
अमन त्रिपाठी-
बाबुषा कोहली हिन्दी कविता में एक मुसीबत का नाम है. मुसीबत पाठक के लिए कम, समीक्षक के लिए ज़्यादा. वे ख़ुद ही अपनी कविता को एकदम अरक्षित छोड़ देती हैं. उसके सारे टूल्स वगैरह सामने रख देती हैं कि इनको देखो और कविता की आलोचना वगैरह कर लो. पर अक्सर तो उस कविता का कोई सिरा ही नहीं होता, जिसकी पड़ताल करनी है. खुले मैदान की तरह. बाबुषा ने अपनी प्रोफेटिक-सी भंगी में मानो अपना स्थायी ठिकाना बना लिया है, जो कि इरिटेट भी करता है, कविता को कमज़ोर या ख़राब भी करता है. लेकिन यह भंगिमा आसानी से हासिल भी नहीं होती. अगर हासिल हो गई है तो उसका स्रोत क्या है इसे देखना चाहिए.
वह स्रोत किसी निश्छल-सी जगह पर हो सकता है या कोई बहुत प्रॉब्लमैटिक जगह पर हो सकता है. जो भी हो, पर यह निर्द्वंद्वता दिलफ़रेब है.
‘निर्द्वंद्व’ भी बाबुषा की कविता के लिए एक की-वर्ड है. वे इतनी द्वंद्वमुक्त हैं कि शक पैदा होता है. बल्कि उस निर्द्वंद्वता की वजह से कई हल्की कविताएँ इस संग्रह में सम्भव हुई हैं.
जैसे यही हिस्सा देखिए – “उस शहर की नदी का पानी/कभी नहीं उतरता जहाँ किसी प्रेमी की/आँख बरसी हो”. बाबुषा बहुत अच्छे-से जानती होंगी कि इन पंक्तियों में समस्या क्या है, लेकिन वे ऐसे रूमानी स्वीपिंग स्टेटमेंट्स अपनी कविताओं में देती रहती हैं. लेकिन फिर भी कुछ है जो उन द्वंद्वमुक्त, रूमानी स्वीपिंग स्टेटमेंट्स से आगे जाकर भी उनकी कविता का सत्व और उजलापन बचाए रखता है.

कहने को यह प्रेम कविताओं का संग्रह है, लिहाज़ा बाबुषा की प्रेम-विषयक दृष्टि पर भी उठने वाली बातें कर लेनी चाहिए. बाबुषा के प्रेम के साथ समस्या कहें या उसका कैरेक्टरिस्टिक कहें, कि वह कभी-भी जनरलाइज़्ड धरातल से नीचे उतरता ही नहीं. उनके प्यार करने वालों के सामने जाति, वर्ग, भाषा, रंग, समाज इत्यादि टाइप की समस्याएँ ही नहीं हैं. ऐसा वायवीय प्यार किस भूगोल में घटित में हो रहा है उसकी कोई भनक भी नहीं.
ऐसी चीज़ें लिखने वाले को कम, पढ़ने वाले को अधिक प्रभावित करती हैं. अफ़ीम की तरह इनका मज़ा होता है. हमारे समाज में सबसे बड़े अपराधों की सूची में प्यार का नाम है. प्यार करने पर बाप अपने बच्चों की हत्या तक कर सकता है, लेकिन आमतौर पर देखा गया है कि बलात्कार करने पर उसे बचाने की क़वायद घर वाले करने लगते हैं. ऐसे समाज में ऐसा दिव्य प्रेम कहाँ है, किस गति से दुनिया को बदल रहा है, उस प्रेम पर क्या इन सचाइयों का असर नहीं पड़ता – ऐसी बातें ज़ाहिराना तौर पर बाबुषा की कविता के सामने उठती हैं.
ऐसा नहीं कि वे इन बातों से भिज्ञ नहीं. लेकिन उनके पास इतना धैर्य है कि जब तक फूल अपनी सुंगध न छोड़े या आषाढ़ के मेघ बिन बरसे आकाश में विलीन न हो जाएँ वगैरह, तब तक वे अपना धैर्य नहीं छोड़ सकतीं. क्योंकि काम की सारी चीज़ें मसलन धूप, धुन वगैरह अभी मुफ्त और इफ़रात में हैं.
यह स्टैंड बहुत प्रॉब्लमैटिक, ख़राब और सुविधापरस्त है.
लेकिन यह ज़रूर कहूँगा, इस कवि की प्रेम-विषयक दृष्टि को फूँक मारकर, या पानी खाई मूँज जैसे सस्ते मुहावरों के बल पर नहीं उड़ाया जा सकता. जिस आग की वो बात करती हैं, उसमें जलना भी होता है, तब उसकी तासीर समझ में आती है. खाला का घर नहीं है.
यही मुसीबत है बाबुषा कोहली. और यही मुसीबत दुनिया के आगे भी है, कलाओं के आगे भी.
संग्रह कुल मिलाकर अच्छा है. कुछ कविताएँ बहुत अच्छी हैं, कुछ बहुत ख़राब. लेकिन अच्छों की संख्या ज़्यादा है.
अब पढ़ें बाबुषा कोहली का जवाब-

अमन त्रिपाठी, मुझे ख़बर है कि एक अरसे से हिन्दी के परिदृश्य में मेरी उपस्थिति बहुतों को असहज कर रही है और फिर भी मैं वह लिखने से बाज नहीं आ रही, जो मुझे लिखना है।
किसी की अपेक्षा पूरी करने के लिए नहीं लिख रही, सूचियों से ख़ारिज होने के भय से सुर नहीं बदल रही, वरिष्ठों की आँखों में चुभने से नहीं डर रही, लाभ लेने के लिए किसी को नमस्ते नहीं कर रही।
तुम यह जान लो कि मेरी लिखाई पर बात करते हुए तुम पहले हो, जो इतनी दूर तक पहुँचे —
“ इनको देखो और आलोचना वग़ैरह कर लो।”
जियो प्यारे !
मुसीबत को चिह्नित कर लिया है, तो न कहो कभी स्रोत तक भी पहुँच जाओ। हिन्दी के मोटी ऐनक वाले किताबी खूसटों और चिन्दी बरोबर नाम के भुक्खड़ों से कोई उम्मीद नहीं रखती।
तुम्हें कभी कोई सिरा पकड़ आया, तो मुझे ख़ुशी होगी; न आया, तो दुःख भी न होगा।
बाक़ी इतनी मुहब्बत से लिखोगे तो चचा से ही पंक्ति उधार लेनी होगी मुझे –
गालियाँ खा के बेमज़ा न हुआ !



