सुरेंद्र किशोर-
कभी के ऐसे -ऐसे संपादक!
तब की बात है जब हमारे प्रधान संपादक थे प्रभाष जोशी। हमलोग भागलपुर गये थे। वहां हमारी अगवानी में थे वहां के जनसत्ता संवाददाता गिरधारी लाल जोशी।
प्रभाष जी ने वहां कुछ भागलपुरी कपड़े खरीदे। शर्ट के तीन पीस थे। उन्होंने दो पीस अपने दो पुत्रों के लिए रखे और एक पीस मुझे थमा दिया। कहा–‘‘देखिए सुरेंद्र जी, मैंने कोई भेदभाव नहीं किया है।’’
यानी, तब के जोशी जैसे संपादकों के लिए पुत्र और संवाददाता दोनों एक ही धरातल पर थे।
वैसे तो बहुत सारी बातें प्रभाष जी के बारे में कहने को है। पर एक बात से बहुत मतलब निकल जाता है। जोशी जी पटना आते थे तो हवाई अड्डे पर मुझे अपना सूटकेस उठाने नहीं देते थे। खुद उठाते थे।
दैनिक आज (पटना)के हमारे संपादक थे–पारसनाथ सिंह। वे वाराणसी में महान संपादक बाबूराव विष्णु पराड़कर के साथ काम कर चुके थे। अखबार के मालिक को संपादक से मिलना होता था तो वे पहले पुछवा लेते थे–जाकर देखो, पंडित जी काम कर रहे हैं या खाली हैं?
जब चपरासी आकर कहता था कि खाली हैं तभी मालिक संपादक के कमरे में जाते थे। यानी, मालिक संपादक को अपने कमरे में नहीं बुलाते थे।
पराड़कर जी क़ो लोग जब किसी समारोह में शामिल होने के लिए बुलाते थे तो वे कह देते थे–आज मेरा जो संपादकीय छपा है, उसे पढ़कर समारोह में सुना देना।
दरअसल पंडित जी जानते थे कि मुझे इसलिए बुलाया जा रहा है ताकि उस समारोह की खबर ‘आज’ में छप जाए। दैनिक आज की कितनी प्रतिष्ठा थी, उसका एक नमूना पेश कर रहा हूं।
1977 के प्रारंभ में लोक सभा चुनाव की घोषणा हो चुकी थी। वाराणसी से हमारे पटना ब्यूरो चीफ पारस बाबू को यह संदेश आया कि जय प्रकाश नारायण का एक इंटरव्यू करना है।
उस कालखंड में जेपी कितना व्यस्त थे, उसकी कल्पना कोई भी जानकार व्यक्ति कर सकता है। दुनिया भर के मीडियामेन और देश के बड़े-बड़े नेता जेपी से उन दिनों मिलना चाहते थे।
मुझे पारस बाबू ने कहा कि जेपी के यहां फोन करके समय मांगिए। मैंने फोन किया। आज के नाम पर समय तुरंत मिल गया। मैं पारस बाबू के साथ कदम कुआं (पटना) स्थित जेपी के आवास पर गया।
अखबार के लिए बातचीत शुरू करने से पहले जेपी देर तक पारस बाबू से ‘आज’, उसके मालिक शिव प्रसाद गुप्त और संपादक पराड़कर जी की प्रशंसा करते रहे। याद रहे कि गुप्त जी अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के कोषाध्यक्ष भी थे जब कांग्रेस का केंद्रीय कार्यालय प्रयाग में था।
1979 में जब पटना से आज का प्रकाशन शुरू हुआ तो मुझे मुख्य संवाददाता की जिम्मेदारी दी गई। खबरों का हैंड आउट मैं ही देखता था। पारस बाबू ने निदेश दे रखा था-
कोई किसी के पद ग्रहण करने पर बधाई दे रहा हो, कोई किसी के जन्म दिन पर बधाई दे रहा हो या इस तरह के किसी हैंड आउट की खबर पास मत कीजिए। यह तो उन दोनों के बीच का मामला है। इससे अखबार के पाठकों का क्या संबंध?
उन लोगों से कहिए कि बधाई की चिट्ठी आप अपने नेता को डाक से भेज दीजिए। पारसबाबू के इस आदेश का पालन होता था।
राजेंद्र माथुर के बारे में… तब माथुर साहब नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक थे। एक दिन वे दिल्ली के किसी डाक्टर के यहां उनके वेटिंग रूम में अपनी बारी की प्रतीक्षा करते देखे गये थे। जबकि माथुर साहब की तबीयत बहुत खराब थी। उन्हें बारी से पहले इलज की सख्त जरूरत थी।
यानी हरि अनंत, हरि कथा अनंता! आज के संपादकों का हाल मैं नहीं जानता। क्योंकि अखबारों से कटा हुआ हूं। सुनता हूं–‘‘बदले हुए जमाने’’ के तहत उन्हें विपरीत परिस्थितियों में काम करना पड़ता है।


