
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों में मध्य प्रदेश के गालीबाज और मुंहफट मंत्री के बयान से संबंधित कार्रवाई की खबरें छाई हुई हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स में सबसे छोटी से लेकर दि एशियन एज में पांच कॉलम तक की। टाइम्स ऑफ इंडिया, नवोदय टाइम्स और अमर उजाला में लीड भी है। कल मैंने बताया था कि अशोका विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर को ऐसी पोस्ट के लिये गिरफ्तार कर लिया गया है जिसमें कुछ आपत्तिजनक है ही नहीं। दूसरी ओर मध्य प्रदेश के एक गालीबाज और मुंहफट मंत्री को हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी गिरफ्तार नहीं किया गया था। उसकी खबर भी नहीं थी। पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने राहत नहीं दी थी। राहत की खबर अब भी नहीं है और शायद इसीलिये आज मजबूरी में यह खबर पहले पन्ने पर है। मैं अखबारों की इसी मजबूरी (या मनमानी) को रेखांकित करना चाहता हूं और रोज किसी न किसी खबर का उदाहरण देता हूं। खबर तब थी जब सरकार या पुलिस अपने मंत्री के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रही थी। खबर तब थी जब इससे कमजोर या साधारण मामले में एक प्रोफेसर को गिरफ्तार कर लिया गया पर मंत्री की गिरफ्तारी नहीं हुई। बचने के लिए मंत्री ने माफी मांगी, पार्टी को लोग संबंधित फौजी अधिकारी के घर गये पर सुप्रीम कोर्ट ने माफी स्वीकार नहीं की।
अमूमन मीडिया ट्रायल का असर होता है और हो या नहीं, मीडिया ट्रायल होता ही है। देश के बहादुर और बेशर्म मीडिया ने बच्चियों को इसका शिकार बनाया है। पुलिस और सरकार का साथ दिया है पर एक गालीबाज मंत्री के खिलाफ कल खबर ही नहीं थी। मंत्री के मुकाबले बहुत साधारण और लगभग अनापत्तिजनक पोस्ट के लिए किसी प्रोफेसर को गिरफ्तार किया जाये तो खबर बनती है। यही नहीं, जासूसी के आरोप में एक ट्रैवेल ब्लॉगर को गिरफ्तार किया जाये और यह नहीं बताया जाये कि उसे सूचनाएं कहां से मिलती थीं जिसे उसने अपने पाकिस्तानी संपर्को को भिजवाया, तो खबर अधूरी है। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसा हुआ नहीं होगा और हुआ हो तो सूचना लेकर अपने संपर्क तक पहुंचाने से पहले इसे गिरफ्तार कर लिया जाना चाहिये था और उस सूचना की बरामदगी के बारे में कुछ बताया नहीं गया है लेकिन एक बेटी को गिरफ्तार कर लिया गया और उसकी खबर पहले पन्ने पर छप भी गई। यह सरकारी प्रचार था। पर सरकार हाईकोर्ट के आदेश पर भी काम नहीं कर रही थी। यह खबर थी लेकिन पहले पन्ने पर नहीं छपी। जैसा मैंने पहले बताया, आज सुप्रीम कोर्ट की जिस कार्रवाई की खबर है वह सिंगल कॉलम से लेकर पांच कॉलम तक की और लीड भी है। द टेलीग्राफ में यह खबर कल जैसी ही है। लेकिन मेरे आठ अखबारों में कोई दूसरा ऐसा नहीं है।
आज पहले पन्ने की खबरों में एक खबर नवोदय टाइम्स में है, जासूसी में चार और गिरफ्तार। खबर के अनुसार, 15 मई 2025 को मिली विश्वसनीय खुफिया जानकारी से संकेत मिला कि सुखप्रीत सिंह और करणबीर सिंह ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से संबंधित गोपनीय विवरण पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के साथ साझा कर रहे थे। इस सूचना में पंजाब, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में सेना की आवाजाही और प्रमुख रणनीतिक स्थान शामिल थे।” पुलिस ने दोनों संदिग्धों को गिरफ्तार कर लिया है। अधिकारी ने बताया, “उनके मोबाइल फोन की फॉरेंसिक जांच से खुफिया जानकारी की पुष्टि हुई है। पुलिस टीम ने उनके कब्जे से तीन मोबाइल फोन और आठ कारतूस (.30 बोर) भी बरामद किए हैं।” यादव ने बताया कि प्रारंभिक जांच से पता चला कि आरोपी आईएसआई में अपने आकाओं के सीधे संपर्क में थे और उन्होंने भारतीय सशस्त्र बलों से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी साझा की थी। सवाल उठता है कि यह जानकारी उन्हें कहां से मिली और देने वाले को क्यों छोड़ दिया गया है। संभव है कि इनके काम के क्रम में इन्हें ऐसी सूचनाएं मिलती हों जिसे वे अपने पाकिस्तानी संपर्कों से साझा करते हों। पर तब भी सवाल उठेगा कि ये कौन हैं और क्या काम करते थे और ऐसी संवेदनशील सूचनाएं इनके पास होती थीं तो इनपर नजर क्यों नहीं रखी गई। स्पष्ट है कि मामला संदिग्ध है और सरकार जो कर रही है उसका प्रचार तो हो रहा है पर जो नहीं कर रही है उसकी कोई चर्चा नहीं होती।
मध्य प्रदेश के गालीबाज, मुंहफट भाजपाई मंत्री के खिलाफ सरकार ने कार्रवाई नहीं की तो खबर नहीं छपी अब सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है तो उसकी खबर है लेकिन सरकार ने अपने मंत्री को संरक्षण तो पूरा दिय। फिर भी उनकी देशभक्ति पर आंच नहीं आई जबकि प्रोफेसर को बिना अपराध परेशान किया जा रहा है और उसका प्रचार भी पूरा है। इसमें यह भी नहीं बताया जा रहा है कि हर नागरिक के समान अधिकार हैं फिर भी प्रोफेसर को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया, नेता को हाईकोर्ट का आदेश होने पर भी सुप्रीम कोर्ट में अपील करने और उसके आदेश के अनुसार जांच होने तक छूट रहेगी। जांच होने तक ऐसी छूट तमाम विपक्षी नेताओं को नहीं मिली है, गुजरात समाचार के बीमार मालिक को भी नहीं मिली थी और उसकी भी खबर कुछ ही अखबारों में पहले पन्ने पर थी। सरकारी प्रचार को हवा देने वाली खबरों में आज एक खबर है, स्वर्ण मंदिर पर हमले को सेना ने किया नाकाम। पहले पन्ने पर विस्तार से छपी एजेंसी की यह खबर नवोदय टाइम्स में एक अनाम सैनिक के हवाले से है और उसने कहा है, …. यह अनुमान लगाया गया था कि पाकिस्तान जवाबी कार्रवाई करेगा। पाकिस्तान पर हमले के बाद की शुरुआती खबरों को याद कीजिये तो कौन नहीं जानता है कि तब कहा गया था कि भारत ने सिर्फ आतंकी ठिकानों पर हमला किया है, पाकिस्तान मामले को बढ़ा रहा है आदि और पुंछ में नुकसान हुआ तो पाकिस्तान गलत कर रहा है असैनिक क्षेत्र पर हमला और स्वर्ण मंदिर पर नहीं हुआ तो सेना ने बचा लिया। अगर यह खबर है तो जो नुकसान हुआ उसकी खबर क्यों नहीं दी जा रही है। ऑपरेशन सिन्दूर नाम वाला युद्ध, ऐसी खबरों और आत्मघाती युद्ध के बारे में क्या कहा जाये।
मध्य प्रदेश के मंत्री से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के आदेश की खबर आज द हिन्दू में सेकेंड लीड है। शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा : मध्य प्रदेश के मंत्री की टिप्पणी पर एफआईआर की जांच के लिए एसआईटी बनाई जाये। यह विडंबना ही है मंत्री के हिन्दी के बयान की जांच के लिए आईपीएस अफसरों की टीम बनेगी और हाईकोर्ट का आदेश लगभग स्थगित है लेकिन अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर की अंग्रेजी की पोस्ट पर पुलिस के निचले स्तर के अधिकारियों ने हिन्दी में लिखी एफआईआर पर कार्रवाई की और संभावना है कि शिकायतकर्ता ने अंग्रेजी की पोस्ट को समझा नहीं या उन्हें गलत अनुवाद मिला। प्रोफेसर साब को सजा हो, न हो परेशान तो कर दिया गया। मंत्री जी जेल भी जायेंगे तो घर जैसी सुविधा पा सकते हैं। तैयारियों के लिए समय तो मिल ही गया है। और यह सब खबर नहीं है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर सिंगल कॉलम में तो है ही इसके साथ जो खबर है वह अभी दूसरे अखबारों में नहीं दिखी है क्योंकि प्रमुखता से तो नहीं है। इस खबर के अनुसार अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर की अपील सुप्रीम कोर्ट में सुनी जायेगी। इंडियन एक्सप्रेस ने भी मध्य प्रदेश के मंत्री की खबर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पहले पन्ने पर छापी है। स्वर्ण मंदिर वाला सेना का प्रचार भी यहां समान भाव से है।



