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सियासत

तुम्हारी पोस्ट से लगता है, तुम ईरान की हुकूमत को गुनहगार मानते हो!

समरेंद्र सिंह-

शाम में एक विद्वान ने फोन किया और कहा कि ईरान पर तुम्हारी पोस्ट से लगता है कि तुम ईरान की हुकूमत को गुनहगार मानते हो। क्या तुम जानते हो कि ईरान के साथ पश्चिमी देशों ने कितना गलत किया है?

उनका इशारा ईरान में पहले ब्रिटेन और रूस का दखल और बाद में अमेरिकी दखल की ओर था। मैंने कहा कि गलत तो भारत के साथ भी हुआ था। दो तरफ से काट दिया गया। इसलिए मसला ये नहीं है कि अतीत में क्या गलत हुआ या गलत नहीं हुआ?

मसला ये है कि आपने राह क्या चुनी?

ईरान ने इस्लामी क्रांति के बाद आतंक की राह चुनी। दरअसल वो क्रांति इस्लामी नहीं थी। उस क्रांति में बहुत बड़ा हिस्सा वामपंथियों का था। बाद में उनमें से ज्यादातर को खुमैनी ने मरवा दिया। ये संख्या हजारों में है। एक दो हजार नहीं बल्कि उससे कई गुना ज्यादा है। कुछ के मुताबिक 1980 से 85 के बीच 8-10 हजार लोगों की जान ली गई।

उसके बाद 1988 का नरसंहार तो और भी भयावह था। तब पूरे मुल्क में 30-32 जगहों पर हजारों लोग मौत के घाट उतार दिए गए। मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक ये संख्या 30 हजार से भी अधिक है। इनमें से ज्यादातर लिबरल सोच वाले लोग थे।

लोगों को मौत की सजा सुनाने में ईरान दूसरे नंबर पर है। पहले नंबर पर चीन है। ईरान में 2024 में करीब 1000 लोगों को मौत की सजा दी गई। जिनमें 31 औरतें भी शामिल हैं।

अपने लोगों पर कहर बरपाने के साथ 1979 के बाद से ही ईरान ने अमेरिका, यूरोप और इजरायल से दुश्मनी की राह चुनी। आतंकवादी संगठनों को संरक्षण देना शुरू किया।

आप खुद को मजबूत कीजिए, ये एक पहलू है। लेकिन आतंकियों को संरक्षण देना, दूसरों के यहां हिंसा फैलाना – अलग मसला है।

इस लिहाज से ईरान और अमेरिका में कोई फर्क नहीं। लेकिन ईरान और अमेरिका में एक फर्क है। अमेरिका अपने लोगों के लिए अच्छा है।

ईरान का खुमैनी और खामेनेई तो बाहर भी अपराधी हैं और भीतर भी अपराधी हैं।

अब चूंकि आपका धर्म एक है और वो आपको धर्म का रक्षक लगता है तो ये आपकी दिक्कत है। मुझे आपकी इस दिक्कत से जरा सा भी फर्क नहीं पड़ता।

खैर, खुमैनी तो मिट्टी में मिल गया है और खामेनेई भी बंकर में छिपा है। उम्र भी हो चली है। इस युद्ध में बच गया तो भी कुछ दिन में मिट्टी में ही मिल जाएगा।

ये कितना रोचक है कि इतना सब करने के बाद भी सब के सब मिट्टी में ही मिलते हैं!


अमेरिका में 50 लाख से अधिक भारत के लोग रहते हैं। ब्रिटेन में भी 15-20 लाख भारत के लोग हैं। फ्रांस में भी डेढ़-दो लाख भारत वाले होंगे। इनमें से बहुतेरे भारत में घरवालों को पैसे भी भेजते हैं। सबसे ज्यादा पैसे अमेरिका से आते हैं। उसकी हिस्सेदारी 27 प्रतिशत है। दूसरे नंबर पर संयुक्त अरब अमीरात है। वहां भी बड़ी संख्या में भारतीय हैं। अरब के जिन देशों में भारतीयों को सबसे ज्यादा रोजगार मिलता है, वो सभी अमेरिका और यूरोप से मैत्री के भाव में रहते हैं। ब्रिटेन की हिस्सेदारी भी 10 प्रतिशत के करीब है।

इतना ही नहीं देश के तौर पर सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर भी अमेरिका है। ट्रेड के संदर्भ में जीसीसी (गल्फ को-ऑपरेशन काउंसिल) देशों का स्थान सामूहिक तौर पर पहले नंबर पर है। लेकिन जीसीसी में जो देश शामिल हैं उनमें ईरान नहीं है। लगभग सभी ऐसे इस्लामिक देश हैं जिनके संबंध अमेरिका से अच्छे हैं। जीसीसी के बाद बतौर समूह यूरोपीय संघ भी बड़ा पार्टनर है।

इसके बावजूद भारत के बहुत से बुद्धिजीवियों को लगता है कि युद्ध की स्थिति में भारत को ईरान का साथ देना चाहिए।

क्यों भई? भारत को अपना हित नहीं देखना चाहिए क्या? ये सही है कि भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन का प्रणेता है, लेकिन इसके चक्कर में भारत को अपनी पूंछ में आग लगा लेनी चाहिए क्या?

भारत को अपना हित देखना चाहिए और भारत को किसी भी सूरत में इस युद्ध में हिस्सा नहीं लेना चाहिए।

भारत को किसी का साथ नहीं देना चाहिए और लगातार बार-बार शांति की अपील करनी चाहिए।

साथ ही भारतीय आसमान से गुजरते हुए यदि कोई अमेरिकी विमान तेल के संकट से जूझ रहा हो तो उसे तेल भराने देना चाहिए। ठीक ऐसे ही भारत दौरे पर आए ईरानी नागरिक खासकर बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे यदि वीजा बढ़ाना चाहते हैं तो कुछ दिन वीजा बढ़ा देना चाहिए।

वैसे देशों के संदर्भ में दोस्ती जैसे शब्द बहुत मायने नहीं रखते, फिर भी जब दो ‘दोस्त’ लड़ रहे हों तो लड़ाई से दूरी बनाए रखते हुए दोनों की यथासंभव मानवता आधारित मदद करनी चाहिए।

किसी एक को अपनी जमीन पर मानवीय मदद देने से दूसरे को दिक्कत होती है तो ये उसकी समस्या है। और यदि कोई अपनी इस समस्या को जाहिर करता है तो उस पर कोई भी प्रतिक्रिया देने की जरूरत नहीं है। ये समझिए कि उसे पीड़ा है और उसका इजहार कर रहा है। जब युद्ध थमेगा और सब शांति से विचार करेंगे तो स्थितियां संभल जाएंगी।

यहां एक दलील दी जाती है कि भारत में भी मुसलमान हैं, उनके बारे में सोचना चाहिए। ये दलील तो अपनी जेब में रखिए। भारत का जो मुसलमान भारत से अधिक ईरान और फिलिस्तीन के प्रति वफादार है तो उसे वहीं जाकर युद्ध लड़ना चाहिए। उनकी बहुत परवाह करने की जरूरत नहीं है।


ईरान पर अमेरिकी हमले का अर्थ

इजरायल कई महीनों से ईरान के खिलाफ निर्णायक लड़ाई की तैयारी कर रहा था। इस तैयारी में अमेरिका उसके साथ था। यूरोप के कुछ ताकतवर मुल्कों का भी साथ था।

ईरान पर हमले का समय करीब आया तो उसी समय पाकिस्तान ने भारत के पहलगाम में आतंकी हमला करा दिया। गुस्से में भारत ने पाकिस्तान पर सैन्य कार्रवाई कर दी। अचानक एक ऐसा फ्रंट खुल गया जिसके लिए टीम अमेरिका तैयार नहीं थी। तुरंत भारत और पाकिस्तान पर दबाव बनाया गया। मामले को शांत किया गया। ये मेरा अनुमान है।

ऐसा इसलिए हुआ होगा क्योंकि ईरान पर सैन्य कार्रवाई में पाकिस्तान की जरूरत पड़ सकती है। बात आगे बढ़ेगी तो पाकिस्तानी जमीन का इस्तेमाल ईरान पर हमले में होगा। पाकिस्तान को एक बफर स्टेट के तौर पर तैयार किया गया। वो अमेरिका के लिए पहले भी जरूरी था और अब भी जरूरी है।

इस समय तो पाकिस्तान की जरूरत बहुत अधिक है। टीम अमेरिका ये सुनिश्चित करने में जुटी है कि ईरान को मदद पहुंचाने के लिए चीन किसी भी तरह पाकिस्तान की धरती और आसमान का इस्तेमाल नहीं कर सके। इस लिहाज से मौजूदा समय में अमेरिका और यूरोप के लिए पाकिस्तान, भारत से कहीं अधिक जरूरी है। पाकिस्तान सैन्य प्रमुख को अमेरिकी व्हाइट हाउस में दावत भी इसीलिए दी गई है। और पाकिस्तान को आर्थिक मदद भी इसी वजह से मुहैया कराई गई है।

अगर ईरान पर हमले की तैयारी नहीं होती तो भारत-पाकिस्तान का मामला इतना जल्दी शांत नहीं होता। आगे भी बढ़ सकता था। हालात ऐसे ही थे कि भारत और पाकिस्तान के बीच एक युद्ध होता।

इसलिए जब इजरायल ने ईरान पर हवाई हमला किया तभी मैंने कहा कि सबकुछ तैयारी के साथ हुआ है। अमेरिकी की सहमती और संरक्षण में हुआ है। ईरान के खिलाफ इस लड़ाई में यूरोप के कई ताकतवर मुल्क अमेरिका और इजरायल के साथ हैं। और अमेरिका भी हमला करेगा। कुछ दिन लग सकते हैं, लेकिन हमला करेगा। अब हमला शुरू हो गया है।

फ्रांस अपनी नौ-सेना के जहाज इजरायल की रक्षा के लिए पहले ही भेज चुका है। ब्रिटेन भी साथ है। जब जरूरी होगा – ये सब मिल कर लड़ेंगे। और जब ये मिल कर लड़ेंगे तो ईरान इनका कुछ भी नहीं उखाड़ सकेगा। चीन और रूस भी हथियार भेजने और बेचने से अधिक कुछ नहीं कर सकेंगे।

मसला गलत या सही का नहीं है। क्या गलत और क्या सही है – मेरे और आपके जैसे लोग इस पर बहस करेंगे तो भी इससे कुछ रुकने वाला नहीं है। पश्चिमी एशिया में जो युद्ध होने जा रहा है इसे सिर्फ चंद लोग ही रोक सकते हैं। इन लोगों में पहले नंबर पर अली खामेनेई हैं। और दूसरे नंबर पर अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप हैं।

ईरानी हुकूमत 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से ही इजरायल के खिलाफ एक परोक्ष युद्ध लड़ रही थी। फर्क सिर्फ इतना ही हुआ है कि वो युद्ध अब इनके दरवाजे पर आ गया है।

जब तक इजराइल में बम फट रहे थे, गाजा में बम गिर रहे थे तब तक इन सबको मजा आ रहा था।

अब बम ईरान पर गिर रहे हैं। तो सबको घबराहट हो रही है।

तमाशा देख रहा इस्लामिक वर्ल्ड अब युद्ध के मुहाने पर है। ईरानी हुकूमत ने बिना शर्त बातचीत का प्रस्ताव मंजूर नहीं किया और खामेनेई ने सरेंडर नहीं किया तो ईरान की जमीन पर युद्ध होगा और ये युद्ध बहुत भयावह होगा।


ईरान और इजरायल का झगड़ा बहुत पुराना है। शाह के समय ईरान और इजरायल के बीच झगड़ा नहीं था। लेकिन 1979 शाह का तख्तापलट जिन लोगों ने किया, उनको लेबनान के फिलिस्तीनी कैंप में ट्रेनिंग मिली थी। उनका फिलिस्तीन से काफी जुड़ाव था। इसलिए जब ईरान में तख्तापलट हुआ तो “आज ईरान, कल फिलिस्तीन” के नारे लगे।

अयातुल्ला रुहोल्ला खुमैनी ने 1979 में जब ईरान को अपने कब्जे में लिया, सबसे पहले यासिर आराफात अपने लाव-लश्कर के साथ वहां पहुंचे। वो बिना बुलाए वहां गए थे। फिर खुमैनी और आराफात ने एक दूसरे का हाथ पकड़ा और फिलिस्तीन को आजाद कराने की बात कही।

इजरायल से अदावत वहीं से चल रही है। 1979-80 में ही इस्लामिक कट्टरपंथियों ने ईरान के अमेरिकी दूतावात में 66 लोगों को बंधक बनाया। ये संकट साल भर से अधिक समय तक चला। इस संकट की आड़ में खुमैनी ने धीरे-धीरे अपने सभी विरोधियों को ठिकाने लगाया। कोई हिंसा का शिकार हुआ। कोई बीमारी से मर गया। 3500-4000 हजार लोगों को तो मौत की सजा सुना दी गई। कुछ आंकड़े ईरानी क्रांति के बाद जितने क्रांतिकारी सरकार में शामिल हुए थे, या तो वो मुल्क छोड़ कर भाग गए या फिर मार दिए गए। जो दो-चार बचे उन्होंने घुटने टेक दिए या फिर जेल में रहे।

खुमैनी की अगुवाई में कट्टरपंथियों और कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों ने ईरानी जनता की नसों में अमेरिका और इजरायल के प्रति नफरत भर दी है। अब ईरान की जनता अपने बारे में कम, फिलिस्तीन के बारे में ज्यादा सोचती है। इसलिए जब ईरान ने इजरायल पर अपना पहला हमला किया तो ईरान के लोग जश्न मनाते दिखे। खुमैनी की तरह खामेनेई भी इजरायल को खत्म करने का सपना देखते हैं। आतंकियों को मदद देते हैं। हमास को संरक्षण देते हैं। ये कोई भले लोग नहीं हैं। भला तो इजरायल भी नहीं है। अमेरिका और ब्रिटेन भी नहीं हैं। ये फॉल्ट लाइन सबने मिल कर बनाई है।

वैसे इस बार लगता है कि ईरान के खिलाफ आर-पार की लड़ाई होगी। अमेरिका अभी इजरायल को बाहर से मदद दे रहा है, लेकिन ट्रंप के तेवर बता रहे हैं कि अमेरिका जल्दी ही सीधा हमला कर सकता है। ऐसा हुआ तो समझिए कि ईरान में खामेनेई की अगुवाई में इस्लामी हुकूमत अपने आखिरी दिनों में है।


ईरान और इजरायल युद्ध : चीन फंसा हुआ है। भयानक तौर पर। आर्थिक मंदी चल रही है। रियल स्टेट क्रैश कर रहा है। बीआरआई प्रोजेक्ट भी लगभग नाकामी की ओर है। पश्चिमी देशों ने उसे बुरी तरह से घेर रखा है। वो अमेरिका और यूरोप से समझौता कर रहा है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि कोई युद्ध उसके सीमा के करीब लड़ा जाएगा, उसके सहयोगी को घेरा जाएगा और वो इसमें हिस्सेदार नहीं बनेगा। वो हिस्सेदार बनेगा।

रूस भी थोड़ा उलझा हुआ है, यूक्रेन से युद्ध लड़ रहा है। यूक्रेन के बहाने यूरोप के ताकतवर देशों और अमेरिका से भी युद्ध लड़ रहा है। इसलिए वो इजरायल-ईरान युद्ध में कूदेगा नहीं, ऐसा सोचना गलत है। सही सवाल ये होगा कि उनकी भूमिका किस हद तक रहेगी?

दुनिया की सैन्य संरचना बहुत ही जटिल होती है। संबंधों की संरचना भी बहुत जटिल है। लाभ हानि के पैमाने भी बहुत अजीब से हैं। मतलब अमेरिका और रूस परोक्ष तौर पर लड़ रहे हैं। मगर बात भी कर रहे हैं। एक तरफ यूरोप के ताकतवर देश यूक्रेन को हथियार दे रहे हैं, रसद मुहैया करा रहे हैं, उसके लोगों को शरण दे रहे हैं और रूस से बात भी कर रहे हैं। दूसरी तरफ चीन पड़ोसी मुल्क रूस को हथियार दे रहा है और यूरोप और अमेरिका से ट्रेड की बात भी कर रहा है।

सबकुछ उलझा हुआ है। बहुत ही कॉम्प्लैक्स ढांचा है। इसलिए इजरायल और ईरान युद्ध में रूस और चीन भी कूदेंगे। सीधे नहीं तो परोक्ष तौर पर कूदेंगे। इस युद्ध में शर्तिया तौर पर चीन और रूस की हिस्सेदारी रहने जा रही है।

अभी लड़ाई दो मुल्कों के बीच है। इजरायल और ईरान। इजरायल ने ईरान पर हमला अमेरिका के समर्थन से किया है। ट्रंप चाहे जितना झूठ बोल लें, अमेरिका के इशारे के बगैर इजरायल इतना बड़ा कदम नहीं उठाता। अब अमेरिका इस इंतजार में है कि ईरान इस युद्ध के दायरे में अन्य देशों को भी घसीटे। अगर ईरान ने ऐसा किया तो अमेरिका और यूरोप के उसके सहयोगी मुल्क सीधे तौर पर इसमें कूदेंगे।

इजरायल सीधे ईरान में नहीं पहुंच सकता। मगर अमेरिका पहुंच सकता है। ईरान पर अमेरिका दो तरफ से सैन्य कार्रवाई कर सकता है। इराक की तरफ से जमीनी कार्रवाई और समुद्री रास्ते से ईरान को दक्षिणी तरफ से घेर सकता है। अगर पाकिस्तान ने साथ दिया तो ये कार्रवाई तीन तरफ से हो सकती है।

मुझे लगता है कि कहानी यही लिखी गई है। अमेरिका और पश्चिमी देश ये उम्मीद कर रहे हैं कि अली खामेनेई युद्ध का दायरा बढ़ाएं। अगर खामेनेई ने ये गलती की और उनके ट्रैप में फंसे तो ईरान में सत्ता परिवर्तन होगा।

रही बात चीन और रूस के कूदने की। तो वो ईरान के सहयोग में उतरेंगे, लेकिन सीधी लड़ाई से बचेंगे। चीन घर में घिरा हुआ है। उसने एक धधकता हुआ इंजन तैयार किया है, जिसकी रफ्तार थम रही है। ज्यादा थमी तो आंतरिक चुनौतियां बढ़ जाएंगी। बेरोजगारी बढ़ेगी। अराजकता बढ़ेगी। चीन ऐसा नहीं चाहेगा। वो अमेरिका और यूरोप को अपनी बढ़ी हुई ताकत का अहसास तो कराना चाहता है, लेकिन जानता है कि उसका ये सही समय नहीं है।

कुल मिला कर अगर अली खामेनेई ने गलती की और ईरान में युद्ध हुआ तो रूस और चीन खुद को हथियार मुहैया कराने और अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने तक सीमित रखेंगे। इतने से ईरान की थोड़ी मदद तो होगी लेकिन ज्यादा नहीं। इससे ईरान की हार टाली नहीं जा सकेगी।

इसलिए समझदारी यही है कि अली खामेनेई और ईरान, अमेरिका से बिना शर्त परमाणु समझौते के लिए बात करें। युद्ध की किसी भी गुंजाइश को टाले। अली खामेनेई को ऐसा ही करना चाहिए। और ऐसा नहीं हुआ तो ये मान कर चलिए कि ईरान में भीषण नरसंहार होगा और खामेनेई का भी अंत तय है।

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