ब्रिटेन की प्रतिष्ठित पत्रिका The Economist ने एक बार फिर अपने कवर से वैश्विक बहस छेड़ दी है। ताज़ा अंक में पत्रिका ने अमेरिका-ईरान तनाव और कथित सैन्य कार्रवाई को “Operation Blind Fury” शीर्षक दिया है, जो सीधे तौर पर अमेरिकी नेतृत्व—खासकर Donald Trump—की नीतियों पर तीखा व्यंग्य माना जा रहा है।
मैगजीन के कवर में ट्रंप को सैनिक हेलमेट पहने दिखाया गया है, जिसकी आंखों पर पट्टी जैसी स्थिति है—संकेत साफ है कि यह ‘अंधे गुस्से’ (Blind Fury) में लिए गए फैसलों की ओर इशारा करता है। दिलचस्प बात यह है कि इसे “Operation Epic Fury” जैसे किसी आधिकारिक सैन्य नाम के उलट एक आलोचनात्मक और प्रतीकात्मक नाम दिया गया है।
सवाल उठता है—क्या भारतीय मीडिया ऐसा कर सकता है?
इस कवर के सामने आने के बाद मीडिया जगत में एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है—क्या भारत का मुख्यधारा मीडिया सत्ता और नेतृत्व पर इतनी सीधी, रचनात्मक और आलोचनात्मक टिप्पणी करने का साहस दिखा सकता है?
जहां एक ओर पश्चिमी मीडिया संस्थान सत्ता से सवाल पूछने को अपनी जिम्मेदारी मानते हैं, वहीं भारत में अक्सर मीडिया की भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं। आलोचकों का मानना है कि यहां का एक बड़ा हिस्सा सत्ता के प्रति ज्यादा अनुकूल और कम आलोचनात्मक होता जा रहा है।
व्यंग्य बनाम राष्ट्रहित की बहस
हालांकि इस तरह के कवर को लेकर एक दूसरी बहस भी सामने आती है—क्या इस तरह की प्रस्तुति राष्ट्रीय हितों के खिलाफ जाती है या फिर यह लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है?
The Economist का यह कवर इस बात का उदाहरण है कि वैश्विक मीडिया किस तरह प्रतीकों और व्यंग्य के जरिए सत्ता को आईना दिखाने की कोशिश करता है।
द इकोनॉमिस्ट लंदन से छपती है। आप दिल पर हाथ रखकर बताइए कि क्या हिंदुस्तान के किसी अखबार पत्रिका या टीवी में डोनाल्ड ट्रम्प की ऐसी तस्वीर छापने का साहस है? मुझे तो नहीं लगता। -आवेश तिवारी, पत्रकार
The Economist cover is a play on the US’s Iran war called Operation Epic Fury. The magazine has titled it as Operation Blind Fury. विनेद शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार


