देवप्रिय अवस्थी-
नई जगह, नया माहौल….
जनसत्ता से मुक्त होने के बाद काम की तलाश के सिलसिले में मैं सबसे पहले राजेंद्र माथुर से मिला. उन्होंने नवभारत टाइम्स के पटना संस्करण में नियुक्ति का प्रस्ताव किया और कहा कि भोपाल संस्करण जल्दी निकलने वाला है. बाद में वहां भेज देंगे. रज्जू बाबू ने मेरी नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी कार्यकारी संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह को सौंपी. एसपी ने पहले मुझे पटना के नवभारत टाइम्स और हिंदुस्तान की तुलनात्मक समीक्षा का काम सौंपा. उन दिनों पटना के दो-तीन दिन पुराने अखबार कूरियर से दिल्ली आते थे. उन्हें मैं नभाटा के दफ्तर से घर ले जाता और उन पर समीक्षात्मक नोट लिखकर एसपी को सौंपता. यह सिलसिला करीब एक महीने चला. फिर एसपी ने मुझे समीक्षा की समरी और अपनी कार्य-योजना पर दो अलग-अलग नोट बनाने को कहा.
संयोग से ये नोट बहुत अच्छे बन गए. इन्हें रज्जू बाबू और एसपी ने खूब सराहा. मेरे पटना जाने के पहले ही ये नोट वहां स्थानीय संपादक दीनानाथ मिश्र और अन्य साथियों को इस निर्देश के साथ भेज दिए गए कि वे इनमें सुझाए गए बिंदुओं पर अमल शुरू करें. इन नोटों की प्रतियां मैंने संभलकर नहीं रखीं. उनके कुछ बिंदु जरूर याद हैं. ये थे-मुखपृष्ठ पर राष्ट्रीय ख़बरों की बजाय राज्य/स्थानीय खबरों को प्राथमिकता दी जाए, हरेक पेज पर एक-दो शीर्षक भोजपुरी/मैथिली में लगाए जाएं, हफ्ते में दो-तीन संपादकीय बिहार पर केंद्रित हों आदि.
नवभारत टाइम्स में नियुक्ति की प्रक्रिया चल ही रही थी कि कुछ शुभेच्छु, जिनमें रामबहादुर राय प्रमुख थे, हिंदुस्तान, दिल्ली में मेरे लिए गुंजाइश तलाशने लगे. उन्होंने उसके तत्कालीन अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक नरेश मोहन से मेरी मुलाकात भी कराई. नरेश मोहन ने मुझे हिंदुस्तान के दिल्ली संस्करण से बतौर उप समाचार संपादक जोड़ने पेशकश की. चूंकि मैं रज्जू बाबू से मिल चुका था और उनका सकारात्मक जवाब भी मिला था इसलिए नरेश मोहन की पेशकश को विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया. नोटिस पीरियड पूरा होने के करीब एक सप्ताह बाद नवभारत टाइम्स, पटना के लिए नियुक्ति पत्र मिला.
नवंबर 86 के दूसरे हफ्ते में एक पद कम और लगभग समान वेतन मैं पटना चला गया. वहां की संपादकीय टीम के साथ तालमेल बैठाने में मुझे ज्यादा दिन नहीं लगे. वहां के लिए रज्जू बाबू-एसपी ने बेहतरीन टीम चुनी थी. कमी थी तो टीम में समन्वय कायम कर उससे अच्छा काम लेने वाले नेतृत्व की. स्थानीय संपादक दीनानाथ मिश्र उन दिनों अपनी संघी पृष्ठभूमि से इतर छवि बनाने में जुटे थे. उनका ज्यादातर समय एक्टिविस्टों के साथ गपियाने में जाता था. संपादकीय टीम दिशाहीनता की शिकार थी. जो बिहार अपनी जातिवादी, वर्गवादी राजनीति और चरित्र के लिए बदनाम था और जहां गैर-बिहारियों को प्रायः हिकारत से देखा जाता था वहां मुझे एक दिन भी गैर-बिहारी होने या फिर अवांछित होने का अहसास नहीं हुआ.
पटना में मैं पूरी तरह बिहारी बनकर रहा. साथियों में भी बिहारी होने का गर्व बोध कराने की कोशिश करता रहा.
मेरी पहल पर ही ख्यात शिक्षाविद रामेश्वर सिंह कश्यप की ‘लोहा सिंह की डायरी’ अखबार का नियमित स्तंभ बना. इसके रेडियो रूपांतर मैंने कभी आकाशवाणी के हवामहल कार्यक्रम में सुने थे. तब से इसके लेखक से मिलने की इच्छा थी. संयोग से साथी मुख्य समाचार संपादक विजय भास्कर का कश्यप जी से पूर्व परिचय था. हम दोनों ने कश्यप जी के घर जाकर उनसे लोहा सिंह की डायरी को मौजूदा संदर्भ में लिखने का आग्रह किया जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया. अखबार में छपने पर दीनानाथ जी अक्सर संपादकीय हाल में इस स्तंभ को सस्वर बांचते थे.
पटना के कई साथी आज भी मेरी यादों में रचे-बसे हैं. सुकांत नागार्जुन, मणिमाला, महेश खरे, राकेश नाराओ माथुर, श्रीचंद, उदय कुमार, गोपाल जोशी, किरण शाहीन, नवेंदु, रंजन कुमार सिंह, गुंजन कुमार सिन्हा, इंद्रजीत सिंह, उर्मिलेश, दिवाकर, किरण पटनायक, राजीव नयन बहुगुणा, प्रवीण बागी व्योमेश जुगरान, हरजिंदर, गंगाप्रसाद, नीलाभ मिश्र, सुभाष पांडेय, इंदु भारती (सिन्हा) आदि सभी की कुछ यादें जुड़ी हैं. इनमें से कई ने आगे चलकर खूब प्रगति की और नाम कमाया. कुछ अन्य अखबारों में मेरे सहकर्मी भी रहे.
चूंकि पटना में ज्यादा समय रुकने का इरादा नहीं था इसलिए मेरे पटना रहने के दौरान परिवार दिल्ली में ही रहा. पटना में एक हफ्ते तो दीनानाथ जी के साथ रहा. मणिमाला और हरजिंदर भी उनके साथ रहते थे. बाद में गुंजन कुमार सिन्हा के साथ रहा जिनके पास अपेक्षाकृत बड़ा मकान था.
पटना पहुंचे कुछ ही दिन हुए थे कि एक दिन बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे के सचिव दफ्तर आए. उन्होंने कहा कि मैं मुख्यमंत्री जी के साथ आपकी मुलाकात तय करा देता हूं. आप उनका इंटरव्यू कर लें. उन्होंने मुख्यमंत्री के कान्यकुब्ज ब्राह्मण होने का हवाला भी दिया. मैंने कहा कि मुख्यमंत्री का इंटरव्यू करने या उनसे मिलने में मेरी कोई रूचि नहीं है. जरूरत होगी तो हमारे रिपोर्टर इंटरव्यू कर लेंगे. अलबत्ता, मैं एक दिन राज्य के वरिष्ठ मंत्री सिद्धेश्वर प्रसाद से मिलने सचिवालय जरूर चला गया. सिद्धेश्वर जी अज्ञेय के कार्यकाल में नवभारत टाइम्स, दिल्ली में सहायक संपादक रह चुके थे और पटना संस्करण शुरू होने में उनकी भी भूमिका थी.
पटना में मेरा मन रमने लगा ही था कि फरवरी 87 के मध्य में जनसत्ता में उसके प्रस्तावित चडीगढ़ संस्करण के संपादकीय विभाग के लिए विज्ञापन आया. इसमें समाचार संपादक पद के लिए भी आवेदन मांगे गए थे. विज्ञापन में इच्छुक उम्मीदवारों में स्थानीय भाषा-बोली (पंजाबी) की जानकारी होने की शर्त शामिल थी. मैंने प्रभाष जी को पत्र लिखकर जनसत्ता में वापसी की इच्छा जताई. उन्हें लिखा कि मैं स्थानीय भाषा-बोली की जानकारी की शर्त पूरी करने के अलावा आपके बाकी पैमानों पर तो खरा उतरता ही हूं. जल्द ही जनसत्ता के पटना संवाददाता सुरेंद्र किशोर के माध्यम से प्रभाष जी का संदेश मिला कि उन्होंने मेरा अनुरोध स्वीकार कर लिया है. मैं जल्द से जल्द चंडीगढ़ पहुंचकर एडिशन निकालने की तैयारी शुरू करूं. सुरेंद्र जी ने यह भी बताया कि प्रभाष जी ने कूरियर से आफर लेटर भिजवाया है. हालांकि यह लेटर मुझ तक पहुंचने के पहले ही कहीं गुम हो गया.
रज्जू बाबू का बड़प्पन
सुरेंद्र किशोर से संदेश मिलने के बाद मैंने रज्जू बाबू और एसपी को पत्र लिखकर पटना नभाटा छोड़ने की जानकारी दी और क्षमायाचना की कि मेरे मुश्किल समय में उन्होंने जिस भरोसे से मुझे पटना में नियुक्ति दी थी, उस भरोसे को तोड़ रहा हूं. साथ ही, स्थानीय संपादक दीनानाथ जी के नाम औपचारिक रूप से इस्तीफा भी लिखा. चूंकि नभाटा, पटना में काम करते हुए मुझे छह माह पूरे नहीं हुए थे और मेरी सेवाएं स्थायी नहीं हुई थीं इसलिए नोटिस पीरियड की कोई बंदिश नहीं थी. मैंने वहां से मुक्त होने के लिए 10 दिन का समय मांगा था जो 31 मई 1987 को पूरा हो रहा था.
मेरा पत्र मिलते ही रज्जू बाबू ने नभाटा, पटना के जीएम योगेंद्र मोहन के माध्यम से मुझे निर्देश भेजा कि मैं फौरन दिल्ली आकर उनसे मिलूं. रज्जू बाबू के निर्देश पर विमान से मेरी दिल्ली यात्रा की व्यवस्था कंपनी ने ही की, हालांकि नियमानुसार मुख्य उपसंपादक विमान यात्रा के पात्र नहीं होते थे. दिल्ली पहुंचकर मैं बहुत सकुचाते हुए रज्जू बाबू से मिलने गया. वे बड़े प्रेम से मिले और बोले, बेहतर होगा कि कुछ दिन और पटना में काम करो. गुंजाइश बनते ही दिल्ली बुला लूंगा. चूंकि एक बार फैसला लेकर, भले ही वह अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा हो, उसे बदलना मेरी आदत में नहीं रहा है इसलिए मैंने रज्जू बाबू की बात नहीं मानी. रज्जू बाबू ने कहा भी- मैं जानता था कि तुम फैसला नहीं बदलोगे। फिर भी, दूसरी बार नभाटा छोड़ने के तुम्हारे फैसले पर एक बार आमने-सामने बैठकर बात करना मुझे जरूरी लगा. हिंदी के सर्वकालिक श्रेष्ठ संपादकों में एक का इतना बड़प्पन, इतना प्यार, इतनी आत्मीयता! पाकर किसका माथा नहीं फिर जाएगा? कौन बौरा नहीं जाएगा? अगर रज्जू बाबू और प्रभाष जोशी का इतना नैकट्य पाकर खुद पर इतराता हूं तो इसमें गलत भी क्या है?
पटना से विदाई
मार्च 1987 के आखिरी हफ्ते में एक दिन साथी सुकांत भोजन के लिए मुझे अपने घर ले गए. वहां पहली बार बाबा नागार्जुन के दर्शन किए. उनके साथ भोजन भी किया और बतियाया भी. एक दिन साथी रंजन कुमार सिंह भोजन के लिए अपने घर ले गए. उनके पिता शंकर दयाल सिंह (पूर्व सांसद) और परिवार के अन्य सदस्यों का सान्निध्य आनंददायक रहा. इसी तरह एक दिन बहन सरीखी किरण शाहीन के घर भोजन का आनंद लिया.
29 या 30 मार्च 1987 नभाटा, पटना में मेरा आखिरी दिन था. मुझे शाम 6:30 बजे की ट्रेन से दिल्ली के लिए निकलना था. उस दिन स्थानीय संपादक दीनानाथ मिश्र समेत संपादकीय विभाग के लगभग आधे साथी मुझे विदा करने पटना जंक्शन स्टेशन पहुंचे थे. इस तरह की विदाई मुझे और कहीं नहीं मिली. यह नवभारत टाइम्स में मेरी दूसरी पारी का अंत भी था.
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मेरी पत्रकारिता यात्रा (5) : मुझे लगा कि जनसत्ता में मेरे दिन पूरे हो गए हैं और अब मुझे यहां से मुक्त हो जाना चाहिए!


