नई दिल्ली। आगामी जीएसटी काउंसिल की बैठक से पहले मीडिया, विज्ञापन और प्रकाशन क्षेत्र से जुड़ी शीर्ष संस्थाओं ने सरकार से टैक्स ढांचे में तात्कालिक सुधार की अपील की है। इंडस्ट्री का कहना है कि मौजूदा जीएसटी व्यवस्था वित्तीय दबाव बढ़ा रही है और इससे न केवल मीडिया कंपनियों का अस्तित्व खतरे में है, बल्कि विज्ञापन और मार्केटिंग सेक्टर की वृद्धि भी प्रभावित हो रही है।
कौन कर रहे हैं मांग?
- एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगज़ीन्स (AIM)
- न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन (NBDA)
- इंडियन आउटडोर एडवरटाइजिंग एसोसिएशन (IOAA)
इन सभी संगठनों ने वित्त मंत्री और जीएसटी काउंसिल की चेयरपर्सन निर्मला सीतारमण को ज्ञापन भेजकर विस्तृत सुधारों की मांग रखी है।
पत्रिकाओं का पक्ष
AIM ने कहा है कि प्रिंट अख़बार और पत्रिकाओं पर टैक्स छूट है, लेकिन उनकी डिजिटल कॉपियों पर 18% जीएसटी लगता है। AIM का तर्क है कि आज के समय में डिजिटल एडिशन ही सबसे अहम माध्यम बन गए हैं, खासकर छोटे कस्बों और मोबाइल उपभोक्ताओं तक पहुँच के लिए।
AIM ने हल्के पेपर (LWC) पर जीएसटी को 5% या शून्य करने, कवर पेपर पर टैक्स 18% से घटाकर 5% करने और इंक, प्रिंटिंग व अन्य सेवाओं पर पूर्ण इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) की अनुमति देने की मांग की है।
प्रसारकों की दिक्कत
NBDA (प्रेसिडेंट राजत शर्मा) ने जीएसटी एक्ट की धारा 13 का मुद्दा उठाया, जिसके तहत इनवॉयस बनने के समय ही टैक्स चुकाना होता है। सरकारी विज्ञापन एजेंसियों से भुगतान में देरी के कारण प्रसारकों पर भारी बोझ पड़ता है। NBDA ने मांग की कि कम से कम सरकारी विज्ञापनों के लिए टैक्स भुगतान इनवॉयस की बजाय पेमेन्ट मिलने पर हो।
इसके अलावा, धारा 17(5) के तहत कई जरूरी खर्चों (जैसे hired वाहन, फूड सर्विस, कर्मचारी बीमा) पर ITC नहीं मिलता। NBDA ने कहा कि इन्हें अनुमति दी जाए ताकि न्यूज़ प्रोडक्शन की लागत कम हो।
आउटडोर मीडिया की समस्या
IOAA ने कहा कि आउटडोर विज्ञापन पर 18% जीएसटी “अनुचित रूप से अधिक” है। इससे छोटे विज्ञापनदाता और एमएसएमई इस माध्यम से दूर हो जाते हैं। संगठन ने मांग की कि आउटडोर विज्ञापन पर जीएसटी को घटाकर 5% किया जाए और पीपीपी प्रोजेक्ट्स (बस शेल्टर, सार्वजनिक शौचालय, स्ट्रीट फर्नीचर) को टैक्स छूट दी जाए, ताकि शहरी विकास से जुड़े प्रोजेक्ट्स को मजबूती मिले।
एजेंसियों और एक्सपर्ट्स की राय
प्रखर श्रीवास्तव, VP (White Rivers Media): “जीएसटी में सबसे बड़ी उम्मीद है—क्लियर और सरल अनुपालन ढांचा। इससे विवाद घटेंगे और लिक्विडिटी बढ़ेगी।”
श्रद्धा अग्रवाल, CEO (Grapes Worldwide): “वर्तमान ढांचे में कई स्तर की जटिलताएं हैं। टैक्स का सरलीकरण एजेंसियों और क्लाइंट्स दोनों के लिए फायदेमंद होगा।”
संदीप गोयल, MD (Rediffusion): “जीएसटी दरों का तर्कसंगतीकरण उपभोग आधारित सेक्टर्स (जैसे FMCG, ऑटोमोबाइल, टेक्सटाइल) को बढ़ावा देगा, जिससे विज्ञापन उद्योग को भी सीधा लाभ होगा।”
डिजिटल विज्ञापन एजेंसियों ने यह भी सुझाव दिया है कि क्रॉस-बॉर्डर एड्स पर लगने वाले equalisation levy को जीएसटी में समाहित किया जाए। साथ ही, इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग में “non-cash consideration” (बार्टर या गिफ्ट आधारित डील) पर टैक्स नियम साफ़ करने की भी मांग उठाई गई है।



