सुधीर मिश्रा-
कल कला स्रोत के संचालक Anurag Didwania और Ravi Bhatt साहब ने वाणी प्रकाशन से आयी मेरी नई किताब दिल्ली दिल से पहली चर्चा आयोजित की। यह इस किताब की ऑनलाइन और बुक शॉप्स पर बिक्री शुरू होने के बाद पहला कार्यक्रम था। यह किताब नवभारत टाइम्स दिल्ली में दो साल तक संपादक रहने के दौरान लिखे गए लेखों का संग्रह है। इसमें दिल्ली का वो दर्द है जो इस दौरान मेरे दिल ने महसूस किया। वो स्वाद है जिसने मुझे लुभाया और वह व्यवहार संस्कृति है जिसने मुझे चौकाया। इसमें दिल्ली क्या और कैसी होनी चाहिए के ख़्वाब को पूरा करने के लिए कुछ कड़वी दवाइयां हैं।
बहरहाल आप जब पढ़ेंगे तो जानेंगे पर इतना जरूर ध्यान रखें इसमें दिल्ली का इतिहास नहीं बल्कि वर्तमान और भविष्य की चिंता है। Arvind Mohan Aaftab Aalam Manish Mishra Naval Kant Sinha Kanak Rekha Chauhan Gopal Sinha Gopal Krishna Chaturvedi Madhu Chaturvedi Chander Prakash Chandra Shekhar Varma Ashutosh Shukla Pankaj Prasun Dayanand Lal Vinita mishra और कार्यक्रम में आए सभी अतिथियों का हार्दिक आभार। अनुराग डीडवानिया भाई आप का विशेष आभार Aditi Maheshwari Divyansh Publications Neeraj Arora Vani Prakashan आप को बहुत बहुत धन्यवाद


प्रकाश दयाल-
नवभारत टाइम्स के संपादकीय पृष्ठ पर छपने वाले सुधीर मिश्र के लेखों ने मेरा ध्यान खींचा और मैं उनके लेखन का प्रशंसक बन गया। उनका यात्रा वृत्तांत ‘मुसाफ़िर हूँ यारों’ पढ़ चुका था जिसकी चर्चा मैं आगे करने वाला हूँ।
उनकी नयी किताब ‘दिल्ली दिल से’ की कई दिन से प्रतीक्षा थी। जब मिली तो लगा इंतज़ार और पढ़ना सार्थक हो गया। सुधीर मिश्र एक निष्पक्षता के साथ कलम उठाते हैं। मैं किसी भी लेख में दाएँ-बाएँ- मध्य परिलक्षित नहीं कर सका। विषयों की विविधता, आमजन के जीवन के प्रति सरोकार और शोध की गहराई प्रशंसनीय है। वास्तव में खुले मन से ही नहीं, बल्कि खुले दिमाग से लिखी रचनाएँ हैं। उनके चिंतन और लेखन में एक पत्रकार और साहित्यकार समन्वय के साथ कार्य करते हैं। पत्रकार विषय को खंगालता है, पुख्ता जानकारी जुटाता है और साहित्यकार उसे हास्य, व्यंग और करुणा की चाशनी से रोचक और पठनीय बना देता है।

‘दिल्ली दिल से’ के विषयों का ज़िक्र ज़रूरी है। कटहल, कद्दू से शुरू होकर आम की मिट्टास और महँगे टमाटर की कड़ुआहट तक आपको अपनी ज़िन्दगी के आसपास का कुछ न कुछ इन लेखों में मिल जाएगा। लेखक क्लाइमेट चेंज, न्याय व्यवस्था और हमारे जीवन से लुप्त होते सिविक सेंस को भी नज़रअंदाज़ नहीं करता। लेख आपको सोचने के लिए विवश कर देते हैं। इस किताब को पढ़नेवाला अपने समय का भरपूर मूल्य पाएगा।
अब जिक्र ‘मुसाफिर हूँ यारों’ का जो पढ़ने के साथ ही मन को भा गई। उसकी मासूमियत और स्पष्टवादिता दिल जीतने वाली थी। ऐसी सहजता और रवानी कि लगा जैसे एक प्याली कॉफी के साथ लेखक के सामने बैठा हूँ और वह यात्रा वृतान्त सुना रहे हों।
पहली हवाई विदेश यात्रा के वर्णन से मुझे वर्ष 1991 की अपनी पहली लंदन यात्रा याद आ गई। वह डर, अटपटापन, घबराहट और सब कुछ देखकर अपने अंदर सोंख लेने की आकुलता, फिर से साकार हो उठी। अच्छी रचना की यही विशेषता है कि वह दूसरे को उसके अनुभव तक पहुँचा दे।
एम्सटरडम में मुझे फोल्डिंग बेड वाला अपना सस्ता-सा होटल याद आ गया। सेक्स ट्वायज की दुकानों के सामने से परिवार के साथ गुजरते निर्विकार बच्चे मुझे कैसा तो विस्मित कर जाते थे। वाशरूम के लिए वेनिस में खर्च किया एक यूरो मैं अब तक नहीं भुला पाया हूँ।
सच में ’मुसाफिर’ ने एक खूबसूरत नॉस्टेलजिया रच दिया था। एक अद्भुत अनुभव फिर से जिला देने के लिए मैं लेखक का आभारी हूँ।


