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साहित्य

संजीव पालीवाल की किताब को लेकर अजय ब्रह्मात्मज ने ये क्या लिख दिया!!

अजय ब्रह्मात्मज-

मैंने ‘मुंबई नाइट्स’ पढ़ ली। पहले सोचा था कि पढ़ने के बाद इस पर विस्तार से लिखूंगा। मेरी राय जानने के बाद दोस्तों ने मना किया कि ना लिखूं। लिखना मुल्तवी।

सच्ची घटनाओं पर आधारित काल्पनिक कथाओं का अंतर्निहित प्रभाव यह होता है कि लोग उन कल्पनाओं को भी सच मान बैठते हैं। और फिर एक भ्रम तैयार होता है, जो धारणाओं को मजबूत करता है। फिल्मों के गॉसिप लेखन में भी यही प्रक्रिया काम कर रही होती है।

मित्रों की सलाह पर विस्तार से समीक्षा नहीं लिखने के बावजूद इतना अवश्य कहूंगा कि यह एक साधारण कृति है। इसके किरदार भी साधारण हैं। प्रचलित जानकारी, तथ्यों और धारणाओं को लेकर यह तुरंता लेखन है। यह कृति प्रकारांतर से एक आत्महत्या को हत्या साबित कर उस धारणा को मजबूत करती है, जो सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के समय फैलाई गई थी। साथ ही फिल्म इंडस्ट्री को गलीज, गंदी, सेक्स में डूबी इंडस्ट्री के तौर पर स्थापित करती है। आंशिक तथ्य को पूर्ण सत्य बताने की कोशिश है।

हां मैं जानना चाहूंगा कि शायनी चोपड़ा नामक किरदार पृष्ठ संख्या 83 और 122 पर शायनी आहूजा कैसे हो गई है। और पृष्ठ 161 पर शायनी अरोड़ा। इसी प्रकार पृष्ठ 33 पर विशाल सारस्वत का नाम विशाल चक्रवर्ती हो जाता है और पृष्ठ 156 पर गौरव खुराना का नाम गौरव वर्मा।

अजय ब्रह्मात्मज मुंबई के जाने माने वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार हैं.

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