सात काम सौंप गए प्रभाष जी

प्रभाष जी से मेरा पहला परिचय जेपी आंदोलन के समय में उस समय हुआ जब वे रामनाथ गोयनका के साथ जयप्रकाश नारायण से मिलने आए थे। उस समय की वह छोटी सी मुलाकात धीरे-धीरे प्रगाढ़ संबंध में बदल गई। बोफोर्स मुद्दे को लेकर जब पूरे देश में कांग्रेस के खिलाफ आवाज उठने लगी तब उन्होंने मुझे भारतीय जनता पार्टी में भेजने के लिए संघ के अधिकारियों से बात की। उनका मानना था कि जेपी आंदोलन के दौरान जो ताकतें कांग्रेस के खिलाफ सक्रिय थीं, उन्हें फिर से एकजुट करने में मेरी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। वीपी सिंह की सरकार बनने के पहले और बाद में भी मेरा उनसे लगातार संपर्क बना रहा।

कठिनाई-गरीबी में खुश रहना जानते थे पिताजी

प्रभाषजी पर पीआईबी में शोकसभा का आयोजन : ‘प्रभाष जी न किसी के जीवन में हस्तक्षेप करते थे और न ही अपने या अपने परिवार के जीवन में किसी का हस्तक्षेप बर्दाश्त करते थे.’ यह जानकारी आज भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) में बुलाई गयी एक शोक सभा में उनके करीबी सहयोगी और वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने वहां मौजूद लगों को दी. पीआईबी के इतिहास में शायद पहली बार किसी वरिष्ठ पत्रकार की याद में शोक सभा का आयोजन किया गया जो कि कभी सरकारी पद पर न रहा हो. पीआईबी की महानिदेशक नीलम कपूर की पहल पर हुए इस आयोजन में कई वरिष्ठ पत्रकार और पीआईबी के अधिकारी मौजूद थे. प्रभाष जी के पुत्र सोपान जोशी ने बताया कि वे कठिनाई और गरीबी में बहुत खुश रहना जानते थे और उनके इस सदगुण को वे हमेशा याद रखना चाहते हैं. प्रभाष जी जब १९५५ में घर से निकल गए थे तो पत्रकारिता करने नहीं गए थे. वह तो संयोग था कि उन्हें हमेशा अच्छे सम्पादक और मालिक मिले और मिलते गए. सोपान ने राहुल बारपुते, नरेंद्र तिवारी और राम नाथ गोयनका का ज़िक्र किया.

‘पिताजी के छूटे काम पूरा करने में मदद करें’

श्रद्धांजलि सभा में सोपान जोशी बोले : पत्रकार प्रभाष जोशी के निधन पर आयोजित श्रद्धांजलि सभा में प्रभाष जी के बेटे सोपान जोशी ने कहा कि जो काम पिता अधूरा छोड़ गए हैं वे पूरे हो जाएं, लोग मिलकर मदद करें, यही उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी। प्रभाष जोशी के छोटे भाई सुभाष जोशी ने कहा कि वे जो भी काम शुरू करते थे, उसे पूरा होने तक बड़े मनोयोग से करते थे। उन्होंने कहा कि उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि यही हो सकती है कि हम उनके अधूरे सपनों को पूरा करने की दिशा में बढ़ें।

कहीं हम चौथा खंभा भी न खो बैठें

यदि लोकतंत्र में प्रेस का गलत तरीके से इस्तेमाल किया जाता रहेगा तो लोकतंत्र का चौथा खंभा होने का दावा भी खो बैठेंगे। यह कहना था प्रेस इंस्टीच्यूट आफ इंडिया के पूर्व निदेशक और वरिष्ठ पत्रकार अजित भट्टाचार्य का। दिग्गज पत्रकार प्रभाष जोशी की याद में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में श्रद्धांजलि देते हुए भट्टाचार्य ने कहा कि जोशी खबरों के प्रकाशन में धन लेने की नई प्रवृत्ति के विरोधी थे। उन्होंने तमाम वरिष्ठ पत्रकारों को इसके खिलाफ एकजुट किया। मैंने और उन्होंने अपने दस्तखत से प्रेस कौंसिल आफ इंडिया में याचिका भी दायर की। उन्होंने बताया कि जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के दौरान आपातकाल का विरोध करते हुए उन्होंने ‘प्रजानीति’ का संपादन किया। उनका लेखन, संपादन बाद में ‘जनसत्ता’ के प्रकाशन में और निखरा। वे जन सरोकार के आंदोलनों में भी बेहद सक्रिय रहे।

प्रभाष जी की आत्मा को शांति नहीं चाहिए

आलोक तोमरप्रभाष जोशी चले गए। उनकी अस्थियां भी उस नर्मदा में विसर्जित हो गई जिस वे हमेशा मां कहते थे और अक्सर नर्मदा को याद कर के इतने भावुक हो जाते थे कि गला भर आता था। इन दिनों हमारे प्रभाष जी को ले कर संवेदनाओं के लेख, संस्मरण और शोक सभाओं का दौर चल रहा है। वे लोग जो कुछ दिन पहले तक इंटरनेट पर प्रभाष जी को इस युग का सबसे पतित, मनुवादी और ब्राह्मणवादी पत्रकार करार दे रहे थे, उनकी बोलती बंद है। उनमें से कई तो उनके निधन पर घड़ियाली आंसू भी बहाते दिखे।

अंतिम नर्मदा स्नान के बाद पृथ्वी से देह का प्रस्थान

चार महीने पूर्व नर्मदा के उत्तर तट पर कुछ समय बिताने के लिए आए प्रभाष जोशी की इच्छा यही थी कि जब वे प्राण त्यागें तो उनका अंतिम संस्कार इसी नर्मदा तट पर किया जाए। नर्मदा के प्रति प्रभाष जी का आत्मीय लगाव और असीम श्रद्धा थी। शनिवार को करीब 11 बजे नावघाटखेड़ी में उनका पार्थिव शरीर इंदौर से लाया गया। कुछ समय के लिए शरीर दर्शनार्थ रखे जाने के बाद प्रभाष जी को नर्मदा स्नान कराया गया। दिन में 12 बजे पार्थिव शरीर को पुत्र संदीप जोशी ने मुखाग्नि दी। इस प्रकार प्रभाष जी पंचतत्व में विलीन हो गए और इस दुनिया से उनकी देह भी हमेशा के लिए गायब हो गई।

अंतिम संस्कार के लिए नर्मदा तट पर लाए जाने से लेकर मुखाग्नि दिए जाने तक की तस्वीरें खंडवा से सदाकत पठान ने भेजी हैं। इसके लिए भड़ास4मीडिया उनका आभारी है।

कुछ चुनिंदा तस्वीरें इस प्रकार हैं-

प्रभाष जोशी की पसंद के दो प्रिय भजन सुनिए

प्रभाषजी के प्रिय गायक कुमार गंधर्व की आवाज में कबीर की दो रचनाएं… उपर- उड़ जाएगा हंस अकेला…प्रभु दर्शन का मेला… और नीचे- झीनी झीनी बीनी चदरिया… दास कबीरा जतन से ओढी… ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया…

प्रभाष जी – पत्रकारिता के ‘जवाहर’

गिरीश मिश्रसुबह-सुबह जब खबर मिली कि प्रभाष जोशी नहीं रहे तो दिल-दिमाग धक् सा रह गया। प्रभाष जी का जाना वैसे तो पूरे पत्रकारिता जगत की बड़ी क्षति है। लेकिन, हिन्दी पत्रकारिता के लिए तो एक मजबूत स्तम्भ के गिरने जैसा है। 73 साल के इस बुजुर्ग पत्रकार ने जिस युवा जोश के साथ ‘डिरेल’ होती पत्रकारिता को फिर से पटरी पर लाने, उसे मूल्यगत और मर्यादित करने की मुहिम छेड़ी थी- वो कोई साधारण काम नहीं था। और, निश्चित रूप से ये काम कोई उनके जैसा बिरला ही कर सकता था।

अंतिम यात्रा और इंदौर की असंवेदनशीलता

इंदौर की माटी में रचे-बसे व बड़े होने के बाद भी बहुत दुख के साथ यह इसलिए लिखना पड़ रहा है कि जब पत्रकारिता के पुरोधा प्रभाष जोशी का शव राज्य सरकार के विशेष विमान से शुक्रवार शाम इंदौर विमानतल पर लाया गया तब वहां गिने हुए चार पत्रकार, एक फोटोग्राफर व एक लोकल चैनल के कैमरामैन के अलावा पत्रकार बिरादरी से कोई मौजूद नहीं था। जो दूसरे शख्स वहां मौजूद थे उनमें सांसद सज्जनसिंह वर्मा व उद्योगपति किशोर वाधवानी के अलावा कांग्रेस के आधा दर्जन नेता, चार-छह रिश्तेदार, चचेरे भाई महेंद्र जोशी व सुख-दुख के साथी सुरेंद्र संघवी शामिल हैं। जिन प्रभाष जोशी को दिल्ली से अंतिम विदाई देने के लिए उनके वसुंधरा स्थित निवास से गांधी प्रतिष्ठान व दिल्ली विमानतल तक पत्रकार बिरादरी के सैकड़ों साथ रहे हों वहीं उनके प्रिय इंदौर में ऐसा क्यों हुआ, यह समझ से परे है।

पैकेज पत्रकारिता से प्रभाषजी दुखी थे

पत्रकारिता के महानायक थे प्रभाष जोशी : नागपुर : हिंदी पत्रकारिता के मूर्धन्य पत्रकार प्रभाष जोशी को श्रद्धांजलि देते हुए ‘लोकमत’ के संपादक और वरिष्ठ साहित्यकार सुरेश द्वादशीवार ने कहा कि वे सदैव सत्य के प्रति निष्ठावान रहे। यही कारण था कि वे पहले विनोबा भावे और बाद में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के साथ कार्य करते रहे। तिलक पत्रकार भवन में प्रभाष जोशी को श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित कार्यक्रम में द्वादशीवार ने मुंबई में उनके साथ बिताए क्षणों को बखूबी याद किया। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता की गरिमा को जब भी ठेस पहुंची, उन्होंने अपनी आवाज बुलंद की। हिंदी पत्रकारिता के प्रमुख स्तंभ रहे जोशी के निधन के साथ ही हिंदी पत्रकारिता के एक युग का अवसान हो गया। उन्हें परंपरा और आधुनिकता के साथ भविष्य पर नजर रखने वाले पत्रकार के रूप में सदा याद किया जाएगा।

ऐसी खबर जनसत्ता ही छापेगा, प्रभाषजी को भेज दो

जुलाई 1983 में मैं गोरखपुर से लखनऊ आया और ‘प्रतिदिन’ सांध्य दैनिक में अखिलानंदजी और बाद में सुरेश द्विवेदी (पूर्व संपादक, नवजीवन) के सानिध्य में पत्रकारिता का ककहरा सीख रहा था. इसी दौर में जनसत्ता का दिल्ली से प्रकाशन शुरू हुआ था. लखनऊ में जनसत्ता दोपहर के बाद पहुंचता था और उसके चाहने वाले उसका बेसब्री से इंतजार करते थे. कारण जनसत्ता हिन्दी पत्रकारिता को लेखन की एक नई दिशा दे रहा था. उन्हीं दिनों श्रीपति मिश्र उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. 1984 में मुख्यमंत्री के बेटों ने अधिकारियों को प्रभाव में लेकर गलत तरीके से एक पुरानी इमारत, जहां खादी ग्रामोद्योग बोर्ड का मुख्यालय था, के खाली पड़े भूभाग को अपने नाम करा लिया और उस पर आलीशान मकान बनवाना शुरू कर दिया. विपक्ष से जुड़े तमाम नेताओं ने इस मुद्दे पर हो-हल्ला तो शुरू किया लेकिन मीडिया चुप्पी साधे रही. मीडिया की चुप्पी के पीछे खास कारण एह रहा कि कतिपय बड़े पत्रकारों को इस खबर को दबाने के लिए गोमती नगर में प्रस्तावित पत्रकारपुरम में भूखण्ड देने का आश्वासन मिला था.

वह आवाज और आज के संपादकों की म्याऊं-म्याऊं

प्रभात रंजन दीन…अभी नहीं मरूंगा मैं, कभी नहीं मरूंगा मैं… फील्ड मार्शल मानिक शॉ के निधन पर लेख लिखते समय नीरज की कविता की यह पंक्ति याद आ गई थी। पत्रकारीय विधा के योद्धा आदरणीय प्रभाष जोशी जी के दिवंगत होने पर आज उन्हीं पंक्तियों से शुरुआत करता हुआ लिख रहा हूं… ‘मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा’… और तेरा ही तुझको सौंप रहा हूं… अग्रज आलोक तोमर जी और अनुज यशंवत जी के अनुभव और संस्मरणों ने जिंदगी के कैनवस पर बनते-मिटते अनगिनत स्मृति रंगों को एक बार फिर जैसे साकार कर दिया हो।

यूं दबे पांव चले जाना उनका स्वभाव ही नहीं था

श्रवण गर्गपत्रकारिता के कबीर पुरुष का अवसान : कोई चालीस साल पहले, गांधी शताब्दी वर्ष के दौरान, तब बत्तीस-तैंतीस वर्ष के प्रभाष जोशी इंदौर के निकट स्थित कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट के कार्यकारी मंत्री स्व. श्यामलालजी की एक सिफारिशी चिट्ठी गांधी स्मारक निधि, राजघाट के सचिव देवेन्द्र कुमार गुप्ता के नाम लेकर महानगर दिल्ली पहुंचे थे। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अपने दिल्ली आने पर कभी अफसोस भी जाहिर नहीं किया। बस अपनी मेहनत और असीमित ऊर्जा के दम पर मालवा की संस्कृति, उसकी जुबान और उसके मुहावरे को किसी की भी कद्र नहीं करने वाली दिल्ली की छाती पर स्थापित कर दिया। वर्ष 1991 में राजेन्द्र माथुर के असामयिक निधन के कोई अट्ठारह सालों के बाद प्रभाष जोशी का यूं चुपचाप चले जाना हिन्दी पत्रकारिता के लिए दूसरा बड़ा घाव है। जो लोग प्रभाषजी को नजदीक से जानते रहे हैं उनके लिए यकीन करना मुश्किल है कि वे इस तरह से दबे पांव चले जाएंगे, बिना किसी को खबर किए हुए। उनका ऐसा स्वभाव ही नहीं था। वे जब कहीं प्रवेश करते या कहीं से प्रस्थान करते, पता चल जाता था कि प्रभाषजी आए और गए हैं।

प्रभाष जी का अंतिम ‘कागद कारे’

पहली नवंबर को प्रभाष जोशी का अंतिम ‘कागद कारे’ जनसत्ता में छपा। इंदिरा गांधी पर था। पर इंदिरा के बहाने आज के दौर की जिस सूक्ष्मता से पड़ताल उन्होंने की है वह अद्वितीय है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इस कागद कारे को जरूर पढ़ें, लंबा है, लेकिन धैर्य के साथ पढ़ेंगे तो प्रभाष जी की दृष्टि को समझ सकेंगे।  -एडिटर, भड़ास4मीडिया

हम परदेसी पंछी

हरिवंशगुरुवार देर रात रांची लौटा. बाहर से. दफ्तर आया. कुछेक लोगों को पत्र लिखा. उनमें प्रभाषजी भी थे. फ़िर घर लौटा. सो गया. तड़के नींद खुली. सूचना मिली. प्रभाषजी नहीं रहे. गहरा झटका और आघात. जिनकी सोहबत ने मांजा, ताकत दी, दृष्टि दी. वह नहीं रहे. अचानक गये. याद आया इसी तरह धर्मवीर भारती गये. गणेश मंत्री गये. जिनके सानिध्य में काम करना सीखा. जहां पत्रकारिता, जीवन के संस्कार व मूल्य बने- विकसित हए. भाई सुरेंद्र प्रताप सिंह और उदयन जी भी अचानक नहीं रहे. ये सभी एक पल में याद आये. इन सबके सानिध्य में ही पत्रकारिता का संसार समझा-बूझा.

अपनी तारीफ सुन प्रभाष जी ने हाथ जोड़ लिया था

प्रभाष जोशी, संजय तिवारी और यशवंत. बिलकुल बाएं हैं प्रभाष जी की धर्मपत्नी.

प्रभाष जी नहीं रहे तो कष्ट ये हो रहा कि उनसे जी भर मिला क्यों नहीं, जमकर बात क्यों नहीं की, उन्हें पूरी तरह से समझने की कोशिश क्यों नहीं की. उनसे कुछ छिटपुट मुलाकातें हुईं, जिसमें प्रभाष जी से परिचयात्मक बातचीत हुई. आज जब अनुरंजन झा ने अपने पुत्र की बर्थडे पार्टी की कुछ तस्वीरें भेजीं तो उसमें कुछ तस्वीरें मेरी और संजय तिवारी की भी थीं. मैं जब बर्थडे पार्टी में पहुंचा तो प्रभाष जी धर्मपत्नी के साथ वहां मौजूद थे. मैं लपका. अपना परिचय दिया. भड़ास4मीडिया पर उनके इंटरव्यू को सराहा.

लोग नौकरी करते रहे और प्रभाष जी पत्रकारिता

अनुरंजन झा (दाएं) के पुत्र की बर्थ-डे पार्टी में प्रभाष जी और उनकी पत्नी। बाएं से दूसरे नंबर पर हैं अनुरंजन की धर्मपत्नी और पुत्र।

राम नाम सत्य है …. इस बोल के साथ जब दिन के तकरीबन एक बजे पार्थिव शरीर को कंधा दे रहा था तो पूरे शरीर में एक सिहरन-सी हुई और इस कठोर सत्य पर विश्वास करना पड़ा कि अब कभी गुरुजी के दर्शन नहीं होंगे। पल भर में पिछला पांच साल घूम गया। जी, पिछले पांच साल में ही मैं व्यक्तिगत तौर पर उनके थोड़ा करीब आ पाया था और वो भी बड़ी हिम्मत जुटाकर, जबसे मैं जनसत्ता अपार्टमेंट में उनके करीब रहने लगा था। हां, एक लेखक और पाठक का रिश्ता काफी पुराना था। सच तो यही है कि उनकी लेखनी पढ़कर ही लिखने का शौक जगा और उस उम्र में ऐसा लगता था कि बस हमने पत्रकारिता शुरू की नहीं कि समाज में क्रांति आ जाएगी, लेकिन जल्द ही नौकरी करने लगा और दुनिया को बताने लगा कि पत्रकार हो गया हूं।

मिले तो बहुत लेकिन प्रभाष जी जैसा कोई नहीं मिला

प्रभाष जोशी के बारे में सोचता हूं तो कई बार यकीन नहीं होता कि कोई आदमी इतना महान कैसे हो सकता है. ग्रेजुएशन के प्रोजेक्ट के सिलसिले में हमें कुछ संपादकों के इंटरव्यू करने थे. आलोक तोमर सर ने प्रभाष जी का इंटरव्यू करने के लिए कहा और खुद उनसे मुलाक़ात का इन्तेजाम भी कराया. इस यादगार मुलाक़ात में प्रभाष जी ने हमे ये भी बताया था कि उन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत किस तरह की थी. मुलाक़ात वाले दिन नियत समय पर हम (मैं और मेरे दो मित्र भारत शर्मा और नरेन्द्र कुमार) उनके निर्माण विहार वाले निवास पर जा ही रहे थे कि रास्ते में एक आदमी नेकर और टीशर्ट पहने हुए प्रभाष जी जैसा दिखा. अभी तक हमने प्रभाष जी को सिर्फ धोती और कुरते में ही देखा था इसलिए हैरानी तो हुई मगर नजदीक जाकर उन्हें पहचान लिया.

पत्रकारि‍ता एक राउंड गोली की बंदूक नहीं : प्रभाष जोशी

‘जि‍समें दम नहीं होता वह बि‍खरता है और जि‍समें होता है वह समय, कसौटि‍यों और अग्‍नि‍ परीक्षाओं में से नि‍खरता जाता है’ : ‘आजीवन और नि‍रंतर वैचारि‍क समानता और सातत्‍य सि‍र्फ गधों में होता है’ : प्रभाषजी आज हमारे बीच में नहीं है। लेकि‍न वे कुछ मूल्‍य छोड़ गए हैं। आदमी मरता है तो बहुत कुछ त्‍यागकर ही उसे संसार से प्रयाण करना होता है। प्रभाषजी भी जब हमें छोड़कर गए तो लेखकों और पत्रकारों के लि‍ए कुछ मूल्‍य छोड़ गए हैं। ‘ई’ लेखकों को प्रभाषजी की कुछ बातें जरूर सीखनी चाहि‍ए। उनका मानना था- ‍”अंदर जो भी घुमड़ रहा हो, घुमड़े, मैं अपने को भावनाओं के हवाले नहीं करूँगा।” इस नि‍यम का उन्‍होंने जिंदगीभर पालन कि‍या। प्रभाष जोशी के आकस्‍मि‍क नि‍धन से ‘ई’ लेखकों ने जि‍तनी तेज गति‍ से श्रद्धांजलि‍यां दी हैं, वैसी लेखकीय प्रति‍क्रि‍या कि‍सी संपादक के मरने पर नहीं देखी गयी। यह प्रेस के संपादक का ‘ई’ लेखकों पर असर का संकेत है। लेखक और पत्रकार के नाते प्रभाषजी बहुत कुछ ऐसा लि‍ख गए हैं जो ‘ई’ लेखकों के भी काम का है।

मालिकों को इंतजार कराया, हमसे पहले मिले

दो दिन बाद प्रभाष जी कोलकाता एक कार्यक्रम में आने वाले थे मगर नियति ने कोलकाता वालों से यह मौका छीन लिया : जनसत्ता, कोलकाता में पाच नवंबर को मैं रात की पाली में था। यहां संस्करण रात 10.30 से 11.00 बजे के आसपास छूट जाता है। संस्करण छोड़ने के बाद अपने वरिष्ठ सहयोगी पलाश विश्वास के साथ घर लौटा। सुबह देर से जगा तो मेरी बेटी अरूणा ने मुझे बताया कि प्रभाष जोशी नहीं रहे। उसके मोबाइल पर न्यूज अलर्ट में यह खबर आई थी। खबर सुनते ही दिल भर आया। दुख हो भी क्यों नहीं। आखिर पत्रकारिता की उनकी कार्यशाला से काफी कुछ सीखा और आत्मीयता भी मिली थी।

जो रचेगा वह बचेगा : प्रभाष जोशी

सिलीगुड़ी आफिस में प्रभाष जोशीहिन्दी पत्रकारिता के शिखर पुरुष प्रभाष जोशी के सहज और संवेदनशील व्यवहार ने मेरे मन को छू लिया था. मुझे याद है, प्रभाष जी सिलीगुड़ी में लायंस क्लब की कांफ्रेंस में हिस्सा लेने आये थे. उस समय मैं प्रभात खबर में काम करता था. प्रभाष जी की आने की खबर मिलने के बाद मैं होटल में उनसे मिलने गया. मन में टेंशन कि इतने बड़े मनीषी से मिल रहा हूं, क्या बात करूंगा. होटल में प्रभाष जी ने मुझे आपने पास बैठाया.

प्रभाष जोशी के बिना पहला एक दिन

आलोक तोमरहमारे गुरु जी भी कम बावले नहीं थे : जिस रात वे दुनिया से गए, उसी शाम लखनऊ से वापस आए थे और अगली सुबह मणिपुर के लिए रवाना होना था : प्रभाष जी की मां अभी जीवित हैं और कहती हैं कि मेरे बेटे के पांव में तो शनि है, कहीं टिकता ही नहीं : अटल जी के श्रद्धांजलि पत्र में नाम ‘प्रभात जोशी’ लिखा है : जब मौज में आते थे तो कुमार गंधर्व के निर्गुणी भजन पूरे वाल्यूम में बजा कर पूरी कॉलोनी को सुनवाते थे : ‘कोई हरकत नहीं है पंडित’… किसी बात को हवा में उड़ा देने के लिए हमारे प्रभाष जी का यह प्रिय वाक्य था। फिर कहते थे… ‘अपने को क्या फर्क पड़ता है’… अभी एक डेढ़ महीने पहले तक इंटरनेट के बहुत सारे ब्लॉगों और आधी अधूरी वेबसाइटों पर प्रभाष जी को ब्राह्मणवादी, कर्मकांडी, रूढ़िवादी और कुल मिला कर पतित पत्रकार साबित करने की प्रतियोगिता चल रही थी। मैंने जितनी हैसियत थी उसका जवाब दिया और फिर उनके खिलाफ लिखे गए लेखों और अपने जवाब की प्रति उनको भेजी तो उन्होंने फोन कर के यही कहा था।

I am a product of Prabhas school of journalism

“Yes. Then what happened, What did Beckit say?” The old man sitting on the other side of the  table in the posh five star hotel asked with a smile in Hindi. I fumbled. “The last temptation is the  biggest treason, to do the right thing for the wrong reason”, I murmured. “Right”. He  laughed. Becket was a friend of the king and he revolted against him when the king had tried  to challenge the authority of the Church. The man in spectacles was talking about the plot  of T.S. Eliot’s ‘Murder In The Cathedral’ and I was caught napping. I was not prepared for  this question.

जनसंगठनों को सच्चे दोस्त की कमी खलेगी

प्रभाष जोशीप्रभाष जोशी का यूं चले जाना : जनसंगठनों की क्षति और जन सरोकारी पत्रकारिता में निर्वात : वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रभाष जोशी का निधन न सिर्फ पत्रकारिता बल्कि देश के जनसंगठनों के लिए भी अपूरणीय क्षति है। ऊनके निधन से दोनों ही स्‍थानों पर निर्वात महसूस किया जा रहा है। श्री जोशी देशभर के सामाजिक समूहों से न सिर्फ जुड़े रहे हैं बल्कि उन्‍होंने ने ऐसे समूहों ने सक्रिय भागीदारी भी की है। ऊन्‍होंने देश के किसानों, दलितों, आदिवासियों, अल्‍पसंख्‍यकों और वंचित वर्गों के मुद्दे न सिर्फ अपनी लेखनी के माध्‍यम से उठाये बल्कि वे उनसे करीब से जुड़े भी रहें हैं। ऐसे ही समूहों में नर्मदा बचाओ आंदोलन भी शामिल है।

पल भर को एहसास हुआ जैसे कायनात थम गयी

प्रभाष जोशीजाना एक समर्थ पत्रकार और एक अद्मय जीवट के इनसान का : सुबह नींद से उठ कर अखबार पलट ही रहा था कि बड़े भाई साहब डाक्टर रुक्म त्रिपाठी के कुछ शब्द मुझे दहला देने के लिए काफी थे। उन्होने कहा-`जानते हो प्रभाष जी नहीं रहे।’ पल भर को एहसास हुआ जैसे कायनात थम गयी, जैसे सार्थक और सोद्देश्य व निष्पक्ष पत्रकारिता का सूर्यास्त हो गया। प्रभाष जोशी एक बाईपास झेल चुके थे पर प्रभु की कृपा से भले -चंगे और कार्यक्षम थे। उनकी सक्रियता को देख ऐसा नहीं लगता था कि वे एक बड़ा आपरेशन झेल चुके हैं। उनकी सशक्त और अपने में अनुपमेय लेखन शैली निरंतर गतिशील रही और हिंदी पत्रकारिता को देती रही नये आयाम, नये उत्कर्ष। जोशी जी के साहचर्य में पत्रकारिता के जितने भी क्षण हम जैसे लोगों ने बिताये हैं, वे निश्चित ही उस महामना की प्रज्ञा, विचारों की प्रखरता और प्रासंगिकता व उनकी तरह की समाजपरक पत्रकारिता के हमेशा कायल रहेंगे।

कंधे पर हाथ रख कहा- कैसे हो पंडित?

प्रभाष जोशीवह अक्तूबर, 1991 की कोई तारीख थी. तब मैं गुवाहाटी से प्रकाशित हिंदी दैनिक पूर्वांचल प्रहरी में काम करता था. उन दिनों कोलकाता (तब कलकत्ता) से जनसत्ता निकालने की तैयारियां जोर-शोर से चल रही थीं. खुद मेरे अखबार के अलावा सेंटिनल के दर्जनों लोगों ने वहां अप्लाई किया था और लिखित परीक्षा दे आए थे. मेरी भी इच्छा तो थी लेकिन मैंने आवेदन नहीं भेजा था. उसी दौरान एक दिन राय साब (राम बहादुर राय) गुवाहाटी पहुंचे. उन्होंने मुझे सर्किट हाउस में आ कर मिलने का संदेश दिया. वह उनसे मेरी पहली मुलाकात थी. मिलने पर उन्होंने पहला सवाल किया कि आपने आवेदन क्यों नहीं भेजा. दरअसल, इस सवाल की वजह थी. पूर्वांचल प्रहरी में रहते हुए मैंने मई,91 में पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनावों पर जनसत्ता (दिल्ली) के लिए काफी लिखा था. शायद राय साब को मेरी रिपोर्टिंग पसंद आई थी. मैंने कहा कि कोई खास वजह नहीं है. बस यूं ही.

वो खुशी के आंसू थे, ये किसी की कमी के आंसू हैं

प्रभाष जोशीपता नही, कहां चले गए… : जैसे ही यह आवाज मेरे कानों तक गयी की प्रभाष जी नहीं रहे, दिल मानों थम-सा गया हो….। गुरुवार और शुक्रवार की दरम्यानी रात कुछ ऐसा हुआ की वक्त ख़ुद ब ख़ुद मेरे सामने आकर खड़ा हो गया और बोला की पत्रकारिता के पितामह नहीं रहे। बीच-बीच में आंखें भी नम हो रहीं थीं और दिल में उथल-पुथल भी हो रही थी की जिसे मैं गुरुवार की रात तहलका में (हम नमक सत्याग्रही) पढ़ रहा था…. वो तैयारी कर रहा था किसी दूसरे लोक को जाने की।

प्रेस क्लब को मयखाना न बनाने का वादा निभाया

तत्कालीन शपथ ग्रहण समारोह की तस्वीर.

अलसुबह अशोक चौधरी का फोन आया. देर तक सोने वाले चौधरी के फोन से ही मन में शंका हो गयी. धड़कते दिल से फोन रिसीव किया. अशोक ने कहा एक दुखद खबर है- प्रभाष जी नहीं रहे. कलेजा धक् से रह गया. उनका मैं बेहद सम्मान करता हूं. इस सम्मान का सिरा तो मेरे लिखने पढ़ने के साथ ही जुड़ा है लेकिन सीधा जुडाव दस साल पहले हुआ. मुझे तारीख याद है. 22 अगस्त 1999, उस दिन गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब की पहली निर्वाचित कार्यकारिणी का शपथ ग्रहण समारोह था. प्रभाष जी मुख्य अतिथि के रूप में बुलाए गए थे. उनके साथ राष्ट्रीय सहारा के तत्कालीन सम्पादक विभ्यांशु दिव्याल भी आये थे.

प्रभाषजी और उनके खेल प्रेम पर दिग्गजों की राय

प्रभाष जोशीसचिन की आतिशी पारी के बावजूद भारत की हार के साथ हिंदी पत्रकारिता के शिखर पुरुष और क्रिकेट के जबर्दस्‍त रसिक प्रभाष जोशी इतने मायूस हुए कि दुनिया को ही अलविदा कह दिया। प्रभाष जी- जो क्रिकेट और टेनिस के दीवाने थे- अपने शब्दों के जरिए पाठकों और क्रिकेटप्रेमियों की चेतना को झकझोरते रहे, सचिन के 17 हजार रनों पर लिखने की तमन्‍ना को दिल में लिए ही जहां से कूच कर गए।

इसीलिए अपन सब के लिए वह प्रभाषजी थे

प्रभाष जोशीसंपादक बने बनवारी जो समाजवादी युवजन सभा में रहे थे, रिपोर्टिंग के हेड थे रामबहादुर राय जो विद्यार्थी परिषद के ‘होल टाइमर’ थे, जयप्रकाश शाही नक्सलियों के करीब थे,  सुरेंद्र किशोर, खुद की तरह गांधीवादी, हरिशंकर व्यास- पहले संघ के साप्ताहिक पांचजन्य में रहे थे, गोपाल मिश्र- बाद में कांग्रेस साप्ताहिक के संपादक बने, महादेव चौहान-घोर लेफ्टिस्ट,  परमानंद पांडे और उमेश जोशी- ट्रेड यूनियनिस्ट, राकेश कोहरवाल शुद्ध खबरची :  खाड़कू, मरजीवड़े, चिरकुट, चंडूखाना, अपन… न जाने कितने शब्द चलन में लाए : न लाग, न लपेट, खरी-खोटी वाले थे प्रभाष जी : 

‘माफी मांगिए, प्रभाषजी माफ कर देंगे’

प्रभाष जी को श्रद्धांजलि बाद ए मुख़लिफ़ से न घबरा ए उक़ाब, ये तो चलती हैं तुझे ऊंचा उड़ाने के लिए : दुनिया में बहुत कम लोग होते हैं जो व्यक्ति की सीमा से आगे बढ़कर संस्थान का रूप ले लेते हैं. प्रभाषजी कुछ उन्हीं श्रेणी में थे. पत्रकारिता उनके लिए पेशा नहीं था, जीवन था, उनकी साधना थी. 60 की उम्र के बाद लोग जिन्दगी की थकान मिटाने की कोशिश करते हैं.

‘फूल चढ़ा पल्ला झाड़ो या धूल को भस्म बनाओ’

प्रभाष जी का पार्थिव शरीर.

उनका चेहरा नीला पड़ गया था। मुझे लगा कि यह मृत्यु के गरल का असर है। लेकिन मित्रों ने बताया कि शव को खराब होने से बचाने के लिए किए गए चिकित्सकीय लेप ने ऐसा किया है।

Prabhash Ji- journalist par excellence

Vivek ShuklaIt is sheer  coincidence that when India was feeling proud of Sachin Tendularkar’s masterly performance in Hyderabad against Australia in a lost cause, it lost a great Cricket buff, journalist and writer, Prabhash Joshi. Prabhash Joshi was perfectly all right till Sachin was batting, but he started feeling uneasy after Sachin was dismissed and defeat was staring India. That Prabhash Joshi was a great lover of Cricket is a well-known fact to all those who remained reader of Jansatta, the paper he started with great conviction. That Prabhash Joshi has  produced an absolutely cracker of a Hindi newspaper is  now part of the folklore of Hindi journalism.  It is true that has given new grammar to Hindi journalism, both in terms of content and style of writing. Before Jansatta, Hindi newspapers used to prefer Hindi close to ‘Sarkari Hindi’. Very tough and boring. He ensured that Jansatta publish in the language of masses, which is also liked by classes.

‘प्रभाषजी ने बताया- सब कुछ ठहरा हुआ नहीं’

बालेन्दु शर्मा दाधीचसच, साहस और सरोकार, यानी प्रभाष जोशी : मैंने राजस्थान पत्रिका में अपने पत्रकारिता जीवन की शुरुआत की थी। मेरे लिए वह सीखने का समय था। ‘पत्रिका’ दफ्तर में आने वाले प्रांतीय-राष्ट्रीय अखबारों को पढ़ने के लिए हम युवा मित्रों में होड़-सी लगी रहती थी। अखबारों के गट्ठर में जिस अखबार को उठाने के लिए सबसे पहले लपकते, वह था- ‘जनसत्ता।’ दर्जन भर अखबारों के बीच वह अलग ही दिखाई देता। बहुत प्रबल उपस्थिति थी उसकी। प्रभाषजी के संपादन में निकले इस नए अखबार ने कुछ महीनों में देश भर में युवकों को आकर्षित कर लिया था। जहां हिंदी पत्रकारिता में हम सब एक-सी लीक पीटने में लगे हुए थे और रोजमर्रा की खबरों को किसी तरह आकर्षक ले-आउट (अखबार का डिजाइन) में चिपका देने को ही बहुत बड़ी सफलता माने बैठे थे वहीं जनसत्ता ने हम सबको बड़ा झटका दिया था। सिर्फ पाठकों को ही नहीं, प्रबंधकों, पत्रकारों, संपादकों और नेताओं को भी। हिंदी पत्रकारिता के लिए लगभग ठहराव के से उस जमाने में प्रभाषजी ने हमें झकझोर कर बताया कि सब कुछ ठहरा हुआ नहीं है।

‘सब जा रहे हैं तो मैं क्यों जिंदा हूं’

आलोक तोमरअपने प्रियजनों की मौत पर प्रभाषजी के हर लेख में कुछ इसी तरह का आत्मधिक्कार होता था : गुरुवार की रात और रातों जैसी नहीं थी। इस रात जो हुआ उसके बाद आने वाली कोई भी रात अब वैसे नहीं हो पाएगी। रात एक बजे के कुछ बाद फोन बजा और दूसरी ओर से एक मित्र ने कहा, बल्कि पूछा कि प्रभाष जी के बारे में पता है। आम तौर पर इस तरह के सवाल रात के इतनी देर में जिस मकसद से किए जाते हैं वह जाहिर होता है। मित्र ने कहा कि प्रभाष जी को दिल का दौरा पड़ा और वे नहीं रहे। काफी देर तो यह बात मन में समाने में लग गई कि प्रभाष जी अतीत हो गए हैं। अभी तीन दिन पहले तो उन्हें स्टूडियो में बुलाने के लिए फोन किया था तो पता चला था कि वे पटना जा रहे हैं, जसवंत सिंह की किताब के उर्दू संस्करण को लोकार्पित करने के लिए। पटना से वे कार से वाराणसी आए और कृष्णमूर्ति फाउंडेशन में रूके। वहां से हमारे मित्र और मूलत: वाराणसी वासी हेमंत शर्मा को फोन किया और कहा कि गेस्ट हाउस में अच्छा नहीं लग रहा।

‘प्रभाषजी का हाथ और मेरा कंधा’

प्रभाष जोशीक्या पता था यह उनके जन्मदिन का अंतिम आयोजन था। मेरे लिए तो पहला था क्योंकि उनके किसी जन्मदिन में मैं पहली बार शामिल हुआ था। पत्रकारिता में कदम रखने वाले हर शख्स की तरह मैं भी प्रभाष जी को पढ़ते-गुनते इस फील्ड में आया। एक लिविंग लीजेंड से मिलने की तमन्ना वर्षों से दिल में थी लेकिन मुलाकात का मौका दिल्ली आने पर ही मिला। मुझे अफसोस है कि मैं प्रभाष जी से कभी इत्मीनान से बतिया नहीं पाया। एक मौका था। उनका इंटरव्यू करने का। तो वह मौका लपक लिया अपने साथी अशोक कुमार ने। भड़ास4मीडिया के लिए अशोक ने विस्तृत इंटरव्यू किया। मैंने मन को समझाया था। आगे कभी इत्मीनान से मैं खुद एक राउंड और इंटरव्यू करूंगा प्रभाष जी का। जो चीजें अशोक से छूटी हैं, उस पर प्रभाष जी से बात करूंगा। उनकी मनःस्थिति, उनके विचारों को गहराई से समझने की कोशिश करूंगा।

‘गरीब परिवार था, गदगद वातावरण था’

प्रभाष जोशीमैं सिर्फ हथेली पर नोट लेता था और उसी से पूरा पेज भर देता था : पढ़ने में रुचि नहीं थी : तबसे दिल्ली में आकर धूल फांक रहा हूं : प्रभाष जोशी ने पिछले दिनों भड़ास4मीडिया को दिए एक विस्तृत इंटरव्यू में अपने जन्म की कथा बयान की थी। उन्होंने अपने परिवार, पारिवारिक स्थितियों, भाई-बहनों की खूब चर्चा की। इसमें उन्होंने अपने पत्रकार बनने की कहानी भी बयान की। पेश है प्रभाष जी की ही जुबानी, उनके बचपन और पत्रकारिता में आने की कहानी-  ” मां का कहना है कि 15 जुलाई 1937 को जिस दिन मैं जन्मा, (मध्य प्रदेश के सिहोर जिले के आस्टा गांव में) दो-तीन दिन पहले से ही खूब बारिश हो रही थी। मेरे प्रसव के लिए मां मौसी के घर गई थीं। आस्टा गांव के किनारे पार्वती नदी बहती है। नदी लबालब थी, बाढ़ की स्थिति थी। 

‘मैच पर लिखने की तैयारी कर चुके थे’

प्रभाष जोशीसचिन के सत्रह हजार रन पूरे होने पर प्रभाष जी ने लिखने का मन बना लिया था। उन्होंने जनसत्ता आफिस फोन कर कह भी दिया था कि लिखने जा रहा हूं, मेरा आर्टिकल मंगवा लेना। फिर उन्होंने लिखने का कार्यक्रम मैच खत्म होने तक टाल दिया। इसी बीच भारत की हार होते ही प्रभाष जी को हृदय में दर्द शुरू हो गया। वे क्रिकेट मैचों को डूबकर देखा करते थे। उनकी क्रिकेट के प्रति दीवानगी सबको पता है। दर्द शुरू हुआ तो जो एक टैबलेट खाने को दिया जाता है, दिया गया। पर दर्द कम नहीं हुआ। ब्लड प्रेशर कम करने के लिए एक अन्य दवा खाने को दी जाती थी पर उस वक्त वह दवा घर पर नहीं थी। बगल में रहने वाले डाक्टर को फोन किया गया तो वे आए और चेक करने के बाद हार्ट अटैक की सूचना दी। उन्होंने प्रभाष जी को तुरंत अस्पताल ले जाने की सलाह दी। इस दौरान प्रभाष जी की सांस फूलने लगी थी और आंखें बंद होने की स्थिति में थी। अस्पताल ले जाते-जाते प्रभाष जी बेहोश हो चुके थे।

चले गए प्रभाषजी

प्रभाष जोशीहि‍न्‍दी पत्रकारि‍ता के शि‍खर पुरुष प्रभाष जोशी नहीं रहे। कल रात उन्‍हें भारत-आस्‍ट्रेलि‍या मैच देखते हुए हृदय का दौरा पड़ा और उसके बाद उनकी मौत हो गयी। उनकी उम्र 73 साल थी। पांच दशक से भी ज्‍यादा समय से वे हि‍न्‍दी पत्रकारि‍ता में सक्रि‍य थे। प्रभाष जी के जाने से हि‍न्‍दी ने अपना सबसे बड़ा जुनूनी हि‍मायती खो दि‍या है। उनकी मौत के बाद पत्रकारि‍ता में जो शून्‍य पैदा हुआ है उसकी सहज ही भरपाई नहीं हो पाएगी। प्रभाष जी जैसा मेधावी और ईमानदार पत्रकार सदियों में तैयार होता है। प्रभाषजी की मेधा, कलम और ईमानदारी का सभी लोहा मानते थे। कारपोरेट पत्रकारि‍ता में पचास सालों तक काम करने के बाद नि‍ष्‍कलंक पत्रकार का जीवन बि‍ताना और अपनी कलम और ईमानदारी से सबको प्रभावि‍त करना यह सचमुच में वि‍रल बात है। प्रभाषजी के दो प्रधान वि‍षय थे जहां पर उनकी कलम सभी तटबंध तोडती हुई चली जाती थी। एक था क्रि‍केट और दूसरा था राजनीति‍क अनीति‍।