
इंडियन एक्सप्रेस ने एनपीपी के नेता और मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा से बातचीत की है। उन्होंने कहा है कि मणिपुर में मुख्यमंत्री बदले बिना किसी प्रभावी कदम की संभावना नहीं है। मेरा मानना है कि कैलाश गहलोत के इस्तीफे को बड़ी खबर मानने–बताने वालों की जिम्मेदारी है कि वे उनसे पूछते और बताते कि उनने आम आदमी पार्टी से इस्तीफा क्यों दिया और भाजपा में शामिल हुए तो क्यों? खासकर तब जब यह आरोप है कि भाजपा ने उनपर दबाव डालकर, डर दिखा कर पार्टी छोड़ने के लिए मजबूर किया। आज यह छपा है कि उन्होंने इससे इनकार किया पर यह तो उनका दावा है और तब जो दूसरे सवाल पैदा होते हैं उनका जवाब क्यों नहीं है। अभी तक अखबारों ने जो किया है वह तो उनका और भाजपा का प्रचार है। आम आदमी पार्टी की बदनामी नहीं हुई हो तब भी।
संजय कुमार सिंह
वैसे तो मैं यहां अखबारों के पहले पन्ने की ही खबरें लिखता रहा हूं लेकिन आज मेरे आठ में से सात अखबारों के पहले पन्ने पर आधा और आधे से ज्यादा विज्ञापन है। दि एशियन एज अपवाद है। इसलिए सिर्फ पहले पन्ने की खबरों से बात नहीं बनेगी। वैसे भी जब मीडिया का हाल ही बताना है तो सिर्फ पहला पन्ना क्यों? इस लिहाज से एक पाठक के रूप में आज मैंने यह जानना तय किया कि आम आदमी पार्टी के मंत्री कैलाश गहलोत के भाजपा छोड़ने के बाद क्या प्रगति है। आप जानते हैं कि दिल्ली विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। भाजपा दिल्ली में लोक सभा की सारी सीटें जीत चुकी है और पहले भी जीतती रही है लेकिन विधानसभा में उसकी दाल नहीं गलती है। ऐसे में अलग और खास विचारधारा वाली पार्टी दिल्ली की 70 में से सात आठ सीटों (पहले इससे भी कम) पर संतोष करती रही है। झारखंड और महाराष्ट्र में भाजपा चुनाव जीते-हारे या किसी तरह सरकार बना ले (अब यह एक नई संभावना है), उसकी राजनीति और चुनाव प्रचार से साफ हो चुका है कि उसके पास न कुछ करने को है और ना चुनाव प्रचार में कहने को। यही नहीं, सरकार बनाने के लिए और सरकार में रहने के लिए कुछ भी कर सकती है और जो सब किया या हुआ वह जितना शर्मनाक है उतना अखबारों को नहीं लगता है।
जैसा मैंने कल बताया, अखबारों ने आम आदमी पार्टी से एक मंत्री या विधायक के अलग होने को भाजपा या राजग से सात विधायकों वाली एक पूरी पार्टी के अलग होने से ज्यादा महत्व दिया। भले बड़ी खबर का बड़ा असर हुआ है और उसकी खबर भी है लेकिन वह सभी अखबारों में नहीं है। इसके कारण हो सकते हैं पर यह अपने आप में गौरतलब है कि भाजपा जैसी पुरानी, बड़ी और सत्तारूढ़ पार्टी से सात विधायकों की पार्टी मणिपुर जैसे राज्य में डेढ़ साल चली हिंसा के बाद अलग हो और उसकी खबर आम आदमी पार्टी जैसी नई, मामूली और अपेक्षाकृत छोटी पार्टी से एक मंत्री के अलग होने की खबर के मुकाबले छोटी हो और कम छपे। फिर दोनों खबरों का ठीक से फॉलो अप भी न हो। मामला दिल्ली और मणिपुर का था फिर भी। तथ्य यह है कि दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने हैं और यह सत्तारूढ़ पार्टी की तैयारी भी हो सकती है। इसलिए इसमें खबर के तत्व ज्यादा है। पाठकों की जानने की इच्छा तो होगी ही। पत्रकारिता के नियमों, आदर्शों और जरूरतों का तकाजा है कि ऐसे लोगों के बारे में जनता को बताये और आज इंडियन एक्सप्रेस ने मणिपुर में भाजपा से अलग होने वाले एनपीपी के नेता और मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा से बातचीत की भी है। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसे नेताओं से उनके वोटर, आम नागरिक और मेरे जैसे पाठक बहुत कुछ पूछना और जानना चाहते हैं। 2014 से पहले अखबारों में ऐसे नेताओं से बात-चीत छपती थी वे करते भी थे और मेरा अनुभव है कि वे अपनी बात बताने के लिए न सिर्फ परेशान होते थे, तकलीफ उठाते थे और खर्च भी करते थे। अब मन की बात का जमाना है।
नरेन्द्र मोदी का जमाना आया तो न सिर्फ प्रेस कांफ्रेंस बंद हुई प्रधानमंत्री के विदेश दौरे के दौरान खाली सीटों पर पत्रकारों को ले जाना भी बंद कर दिया गया। पहले प्रधानमंत्री के साथ विमान की खाली सीट पर विदेश जाने वाले पत्रकार अगर अपनी या कंपनी के खर्चे पर होटल में ठहरते तो भारत सरकार का कोई अतिरिक्त खर्च नहीं होता और पाठकों को तरह-तरह की खबरें मिलती थीं। नरेन्द्र मोदी ने इसे बंद किया तो खबरें मिलना बंद हो गईं बाद में आरोप लगा कि उनके साथ उद्यमी और व्यवसायी जाते रहे हैं और सरकार उनके लिए काम करती रही है। जाहिर है पत्रकारों को साथ नहीं ले जाने का कारण कुछ और था पर पहले की सरकार और साथ जाने वाले पत्रकारों को बदनाम किया गया और अब सबको पता है भाजपा के पास इसके लिए ट्रोल सेना है जो नरेन्द्र मोदी की निजी उपलब्धियों में एक है। इसके लिए वे गालीबाजों को फॉलो करते हैं और लोग इसपर गौरवान्वित होते है। हालांकि यह पुराना और अलग मुद्दा है। भ्रष्टाचार मिटाने आई सरकार की इस शुरुआत के साथ मीडिया पर सरकारी नियंत्रण का आलम वही है जो कल मैंने बताया। आज मुझे यह सब इस लिए बताना पड़ा कि कैलाश गहलोत से किसी ने कोई बात नहीं छापी है जबकि कल उनके इस्तीफे की खबर को प्राथमिकता देने वाले को आज जरूर छापना चाहिये था। टाइम्स ऑफ इंडिया इनमें प्रमुख है लेकिन पूरे अखबार में उनका इंटरव्यू ढूंढ़ना टेढ़ी खीर है। इसीलिए मैं सिर्फ पहले पन्ने पर छपने वाली प्रमुख खबरों की बात करता रहा हूं और आज भी उसी अखबार के अंदर के पन्ने की बात कर रहा हूं जिसमें पहले पन्ने पर छोटी सी भी खबर हो।
अमर उजाला में आज कैलाश गहलोत की फोटो के साथ दो लाइन का शीर्षक और नौ लाइन की खबर है। शीर्षक है, गहलोत ने थामा कमल कहा – कोई दबाव नहीं। यह खबर का विस्तार अंदर होने की सूचना है। नवोदय टाइम्स में यह डेढ़ कॉलम की खबर भर है, कैलाश गहलोत भाजपा में। अंदर विवरण होने की सूचना नहीं है। अंग्रेजी अखबारों में दि एशियन एज ने पहले पन्ने पर ही छाप दिया है कि आम आदमी पार्टी छोड़कर गये कैलाश गहलोत भाजपा में शामिल हो गये हैं और आम आदमी पार्टी ने उनकी जगह रघुविन्दर शौकीन को मंत्री बना दिया है। हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर सिंगल कॉलम की खबर है। इसका शीर्षक है, गहलौत भाजपा में शामिल हुए, केंद्र सरकार के दबाव से इनकार किया। कहने की जरूरत नहीं है कि स्थितियां ऐसी नहीं है कि सिर्फ इनकार से बात बन जाये पर कोशिशें जारी हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया में भी यह खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर सिंगल कॉलम में है। शीर्षक है, आप छोड़ने के एक दिन बाद कैलाश गहलौत भाजपा में शामिल हुए। यह विवरण पेज 5 पर होने की सूचना है और यह भी कि गहलौत की जगह रघुविन्दर शौकीन अतिशी के मंत्रिमंडल में शामिल होंगे। इसके अलावा पहले पन्ने पर मुझे यह खबर नहीं दिखी। अंदर जो खबर छपी है उसमें मन की बात की तरह उनका एकतरफा प्रसारण है। कहीं कोई क्रॉस क्वेश्चन या काउंटर क्वेश्चन नहीं है। ऐसे में यह नहीं पता चलता है कि भाजपा की किन अच्छाइयों के लिए वे भाजपा में शामिल हुए हैं जबकि यह बताया गया था कि आम आदमी पार्टी की किन बुराइयों के लिए उन्होंने अपनी पुरानी पार्टी छोड़ी। दूसरी ओर, यह स्पष्टीकरण जरूर है कि यह सब उन्होंने किसी दबाव के बगैर किया है। इंडियन एक्सप्रेस के अलावा किसी और ने एनपीपी का पक्ष जानने की कोशिश नहीं की यह अखबारों से दूसरी शिकायत है।
एनपीपी के समर्थन वापस लेने की घोषणा का फॉलो अप नहीं के बराबर है और यह होना ही था क्योंकि समर्थन वापस लिये जाने की मूल खबर ही दबा दी गई थी। आज अकेले इंडियन एक्सप्रेस की लीड के अनुसार मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बिरेन सिंह और विधायकों ने केंद्र से कहा है कि कुकी आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई की जाये और आफस्पा की समीक्षा की जाये। आपको पता है कि हाल में जब दोबारा हिंसा शुरू हुई तो पूर्व में वापस लिये जा चुके आफस्पा को फिर ले लागू किया गया है और अब मुख्यमंत्री उसकी समीक्षा की मांग कर रहे हैं। आप समझ सकते हैं कि वहां कैसी और किसकी सरकार चल रही है। उपशीर्षक के अनुसार, मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली बैठक ने चेतावनी दी है कि मांगें नहीं मानी गईं तो एनडीए के विधायक और लोग फैसला करेंगे। इससे समझ में आता है कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार छोड़कर क्यों दिल्ली लौट आये होंगे। पर बाकी अखबारों ने यह सब इतनी प्रमुखता से नहीं बताया है।
ऐसे में आज द टेलीग्राफ की लीड भी खास है और इंडियन एक्सप्रेस की लीड का विस्तार कही जा सकती है। “पीड़ा:आरएसएस देखता है, प्रधानमंत्री नहीं देखेंगे” – शीर्षक से उमानंद जायसवाल की बाईलाइन और गुवाहाटी डेटलाइन की खबर इस प्रकार है : आरएसएस ने सोमवार को मणिपुर में “टकराव के तत्काल, ईमानदार समाधान” की मांग की। मणिपुर में भाजपा सरकार की सहयोगी नेशनल पीपुल्स पार्टी ने बिगड़ती स्थिति का हवाला देते हुए बीरेन सिंह सरकार को छोड़ दिया उसके एक दिन बाद वैचारिक अभिभावक ने भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र और राज्य सरकारों पर दबाव बढ़ाया है। इसका पता आरएसएस के मुखपत्र, ऑर्गनाइजर में की गई टिप्पणियों से चलता है। इसमें “स्थिति को तुरंत ठीक करने की केंद्र और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी” की बात कही गई थी। यह सलाह ऐसे समय आई है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मणिपुर का दौरा नहीं करने या संकट पर सार्वजनिक रूप से बोलने के अपने फैसले पर अड़े हुए हैं। दूसरी ओर, भाजपा पर दबाव अंदर से भी है। जिरीबाम में इसकी मंडल इकाई के आठ पदाधिकारियों ने जिरीबाम और मणिपुर में संपूर्ण तौर पर “अवांछित/असहाय” स्थिति के लिए पार्टी से संयुक्त इस्तीफा दिया है। ऑर्गनाइजर ने रविवार को आरएसएस की मणिपुर इकाई द्वारा जारी बयान को दोहराते हुए कहा है, “आरएसएस के अनुसार, निर्दोष लोगों की पीड़ा निरंतर जारी है, तथा अनसुलझा संघर्ष एक गंभीर मानवीय संकट बना हुआ है। अपने बयान में, आरएसएस ने हाल ही में हुए अत्याचारों, विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के अपहरण, बंदी बनाए जाने तथा उसके बाद उनकी हत्या की निंदा की तथा इन कार्रवाइयों को ‘कायरतापूर्ण तथा मानवता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के मूल तत्व के विपरीत’ करार दिया है।”
इसके अलावा आज की खबरें सामान्य हैं। मणिपुर में जब समर्थन वापस लिया गया, सरकार गिरने का डर बना तो न सिर्फ आरएसएस की नीन्द खुली भाजपा और सरकार भी सक्रिय हुई है। आज की दो बड़ी खबरों में एक मणिपुर में हिंसा रोकने के लिए केंद्रीय बलों के 5,000 सैनिक मणिपुर भेजने की खबर है जबकि दूसरी बड़ी खबर दिल्ली में प्रदूषण से संबंधित है। खबरों के अनुसार ग्रेडेड रेसपांस एक्शन प्लान (ग्रेप) 4 के प्रतिबंध लागू कर दिये गये हैं और सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगले आदेश तक जारी रहेंगे। यह दिलचस्प है कि प्रदूषण की चिन्ता में आतिशबाजी नहीं छोड़ने वाली दिल्ली की आबादी की चिन्ता अब सरकार और सुप्रीम कोर्ट कर रही है और आज खबर है कि स्कूल बंद कर दिये गये हैं। इसका मतलब यही है कि दीवाली पर पटाखे चलाना जरूरी मानने वालों के लिए बच्चों की पढ़ाई रोकी जा सकती है। खबरों और विज्ञापनों की इस भीड़ में झारखंड और महाराष्ट्र में कल मतदान है लेकिन पहले पन्ने की खबर सिर्फ टेलीग्राफ में है। कल झारखंड की थी आज महाराष्ट्र की है। इसके अनुसार, होर्डिंग से संकेत मिलता है कि भाजपा को बहुमत मिला तो देवेन्द्र फडणविस मुख्यमंत्री बनेंगे और इससे भाजपा के सहयोगी नाराज हैं। अगर कायदे से नाराज हुए तो इसका असर नतीजों पर भी होगा। पर यही भाजपा की राजनीति है। देखते रहिये।



