Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

आयोजन

रवीश कुमार ने वेंकैया नायडू के हाथों ‘कलम’ थामने के बाद सफाई में क्या लिखा, आप भी पढ़ें

Ravish Kumar : बाग़ों में बहार तो नहीं है मगर फिर भी…. तस्वीरें अपनी नियति देखने वालों की निगाह में तय करती हैं। इंडियन एक्सप्रेस के प्रवीण जैन के कैमरे से उतारी गई इस तस्वीर को देखने वालों ने तस्वीर से ज़्यादा देखा। एक फ्रेम में कैद इस लम्हे को कोई एक साल पहले के वाक़ये से जोड़ कर देख रहा है तो कोई उन किस्सों से जिसे आज के माहौल ने गढ़ा है। दिसंबर की शाम बाग़ों में बहार का स्वागत कर रही थी। गालियों के गुलदस्ते से गुलाब जल की ख़ुश्बू आ रही थी। तारीफ़ों के गुलदस्ते पर भौरें मंडरा रहे थे। मैं उस बाग़ में बेगाना मगर जाना-पहचाना घूम टहल रहा था।

Ravish Kumar : बाग़ों में बहार तो नहीं है मगर फिर भी…. तस्वीरें अपनी नियति देखने वालों की निगाह में तय करती हैं। इंडियन एक्सप्रेस के प्रवीण जैन के कैमरे से उतारी गई इस तस्वीर को देखने वालों ने तस्वीर से ज़्यादा देखा। एक फ्रेम में कैद इस लम्हे को कोई एक साल पहले के वाक़ये से जोड़ कर देख रहा है तो कोई उन किस्सों से जिसे आज के माहौल ने गढ़ा है। दिसंबर की शाम बाग़ों में बहार का स्वागत कर रही थी। गालियों के गुलदस्ते से गुलाब जल की ख़ुश्बू आ रही थी। तारीफ़ों के गुलदस्ते पर भौरें मंडरा रहे थे। मैं उस बाग़ में बेगाना मगर जाना-पहचाना घूम टहल रहा था।

मैं स्थितप्रज्ञ होने लगा हूं। हर तूफ़ान के बीच समभाव को पकड़ना चाहता हूं। कभी पकड़ लेता हूं, कभी छूट जाता है। इनाम और इनायत के लिए आभार कहता हुआ 2007 के उस लम्हे को खोज रहा था जब पिताजी के साथ पहली बार रामनाथ गोयनका पुरस्कार लेने गया था। यादें आपको भीड़ में अकेला कर देती हैं। पास आती आवाज़ें मेरे बारे में कह रही थीं मगर वो मेरे बारे में नहीं थीं। क़रीब आकर कुछ कह कर गुज़र जाने वाले ये लोग तमाम छोटे-बड़े पत्रकारों के काम को सलाम भेज रहे थे। शायद उम्र का असर होगा, अब लगता है कि मैं बहुतों के बदले पुरस्कार ले रहा हूं। अनगिनत पत्रकारों ने मुझे सराहा है और धक्का देकर वहां रखा है जहां से कभी भी किसी के फ़िसल जाने का ख़तरा बना रहता है या फिर किसी के धक्का मार कर हटा दिए जाने की आशंका।

आईटीसी मौर्या के पोर्टिको में उतरते ही वहां होटल की वर्दी में खड़े लोग क्यों दौड़े चले गए होंगे? जबकि सब अपने काम में काफी मशरूफ थे। सबने अपने काम से कुछ सेकेंड निकालकर मेरे कान में कुछ कहा। एक कार आती थी, दूसरी कार जाती थी। इन सबके बीच एक एक कर सब आते गए। किसी ने प्यार से नमस्कार किया तो कोई देखकर ही खुश हो गया। सबने कहा कि मीडिया बिक गया है। यहां आपको देखकर अच्छा लगा। आप किस लिए आए हैं? जब बताया तो वे सारे और भी ख़ुश हो गए।

ज़ीरो टीआरपी एंकर को जब भी लगता है कि कोई नहीं देखता होगा, अचानक से बीस-पचास लोग कान में धीरे से कह जाते हैं कि हम आपको ही देखते हैं। कोई रिसर्च की तारीफ कर रहा था कोई पंक्तियों की तो कोई शांति से बोले जाने की शैली की। आख़िर टीवी देखने का इनका स्वाद कैसे बचा रह गया होगा? क्या इन लोगों ने पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों की पढ़ाई की है? नहीं। पांच सितारा होटल के बाहर खड़े होकर कारों की प्रतीक्षा करना, उन्हें बेसमेंट तक ले जाना और ले आना। ये सब करते करते जब ये घर जाते होंगे तो टीवी देखने लायक नहीं बचते होंगे। ऐसे लोगों के बारे में हमें बताया जाता है कि थक-हार कर कोई घर जाता है, दिमाग़ नहीं लगाना चाहता, इसलिए हल्ला हंगामा देखना चाहता है ताकि उसकी दिन भर की थकान और हताशा निकल जाए।

मैं अंदर जाते वक्त और बाहर आते वक्त उनसे मिलता रहा। कुछ सामने आकर मिले तो कुछ ने दूर से ही निगाहों से मुलाकात की रस्म अदा कर दी। एक उम्र दराज़ वर्दीधारी दो तीन बार आए। उत्तराखंड के चंपावत में कई साल से सड़क न होने के कारण दुखी थे। ज़ोर देकर कहा कि आप चंपावत की थोड़ी ख़बर दिखाइये ताकि सरकार की नज़र जाए। सरकार में बैठे लोगों और उनके इशारे पर चलने वाले आई टी सेल के लोगों ने इसी बुनियादी काम को सरकार विरोधी बना दिया है। मैंने उनसे कहा कि हमारे चैनल पर सुशील बहुगुणा ने हाल ही में पंचेश्वर बांध के बारे में लंबी रिपोर्ट की है। तुरंत कहा कि हमने देखी है वो रिपोर्ट, वैसा कुछ चंपावत पर बना दीजिए। मैं यही सोचता रहा कि इतनी थकान लेकर घर गए होंगे और तब भी इन्होंने बहुत मेहनत और रिसर्च से तैयार की गई पंचेश्वर बांध की कोई पचीस तीस मिनट की लंबी रिपोर्ट देखी। मुमकिन है उस कार्यक्रम की रेटिंग ज़ीरो हो, होगी भी।

हमने पत्रकारिता को टीआरपी मीटर का गुलाम बना दिया है। टीआरपी मीटर ने एक साज़िश की है। उसने अपने दायरे के लाखों करोड़ों लोगों को दर्शक होने की पहचान से ही बाहर कर दिया है। कई बार सोचता हूं कि जिनके घर टीआरपी मीटर नहीं लगे हैं, वो टीवी देखने का पैसा क्यों देते हैं? क्या वे टीवी का दर्शक होने की गिनती से बेदखल होने के लिए तीन से चार सौ रुपये महीने का देते हैं। करोड़ों लोग टीवी देखते हैं मगर सभी टीआरपी तय नहीं करते हैं। उनके बदले चंद लोग करते हैं। कभी आप पता कीजिएगा, जिस चैनल को नंबर वन टीआरपी आई है, उसे ऐसे कितने घरों के लोग ने देखा जहां मीटर लगा है। दो या तीन मीटर के आधार पर आप नंबर वन बन सकते हैं।

मैं उस दर्शक का क्या करूं जो टीआरपी में गिना तो नहीं गया है मगर उसने पंचेश्वर बांध पर बनाया गया शो देखा है और चंपावत पर रिपोर्ट देखना चाहता है? मेरे पास इसका जवाब नहीं है क्योंकि मीडिया का यथार्थ इसी टीआरपी से तय किया जा रहा है। सरकार आलोचना करती है मगर वह खुद ही टीआरपी के आधार पर विज्ञापन देती है। सवाल करने के आधार पर विज्ञापन नहीं देती है।

टीआरपी एक सिस्टम है जो करोड़ों लोगों को निहत्था कर देता है ताकि वे दर्शक होने का दावा ही न कर सकें। चंपावत की सड़क पर रिपोर्ट देखने की उनकी मांग हर चैनल रिजेक्ट कर देगा यह बोलते हुए कि कौन देखेगा, जबकि देखने वाला सामने खड़ा है। हज़ारों लोग बधाई देने के लिए जो मेसेज भेज रहे हैं, क्या वो पत्रकारिता की अलग परिभाषा जानते हैं? क्या ये सभी दर्शक नहीं हैं?

हम संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। इस कारण अपने बहुत अच्छे साथियों से बिछड़ने का दर्द भी झेल रहे हैं। पत्रकार बने रहने का जो इको-सिस्टम है वह वैसा नहीं रहा जैसा आईटीसी मौर्या की पार्किंग में खड़े वर्दीधारी कर्मचारी सोच रहे हैं। एक वातावरण तैयार कर दिया गया ताकि कोई भी आर्थिक रूप से बाज़ार में न टिक सके। बाज़ार में टिके रहना भी तो सरकार की मर्ज़ी पर निर्भर करता है। आप देख ही रहे हैं, बैंक भी सरकार की मर्ज़ी पर टिके हैं। प्रतिस्पर्धा के नाम पर उसे मार देने का चक्र रचा गया है जो सर उठाकर बोल रहा है।

आईटीसी मौर्या के हॉल में क़रीब आते लोगों से वही कहते सुना, जो होटल की पार्किंग में खड़े कर्मचारी कह रहे थे। सबने दो बातें कही। इस डर के माहौल में आपको देखकर हिम्मत मिलती है। एक एनडीटीवी ही है जहां कुछ बचा है, बाकी तो हर जगह ख़त्म हो चुका है। ऐसा कहने वालों में से कोई भी साधारण नहीं था। लगा कि अपने पास डर रख लिया है और हिम्मत आउटसोर्स कर दिया है।

उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू जी का भाषण अच्छा था। उन्होंने भी एक दूसरे के मत को सम्मान से सुने जाने पर ज़ोर दिया। विपक्ष को कहने दो और सरकार को करने दो। यही सार था उनका। आपातकाल की याद दिला रहे थे, लोग आज के संदर्भ में याद कर रहे थे। एक्सप्रेस के संपादक राजकमल झा का भाषण तो बहुत ही अच्छा था। रामनाथ गोयनका का परिचय से बिहार के दरंभगा से शुरू होता है तो थोड़ा सा अच्छा लगता है!

क्या वाकई लोगों की हड्डियों में डर घुस गया है? हम पत्रकार लोग तो और भी असुरक्षित हैं। कल पत्रकारिता के लायक रहेंगे या नहीं, घर चलाने लायक रहेंगे या नहीं, पता नहीं है फिर भी जो सही लगता है बोल देते हैं। लिख देते हैं। हॉल मे करीब आने वाले लोगों के सूट बहुत अच्छे थे। करीने से सिले हुए और कपड़ा भी अच्छी क्वालिटी का था। मगर उस पर रंग डर का जमा नज़र आया। टेलर ने कितनी मेहनत से शरीर के नाप के अनुसार सिला होगा ताकि पहनने वाले पर फिट आ जाए। लोगों ने टेलर की मेहनत पर भी पानी फेर दिया है। अपने सूट के भीतर डर का घर बना लिया है।

आईटीसी मौर्या के शेफ का शुक्रिया जिन्होंने इतनी व्यस्तता के बीच मेरे लिए स्पेशल जूस बनवाया और सेल्फी लेते वक्त धीरे से कहा आपकी आवाज़ सुनकर लगता है कोई बोल रहा है। कीमा शानदार बना था। मीडिया में खेल के सारे नियम ध्वस्त किये जा चुके हैं। जहां सारे नियम बिखरे हुए हैं वहां पर नियम से चलने का दबाव भी जानलेवा है। इम्तहान वो नहीं दे रहे हैं जो नियम तोड़ रहे हैं, देना उन्हें है जिन्होंने इसकी तरफ इशारा किया है। भारत का नब्बे फीसदी मीडिया गोदी मीडिया हो चुका है। गोदी मीडिया के आंगन में खड़े होकर एक भीड़ चंद पत्रकारों को ललकार रही है। पत्रकारिता और तटस्थता बरतने की चुनौती दे रही है। अजीब है जो झूठा है वही सत्य के लिए ललकार रहा है कि देखो हमने तुम्हारी टांग तोड़ दी है, अब सत्य बोल कर दिखा दो। एक दारोगा भी ख़ुद को ज़िला का मालिक समझता है, सरकार से ख़ुशनुमा सोहबत पाने वाले मीडिया के एंकर ख़ुद को देश का मालिक समझ बैठे तो कोई क्या कर लेगा।

बहरहाल, बुधवार की शाम उन्हीं दुविधाओं से तैरते हुए किसी द्वीप पर खड़े भर होने की थी। मैंने कोई तीर नहीं मारा है। विनम्रता में नहीं कह रहा। मैं किस्मत वाला हूं कि थोड़ा बहुत अच्छा कर लिया मगर बधाई उसके अनुपात से कहीं ज़्यादा मिल गई। हिन्दी के बहुत से पत्रकारों ने मुझसे कहीं ज़्यादा बेहतर काम किए हैं। जिनके काम पर दुनिया की नज़र नहीं गई। वह किसी छोटे शहर में या किसी बड़े संस्थान के छोटे से कोने में चुपचाप अपने काम को साधता रहता है। पत्रकारिता करता रहता है। जानते हुए कि उसके पास कुछ है नहीं। न पैसा न शोहरत और न नौकरी की गारंटी। समाज पत्रकारिता से बहुत कुछ चाहता है मगर पत्रकारों की गारंटी के लिए कुछ नहीं करता। उसके सामने इस पेशे का क़त्ल किया जा रहा है।

मैं अब अपने लिए पुरस्कार नहीं लेता। उन पत्रकारों के लिए लेता हूं जिनके सपनों को संस्थान और सरकार मिलकर मार देते हैं। इसके बाद भी वे तमाम मुश्किलों से गुज़रते हुए पत्रकारिता करते रहते हैं। इसलिए मैं इनाम ले लेता हूं ताकि उनके सपनों में बहार आ जाए। वाकई मैं किसी पुरस्कार के बाद कोई गर्व भाव लेकर नहीं लौटता। वैसे ही आता हूं जैसे हर रोज़ घर आता हूं। फर्क यही होता है कि उस दिन आपका बहुत सारा प्यार भी घर साथ आता है। आप सभी का प्यार बेशकीमती है और वो तस्वीर भी जिससे मैंने अपनी बात शुरू की थी। शुक्रिया।

एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

अब इसे भी पढ़ें….

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन