विनोद भारद्वाज-
कल मुझे स्त्री- पुरुष की मित्रता से जुड़े शेक्सपियर और ऑस्कर वाइल्ड के दो उद्धरण एक जगह दिखे, तो मैंने उन्हें एक पोस्ट में शेयर किया। वे कमेंट विवादास्पद और विचारणीय थे, इसलिए उन्हें शेयर किया। हुआ यह कि मेरे कवि-आलोचक मित्र पंकज चतुर्वेदी ने उस पोस्ट को अपनी वाल पर शेयर किया, तो काफ़ी असहमति के कमेंट सामने आये। मेरी वाल पर भी असहमति कम नहीं थी पर मेरे ज़्यादा मित्र चित्रकार हैं, बहुत से ग़ैर- हिंदी प्रदेशों के। पंकज की वाल पर अधिक अच्छी- ख़राब टिप्पणियाँ दिखीं,क्योंकि मुझे टैग किया गया था। लेखिका सुदिप्ती ने अपनी वाल पर इस विवादास्पद विषय पर एक टिप्पणी की, तो बहस अधिक व्यापक हो गई। विषय ही ऐसा था, ऊपर से दो बड़े लेखकों के नाम भी थे।

सच तो यह है कि अक्सर शेक्सपियर के नाटकों के संवाद उनके अपने विचार भी मान लिये जाते हैं।एक संवाद मेरी वाल पर काफ़ी चर्चित हो चुका है। पुरुष को किसी स्त्री का पहला प्रेम मिले और स्त्री को पुरुष का अंतिम प्रेम मिले, तो वे भाग्यशाली हैं। मेरी कविताओं के समग्र चयन का प्रस्तावित नाम है —अंतिम प्रेम और अन्य कविताएँ।मुझे लगता है कि शेक्सपियर का यह कथन भी उनके किसी संवाद का हिस्सा है। ऑस्कर वाइल्ड समलैंगिक भी थे,यह भी गौर करने की बात है। मेरी वाल पर शोभा अक्षर की टिप्पणी भी गौर करने लायक़ है :
स्त्री-पुरुष के दोस्ती में देह को शामिल करने में दरअसल हम ही हिचकिचाते हैं। दोस्ती में देह को दूर रखने की हमारी कंडीशनिंग हुई है।
मैं यह मानता हूँ कि स्त्रीपुरुष में अच्छी प्लेटोनिक क़िस्म की दोस्ती भी हो सकती है, होती ही है। लेकिन जब यह दोस्ती गहरी होने लगती है, तो देह कहीं न कहीं फ़ोकस में आने लगती है।पुरुष अधिक ग़ैर- प्लेटोनिक रिश्ते को खोजता है। कह सकते हैं कि लंपट होना उसकी नियति है। वासना रहित प्रेम स्त्री में अधिक है। मैं अपनी किताब यादनामा एक में मंगलेश डबराल के संस्मरण में लिख चुका हूँ कि शराब के नशे में एक शाम स्कूटर से उतरते हुए वह बोले, मैं देवप्रिया (मेरी पत्नी) से प्रेम करता हूँ, पर उसमें वासना बिलकुल नहीं है। प्रिय मित्र और कवि मंगलेश जी से मेरा कहना था सौ प्रतिशत वासना मुक्त प्रेम एक ख़ुशफ़हमी या ग़लतफ़हमी है। गौर किया जाये, यह संस्मरण जब फ़ेसबुक पर सामने आया था, तो मंगलेश जी स्वस्थ और सक्रिय थे। यह मरणोपरांत नहीं लिखा गया था।
रश्मि भारद्वाज- मुझे लगता है यह भी हमारी कंडीशनिंग ही है, (पुरुष और स्त्री दोनों की) कि मित्रता में भी हम देह की बात करने लगें। आकर्षण एक और बात है लेकिन स्त्री पुरूष के बीच बिना लालसा के मित्रता एकदम सम्भव है। होता यह है कि पुरुष देह की ओर प्रवृत्त होने लगते हैं और स्त्रियाँ देह को लेकर सहज, स्वाभाविक नहीं रह पातीं। स्त्रियों को तो मुझे लगता है दैहिक से अधिक मानसिक, दिमाग़ी खुराक की तलाश होती है। एक सहजता, एक बौद्धिक, कलात्मक, रचनात्मक संसर्ग लेकिन अक्सर ये उन्हें नहीं मिल पाता है। लगभग नहीं!
संतोष चंदन– बिना प्रेम के दोस्ती हो ही नहीं सकती. स्त्री-पुरुष संबंध को सिर्फ़ शरीर के खांचे में रखकर देखना-समझना मर्दवाद ही है. इस मामले में हमें अमृता प्रीतम और इमरोज़ के साथ का एक वाकया सबसे मुफ़ीद लगता है.. एक बार इमरोज़ ने अमृता से यूं ही पूछा कि – ‘अच्छा अमृता, कोई तुमसे पूछे कि तुम्हारी सबसे बड़ी उपलब्धि या धरोहर क्या है तो तुम क्या बताओगी?’ इस पर अमृता ने जवाब दिया – ‘मैं दोस्त कमाती हूं.’ (ये बात हमने हिंद पॉकेट बुक्स से छपी इमरोज़ की किताब “अमृता के प्रेम पत्र” में कोई 30-35 साल पहले पढ़ी थी)
फ़िरोज़ ख़ान- इकतरफा शारीरिक इच्छा खराब बात है, फिर वह पति-पत्नी के बीच हो, दोस्तों के बीच हो या कहीं अन्य। शेक्सपियर या ऑस्कर वाइल्ड के वक्त की नैतिकताएं अलग तरह की थीं। कोई भी लेखक दार्शनिक अपने वक्त से थोड़ा आगे ज़रूर देखता है, लेकिन हर वक्त में उसकी कही बात प्रासंगिक होगी यह ज़रूरी नहीं। दो पुरुष या दो स्त्रियां अच्छे दोस्त हों और उनमें समलैंगिक संबंध बन जाएं तो क्या वे दोस्त नहीं रहेंगे, कुछ और हो जाएंगे। ऐसे ही अपोजिट सेक्सुअल पहचान वाले दोस्तों के बीच बने यौन संबंध उनकी दोस्ती तो खत्म नहीं कर देते। हां, पैट्रियार्की की वजह से पुरुष ऐसे रिश्तों में थोड़े गड़बड़ हो जाते हैं। अन्य देह और मन पर तब भी अधिकार चाहते हैं, जबकि कोई उन्हें वह अधिकार नहीं देना चाहता। इसी सोच की वजह से शेक्सपियर और वाइल्ड की बात लंबे समय तक सच की तरह लगती रही है। लेकिन दुनिया बदली है, बदल रही है।
सौरभ आर्या– ये निर्भर करता है कि दो लोग दोस्ती के प्रति कितना ईमानदार हैं और एक दूसरे के प्रति आदर और सम्मान कितना है। दैहिक आकर्षण बहुत पीछे छूट जाता है उस रिश्ते में। कुछ प्रधानता से रहता है तो समर्पण और प्रेम। बहुत सौभाग्य से मिलते हैं ऐसे सम्बन्ध। आदर और प्रेम से सींचना पड़ता है इन्हें।



