
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों में दो ही खबरें उल्लेखनीय लगीं। हालांकि, मणिपुर में फिर से हिंसा भड़कने की खबर को अब प्रमुखता मिलना भी गौर करने वाली बात है। हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों में चुनाव आयोग का बचाव पहले पन्ने पर है। लेकिन आज की खबर तो हिन्दुस्तान टाइम्स में है। इसके अनुसार, राज्यसभा के अलर्ट के बाद हाईकोर्ट के जज के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की जांच का विचार छोड़ दिया गया। मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज शेखर कुमार यादव के विवादास्पद भाषण का है। आपको याद होगा कि विश्व हिन्दू परिषद के एक कार्यक्रम में उनके भाषण को लेकर विवाद हो गया था। इस क्रम में आज खबर है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में एक आंतरिक जांच शुरू करने की तैयारी कर रहा था लेकिन राज्यसभा सचिवालय से स्पष्ट चिट्ठी मिलने के बाद योजना को रद्द कर दिया है। अखबार ने इस मामले के जानकार लोगों के हवाले से बताया है कि राज्यसभा ने इस मामले को अपने विशेष क्षेत्राधिकार में होने का दावा किया है। आज जानते हैं कि भारत के उपराष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन सभापति और अध्यक्ष होते हैं। इस समय जगदीप धनखड़ उपाध्यक्ष हैं और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहते हुए मुख्यमंत्री से उनकी भिड़ंत यादगार है। पूरी तरह राजनीतिक इस भिड़ंत के बाद उन्हें तरक्की देकर इस पद पर लाया गया है और हाल के समय में वे जजों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली के खिलाफ मुखर रहे हैं। सरकार की ओर से यह काम पहले भी कई लोग कर चुके हैं पर अभी वह मुद्दा नहीं है।
मुद्दा यह है कि सुप्रीम कोर्ट को सरकार से मुक्त, स्वतंत्र और स्वायत्त होना चाहिये। सरकार मौजूदा कॉलेजियम प्रणाली के खिलाफ रही है और अनुकूल फैसला न होने पर सुप्रीम कोर्ट की आलोचना भी हुई है। हाल में मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने कहा है कि न्यायाधीशों को बाहरी नियंत्रण से मुक्त होना चाहिए और हर लोकतंत्र में न्यायपालिका को न केवल न्याय देना चाहिए, बल्कि उसे एक ऐसी संस्था के रूप में भी देखा जाना चाहिए जो सत्ता के सामने सच्चाई को रखने के लिए जिम्मेदार है। सीजेआई ने कहा कि दुख की बात है कि न्यायपालिका के भीतर भी भ्रष्टाचार और कदाचार के मामले सामने आए हैं और ऐसी घटनाओं का जनता के विश्वास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस समय जजों से संबंधित दो मामले चर्चा में हैं। 8 दिसंबर 2024 को प्रयागराज में विश्व हिंदू परिषद के एक कार्यक्रम में दिए गए इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज के भाषण ने न केवल सामाजिक और राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी थी, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों को लेकर गहरा सवाल भी खड़ा कर दिया था। इस भाषण में उन्होंने भारत को बहुसंख्यकों की इच्छानुसार चलने की बात कही और मुस्लिम समुदाय की प्रथाओं की आलोचना करते हुए यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) की वकालत की थी। दूसरा दिल्ली हाईकोर्ट के जज के घर में आग लगने पर भारी नकदी जलने की खबर का है। कहा जा रहा है कि नियमानुसार इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की गई और पुलिस के आला अधिकारियों ने मुख्य न्यायाधीश को सूचना दी।
इसके बाद जो सब हुआ उसमें महत्वपूर्ण है सुप्रीम कोर्ट ने जजों की कमेटी से जांच कराई उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं है फिर भी खबर थी कि सरकार उनके खिलाफ महाभियोग लाने की तैयारी कर रही है और इस तरह पद से हटा दिये जाने से बचने का उनके पास एक तरीका है, इस्तीफा। आप समझ सकते हैं कि हिन्दुत्व के समर्थन में बयान देने वाले जज के खिलाफ कार्रवाई के लिए संसद सर्वोच्च संस्था है और संसद में सरकार का बहुमत हो तो सरकार की ही चलेगी। दूसरी ओर, जज स्वतंत्र होते हैं इसलिए नकद मिलने की एफआईआर नहीं हुई, जब्ती नहीं हुई और इसलिये जांच नहीं हुई और न्यायामूर्ति वर्मा कह चुके हैं कि पैसे उनके नहीं हैं और सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई के रूप में उनका ट्रांसफर दिल्ली से इलाहाबाद किया जा चुका है। यहां एक और बात महत्वपूर्ण है। वह है कि जज लोया की संदिग्ध मौत। उसकी जांच भी नहीं हुई थी। अखबारों की खबरों के अनुसार मोटे तौर पर दलील यह थी कि मौत तब हुई जब वे साथी जजों के साथ थे और साथी जजों को मौत के कारणों की जांच की जरूरत नहीं लगती है इसलिये जांच नहीं हुई। इसी तरह जज के घर में अग्निशमन कर्मचारियों द्वारा नकदी देखे जाने और उसका वीडियो होने के बावजूद संबंधित जज का कहना है कि घर के बाहर कमरे (स्टोर) में रखे गये पैसे उनके नहीं हैं पर इसे माना नहीं गया है।
वास्तविक कानूनी स्थिति क्या है, वह मेरा मुद्दा नहीं है। मेरा मतलब खबर से है और खबरों का मतलब यह है कि जजों के मामले में सरकार कार्रवाई कर रही है या संसद को सर्वोच्च मान लिया गया है। पर जो खबर छपी है वह इस बात को तकनीकी तौर पर कह रही है, सीधे नहीं। ऐसी कोई खबर (पहले पन्ने पर) अखबारों में आज नहीं है लेकिन अभी तक की खबरों से जो राय बनी है वह यही है कि जजों के खिलाफ कार्रवाई के मामले में सरकार या संसद सर्वोच्च है और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के मामले में सुप्रीम कोर्ट की बनाई जजों की कमेटी की कार्रवाई की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट जिस मामले में कार्रवाई करना चाहता था उस मामले में कार्रवाई रोक दी गई है और जिस मामले में सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति की सिफारिश सार्वजनिक नहीं है उसमें भी सरकार कार्रवाई करना चाहती है। इस तरह खबरों से जजों के मामले में सरकार की सर्वोच्चता साबित होती लगती है। इससे पहले, राज्यपाल और राष्ट्रपति से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले पर राष्ट्रपति का सवाल भी सर्वोच्चता का ही मामला लग रहा है जबकि तब मैंने लिखा था कि मामला स्वायतत्ता का है जिसे सर्वोच्चता में बदला जा रहा है। कानून का विषय और उसपर पढ़ने वाले लोग सीमित हैं इसलिए संभव है कि आम अखबारों में इसपर न छपे और पाठकों को यह स्पष्ट न हो कि स्वायतत्ता का मामला सर्वोच्चता में वास्तव में बदला कि नहीं और स्वायतत्ता या सर्वोच्चता का क्या हुआ। खास बात यह है कि हिन्दुस्तान टाइम्स ने आज इस खबर को जितना महत्व दिया है उतना दूसरे अखबारों ने नहीं दिया है।
चुनाव आयोग से संबंधित राहुल गांधी और उनके आलेख की खबर आज भी जनहित की बजाय सरकार और चुनाव आयोग के पक्ष में है। अमर उजाला में यह खबर पहले पन्ने पर है और इसका शीर्षक है, औपचारिक जवाब के लिए सीधे पत्र लिखें राहुल : आयोग। उपशीर्षक है, चुनाव आयोग ने कहा – कोई शिकायत नहीं दी…. संपर्क अभियान के तहत बैठक कांग्रेस ने कर दी थी रद्द। नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, औपचारिक पत्र लिखें राहुल तो मिलेगा जवाब : निर्वाचन आयोग। इस संबंध में कांग्रेस नेता, गुरदीप सिंह सप्पल ने सात जून को ही फेसबुक पर लिखा था, सात फरवरी 2025 को राहुल गांधी, सुप्रिया सुले और संजय राउत ने के साथ प्रेस कांफ्रेंस की थी। उसमें महाराष्ट्र चुनाव में वोटर लिस्ट की अनियमितता और चुनावी प्रक्रिया पर डेटा प्रस्तुत किया गया था और चुनाव आयोग से कुछ सवाल पूछे थे। प्रेस कांफ्रेंस के कुछ ही मिनट बाद चुनाव आयोग ने वक्तव्य जारी किया कि वो जल्दी ही तथ्यों के साथ राहुल जी की बातों का जवाब देंगे।
चुनाव आयोग ने उस दिन हेडलाइन बना दी। लेकिन वो दिन है और आज का दिन है। चुनाव आयोग ने कोई तथ्य नहीं दिए, कोई जवाब नहीं दिया। बस वायदा किया और फिर उसे भूल गए। उस दिन से अब तक, चार महीनों में कांग्रेस पार्टी ने कई बार केंद्रीय चुनाव आयोग से मिलने का वक्त मांगा। लेकिन वक्त नहीं मिला। इस बीच दिल्ली हाई कोर्ट में कांग्रेस की तरफ़ से रणदीप सिंह सुरजेवाला ने अर्जी लगाई और वोटर लिस्ट की कॉपी की माँग की। 25 फ़रवरी 2025 को चुनाव आयोग ने हाई कोर्ट में कहा कि वो तीन महीने में इस बारे में फ़ैसला लेगा। इसके बाद इसी साल 20 मार्च और 17 अप्रैल को कांग्रेस के प्रतिनिधियों रणदीप सिंह सुरजेवाला, मोहम्मद खान और उमर हुडा ने को महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी से मीटिंग के लिए बुलाया गया । वहाँ भी कांग्रेस ने वोटर लिस्ट की इलेक्ट्रॉनिक डेटा की माँग दोहराई। लेकिन 22 मई को दिए जवाब में मुख्य चुनाव अधिकारी ने केवल नियमों और प्रक्रियाओं का हवाला दिया। ये नहीं बताया कि वोटर लिस्ट का डेटा क्यों नहीं दिया जा सकता । न ही ये बताया कि लोकसभा चुनाव के बाद वोटरों की संख्या में अचानक इतना बड़ा उछाल कैसे आया। जाहिर है, चुनाव आयोग समय काट रहा है और लोगों को भ्रम में रखे हुए है। खास बात यह है कि अखबार सच बताने की बजाय चुनाव आयोग का साथ दे रहा है।
आज हिन्दुस्तान टाइम्स और द हिन्दू और द टेलीग्राफ की लीड मणिपुर की खबर है पर टाइम्स ऑफ इंडिया ने दिल्ली में गर्मी की खबर को लीड बनाया है। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है – प्रधानमंत्री ने कहा, महिलाओं के नेतृत्व वाला विकास भारत की विकास गाथा की कुंजी है। इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है – एक देश, एक चुनाव के तहत जल्दी से जल्दी 2034 में संयुक्त चुनाव हो सकते हैं। आज की इन खबरों से सरकार की प्राथमिकता और मीडिया का प्रचार बहुत स्पष्ट है।



