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मीडिया अब हिंदूहृदय सम्राट का डमरू यूँ ही नहीं बजा रही है!

रमा शंकर सिंह-

बड़े धनपिशाच घराने मीडिया पर क़ब्ज़ा महज़ उससे मुनाफ़ा कमाने के लिये नहीं करते बल्कि मीडिया को एक ख़ास नीति की दिशा में प्रबंधित कर जनमानस से अपनी पसंदीदा सरकार चुनवाने के लिये करते हैं। चुनाव बाद फिर ऐसा माहौल बनाते हैं कि सब कुछ बहुत अच्छा हो रहा है और वही हो रहा है जिसमें जनता व देश का हित है। यह भी कि इसके अलावा जो भी वैकल्पिक सोच रखता है वह समाज देश का द्रोही है।

ऐसी भांड मीडिया को ही नया नाम गोदी मीडिया दिया गया लेकिन भारत में गोदी मीडिया चाहे कोई भी नाम रहा हो पहले से ही विद्यमान रही है। हमने नेहरू काल से ही देखा है कि कैसे नेहरू व कांग्रेस विरोधी को तत्कालीन मीडिया यानी अख़बार पागल आवारा अराजक देशद्रोही घोषित करते रहे थे। इसका सबसे कुत्सित बदसूरत रूप डा० लोहिया को भुगतना पड़ा जिन्होंने आज़ाद भारत की नेहरू नीतियों पर सवाल उठाने शुरू कर दिये। पागल का ख़िताब मीडिया ने दिया और सरकार उन्हें बार-बार जेल में डालती रही।

वे ही अखबार १९७१ के बाद इंदिरा गांधी के सत्तानशीन होने पर क्या-क्या लिखते थे, चापलूसी में और जैसे ही आपातकाल लागू हुआ कि ९९% बुद्धिजीवी लेखक कवि पत्रकार सम्पादक और उनके मालिक आदि चरणों में लोटने लगे। जैसे ही आपातकाल हटा और नई जनता सरकार आई तो पल्टा खाया जो मात्र ढाई बरस में ही फिर से पलटी मारनी पड़ी। नेहरू की छवि राष्ट्र निर्माता, इंदिरा गांधी की दुर्गा, राजीव की आधुनिक विकास पुरुष अब सब पीछे छोड़ दिये गये हैं। मीडिया अब हिंदूहृदय सम्राट का डमरू बजा रही है।

यह मीडिया सरकार बदलते ही फिर बदलेगी लेकिन यह मुद्दा अब महत्व का नहीं। असल बात यह है कि जब सच्चाई जानने के इतने आधुनिक औज़ार टैक्नॉलजी ने दे दिये हैं तो मुट्ठी भर शिक्षित चेतन युवा उसका इस्तेमाल क्यों नहीं करते कि देश को पूरी सच्चाई पता होती रहे जो कभी भी एक पक्षीय नहीं हो सकती। वर्तमान मीडिया का ज़्यादा समय नहीं बचा है, जैसे अख़बार घरों में पैकिंग और रद्दी से उतना ही कमाने के लिये अब लिये जाते हैं और शायद ही कोई पढ़ता हो तो टीवी भी जल्दी ही ख़त्म होगा।

भविष्य के सोशल मीडिया का स्पेस भद्दी और हास्य भरी रीलों से इसलिए ही पाटा जा रहा है कि वहाँ भी सच्चाई उभर कर नहीं दिख सके।

मेरा और मेरे जैसों का निजी संकट किसी भी एक पक्षीय विरोधी व्यक्ति से अधिक बड़ा है। एकपक्षीय कुछ की गाली और कुछ का समर्थन पाता है जबकि दोनों को नकार कर अपनी वैकल्पिक बात करने वाले को दोनों ओर से गाली ही गाली मिलती है और फ़ेसबुक जैसे मंचों का पूरा अस्वीकार! होता रहे अपना रास्ता हम नहीं छोड़ने वाले!

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