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जो कहते हैं पत्रकारिता मर गई—जरा आईना देख लें!

कुमार जितेंद्र ज्योति-

पत्रकारिता का मृत्यु प्रमाणपत्र बांटने वालों के लिए लिखना जरूरी लगा…

दो घटनाक्रम का जिक्र कर रहा हूं। खासकर उनके लिए, जो कहते हैं कि पत्रकारिता मर गई है। पत्रकार अब सक्षम नहीं होते। एक बार मेरे ताजा अनुभव को पढ़िए, फिर बताइए कि पत्रकारिता मर सकती है कभी या AI इसकी जगह ले सकता है?

‘अमर उजाला’ बिहार-झारखंड में मानव-संसाधन के तौर पर बहुत कमजोर है। मेरे जीवन की यह सबसे छोटी टीम है। लेकिन,

  1. कुछ समय पहले हमने बीपीएससी शिक्षकों की भर्ती में एक घालमेल की खबर का लगातार पीछा किया। दरअसल, 122 शिक्षकों को बीपीएससी ने TRE 1 में पास कर दिया था, लेकिन तत्कालीन अपरा मुख्य सचिव केके पाठक के निर्देश पर शिक्षा विभाग ने इनकी नियुक्ति रोक दी थी। हमने अकेले इसका पीछा किया। शिक्षा विभाग ने दूसरे मीडिया समूह के कुछ लोगों को लेकर हमारी खबर के खिलाफ लिखवाया। मगर, हम पीछा करते रहे। अपर मुख्य सचिव सिद्धार्थ बने, तो भी पीछा चलता रहा। दूसरे स्तर के अधिकारी जितनी तरह का उपाय लगा रहे थे, हमने अंदर-अंदर सारी पड़ताल की।

और, जब सिद्धार्थ गए तो मेरे जमाने में पटना के डीएम रहे बी. राजेन्दर आए। मुद्दे पर हम जितनी खबर लगा रहे थे, उससे ज्यादा अंदर की जानकारी जुटा रहे थे। आचार संहिता के दौरान भ्रष्टाचार के पूरे खेल की जानकारी मेरे पास थी। नई सरकार बनने के बाद जिम्मेदारों से इसपर बात शुरू हुई कि अचानक विभाग जागा और उनमें से सही अभ्यर्थियों की नियुक्ति हो गई। उन सभी की गुजारिश थी कि अब उन बातों को भुला दीजिए, वरना हमारी नौकरी की प्रक्रिया रोक देंगे अफसर। सो, पत्रकारिता के साथ मानवीयता को रखते हुए उसे छोड़ दिया।

  1. हजार किलोमीटर दूर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के NOIDA या DDA की भी स्कीम आती है तो यहां तक खबर फैल जाती है। लेकिन, क्या आपको पता है कि पटना में बिहार राज्य आवास बोर्ड कोई प्लॉट बिक्री स्कीम लेकर आया था? मुझे जब किसी सोर्स ने बताया तो मैं भी चौंक गया। पता चला कि किसी एक या दो अखबार को अंदर के पन्ने वाला विज्ञापन देकर स्कीम लायी गई। 19 फरवरी तक आवेदन लिया जा रहा है, लेकिन…। सच में, लेकिन ही था सबकुछ।

राज्य आवास बोर्ड की वेबसाइट पर तिलस्मी तरीके से इस स्कीम के आवेदन का लिंक सबसे नीचे बहुत छोटे अक्षर में था। वह हाइपर लिंक भी काम का नहीं। न प्लॉट का विवरण सामने, न कीमत, न प्रक्रिया, न यह जानकारी कि आवेदक का पैसा फंस तो नहीं जाएगा।

इतने सवालों के साथ मैं लैपटॉप के साथ अपने एक साथी को लेकर जब समय लेकर बोर्ड के सचिव राहुल बर्मन से मिला तो बहुत कुछ हुआ। पूरी तकनीकी टीम आई। पोर्टल में किस तरह क्या खेल क्यों किया गया और उससे किसे नफा-नुकसान होगा, यह भी बताया।

आज, आखिरकार उस प्रक्रिया को ‘तकनीकी खामी’ के आधार पर रद्द किया गया। यह भी जिम्मेदार पत्रकारिता है। क्योंकि, सचिव राहुल बर्मन ने दो घंटे का वक्त देकर स्वीकार किया था कि गलतियां हुई हैं और उन्हें सुधार कराएंगे, भले ही तारीख बढ़ानी पड़े। कल अंतिम तारीख थी, लेकिन उससे पहले प्रक्रिया स्थगित करने का पत्र आ गया। और, इस खबर का आगे भी पीछा किया जाता रहेगा- जनहित में।

क्या आपको लगता है कि पत्रकारिता मर गई होती तो यह संभव होता? क्या AI से यह कराया जा सकता है? सच को सच कहिए, गलत को गलत- मुंह पर।

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