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शीतल बयार सी ‘निधि मैम’ और सही जगह लगे अल्पविराम से ‘असद सर’, पत्रकारिता के सबसे सुंदर हिस्से में जाकर बस गए!

प्रियदर्शन-

वह शुरुआतों का दौर था। अनजान लोग एक-दूसरे को पहचान रहे थे‌। तब तक नहीं पता था, इनमें से कई लोग लगभग एक पूरी उम्र साथ काम करने जा रहे हैं।

एक नया चैनल शुरू होना था‌- एनडीटीवी। वहीं पहली बार मिलीं निधि कुलपति। वह छह जनवरी २००३ की तारीख़ थी।

उस पहले दिन हमारे पास एक-दूसरे को पहचानने और आपस में बात करने के अलावा और कोई काम नहीं था। दोपहर बाद निधि और मैं उतरे और नीचे दादा की दुकान पर हमने ब्रेड पकौड़े खाए।

फिर दिन बीता, और भी दिन बीते, कुछ महीने बीते, नया चैनल शुरू हुआ, नई ऊर्जा से लैस, पत्रकारिता के मानक बनाता हुआ। फिर कई साल बीत गए। हमारे बाल सफ़ेद हो गए। हम युवा पत्रकारों की जगह वरिष्ठ होते चले गए।

कई लोग छूट गए, कई नए लोग आ गए। अर्चना बिल्डिंग भी छूट गई जहां की पचास सीढ़ियां बीस साल तक चढ़ते-उतरते हमने पत्रकारिता के कुछ मानक बनाए, सत्ता-प्रतिष्ठानों को नाराज़ किया।

काफी कुछ बदल गया। हम भी बदले। लेकिन कुछ था जो हममें नहीं बदला। निधि किसी ज़िद की तरह निधि बनी रहीं। उम्र भी उनके आगे हारती रही।

मैं भी बना रहा- अपने कई अनिश्चयों के साथ। और निधि के साथ एक रिश्ता बना रहा। प्रगाढ़ होता रहा। आत्मीय सहकर्मी और मित्र का।

हम कई बार आपस में उलझे भी, एक-दूसरे पर झुंझलाए भी, लेकिन जब भी ज़रूरत पड़ी- मदद की, मशविरे की, कभी-कभार अपनी उलझनें साझा करने की- हम बहुत भरोसे के साथ यह करते रहे।

कभी निधि ने मुझे बताया था- वे मुझसे उम्र में बड़ी हैं। बस यह राज़ मैंने पूरे न्यूज़ रूम में हर किसी से साझा कर लिया। निधि ने कहा, यह क्या किया। लेकिन तब तक उन्हें अपने सहकर्मी की फितरत मालूम हो चुकी थी।

निधि को सब जानते हैं, असदुर्रहमान क़िदवई को कम लोग जानते हैं। लेकिन एनडीटीवी डेस्क पर वे हमसे भी पहले से रहे। वे हमारे लिए असद रहे। ज़हीन शख्सियत के मालिक हैं। भीतर से संजीदा, ऊपर से शरारती। भाषिक चौकन्नेपन से लैस। उर्दू अदब और शायरी के गहरे जानकार। जितनी अच्छी स्मृति उतना ही अच्छा पाठ। शमशेर बहादुर सिंह ने जो लिखा था, उसका आईना- ‘मैं हिंदी और उर्दू का दोआब हूं, मैं वह आईना हूं जिसमें आप हैं।’ उनमें एक प्रखर परिहास-बोध है- कभी-कभी असुविधाजनक होता हुआ भी।

कल निधि विदा हुईं, आज असद जा रहे हैं। जाने को एक दिन हम सब चले जाएंगे। दुनिया का कारोबार चलता रहेगा। लेकिन उसकी रौनक कुछ कम हो जाएगी।

टीवी की जिस दुनिया का कारोबार हम चला रहे हैं वह वैसे ही लगातार बेनूर और बेमानी हुई जा रही है- स्क्रीन पर जितनी चमक-दमक, जितना शोर है, ख़बरों में उतना ही अंधेरा और उतनी ही चुप्पी है। सच के कपड़े पहने झूठ हर तरफ़ घूम रहा है।

तस्वीरें मेरे पास नहीं होतीं। कल निधि के साथ तस्वीर लेने की होड़ लगी रही। कुछ समूहों में मैं भी रहा, लेकिन वे मेरे पास नहीं हैं। मगर कुछ बरस पहले असद ने बिना बताए एक तस्वीर हमारी ली थी। तो इसमें हम तीनों हैं- दो उपस्थित, तीसरा अदृश्य।

वैसे अदृश्य-अनुपस्थित होने का समय हम सबके लिए आ रहा है। नासिर काज़मी याद आता है – ‘किसे ढूंढ़ोगे इन गलियों में नासिर / चलो, अब घर चलें दिन जा रहा है।’


अनुराग द्वारी-

न्यूज़रूम का एक युग ढल गया – असद सर और निधि मैम.. “कुछ लोग वक़्त से नहीं जाते, वो वक़्त बन कर रहते हैं।”

असदुर्रहमान क़िदवई सर, जो शब्दों से नहीं, साए से सिखाते थे…वो दस्तार भी नहीं चाहते थे, ना ही तालियाँ। बस चाहते थे कि कोई एक शख़्स ठीक से लिखे — और वो काफी होता।

असद सर की मौजूदगी कमरे में नहीं, वाक्यों में होती थी। कभी सही जगह पर लगे अल्पविराम की तरह — न दिखाई देते, न सुनाई देते, लेकिन पूरे पाठ को संतुलन में रखते।

न उन्होंने दौड़ में भाग लिया, ना कभी हाशिए पर रहने का दुख जताया। उनकी मुस्कान में एक बगावत थी — जो कहती थी कि तेज़ नहीं, ठहराव भी ज़रूरी है।

न्यूज़ की उस तेज़ रफ़्तार में, जहाँ लोग स्क्रीन पर दिखने की चाह में टूट पड़ते हैं, असद वो थे, जो कुर्सी पर बैठे-बैठे ‘गुस्ताख़ी माफ़’ का आइडिया दे जाते थे।

उनकी विदाई, दरअसल किसी इनबॉक्स से एक अंतिम ड्राफ्ट का हटना नहीं है वो तो जैसे यूनिकोड में दर्ज एक आदर्श की फाइल का डिलीट होना है।

निधि मैम, जैसे महादेवी वर्मा की कविता — धीरे-धीरे उतरती, छूती, महसूस कराती हुई। निधि कुलपति मैम उस दौर की आख़िरी मुनादी थीं, जब ख़बर बोलती थी, चीख़ती नहीं थी।

एक साड़ी, एक मुस्कान, एक आवाज़ — हर दिन कैमरे के सामने वो परंपरा की तरह खड़ी होती थीं। बिना शोर के, बिना दिखावे के, एक भरोसे की तरह।

उन्हें देखकर यह यक़ीन होता रहा कि स्क्रीन पर गरिमा अब भी जीवित है। निडरता, मर्यादा और शालीनता के इस त्रिवेणी संगम की विदाई सिर्फ़ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पत्रकारिता की आत्मा की विदाई है।

एक साथ दो रूहें चली गईं — एक जो शब्दों में रहती थी, एक जो स्वर में। दिल्ली के न्यूज़रूम में शायद कुछ आंसू बह भी गए होंगे, कुछ गले मिले होंगे, कुछ तस्वीरें ली गईं होंगी। लेकिन हम — दूर बैठे, भोपाल की खिड़की से झांकते, बस टिमटिमाती पुरानी ईमेल्स, फोटो ऐल्बम और धुंधली यादों को निहारते रहे।

NDTV का न्यूज़रूम अब भी होगा, लपटें अब भी उठेंगी, शो अब भी चलेंगे। लेकिन एक कोना, जहां चुपके से असद सर बैठे होते थे — खाली रहेगा। और एक लहर, जो निधि मैम की आवाज़ से उठती थी — थम गई।

कुछ चुप्पियाँ चीख़ों से ऊँची होती हैं, और कुछ मुस्कानें — पूरी किताब होती हैं।” आप दोनों ने हमारे भीतर बहुत कुछ रखा, जिसे अब शब्द नहीं, एहसास ही कह सकते हैं।

निधि मैम, असद सर — शुक्रिया। आप केवल रिटायर नहीं हुए — आप हमारी पत्रकारिता के सबसे सुंदर हिस्से में जाकर बस गये हैं … हमेशा के लिये

निधि मैम को तो सब जानते हैं उनके ठीक पीछे – शांत, संजीदा, सजग… असद सर आज थोड़ा पीछे खड़े हैं — पर नजरों से नहीं, असर से गायब नहीं हुए हैं। अब कुछ सालों से, टीवी पर कम दिखते हैं, पर न्यूज़रूम की धड़कनों में अब भी उनकी सोच की गूंज है।

इस तस्वीर में — भीड़ से अलग, फिर भी सबसे जुड़ते हुए, नज़रें अब भी सब पर, शब्द अब भी उनके भीतर चुपचाप चल रहे हैं।

वो जो कम बोले अब, पर जब बोलते हैं — तो समय रुकता है, और हर पत्रकार फिर से सीखता है तटस्थता का मतलब।

वैसे तो कई यादें हैं लेकिन बाबा की कविता और निधि मैम की एंकरिंग वाली ये स्टोरी मानसून एक्सप्रेस के दौरान 15 साल पहले की हैं, जो स्मृति में है


संजय सिन्हा-

शीतल बयार सी एक एंकर…

आप में से बहुत कम लोग होंगे जो निधि कुलपति को व्यक्तिगत रूप से जानते हों, लेकिन मीडिया जगत के हर व्यक्ति ने उन्हें जरूर देखा और महसूस किया है।

तो आज निधि की कहानी क्यों? असल में यह कहानी मुझे कल सुनानी चाहिए थी। कल ही तो निधि कुलपति (58) एनडीटीवी से रिटायर हुईं। मुझे न उनकी उम्र का पता था, न ही रिटायरमेंट की खबर थी। वैसे भी पत्रकार रिटायर होते हैं, यह जानकर अक्सर हैरानी होती है।

पत्रकार, चित्रकार, लेखक और फिल्मी कलाकार आखिर कब रिटायर होते हैं? और कैसे? क्या मेरे दत्तक पिता शंभू नाथ शुक्ल रिटायर हो गए? एक दशक पहले मासिक वेतन वाली नौकरी से मुक्त हो गए, लेकिन पत्रकारिता उनसे कब छूटी?

और क्या अमिताभ बच्चन रिटायर हो गए? उम्र के उस पड़ाव पर जहां लोग आराम कुर्सी पकड़ लेते हैं, वे आज भी स्क्रीन पर उतने ही प्रभावशाली हैं। कहने को तो कुमार गौरव रिटायर हो गए थे – वो भी किशोरावस्था से निकलते ही! जबकि उनकी उम्र, ऊर्जा और चेहरा सब परदे के अनुकूल था। पर रिटायरमेंट का असली मतलब क्या होता है? क्या केवल पेशेवर मंच से गायब होना ही रिटायर होना है?

मेरे हिसाब से कुछ पेशे ऐसे होते हैं जिनमें तनख्वाह भले खत्म हो जाए, पर पेशेवर कभी रिटायर नहीं होता। खुद मैं, बिना औपचारिक रिटायरमेंट के, रिटायर-सा हो गया हूं।

कुल बात ये है – पत्रकार रिटायर नहीं होते। बल्कि, पत्रकार और शिक्षक तो उम्र के साथ और परिपक्व होते हैं। अनुभव उन्हें खरा करता है। ऐसे में जब सुना कि निधि कुलपति रिटायर हो गईं, तो एक अजीब-सा खालीपन महसूस हुआ।

ख़ैर, ये लेख रिटायरमेंट की खबर पर नहीं है। मैं तो निधि को इसलिए याद कर रहा हूं क्योंकि जब पहली बार उन्हें एंकरिंग करते देखा था, तो पहली झलक में यही लगा था – माधुरी दीक्षित न्यूज़ पढ़ रही हैं। उस वक़्त ज़ी टीवी नया-नया था और रात 9 बजे न्यूज़ लाता था। निधि उसमें दिखीं। मैंने उन्हें बेहद गंभीरता से सुना – न कोई चूक, न चीख, न हड़बड़ी। वे लगातार, सहजता से पढ़ती रहीं।

मैं तब जनसत्ता में था और संतुष्ट प्रवृत्ति का इंसान होने के कारण कहीं और जाने की कल्पना तक नहीं की थी। पर कहते हैं न, होनी होकर रहती है। टाइम्स ऑफ इंडिया के एक अधिकारी से दोस्ती हुई, और फिर जब वे ज़ी टीवी गए तो मेरा ध्यान भी उधर गया।

1988 में जनसत्ता में आया था, 1999 में ज़ी के नोएडा ऑफिस में था। इस बदलाव की कहानी फिर कभी सुनाऊंगा। ज़ी में निधि मेरे सामने थीं – वही निधि, जिन्हें मैं टीवी पर रात में न्यूज़ पढ़ते देखता था।

आज स्वीकार करता हूं कि मेरे टीवी जगत से प्रेम में निधि कुलपति की बड़ी भूमिका रही। वह सौम्य थीं, सुलझी हुई थीं, गरिमामयी थीं। धीरे-धीरे उनसे संवाद हुआ, दोस्ती हुई।

ज़ी में जब मैंने ज्वाइन किया था, वहां राजनीति अपने चरम पर थी – किसी को मारो, किसी की चुगली करो। जनसत्ता में राजनीति थी, पर वह मजदूर और मालिक के बीच की थी। यहां तो पूरी ‘कहानी घर-घर की’ चल रही थी।

विभिन्न गुट थे – रजत शर्मा (तब वो जा चुके थे), सुधीर चौधरी, विनोद कापड़ी, शैलेश, उमेश उपाध्याय, आलोक वर्मा, राकेश खार…। लेकिन निधि इन सबसे परे थीं। वो न किसी गुट का हिस्सा थीं, न किसी राजनीति का। उनकी एंकरिंग का अंदाज़ आज भी पत्रकारिता में पढ़ाए जाने योग्य है।

कल जब संजय किशोर ने निधि के रिटायरमेंट की खबर पोस्ट की, तो मैंने वहीं लिखा, “वो भारत की बेस्ट एंकर हैं।” और मैं अपने उस कथन पर कायम हूं। जो कोई भी मीडिया में एंकरिंग करना चाहता है, उसे निधि कुलपति को ढूंढकर देखना चाहिए। समझना चाहिए कि न्यूज़ कैसे पढ़ी जाती है।

मैंने कल लिखा था , “वो जेठ की दुपहरी में शीतल बयार हैं।” सचमुच हैं। निधि कुलपति रिटायर नहीं हुई हैं। अभी तो वो 58 की हुई हैं, 85 की हो जाएंगी तब भी नहीं होंगी। वो अब भी हमारे दिलों में हैं।

हमारे मन के टीवी में उनकी मोहक मुस्कान और मिश्री-सी आवाज़ हमेशा गूंजती रहेगी। संजय सिन्हा इंतज़ार करेंगे दूसरी पारी में उन्हें कुछ नया करते देखने के लिए। बस, आज इतना ही।

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