहमान को बुलाने का मौका ही नहीं दिया। कल के समारोह के लिए मुख्यमंत्री का नाम तय होने के बाद अतिथियों को निमंत्रण भेजा जायेगा तो देर हो जायेगी। इसलिए खबर यह भी हो सकती थी कि निमंत्रण भेजे गये हैं कि नहीं और भेजे गये हैं तो क्या और नहीं तो योजना क्या है। निश्चित रूप से यह पहले पन्ने की एक्सक्लूसिव खबर ही होती पर आज मेरे अखबारों में ऐसा कुछ नहीं है। सरकारी खर्चे पर बुहप्रचारित ‘भव्य’ शपथग्रहण समारोह का यह सच आम नहीं है और शायद ही पहले कभी ऐसा हुआ हो लेकिन खबर के रूप में इसकी चर्चा भी नहीं होना सरकार को मिल रहे मीडिया के समर्थन का उदाहरण है। इसी समर्थन के कारण सरकार को जनहित के काम करने की जरूरत नहीं लगती है और वह कुम्भ के आयोजन जैसे काम करती है। ममता बनर्जी ने इसे मृत्युकुम्भ कहा है। आज यह खबर भी पहले पन्ने पर नहीं है। नवोदय टाइम्स बता रहा है कि इस बवाल है, तब भी नहीं। मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा न होना और शपथग्रहण की तैयारी एक विशेष किस्म की राजनीति है। इसमें दूसरी पार्टी से आयातित नेता मुख्यमंत्री बन सकते हैं तो पार्टी के किसी नेता को बनाया जाना निश्चित रूप से पार्टी का आशीर्वाद है और इसके लिए पूर्व सूचना की क्या जरूरत। यह अलग बात है कि इस तरह की राजनीति में जो चुने जायेंगे उनका जो सम्मान पार्टी कर रही है वह भी दिखाई दे रहा है पर खबर यह भी नहीं है।

इससे समझ में आता है कि जो चुना जाता है वह क्यों हमेशा ‘यस सर’ की मुद्रा में होता है भले अगली बार टिकट ही नहीं मिले या वह चुनाव हार जाये। यह राजनीति है। मीडिया का काम था कि जनता को बताया जाता और जनता जानकार निर्णय ले पाती लेकिन ईवीएम से संबंधित आशंकायें और मतदाता सूची से छेड़छाड़ जब खबर नहीं है तो बिना दूल्हे की बारात भी क्यों खबर हो? ऐसे में आज अमर उजाला की लीड का फ्लैग शीर्षक है, बेहूदा टिप्पणी पर यूट्यूबर को गिरफ्तारी से राहत, पर कड़ी फटकार भी…. सुप्रीम कोर्ट ने कहा – दिमाग में गंदगी…माता-पिता बहन-बेटियां भी शर्मिन्दा होंगी। दूसरी बात है, केंद्र सोशल मीडिया पर अश्लील सामग्री रोके – हम चुप नहीं बैठेंगे। इसके साथ एक खबर का शीर्षक है, समाज के कुछ मूल्य हैं, अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कुछ भी बोलने का लाइसेंस नहीं है। शो पर भी रोक, देश नहीं छोड़ने का निर्देश। मामला सुप्रीम कोर्ट का है और मेरा काम उसके आदेश या टिप्पणियों पर टिप्पणी करना नहीं है। मैं खबर की प्रस्तुति की बात कर रहा हूं और मुझे लगता है इसमें खबर यह है कि 1) सुप्रीम कोर्ट ने यू ट्यूबर को फटकार लगाई 2) सरकार से कहा सोशल मीडिया पर अश्लील सामग्री रोकने के लिए कुछ करे 3) शो पर रोक, देश नहीं छोड़ने का निर्देश। अखबार का काम खबर छापना है प्रवचन छापना नहीं। सुप्रीम कोर्ट कहे कि हम चुप नहीं बैठेंगे – तो खबर है लेकिन समाज के कुछ मूल्य हैं…. यह भाषण निबंध का विषय हो सकता है। सर्वोच्च स्तर का ज्ञान भी हो सकता है पर खबर नहीं है। खबर यह है कि बंद कमरे के एक कार्यक्रम में (जो संभवतः टिकट वाला था) जो सब कहा गया उसका वीडियो सोशल मीडिया पर आ गया, देश भर में कई एफआईआर हो गई तो आयोजकों को सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा और सुप्रीम कोर्ट ने ये आदेश दिये हैं। इसमें ज्ञान की बात है कि अगर इसे रिकार्ड नहीं किया जाता, सोशल मीडिया पर नहीं डाला जाता तो शायद यह सब नहीं होता पर डाला क्यों गया था? क्या इसलिए कि कानून नहीं है? मुझे लगता है प्रचार के लिए। अखबारों का काम है कि जो भी खबर हो उसे वास्तविकता के आधार पर रिपोर्ट किया जाना चाहिये और ज्ञान भी उसी से संबंधित होना चाहिये। सबको पता है कि सेक्स के वीडियो सार्वजनिक हैं और इसी समाज के लोग देखते हैं, रोका नहीं जा सका है। यह अलग बात है कि वीडियो सार्वजनिक नहीं करना है तो रिकार्ड क्यों करना? इस कार्यक्रम को इतना भर निर्देश भी दिया जाता तो समाज को कोई समस्या नहीं आनी थी। वरना इसी समाज के लोग पैसे देकर ऐसे कार्यक्रम देखते हैं और कानून से रुकना होता तो वेश्यावृत्ति रुक गई होती। पर यह मेरी चिन्ता नहीं है।

इसी समाज में पति-पत्नी का सेक्स इतना ‘पवित्र’ है कि अदालत ने इसमें अमानवीय होने और मौत तक को अपराध नहीं माना है। लेकिन गाली देना या अश्लील बोलने पर चिन्ता है। माता-पिता के सेक्स पर टिप्पणी अपराध है और मौत अपराध नहीं है। हालांकि अदालत के फैसले और टिप्पणी भी अदालत से की गई मांग पर आधारित होते हैं लेकिन समाज कैसा होगा यह सुप्रीम कोर्ट नहीं तय कर सकता है और ना उसकी चिन्ता होनी चाहिये। मुख्य न्यायाधीश के घर प्रधानमंत्री का पूजा करने जाना और उसका वीडियो सोशल मीडिया पर डालना एक अलग किस्म का समाज बनाने की कोशिश का हिस्सा है। इसे रोकने की चिन्ता किसी को हुई क्या? यह मेरी निजी चिन्ता है पर तथ्य है और समाज की विडंबना भी। लेकिन खबर नहीं है। बन सकती थी पर बनाई नहीं गई। इसपर प्रवचन हो तो छापिये – समयानुकूल होगा। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कुछ भी बोलने की आजादी नहीं है का क्या मतलब है जब संसद में गाली देने पर, चुनाव प्रचार में झूठ बोलने पर और चुनाव जीतने के लिए झूठे वादों-जुमलों पर रोक नहीं है। साफ है कि हर मामले में कार्रवाई फैसले और आदेश सब अलग होते हैं। फंसाने का तरीका बचाने का आधार सब अलग है अर्नब गोस्वामी और सिद्दीक कप्पन में अंतर है। तो खबर यह क्यों नहीं है?

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