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आज के अखबार : मंत्री विजय शाह को छोड़ कर पाक में आतंकी मरा, प्रोफेसर गिरफ्तार, ब्लॉगर गिरफ्तार सब है

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों में पहले पन्ने पर जो खबरें छपी हैं उनमें पहलगाम हमले से पहले पाकिस्तान गई थी ज्योति (नवोदय टाइम्स) लश्कर आतंकी सैफुल्ला पाकिस्तान में मारा गया (हिन्दुस्तान में लीड), अशोका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ऑपरेशन सिन्दूर पर टिप्पणी के लिए गिरफ्तार, देश के मुख्य न्यायाधीश जो महाराष्ट्र के हैं, पहली बार मुंबई पहुंचे तो उनके स्वागत में ‘बड़े लोग’ नहीं आये, किरेन रिजिजू का यह कहना कि सर्वदलीय बैठक में भेजने के लिए सांसदों के नाम नहीं मांगे थे, पुरी के एक यूट्यूबर पर नजर, पाकिस्तान को आईएमएफ के निर्देश जैसी तमाम खबरें हैं लेकिन मध्य प्रदेश के मंत्री विजय शाह के मामले में पहले पन्ने पर कोई खबर नहीं है। यह सिर्फ द टेलीग्राफ में लीड है। आप जानते हैं कि कर्नल सोफिया कुरैशी पर आपत्तिजनक टिप्पणी के बाद हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया है। विजय शाह को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली है फिर भी उन्हें गिरफ्तार किया जाना तो दूर, मेरे आठ अखबारों में किसी में पहले पन्ने पर खबर भी नहीं है। तथ्य यह है कि हाईकोर्ट के निर्देश पर जो एफआईआर हुई वह भी लचर है और इसके लिए भी हाईकोर्ट ने फटकार लगाई है।

खबरों के अनुसार, एफआईआर में मंत्री की करतूत का जिक्र ही नहीं था। यही नहीं, हाईकोर्ट ने भाषा पर भी नाराजगी जताई है। फिर भी खबर पहले पन्ने पर नहीं है। ढूंढ़ने पर (दैनिक जागरण की खबर से) पता चला कि सर्वोच्च न्यायालय की वेबसाइट पर प्रकाशित सूची के अनुसार, जस्टिस सूर्यकांत और एनके सिंह की खंडपीठ इस मामले की सुनवाई 19 मई को (आज) करेगी। शुक्रवार को समय की कमी के कारण जस्टिस कांत की अध्यक्षता वाली पीठ विजय शाह की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) की सुनवाई नहीं कर सकी और याचिकाकर्ता के अनुरोध पर मामले को सोमवार के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया था। कहने की जरूरत नहीं है कि न तो इसके लिए कार्रवाई से छूट मिलनी चाहिये और न ही इससे खबर कमजोर हो जाती है और उदाहरण के रूप में पेश खबरें बहुत गंभीर या क्रांतिकारी हैं। अखबारों में अमूमन सरकार और सरकारी कार्रवाई का प्रचार होता है। वही आज भी है। यह नहीं बताया गया है कि पाकिस्तान के लिये जासूसी में गिरफ्तार यू ट्यूबर ज्योति के पास जासूसी करने लायक सूचनाएं कहां से आती थीं। यह इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण है। इसके बिना गिरफ्तारी (कार्रवाई) का कोई मतलब नहीं है। अपराधी सूचना देने वाला है, पहुंचाने वाला नहीं। कोई और मामला हो तो अलग बात है लेकिन पाकिस्तान जाना (वीजा लेकर) तो अपराध नहीं ही हो सकता है।

यह अलग बात है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घूमने वाले पाकिस्तान जाने और वहां का वीजा लेने से बचते हैं। ऐसे में ज्योति की गिरफ्तारी तो हुई ही उसका फॉलोअप भी नवोदय टाइम्स में है जो आजकल तमाम खबरों का नहीं होता है। और तो और, आज पहले पन्ने की एक और खबर है – सेना ने कहा, भारत पाक संघर्ष विराम पर सहमति को लेकर कोई अंतिम तिथि नहीं है। मुझे तो इस खबर का मतलब ही नहीं समझ में आ रहा है। फिर भी यह जनसत्ता में लीड है। आप जानते हैं कि भारत ने पाकिस्तान के साथ सिंधु संधि से लेकर युद्ध विराम तक तोड़ दिया था। युद्ध ऐसे ही होते हैं और जब युद्ध का पूरा माहौल बन गया, युद्ध छिड़ गया जो अचानक किसी तीसरे के कहने पर बंद हो गया और एक जिम्मेदार मंत्री ने ज सार्वजनिक तौर पर स्वीकार कर लिया है कि हमले की पूर् सूचना दी गई थी तब अब यह बताने का का क्या मतलब कि युद्ध विराम की कोई अंतिम तिथि (या तय मियाद) नहीं है। मुझे लगता है कि अंतिम तिथि होती तो जरूर खबर थी पर यह किसी भी तरह खबर नहीं है। फिर भी न सिर्फ जनसत्ता में, दि एशियन एज में भी लीड है। द हिन्दू में यह खबर सेकेंड लीड है। इसमें बताया गया है कि डीजीएमओ के बीच आज कोई वार्ता निर्धारित नहीं है। द हिन्दू ने हैदराबाद में आग लगने से एक परिवार के 17 लोगों की मौत की खबर को लीड बनाया है। यह सब तब जब मध्य प्रदेश के मंत्री विजय शाह को कार्रवाई से बचने के लिए लंबी राहत दी गई है और अशोका विश्ववद्यालय के प्रोफेसर को मामूली पोस्ट के लिये गिरफ्तार कर लिया गया है।  पोस्ट वैसी है ही नहीं जैसा आरोप लगाया गया है। द टेलीग्राफ ने हमेशा की तरह इस मनमानी को भी रेखांकित किया है और सेना के अभियान का नाम, ऑपरेशन सिन्दूर रखकर वोट बटोरने वाली पार्टी और सरकार के दो चेहरों के रूप में पेश किया है। द टेलीग्राफ में यह खबर लीड है।

सिन्दूर वाले चेहरे के दो चेहरे

आतंकी अब मारा गया तो युद्ध मे?

आज की खबरों में सबसे दिलचस्प खबर है, लश्कर आतंकी सैफुल्ला पाकिस्तान में मारा गया। कई अखबारों में प्रमुखता से है – तीन बड़े हमलों का मुख्य साजिशकर्ता… सीआरपीएफ कैंप संघ मुख्यालय व भारतीय विज्ञान संस्थान को बनाया था निशाना। मैंने यह खबर अमर उजाला से ली है। नई दिल्ली डेटलाइन की इस खबर के अनुसार, उत्तर प्रदेश के रामपुर में सीआरपीएफ कैंप समेत कई आतंकी हमलों में शामिल लश्कर-ए-ताइबा आतंकी रजाउल्ला निजामनी उर्फ अबू सैफुल्ला खालिद की पाकिस्तान के सिंध प्रांत में हत्या कर दी गई। सैफुल्ला को पाकिस्तान सरकार ने सुरक्षा दी हुई थी। वह नागपुर स्थित आरएसएस मुख्यालय पर हमले का भी मुख्य साजिशकर्ता था। सवाल उठता है कि पुलवामा के हमलावरों का पता नहीं है, पहलगाम के हमलावर पकड़े नहीं गये और एक बड़ा आतंकी युद्द के बाद अब मारा गया। दूसरी ओर विदेश मंत्री स्वीकार कर चुके हैं कि हमले की सूचना पहले दी गई थी (भले इसका खंडन भी हो गया है)। ऐसे में युद्ध जैसी स्थितियां बनाकर ऑपरेशन सिन्दूर नाम देकर 100 आतंकियों के मारे जाने के दावे का क्या मतलब है? एक घोषित और ज्ञात आतंकी को तो पाकिस्तान ने खुद मार दिया दूसरी ओर हम अपने मंत्री के खिलाफ एफआईआर पर कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। एफआईआर लचर है सो अलग।   

पाकिस्तानी अफसरों के अनुसार, सैफुल्ला को रविवार को मतली में अज्ञात बंदूकधारियों ने गोली मार दी। उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां मृत घोषित कर दिया। मीडिया रिपोर्ट में इसे आपसी रंजिश का मामला बताया है। सैफुल्ला भारत में आतंकियों की घुसपैठ और आर्थिक मदद जुटाने जैसे गंभीर अपराधों को साजिश में जुटा था। वह लश्कर के ऑपरेशनल कमांडर आजम चीमा उर्फ बाबाजी और याकूब के साथ काम कर रहा था। लश्कर व जमात-उद-दावा के लिए फंड भी जुटाता था। खबर के अनुसार वह इन प्रमुख हमलों में मोस्ट वांटेड था – 2005: बंगलूरू में भारतीय विज्ञान संस्थान पर आतंकी हमला। आईआईटी के प्रो. मुनीश चंद्र पुरी मारे गए, चार लोग घायल हुए थे। 2006: नागपुर में आरएसएस मुख्यालय पर हमले का मास्टर माइंड। हमला करने वाले तीनों आतंकी मार गिराए गए थे। 2008 : रामपुर में सीआरपीएफ कैंप पर हमले में सात जवान शहीद हुए थे। एक नागरिक भी मारा गया था। अंधेरे का फायदा उठाकर दोनों आतंकी भाग निकले थे। नेपाल से नापाक मंसूबों को अंजाम सैफुल्ला लंबे समय तक फर्जी पहचान के साथ नेपाल में छिपकर रहा था। वह लश्कर के नेपाल मॉड्यूल का प्रमुख था और वहीं से नापाक मंसूबे अंजाम दे रहा था। उसके विनोद कुमार, मो. सलीम समेत कई छ‌द्म नाम थे। पर जो मारे गये उनका नाम भी नहीं बता है और यही बालाकोट में हुआ था तब बिना किसी आधार आतंकवाद खत्म होने का दावा किया गया था और विधानसभा चुनाव से पहले आतंकवाद खत्म करने का दावा किया गया। मुझे लगता है कि पहलगाम इसी का बदला लेने के लिए किया गया होगा।   

आज की एक और बड़ी व महत्वपूर्ण खबर है, किरेन रिजिजू का यह कहना कि सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल में भेजने से लिए भिन्न दलों से सांसदों के नाम नहीं मांगे गये थे। आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री सर्वदलीय बैठक में नहीं गये, बिहार में चुनाव प्रचार को प्राथमिकता दी, संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग पर कोई जवाब नहीं है और ऑपरेशन सिन्दूर के नाम पर युद्ध का जो खेल रचा गया (बदला लेने के लिए था पर बदले में ज्यादा मौतें हुईं) पाकिस्तान यह आश्वासन भी नहीं दिया कि वह आतंकी गतिविधियों को संरक्षण नहीं देगा और युद्ध विराम हो गया जिसके बारे में बताया जा रहा है कि उसकी कोई एक्सपायरी तिथि नहीं है। इससे पहले कहा जा चुका है कि सिन्धु संधि स्थगित करेगी और इन सब कार्रवाइयों से दुनिया में भारत की जो छवि बनी है उसे ठीक करने के लिए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजे गये हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि देश का प्रतिनिधित्व करने, सरकार की बातें रखने के लिए प्रतिनिधि मंडल का चयन सोच विचार कर करना चाहिये और सांसदों को ही भेजना है तो उन्हीं में से कोई जायेगा और विरोधाभास इतना है कि निशिकांत दुबे और शशि थरूर लगभग बराबर हो गये हैं। अभी तक की खबर से लग रहा था कि सिर्फ थरूर प्रधानमंत्री की पसंद हैं और इसका कारण भी लोग समझ रहे थे। अब टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर से साफ है कि सरकार मनमानी कर रही है और बांटो व राज करो की अपनी नीति सरकारी खर्च से लागू कर रही है। जहां तक भारत के सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल की बात है, दि एशियन एज की खबर के अनुसार पाकिस्तान भी अपनी टीम भेजेगा और यह डिप्लोमैटिक टीम होगी। इस तरह, इस मामले में न सिर्फ निशिकांत दुबे और शशि थरूर बराबर हो गये हैं, भारत और पाकिस्तान भी बराबर हो गया है।

स्पष्ट है कि बिहार और बंगाल चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी की केंद्र की सरकार चुनावी लक्ष्य पर काम कर रही है, प्राथमिकतायें तय कर रही है, रणनीति बना रही है और सरकारी पैसों से अपनी छवि बना रही है। तभी अखबारों की खबरें आम नागरिकों को डराने वाली हैं। अखबारों में यह खबर नहीं है कि ज्योति को जासूसी के लिए सूचनाएं कहां से मिलती थीं पर यह बताया गया है कि वह पाकिस्तान गई थी। इसके बाद आज प्रोफेसर की गिरफ्तारी की खबर तो है ही उड़ीशा के एक यू टयूबर पर भी नजर रखने की खबर है। ज्योति पर नजर रखा जा रहा था कि नहीं और नहीं रखा जा रहा था तो क्यों का जवाब नहीं है और पुरी में नजर रखने की खबर है। प्रधानमंत्री प्रेस कांफ्रेंस कर रहे होते तो ये सवाल पूछे जाते। नहीं करते हैं तो मीडिया को बताना जाना चाहिये कि इन खबरों से ये सवाल उठते हैं जिसका जवाब हमारे पास नहीं है। लेकिन अखबारों को इसकी जरूरत नहीं लगती है। इसी तरह राष्ट्रपति ने उन्हें आदेश देने के सुप्रीम कोर्ट के अधिकार का जो सवाल उठाया है उसपर तमिलनाडु के मुख्य मंत्री एमके स्टालिन ने गैर भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिखी है। राष्ट्रपति का यह सवाल संविधान की व्याख्या तक जायेगा। ऐसे में मुख्यमंत्रियों की भूमिका महत्वपूर्ण है लेकिन खबर सिर्फ हिन्दुस्तान टाइम्स में तीन कॉलम में है। आज जिन खबरों को ज्यादा महत्व दिया गया है उनमें एक खबर यह भी है कि इसरो का  पीएसएलवी 101 वें मौके पर नाकाम रहा। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह तीन कॉलम में है। हालांकि, अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर को ऑपरेशन सिन्दूर पर पोस्ट के लिए हरियाणा पुलिस ने गिरफ्तार किया भी तीन कॉलम में है। लगभग बराबर में और कह सकते हैं कि यहां तुलना विजय शाह से नहीं है तो 101वीं दफा (बार लिखना ठीक नहीं लग रहा है) से है। 

भारत सरकार के प्रचार में अमर उजाला ने पांच कॉलम में दो लाइन की लीड का शीर्षक लगाया है, भारत के दबाव का असर, आईएमएफ ने कर्ज के लिए पाकिस्तान पर लगाईं 11 शर्तें। नवोदय टाइम्स  में भी ही खबर लीड है, भले दो ही कॉलम में। परमाणु उर्जा वाले पाकिस्तान से युद्ध छेड़ने, उसके परमाणु केंद्र पर हमला और रिसाव की खबरों और उस दौरान सरकार और मीडिया की चुपी के बीच प्रधानमंत्री ने यह दावा किया है कि, “भारत परमाणु ब्लैकमेल से नहीं डरेगा”। कहने की जरूरत नहीं है कि इसमें भारत की जगह नरेन्द्र मोदी पढ़ा जाना चाहिये और उनके कहने भर से नहीं डरने का कोई कारण नहीं है और उनकी गारंटी 2500 रुपये में फिस्स हो चुकी है। पर ये सब मामूली खबरें हैं। असली खबर आज इंडियन एक्सप्रेस में है जिसका शीर्षक है, परमाणु ऊर्जा में तेजी के लिए सरकार निजी ऑपरेटर्स को अनुमति देगी, उनकी जवाबदेही सीमित करेगी। खबर के अनुसार, इससे संबंधित संशोधन मानसून सत्र में किये जाने की संभावना है। मुझे लगता है कि यह एक्सप्रेस की एक्सक्लूसिव खबर है और सरकारी घोषणा नहीं है। कारण चाहे जो हो। अगर यह सरकारी घोषणा होती तो सभी अखबारों में पहले पन्ने पर रहती।

आज पहले पन्ने की खबरों में एक खबर, “बिहार में चुनावी लाभ के लिए भाजपा की नजर ऑपरेशन सिन्दूर और जाति जनगणना पर” है। यह खर दि एशियन एज में है। आप जानते हैं कि ऑपरेशन सिन्दूर (यानी पाकिस्तान से युद्ध) सरकारी खर्चे पर लगभग जबरन किया गया और यह युद्ध कुछ दिन ज्यादा चल जाता तो संभव है कि सरकार की छवि को नुकसान होता इसलिये अचानक रोककर अब उसका लाभ उठाने की कोशश की जा रही है। फिर भी खबर तो छोड़िये चर्चा भी नहीं है और यह सब एक-दो साल में नहीं, 11 साल में हुआ है और आम लोगों के साथ अखबार भी डरे हुए हैं और डराने के लिए ही गिरफ्तारियां हो रही हैं उनकी खबरों को प्राथमिकता दी जा रही है। विदेशी संवाददाताओं को देश निकाला, अनिवासी भारतीयों को मिला ओसीआई का दर्जा खत्म कर परेशान किया जा रहा है। ऐसे में आज एक खबर यह भी है कि बांग्लादेश, म्यामार के जो लोग भारतीय नागरिक होने का दावा कर रहे हैं उनकी पुष्टि 30 दिन में की जानी है वरना उन्हें निर्वासित कर दिया जाये। इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के अनुसार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा गया है कि वे पर्याप्त डीटेंशन सेंटर बनायें ताकि निर्वासित करने से पहले लोगों को रखा जा सकेगा। इससे यह स्थिति बन सकती है और मैं गलत हो सकता हूं कि अधिकारी किसी को दस्तावेज न होने पर बांग्लादेशी (विदेशी) घोषित कर दें। गरीबों, कम पढ़े लिखे लोगों के मामले में यह बहुत आसान होगा। इन्हें डीटेंशन सेंटर में रख दिया जायेगा। वकील ये कर नहीं सकेंगे, दस्तावेजों का प्रबंध नहीं होगा, इनके करीबी भी यही हश्र होने से डरेंगे और अगर बांग्लादेश या बर्मा भी इन्हें अपना न माने तो डीटेंशन सेंटर में रहेंगे। कुछ महीनों या साल बाद छोड़ भी दिये जायें, भारतीय मान लिये जायें तो इस परेशानी का कोई मुआवजा नहीं मिलेगा। संभव है कि यह सिर्फ मुसलमानों के लिए हो लेकिन यह सब उस सरकार ने किया है जिसने बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री को लंबे समय तक शरण दिया है। चुनाव जीतने के लिये तमाम हथकंडे अपनाती रही है।

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