अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-
एक बिजनेस मैन और साथ में एक पत्रकार होने के बावजूद मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि योगी आदित्यनाथ के बनाए हर सिस्टम को भ्रष्ट अधिकारी, कर्मचारी और विभाग पूरे दुस्साहस से ध्वस्त करने में अभी भी लगे हैं। निसंदेह योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री के तौर पर बहुत पारदर्शी, समयबद्ध और जवाबदेह सिस्टम बनाया है। लेकिन तब भी यह हाल है कि जिन तीन विभागों से मुझे जूझना पड़ा है पिछले दस साल में यानी वर्ष 2015-16 से, उन्होंने मुझे एक ही प्रोजेक्ट में अनुमतियाँ देने में पसीने छुड़ा दिए। वह भी तब जबकि मैंने योगी आदित्यनाथ के बनाए हर सिस्टम के तहत उनसे नियमों का पालन करते हुए लड़ाई लड़ी।
यह तीन विभाग हैं एक्स लीडा, बिजली विभाग और अब uprera डॉट इन तीनों के खिलाफ मुझे दर्जनों की तादाद में शिकायतें विभिन्न प्लेटफार्म पर दर्ज करानी पड़ी लेकिन मजाल है कि एक भी काम इन्होंने साल दो साल तक लड़ाई लडऩे से पहले कर दिया हो। सिर्फ इसलिए क्योंकि इन विभागों में प्रचलित भारी घूस के रास्ते से हटकर मैंने नियमों का पालन करते हुए बिना इनसे मिले मंजूरियां मांगी।
एक बिल्डर / डेवलपर के तौर पर मुझे दस साल से एक छोटे से प्रोजेक्ट को चलाने के लिए इतना कुछ झेलना पड़ा, वह भी तब जब मैं पत्रकार हूं और बराबर लड़ता रहा। लेकिन क्या कोई सामान्य उद्यमी, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, मेरे जैसा रास्ता अपनाएगा?
वह कमाने आया है, उसे अपनी तरक्की देखनी है, परिवार देखना है। यूपी का सिस्टम भ्रष्ट रहे या ईमानदार, इसका ठेका उसके पास क्यों रहेगा भला? ठेका तो मेरे पास भी नहीं है लेकिन पत्रकार होने के नाते और घूस के लिए हर कदम मोटी रकम जुटाने में असमर्थ रहने के कारण मुझे यह रास्ता चुनना पड़ा।
योगी सरकार में बस इतना ही बदला है यूपी कि अगर कोई मेरी तरह महीनों / बरसों एक ही मुद्दे पर शासन प्रशासन से लड़ने को तैयार हो तो उसकी सुनवाई हो जाएगी और अंततः वह नियमों से आगे बढ़ जाएगा। लेकिन उसकी कीमत कितनी भारी होगी, यह मुझे अंदाजा हो चुका है। करोड़ों का नुकसान, उससे भी ज्यादा कारोबारी के तौर पर इतने लंबे समय तक अटकने के कारण रेपुटेशन पर असर, निजी जीवन और परिवार पर गहरा नकारात्मक असर, जीवन का ज्यादातर समय की आहुति… आदि बहुत कुछ।
बिजनेस करने वाले समय बचाने के लिए मोटी रकम घूस में देते हैं। बदले में भ्रष्ट अधिकारी, कर्मचारी और विभाग इन्हें नियमों के साथ खेलने और लोगों को लूटने की खुली छूट देते हैं। मसलन, एक्स लीडा को लीजिए, यहां अवैध प्लॉटिंग करना सबसे आसान काम है। क्योंकि विभाग आंखें मूंद लेगा। जमीन अपनी हो, सरकारी हो, नियम कानून पालन कीजिए या नहीं, कोई चिंता नहीं है क्योंकि विभाग के अफसर पट्टी आँख पर लगा लेंगे, बस आप उनसे मिल लीजिए। गलती से आपने उनसे बिना मिले, इस क्षेत्र में प्रोजेक्ट किया या कोई अनुमति मांगी, बस समझिए वहीं आप फंस गये। उसका भुगतान वही होगा, जो मैं कर रहा हूँ पिछले दस साल से।
इसी तरह बिजली विभाग है, कनेक्शन मांगिए या कोई काम हो, उन्हें पता है कि उनसे न मिलने के बाद कैसे आपको सताना है। महीनों बरसों चप्पल घिसाई कीजिए, किस्मत रही तो काम हो जाएगा।
रेरा इस लिस्ट में नया शामिल हुआ है। वह बिल्डर और कस्टमर दोनों को लूट रहा है। उसमें भी उसी मानसिकता से काम हो रहा है कि आँख मूंदने की कीमत चुकाकर जो।चाहे कर लो, नियम से आये और वह भी बिना मिले, तो उस दिन को बरसों तक कोसोगो कि यूपी में व्यापार का फैसला उस दिन लिया ही क्यों।
अगले साल चुनाव हैं। योगी आदित्यनाथ अपने अच्छे कामों को लेकर चुनाव में उतरेगें। उन्होंने काम अच्छे किए हैं, इससे मुझे इसलिए इनकार नहीं है क्योंकि कम से कम मेरे पास इस सरकार में शिकायत के लिए तंत्र है। अखिलेश और मायावती ने तो वह भी नहीं बना रखा था। बस दिक्कत यह है कि इस तंत्र का मखौल जो भ्रष्ट विभाग, कर्मचारी और अफसर उड़ा रहे हैं, उनके खिलाफ चलने वाला सरकारी चाबुक इस शिकायत तंत्र में उन्हीं के पास है, जिनसे जनता को शिकायत है। जैसे कि रेरा … यह वह मंच है, जो कस्टमर को परेशान कर रहा है बिल्डर से बचाने के नाम पर। बिल्डर को परेशान कर रहा है, कस्टमर के नाम पर नियम विरुद्ध प्रपंच रचकर। इसकी शिकायत की हिमाकत की तो महीनों लगें या बरसों, इन्हें किसी चाबुक का कोई डर नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट यह सच समझ चुका है इसलिए उसने कह ही दिया कि बेहतर है कि रेरा बंद ही कर दिया जाए।
कुल मिलाकर यह कि यूपी के हर भ्रष्ट अधिकारी कर्मचारी और विभाग का एक ही उद्देश्य है, जो बिना मिले नियम से आये उसे रोको, जो मिल कर जाये, उसे खुली छूट दे दो। अब इस माहौल में निवेश कीजिए, उद्यमी बनिये या कुछ और मेहनत ईमानदारी का काम कीजिए तो फिर जिंदगी बेलीगारद रहेगी यूपी में रहकर। मजे तो तभी हैं, जब भ्रष्टाचार की बहती गंगा में आप भी डुबकी लगाइए और दूसरों को भी लगाने दीजिए।
मुख्यमंत्री इसे ग्रोथ स्टोरी इसलिए समझ रहे हैं क्योंकि वह वाकई संत हैं और इसमें मुझे या किसी को कोई शक नहीं कि वह पूरी ईमानदारी से यूपी को सुधारने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। लेकिन इस ग्रोथ स्टोरी में शामिल हुए उद्यमी खुद भ्रष्ट अधिकारी, कर्मचारी और विभागों से लुट कर शामिल हुए होते हैं इसलिए उन्हें यूपी की ग्रोथ की बजाय खुद की ग्रोथ के लिए लोगों को लूटना पड़ता है।
लिहाजा ऐसी हर ग्रोथ स्टोरी जनता पर बहुत भारी पड़ती है। फिर भी एक अच्छाई है इस सरकार में कि यहां जनता को सुनने के लिए एक तंत्र है, जो इससे पहले किसी सरकार में नहीं था। काश कि इस तंत्र को दांत नाखून वाला शेर बनाकर जनता को दिया जाता तो यह अब तक बहुत बड़े बड़े चमत्कार कर देता। साथ ही इसे उन अफसरों या विभागों की बजाय किसी और तरीके से नियंत्रित किया जाना चाहिए (मसलन किसी मल्टीनेशनल कंपनी द्वारा) ताकि भ्रष्ट अधिकारी कर्मचारी और विभाग कुछ तो डरें। न्यायपालिका के रिटायर्ड लोग हों, रिटायर्ड IAS या नौकरशाह हों, मीडिया वाले हों, यह सब तो rera की तरह चरने ही आयेंगे। इसलिए उनकी बजाय इस शिकायत तंत्र को कॉरपोरेट स्टाइल में लेकिन किसी ख्यातिप्राप्त मल्टीनेशनल से कराया जाना चाहिए। जैसे टाटा आदि।


