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सुख-दुख

अपने बेटे की सिक्योरिटी मनी लेने के लिए इस महिला पत्रकार को बेईमान गलगोटिया वालों ने दो साल चक्कर कटवाए!

सर्जना शर्मा-

गलगोटिया युनिवर्सिटी और बाकी प्राईवेट शिक्षा संस्थानों कोचिंग सेंटरों का भ्रमजाल हमारी शिक्षा प्रणाली में दीमक हैं जो युवा पीढ़ी के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। इनके फलने फूलने में राज्य सरकारों, केंद्र सरकार (चाहे वो किसी भी राजनीतिक दल की हो) राजनेताओं और मीडिया की अहम भूमिका है। जी हां जबरदस्त नेक्सस है इनका, मैं ये दावे के साथ इसलिए कह सकती हूं कि हमारा परिवार भुगत भोगी है।

सबसे पहले तो दौलतमंद लोग अपने रसूख के बल पर राज्य सरकारों से जमीन ले लेते हैं। फिर सरकारी तंत्र में पैठ बना कर मान्यता प्राप्त कर लेते हैं और ग्रांट ले लेते हैं। गलगोटिया का तो झूठ ही पकड़ा गया अभी पिछले साल अल फलाह युनिवर्सिटी कैसे फली फूली ऐन केंद्र की नाक के नीचे कैसे आंतकवाद को पनाह दी ये तो सब जानते ही हैं।

दुख इस बात का है कि गलगोटिया का भंडाफोड गलत समय पर हुआ। जब भारत एआई पर अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन कर रहा है तब इसके झूठ ने भारत का अपमान करवा दिया। सरकार ने तुंरत एक्शन लिया लेकिन विरोधियो को बोलने का मौका मिला।

सबसे पहले दोषी है मीडिया हाउस जो इनको झूठी रैंकिग देते हैं देश का एक प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान जो पत्रिका, न्यूज चैनल डिजिटल सब चलाता है वो अपनी अंग्रेंजी और हिंदी दोनों पत्रिकाओं में हर साल शिक्षा संस्थानों को रैंकिग देता है गलगोटिया उनकी रैंकिंग में हमेशा पहले दस में ऊपर रहती है। सारा खेल पैसे और विज्ञापन का है मीडिया को विज्ञापन मिल रहा है तो कमियां क्यों बताएगा गुणगान ही करेगा वो भी सरासर झूठ। और सबसे बड़ी बात है केंद्रीय मंत्री मुख्यमंत्री इनके कनोवोकेशन में भी जाते हैं बिना ये पता लगाए कि कौन सा संस्थान क्या कर रहा है।

बहुत साल बाद मैं अपना अनुभव साझा करना चाहती हूं सच पूछिए आज तो AI समिट 2026 में गलगोटिया के पाप का घड़ा फूटा है जो कि सरकारी तंत्र की सजगता की कमी शिक्षा मंत्रालय की लापरवाही और मीडिया के पैसे के लालच के कारण भरता रहा। गलगोटिया यूनिवर्सिटी में मेरे भांजे का दाखिला हमने प्रतिष्ठित मीडिया हाउस की पत्रिका की रैंकिग पर भरोसा करके करवाया था। लेकिन वहां की बदहाली के किस्से ऐसे हैं कि आप यकीन नहीं कर सकते केवल वहीं करेंगे जो भुगत भोगी है। निर्माणाधीन इमारत में छात्रों को आवास देना डबल बेड रूम की फीस लेकर रूम में तीसरा बेड लगा देना। खाना तो ऐसा की मुंह में न जाए।

अब कोई पूछे कि जो ह़ॉस्टल अभी बना ही नहीं वहां छात्रों को रुकवाने का खतरा मोल कैसे लिया। लेकिन शिक्षा विभाग का कोई अफसर देख कर भी अनदेखा कर देगा जब तक अपना हित सध रहा है कायदे कानून जाएं भाड़ में। ये शिक्षा संस्थान केवल बच्चों के साथ अन्याय करते हैं ऐसा नहीं अपनी फैकल्टी को तीन-तीन महीने वेतन नहीं देते। कितनी बार गलगोटिया के अध्यापकों से मेरी बात हुई मात्र 40 हजार वेतन और वो भी तीन-तीन महीने बाद।

खैर, पढाई न लिखाई फीस मोटी, सिक्योरिटी मोटी ले कर रखते हैं। हमारा बच्चा घटिया खाना, कमरे में मच्छरों का धावा आदि के कारण वहां ज्यादा दिन नहीं रह पाया। अब सिक्योरिटी का एक लाख रुपया जब 6 महीने तक नहीं आया तो हमने तकाजा शुरू किया। गलगोटिया का एक कैंपस नोएडा के नॉलेज पार्क में भी है। यूनिवर्सिटी जेवर के पास है उन्होंने कहा हमारा सीएफओ ऩॉलेज पार्क कैंपस में बैठता है आप वहां जाएं। मैं वहां गयी सीएफओ साहब के स्टॉफ ने उनसे मिलने नहीं दिया कोई सरदार जी थे।

खैर मैं फोन नंबर ले कर आ गयी। आप हज़ार फोन कर लो क्या मजाल कोई फोन उठा ले। मैंने लगातार चक्कर काटे उन दिनों हम दिल्ली कैंट रहते थे 60 किलोमीटर आना 60 किलोमीटर जाना होता था। जहां उनका काउंटर है वहां बहुत सारे गरीब माता पिता से मुलाकात होती थी जिन्होंने अपनी जमीन बेच कर अपने बच्चों का दाखिला करवाया था। लेकिन उनकी सिक्योरिटी वापस करने का नाम नहीं। मैंने कई माता पिता को वहां रोते देखा हाथ पैर जोड़ते देखा इनका कलेजा कभी नहीं पिघलता।

एक दिन मैं गयी तो सीएफओ के ऑफिस में घुस गयी, स्टॉफ अंदर न जाने दे। सरदार जी अंदर कमरे में थे मेरे पास कोई चारा नहीं था मैं जोर जोर से चिल्लाने लगी और कहा आज मैं मिल कर ही जाऊंगी। तब सरदार जी ने मुझे पहली बार अपने कमरे में बुलाया। मैंने अपनी बात रखी उन्होंने एक समय सीमा दी। समय सीमा पार हो गयी महीनों तक कोई खबर नहीं फिर मैं गयी लारे लप्पे चलते रहे। पैसा वापस देने का नाम नहीं सरदार जी उल्टे मुझे समझाएं कि वो किसी से डरते नहीं वो पार्लियामेंट स्ट्रीट के पंजाब एंड सिंध बैंक के मैनेजर रहे हैं उन्होंने कभी तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजेपयी की भी नहीं सुनी। मुझे क्या फर्क पड़ना था।

अब मैंने अपने बहुत सारे पत्रकार मित्रों से बात की सबने हाथ खड़े कर दिए कहा कि गलगोटिया मोटे विज्ञापन देता है हमारे यहां उनके खिलाफ न छपेगा न न्यूज चैनल में रिपोर्ट चलेगी। एक साधारण नागरिक के लिए भारत में जीवन बहुत मुश्किल है ये सिस्टम उसी का है जो रसूखदार है ताकतवर है पैसे वाला है। मैंने अपना संघर्ष जारी रखा। हिम्मत नहीं हारी आखिरकार मुझे दो साल के बाद सफलता मिली लेकिन देखिए यहां भी एक लाख में से 15000 रुपए काट कर 85000 रुपए का चैक दिया।

गलगोटिया अकेला उच्च शिक्षा संस्थान नहीं है जहां झूठ की बुनियाद पर शिक्षा के मंदिर खड़े हैं। आज मेरे दिल को बहुत तसल्ली मिली कि देर से ही सही पाप का घड़ा फूटा तो सही। वैसे तो इसके मालिक की पत्नी और बेटा किसी मामले में जेल भी जा चुके हैं। सवाल तो ये हैं कि ये संस्थान फलते फूलते कैसे हैं क्या मानकों की जांच करने वाले शिक्षा विभाग के अधिकारी अपना काम ठीक से नहीं कर रहे हैं।

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