ये एंकर अब जन विरोधी गुंडे हैं : रवीश कुमार

…पुण्य प्रसून वाजपेयी ने हाल ही में कहा है कि ख़बरों को चलाने और गिराने के लिए पीएमओ से फोन आते हैं। कोबरा पोस्ट के स्टिंग में आपने देखा ही कैसे पैसे लेकर हिन्दू मुस्लिम किए जाते हैं। इस सिस्टम के मुकाबले आप दर्शकों ने जाने अनजाने में ही एक न्यूज़ रूम विकसित कर दिया है जिसे मैं पब्लिक न्यूज़ रूम कहता हूं। बस इसे ट्रोल और ट्रेंड की मानसिकता से बचाए रखिएगा ताकि खबरों को जगह मिले न कि एक ही ख़बर भीड़ बन जाए…

Ravish Kumar : न्यूज़ चैनल निर्लज्ज तो थे ही अब अय्याशियां भी करने लगे हैं। इस अय्याशी का सबसे बड़ा उदाहरण है अभी बारह महीने बाद होने वाले चुनाव में कौन जीतेगा। ताकि दिल्ली के आलसी पत्रकारों और एंकरों और बंदर और लोफर प्रवक्ताओं की दुकान चल सके। आम आदमी सड़कों पर मरता रहे।

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पब्लिक ही मेरा संपादक है और मैं पब्लिक न्यूज़ रूम में काम करता हूं। हमारा चैनल अब कई शहरों में नहीं आता है। इससे काम करने के उत्साह पर भी असर पड़ता है। शहर का शहर नहीं देख पा रहा है, सुनकर उदासी तो होती है। इससे ज्यादा उदासी होती है कि संसाधन की कमी के कारण आपके द्वारा भेजी गई हर समस्या को रिपोर्ट नहीं कर पाते। कई लोग नाराज़ भी हो जाते हैं। कोई बेगुसराय से चला आता है तो कोई मुंबई से ख़बरों को लेकर चला आता है। उन्हें लौटाते हुए अच्छा नहीं लगता। आपमें से बहुतों को लगता है कि हर जगह हमारे संवाददाता हैं। सातों दिन, चौबीसों घंटे हैं। ऐसा नहीं है। दिल्ली में ही कम पड़ जाते हैं। जिन चैनलों के पास भरपूर संसाधन हैं उन्हें आपसे मतलब नहीं है। आप एक एंकर का नाम बता दें तो सुबह चार घंटे लगाकर सैंकड़ों लोगों के मेसेज पढ़ता है। इसलिए धीरज रखें। मेरा सवाल सिस्टम से है और मांग है कि सबके लिए बेहतर सिस्टम हो। आपमें से किसी की समस्या को नहीं दिखा सका तो तो आप मुझे ज़रूर उलहाना दें मगर बात समझिए कि जो दिखाया है उसी में आपका सवाल भी है।

आपके मेसेज ने पत्रकारिता का एक नया मॉडल बना दिया है। उसके लिए मैं आपके प्रति आभार व्यक्त करना चाहता हूं और प्रणाम करना चाहता हूं। स्कूल सीरीज़, बैंक सीरीज़, नौकरी सीरीज़, आंदोलन सीरीज़ ये सब आप लोगों की बदौलत संभव हुआ है। दो तीन जुनूनी संवाददाताओं का साथ मिला है मगर इसका सारा श्रेय आप पब्लिक को जाता है।दुनिया का कोई न्यूज़ रूम इतनी सारी सूचनाएं एक दिन या एक हफ्ते में जमा नहीं कर सकता था। महिला बैंकरों ने अपनी सारी व्यथा बताकर मुझे बदल दिया है। वो सब मेरी दोस्त जैसी हैं अब। आप सभी का बहुत शुक्रिया। हर दिन मेरे फोन पर आने वाले सैंकड़ों मेसेज से एक पब्लिक न्यूज़ रूम बन जाता है। मैं आपके बीच खड़ा रहता हूं और आप एक क़ाबिल संवाददाताओं की तरह अपनी ख़बरों की दावेदारी कर रहे होते हैं। मुझे आप पर गर्व है। आपसे प्यार हो गया है। कल एक बुजुर्ग अपनी कार से गए और हमारे लिए तस्वीर लेकर आए। हमारे पास संवाददाता नहीं था कि उसे भेजकर तस्वीर मंगा सकूं।

जब मीडिया हाउस खत्म कर दिए जाएंगे या जो पैसे से लबालब हैं अपने भीतर ख़बरों के संग्रह की व्यवस्था ख़त्म कर देंगे तब क्या होगा। इसका जवाब तो आप दर्शकों ने दिया है। आपका दर्जा मेरे फ़ैन से कहीं ज़्यादा ऊंचा है। आप ही मेरे संपादक हैं। कई बार मैं झुंझला जाता हूं। बहुत सारे फोन काल उठाते उठाते, उसके लिए माफी चाहता हूं। आगे भी झुंझलाता रहूंगा मगर आप आगे भी माफ करते रहिएगा। यही व्यवस्था पहले मीडिया हाउस के न्यूज़ रूम में होती थी। लोगों के संपर्क संवाददाताओं से होते थे। मगर अब संवाददाता हटा दिए गए हैं। स्ट्रिंगर से भी स्टोरी नहीं ली जाती है। जब यह सब होता था तो न्यूज़ रूम ख़बरों से गुलज़ार होता था। अब इन सबको हटा कर स्टार एंकर लाया गया है।

आपसे एक गुज़ारिश है। आप किसी एंकर को स्टार होने का अहसास न कराएं। मुझे भी नहीं। ये एंकर अब जन विरोधी गुंडे हैं। एक दिन जब आपके भीतर का सियासी और धार्मिक उन्माद थमेगा तब मेरी हर बात याद आएगी। ये एंकर अब हर दिन सत्ता के इशारे पर चलने वाले न्यूज रूम में हाज़िर होते हैं। पुण्य प्रसून वाजपेयी ने हाल ही में कहा है कि ख़बरों को चलाने और गिराने के लिए पीएमओ से फोन आते हैं। कोबरा पोस्ट के स्टिंग में आपने देखा ही कैसे पैसे लेकर हिन्दू मुस्लिम किए जाते हैं। इस सिस्टम के मुकाबले आप दर्शकों ने जाने अनजाने में ही एक न्यूज़ रूम विकसित कर दिया है जिसे मैं पब्लिक न्यूज़ रूम कहता हूं। बस इसे ट्रोल और ट्रेंड की मानसिकता से बचाए रखिएगा ताकि खबरों को जगह मिले न कि एक ही ख़बर भीड़ बन जाए।

मैंने सोचा है कि अब से आपकी सूचनाओं की सूची बना कर फेसबुक पर डाल दूंगा ताकि ख़बरों को न कर पाने का अपराधबोध कुछ कम हो सके। यहां से भी लाखों लोगों के बीच पहुंचा जा सकता है। कभी आकर आप मेरी दिनचर्या देख लें। एक न्यूज़रूम की तरह अकेला दिन रात जागकर काम करता रहता हूं। कोई बंदा ताकतवर नहीं होता है। जो ताकतवर हो जाता है वो किसी की परवाह नहीं करता। मैं नहीं हूं इसलिए छोटी छोटी बातों का असर होता है। आज कल इस लोकप्रियता को नोचने के लिए एक नई जमात पैदा हो गई है जो मेरा कुर्ता फाड़े रहती है। यहां भाषण वहां भाषण कराने वाली जमात। एक दिन इससे भी मुक्ति पा लूंगा। शनिवार रविवार आता नहीं कि याद आ जाता है कि कहीं भाषण देने जाना है। उसके लिए अलग से तैयारी करता हूं जिसके कारण पारिवारिक जीवन पूरा समाप्त हो चुका है। जल्दी ही आप ऐसे भाषणों को लेकर आप एक अंतिम ना सुनेंगे। अगर आप मेरे मित्र हैं तो प्लीज़ मुझे न बुलाएं। कोई अहसान किया है तब भी न बुलाएं। मैं अब अपनी आवाज़ सुनूंगा साफ साफ मना कर दूंगा। अकेला आदमी इतना बोझ नहीं उठा सकता है। गर्दन में दर्द है। कमर की हालत खराब है। चार घंटे से ज्यादा सो नहीं पाता।

आप सब मुझे बहुत प्यार करते हैं, थोड़ा कम किया कीजिए, व्हाट्स अप के मेसेज डिलिट करते करते कहीं अस्पताल में भर्ती न हो जाऊं। इसलिए सिर्फ ज़रूरी ख़बरें भेजा करें। बहुत सोच समझ कर भेजिए। मुझे जीवन में बहुत बधाइयां मिली हैं, अब रहने दीजिए। मन भर गया है। कोई पुरस्कार मिलता है तो प्राण सूख जाता है कि अब हज़ारों बधाइयों का जवाब कौन देगा, डिलिट कौन करेगा। मुझे अकेला छोड़ दीजिए। अकेला रहना अच्छा लगता है। अकेला भिड़ जाना उससे भी अच्छा लगता है। गुडमार्निग मेसेज भेजने वालों को शर्तियां ब्लाक करता हूं। बहुतों को ब्लाक किया हूं। जब नौकरी नहीं रहेगी तब चेक भेजा कीजिएगा! तो हाज़िर है पब्लिक न्यूज़ रूम में आई ख़बरों की पहली सूची।

उत्तर प्रदेश में बेसिक टीचर ट्रेनिंग कोर्स एक पाठ्यक्रम है। प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक की नौकरी पाने के लिए यह कोर्स करना होता है। प्राइवेट कालेज में एक सेमेस्टर की फीस है 39,000 रुपए। राज्य सरकार हर सेमेस्टर में 42,000 रुपये भेजती है। मगर इस बार छात्रों के खाते में 1800 रुपये ही आए हैं। छात्रों का कहना है कि अगले सेमेस्टर में एडमिशन के लिए उनके पास पैसे नहीं हैं। आगरा के एम डी कालेज के छात्र ने अपनी परेशानी भेजी है। उनका कहना है कि प्राइवेट और सरकारी कालेज के छात्रों के साथ भी यही हुआ है।

छात्र ने बताया कि बेसिक टीचर ट्रेनिंग का नाम सत्र 2018 से बदलकर डिप्लोमा इन एलिमेंट्री एजुकेशन कर दिया है। इसमें राज्यभर में 2 लाख छात्र होंगे। अब जब 2 लाख छात्र अपने साथ होने वाली नाइंसाफी से नहीं लड़ सकते तो मैं अकेला क्या कर सकता हूं। इन्होंने कहा है कि मैं कुछ करूं तो मैं लिखने के अलावा क्या कर सकता हूं। सो यहां लिख रहा हूं।

बिहार से 1832 कंप्यूटर शिक्षक चाहते हैं कि मैं उनकी बात उठाऊं। लीजिए उठा देता हूं। ये सभी पांच साल से आउटसोर्सिंग के आधार पर स्कूलों में पढ़ा रहे थे। मात्र 8000 रुपये पर। अब इन्हें हटा दिया गया है। आठ महीने से धरने पर बैठे हैं मगर कोई सुन नहीं रहा है। इन्हें शिक्षक दिवस के दिन ही हटा दिया गया। कई बार लोग यह सोचकर आउटसोर्सिंग वाली नौकरी थाम लेते हैं कि सरकार के यहां एक दिन परमानेंट हो जाएगा। उन्हें आउटसोर्सिंग और कांट्रेक्ट की नौकरी को लेकर अपनी राजनीतिक समझ बेहतर करनी होगी। नहीं कर सकते तो उन्हें रामनवमी के जुलूस में जाना चाहिए जिसकी आज कल इन 1832 कंप्यूटर शिक्षकों की भूखमरी से ज़्यादा चर्चा है। ऐसा कर वे कम से कम उन्माद आधारित राजनीति के लिए प्रासंगिक भी बने रहेंगे। नौकरी और सैलरी की ज़रूरत भी महसूस नहीं होगी क्योंकि उन्माद की राजनीति अब परमानेंट है। उसमें टाइम कट जाएगा। सैलरी की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। वैसे इन शिक्षकों ने एक ट्विटर हैंडल भी बनाया है जहां वे मुख्यमंत्री को टैग करते रहते हैं। मगर कोई नहीं सुनता है। पचास विधायकों ने इनके लिए लिखा है मगर कुछ नहीं हुआ। ये सांसद विधायक भी किसी काम के नहीं है। पत्र लिखकर अपना बोझ टाल देते हैं।

हज़ारों की संख्या में ग्रामीण बैंक के अधिकारी और कर्मचारी तीन दिनों से हड़ताल पर हैं मगर इन्हें सफलता नहीं मिली है। रिटायरमेंट से पहले एक लाख रुपये की सैलरी होती है और रिटायर होने के अगले ही महीने इनकी पेंशन 2000 भी नहीं होती है। बहुत से बुज़ुर्ग बैंकरों की हालत ख़राब है। कोई 2000 में कैसे जी सकता है। आप नेताओं की गाड़ी और कपड़े देखिए। अय्याशी चल रही है भाई लोगों की। ज़ुबान देखिए गुंडों की तरह बोल रहे हैं। आपका सांसद और विधायक पेंशन लेता है और आप से कहता है कि पेंशन मत लो। यह चमत्कार इसलिए होता है क्योंकि आप राजनीतिक रूप से सजग नहीं है। आखिर ऐसा क्यों है कि सरकारें किसी की नहीं सुनती तो फिर क्यों इन दो कौड़ी के नेताओं के पीछे आप अपना जीवन लगा देते हैं।

कटिहार मेडिकल कालेज के छात्र लगातार मेसेज कर रहे हैं। वहां डॉक्टर फैयाज़ की हत्या हो गई थी। कालेज प्रशासन ख़ुदकुशी मानता है। फ़ैयाज़ की हत्या को लेकर छात्र आंदोलन कर रहे हैं। कैंडल मार्च कर रहे हैं। बहुत दुखद प्रसंग है। गोपालगंज, कटिहार में भी छात्रों ने प्रदर्शन किया है। दोस्तों अपनी लड़ाई में मेरे इस लेख को ही शामिल समझना। मिलने की ज़रूरत नहीं है न बार बार मेसेज करने की। काश संसाधनों वाले चैनल के लोग आपकी खबर कर देते तब तक आप अपने घरों से हर न्यूज़ चैनल का कनेक्शन कटवा दें। एक रुपया चैनलों पर ख़र्च न करें।

अनवर बर्ख़ास्त हो गया, अनिल बच गया। हांसी से किसी पाठक ने दैनिक भास्कर की क्लिपिंग भेजी है। खबर में लिखा गया है कि गवर्नमेंट पी जी कालेज प्रशासन ने प्रोग्रेसिव स्टुडेंट यूनियन के सदस्य अनवर को बर्ख़ास्त कर दिया और एक अन्य सदस्य अनिल को चेतावनी दी है। अच्छी बात है कि सभी छात्रों ने इसका विरोध किया है और प्रिंसिपल सविता मान से मिलकर आंदोलन की चेतावनी दी है।

भास्कर ने लिखा है कि कालेज के इतिहास विभाग ने 22 मार्च को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत के मौके पर भाषण प्रतियोगिता कराई थी। कार्यक्रम में प्रोगेसिव स्टुडेंट्स फ्रंट के सदस्यों ने पुस्तक प्रदर्शनी लगाई। भगत सिंह की जेल डायरी,दस्तावेज़ व अन्य प्रगतिशील पत्रिकाएं रखी गईं। छात्रों ने कहा कि प्रिंसिपल ने क्रायक्रम के बीच से ही सब हटवा दिया। छात्रों के आई कार्ड छीन लिया। इसके बाद नोटिस लगाया गया जिसने अनवर का नाम काटने और अनिल को चेतावनी देने की बात लिखी हुई है। छात्रों ने विरोध किया है। प्रिंसिपल ने कहा कि अनवर अनुशासनहीनता करता है। प्राध्यापकों की बात नहीं मानता है। दीवार पर पोस्टर चिपका देता है। उसे कई बार चेतावनी दी गई मगर नहीं माना। हमने भास्कर की ख़बर यहां उतार दी।

एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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मेरे आदर्श संपादक प्रभाष जोशी का मानना था- सत्ता और व्यवस्था विरोध हर पत्रकार का एजेंडा होना चाहिए

Devpriya Awasthi : अपने देश और समाज को समझना है तो एनडीटीवी पर रवीश कुमार और फेसबुक पर हिमांशु कुमार को फालो कीजिए. आपको रवीश के बारे में अपनी राय बनाने और रखने का पूरा अधिकार है लेकिन, सत्ता और व्यवस्था प्रतिष्ठान के विरोध में उनका नजरिया मुझे और मुझ सरीखे बहुत से लोगों को पसंद आता है. मेरे आदर्श संपादक प्रभाष जोशी का मानना था कि सत्ता और व्यवस्था विरोध हर पत्रकार का एजेंडा होना चाहिए.

सत्ता और व्यवस्था का समर्थन करना जितना आसान है, सतत विरोध करना उतना ही मुश्किल. जहां तक रवीश द्वारा २.२० करोड़ रुपए के सालाना पैकेज की बात है, मोदी और उनकी सरकार के समर्थन में चाटुकारिता की हद तक जुटे दर्जनों पत्रकार इससे भी ज्यादा पैकेज पा रहे हैं. रही बात अपने मालिक के हित में बात करने की, क्या कोई भी कर्मचारी अपने मालिक के हितों को नुकसान पहुंचाकर उसके संस्थान में टिका रह सकता है.

मैं ३६ साल के कैरियर में आठ संस्थानों और १० राज्यों में काम करने के अनुभव के साथ कह सकता हूं कि किसी भी संस्थान में मालिक या अपने वरिष्ठ अधिकारियों का विरोध करना है तो हर समय इस्तीफा जेब में रखना चाहिए. मैं तो भाग्यशाली था कि मेरे दौर में वैकल्पिक रोजगार के लिए ज्यादा भटकना नहीं पड़ता था. आज तो वैकल्पिक रोजगार मिलना बहुत मुश्किल हो गया है.

वरिष्ठ पत्रकार देवप्रिय अवस्थी की एफबी वॉल से.

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हावर्ड से रवीश कुमार को न्योता

Ravish Kumar : प्रधानमंत्री के भारत लौटने के बाद मैं हावर्ड जाने की तैयारी में लग जाऊंगा! उनके पीछे देश ख़ाली ख़ाली सा न लगे इसलिए रूक गया हूं। अच्छी बात है कि हावर्ड के आयोजक छात्रों ने हिन्दी में ही बोलने के लिए कहा है। 2016 में जब कोलंबिया यूनिवर्सिटी गया था तो वहां भी वत्सल और प्रोफेसर सुदीप्तो कविराज ने कहा कि हिन्दी में ही बोलिए। फिर क्या था जो अनुवाद करा कर ले गया था उसे किनारे किया और जो बोलना था बोल आया।

इस बार भी हावर्ड के प्रतीक ने कहा है कि वहां तो भारतीय ही होंगे सो मैं हिन्दी बोल सकता हूं। काश मुझे अंग्रेज़ी आती तो वहां के दूसरी भाषाओं के छात्रों से भी संवाद कर पाता। मैं भाषाई गौरव गान या वर्चस्व में यक़ीन नहीं करता। एक ही भाषा आना कोई अच्छी बात नहीं है। यह बधाई देने वाली बात नहीं है। वहां तो सब जाते ही रहते होंगे। कई लोग ऐसी सूचनाएँ देख कर बधाई देने लगते हैं। सो प्लीज़। आप चाहें तो दस फरवरी को हावर्ड के गेट पर मुझसे मिल सकते हैं। मैं बाहर पकौड़े तलता मिल जाऊंगा! सर्दी बहुत होगी। रजाई बनवा रहा हूं। जयपुरी रजाई से काम चल जाएगा वहां जी? दो दिन रहूँगा। मौक़ा मिला तो हावर्ड की लाइब्रेरी देखना चाहूंगा।

एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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अपनी शामों को मीडिया के खंडहर से निकाल लाइये : रवीश कुमार

Ravish Kumar : अपनी शामों को मीडिया के खंडहर से निकाल लाइये…. 21 नवंबर को कैरवान (carvan) पत्रिका ने जज बीएच लोया की मौत पर सवाल उठाने वाली रिपोर्ट छापी थी। उसके बाद से 14 जनवरी तक इस पत्रिका ने कुल दस रिपोर्ट छापे हैं। हर रिपोर्ट में संदर्भ है, दस्तावेज़ हैं और बयान हैं। जब पहली बार जज लोया की करीबी बहन ने सवाल उठाया था और वीडियो बयान जारी किया था तब सरकार की तरफ से बहादुर बनने वाले गोदी मीडिया चुप रह गया।

जज लोया के दोस्त इसे सुनियोजित हत्या मान रहे हैं। अनुज लोया ने जब 2015 में जांच की मांग की थी और जान को ख़तरा बताया था तब गोदी मीडिया के एंकर सवाल पूछना या चीखना चिल्लाना भूल गए। वो जानते थे कि उस स्टोरी को हाथ लगाते तो हुज़ूर थाली से रोटी हटा लेते। आप एक दर्शक और पाठक के रूप में मीडिया के डर और दुस्साहस को ठीक से समझिए। यह एक दिन आपके जीवन को प्रभावित करने वाला है। साहस तो है ही नहीं इस मीडिया में। कैरवान पर सारी रिपोर्ट हिन्दी में है। 27 दिसंबर की रिपोर्ट पढ़ सकते हैं।

29 नवंबर 2017 को टाइम्स आफ इंडिया में ख़बर छपती है कि अनुज लोया ने बांबे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से मिलकर बताया था कि उसे अब किसी पर शक नहीं है। तब उसी दिन इन एंकरों को चीखना चिल्लाना चाहिए था मगर सब चुप रहे। क्योंकि चीखते चिल्लाते तब सवालों की बातें ताज़ा थीं। लोग उनके सवालों को पत्रिका के सवालों से मिलाने लगते। अब जब रिपोर्ट पुरानी हो चुकी है, अनुज लोया के बयान को लेकर चैनल हमलावार हो गए हैं। क्योंकि अब आपको याद नहीं है कि क्या क्या सवाल उठे थे।

मीडिया की यही रणनीति है। जब भी हुज़ूर को तक़लीफ़ वाली रिपोर्ट छपती है वह उस वक्त चुप हो जाता है। भूल जाता है। जैसे ही कोई ऐसी बात आती है जिससे रिपोर्ट कमज़ोर लगती है, लौट कर हमलावार हो जाता है। इस प्रक्रिया में आम आदमी कमजोर हो रहा है। गोदी मीडिया गुंडा मीडिया होता जा रहा है।

14 जनवरी को बयान जारी कर चले जाने के बाद गोदी मीडिया को हिम्मत आ गई है। वो अब उन सौ पचास लोगों को रगेद रहा है जो इस सवाल को उठा रहे थे जैसे वही सौ लोग इस देश का जनमत तय करते हों। इस प्रक्रिया में भी आप देखेंगे या पढ़ेंगे तो मीडिया यह नहीं बताएगा कि कैरवान ने अपनी दस रिपोर्ट के दौरान क्या सवाल उठाए। कम से कम गोदी मीडिया फिर से जज लोया की बहन का ही बयान चला देता ताकि पता तो चलता कि बुआ क्या कह रही थीं और भतीजा क्या कह रहा है।

क्यों किसी को जांच से डर लगता है? इसमें किसी एंकर की क्या दिलचस्पी हो सकती है? एक जज की मौत हुई है। सिर्फ एक पिता की नहीं। वैसे जांच का भी नतीजा आप जानते हैं इस मुल्क में क्या होता है।

अब अगर गोदी मीडिया सक्रिय हो ही गया है तो सोहराबुद्दीन मामले में आज के इंडियन एक्सप्रेस में दस नंबर पेज पर नीचे किसी कोने में ख़बर छपी है। जिस तरह लोया का मामला सुर्ख़ियों में हैं, उस हिसाब से इस ख़बर को पहले पन्ने पर जगह मिल सकती थी। सीबीआई ने सोमवार को बांबे हाईकोर्ट में कहा कि वह सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में बरी किए गए तीन आई पी एस अफसरों के ख़िलाफ़ अपील नहीं करेगी। इसे लेकर गोदी मीडिया के एंकर आक्रामक अंग्रेज़ी वाले सवालों के साथ ट्विट कर सकते थे। वंज़ारा को नोटिस नहीं पहुंच रहा है क्योंकि उनका पता नहीं चल रहा है। अदालत ने सीबीआई से कहा है कि वंज़ारा को पता लगाएं। एंकर चीख चिल्ला सकते हैं। चाहें तो।

आपको क्यों लग रहा है कि आपके के साथ ऐसा नहीं होगा? क्या आपने विवेक के तमाम दरवाज़े बंद कर दिए हैं? क्या आप इसी भारत का सपना देखते हैं जिसका तिरंगा तो आसमान में लहराता दिखे मगर उसके नीचे उसका मीडिया सवालों से बेईमानी करता हुआ सर झुका ले। संस्थाएं ढहती हैं तो आम आदमी कमज़ोर होता है। आपके लिए इंसाफ़ का रास्ता लंबा हो जाता है और दरवाज़ा बंद हो जाता है।

आप सरकार को पसंद कर सकते हैं लेकिन क्या आपकी वफ़ादारी इस मीडिया से भी है, जो खड़े होकर तन कर सवाल नहीं पूछ सकता है। कम से कम तिरंगे का इतना तो मान रख लेता है कि हुज़ूर के सामने सीना ठोंक कर सलाम बज़ा देते। दुनिया देखती कि न्यूज़ एंकरों को सलामी देनी आती है। आपको पता है न कि सलाम सर झुका के भी किया जाता है और उस सलाम का क्या मतलब होता है? क्या आप भीतर से इतना खोखला भारत चाहेंगे? न्यूज़ एंकर सर झुकाकर, नज़रें चुरा कर सत्ता की सलामी बजा रहे हैं।

आईटी सेल वाले गाली देकर चले जाएंगे मगर उन्हें भी मेरी बात सोचने लायक लगेगी। मुझे पता है। जब सत्ता एक दिन उन्हें छोड़ देगी तो वो मेरी बातों को याद कर रोएंगे। लोकतंत्र तमाशा नहीं है कि रात को मजमा लगाकर फ़रमाइशी गीतों का कार्यक्रम सुन रहे हैं। भारत की शामों को इतना दाग़दार मत होने दीजिए। घर लौट कर जानने और समझने की शाम होती है न कि जयकारे की।

पत्रकारिता के सारे नियम ध्वस्त कर दिए गए हैं। जो हुज़ूर की गोद में हैं उनके लिए कोई नियम नहीं है। वे इस खंडहर में भी बादशाह की ज़िंदगी जी रहे हैं। खंडहर की दीवार पर कार से लेकर साबुन तक के विज्ञापन टंगे हैं। जीवन बीमा भी प्रायोजक है, उस मुर्दाघर का जहां पत्रकारिता की लाश रखी है।

आप इस खंडहर को सरकार समझ बैठे हैं। आपको लगता है कि हम सरकार का बचाव कर रहे हैं जबकि यह खंडहर मीडिया का है। इतना तो फ़र्क समझिए। आपकी आवाज़ न सुनाई दे इसलिए वो अपना वॉल्यूम बढ़ा देते हैं।

जो इस खंडहर में कुछ कर रहे हैं, उन पर उन्हीं ध्वस्त नियमों के पत्थर उठा कर मारे जा रहे हैं। इस खंडहर में चलना मुश्किल होता जा रहा है। नियमों का इतना असंतुलन है कि आप हुज़ूर का लोटा उठाकर ही दिशा के लिए जा सकते हैं वरना उनके लठैत घेर कर मार देंगे। इस खंडहर में कब कौन सा पत्थर पांव में चुभता है, कब कौन सा पत्थर सर पर गिरता है, हिसाब करना मुश्किल हो गया है।

एनडीटीवी के चर्चित पत्रकार और एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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रवीश कुमार को क्यों कहना पड़ा- ‘हिन्दी अख़बार सरकारों का पांव पोछना बन चुके हैं, आप सतर्क रहें’

Ravish Kumar : क्या जीएसटी ने नए नए चोर पैदा किए हैं? फाइनेंशियल एक्सप्रेस के सुमित झा ने लिखा है कि जुलाई से सितंबर के बीच कंपोज़िशन स्कीम के तहत रजिस्टर्ड कंपनियों का टैक्स रिटर्न बताता है कि छोटी कंपनियों ने बड़े पैमाने पर कर चोरी की है। कंपोज़िशन स्कीम क्या है, इसे ठीक से समझना होगा। अखबार लिखता है कि छोटी कंपनियों के लिए रिटर्न भरना आसान हो इसलिए यह व्यवस्था बनाई गई है। उनकी प्रक्रिया भी सरल है और तीन महीने में एक बार भरना होता है। आज की तारीख़ में कंपोज़िशन स्कीम के तहत दर्ज छोटी कंपनियों की संख्या करीब 15 लाख है। जबकि सितंबर में इनकी संख्या 10 से 11 लाख थी। इनमें से भी मात्र 6 लाख कंपनियों ने ही जुलाई से सितंबर का जीएसटी रिटर्न भरा है।

क्या आप जानते हैं कि 6 लाख छोटी कंपनियों से कितना टैक्स आया है? मात्र 250 करोड़। सुमित झा ने इन कंपनियों के चेन से जुड़े और कंपनियों के टर्नओवर से एक अनुमान निकाला है। इसका मतलब यह हुआ कि इन कंपनियों का औसत टर्नओवर 2 लाख है। अगर आप पूरे साल का इनका डेटा देखें तो मात्र 8 लाख है। समस्या यह है कि जिन कंपनियों का या फर्म का सालाना 20 लाख से कम का टर्नओवर हो उन्हें जीएसटी रिटर्न भरने की ज़रूरत भी नहीं है। इसका मतलब है कि छोटी कंपनियां अपना टर्नओवर कम बता रही हैं।
आप जानते ही हैं कि दस लाख कंपनियों का आडिट करने में ज़माना गुज़र जाएगा। इस रिपोर्ट के आधार पर कहा जा सकता है कि बड़े पैमाने पर कर चोरी की छूट दी जा रही है। बस हो यह रहा है कि कोई आंख बंद कर ले रहा है क्योंकि उसका काम स्लोगन से तो चल ही जा रहा है। आखिर जीएसटी के आने से कर चोरी कहां बंद हुई है? क्या 20 लाख से कम के टर्नओवर पर रिटर्न नहीं भरने की छूट इसलिए दी गई ताकि कंपनियां इसका लाभ उठाकर चोरी कर सकें और उधर नेता जनता के बीच ढोल पीटते रहें कि हमने जीएसटी लाकर चोरी रोक दी है।

क्या आपने किसी हिन्दी अखबार में ऐसी ख़बर पढ़ी? नहीं क्योंकि आपका हिन्दी अख़बार आपको मूर्ख बना रहा है। वह सरकारों का पांव पोछना बन चुका है। आप सतर्क रहें। बहुत जोखिम उठाकर यह बात कह रहा हूं। सुमित झा ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जीएसटी फाइल करने को आसान बनाने के नाम पर राजनेता से लेकर जानकार तक यह सुझाव दे रहे हैं कि कंपोज़िशन स्कीम के तहत कंपोज़िशन स्कीम के तहत डेढ़ करोड़ के टर्नओवर वाली कंपनियों को भी शामिल किया जाए। यह ज़रूर कुछ ऐसा खेल है जिसे हम आम पाठक नहीं समझते हैं मगर ध्यान से देखेंगे तो इस खेल को समझना इतना भी मुश्किल नहीं है।

सुमित के अनुसार डेटा के विश्लेषण से साफ होता है कि कंपोज़िशन स्कीम के तहत 20 लाख टर्नओवर की सीमा को बढ़ा कर डेढ़ करोड़ करने की कोई ज़रूरत नहीं है बल्कि टैक्स चोरी रोकने के लिए ज़रूरी है कि 20 लाख से भी कम कर दिया जाए। बिजनेस स्टैंडर्ड में श्रीमि चौधरी की रिपोर्ट पर ग़ौर कीजिए। CBDT ( central board of direct taxex) को दिसंबर की तिमाही का अग्रिम कर वसूली का के आंकड़ो को जुटाने में काफी मुश्किलें आ रही हैं। दिसंबर 15 तक करदाताओं को अग्रिम कर देना होता है। सूत्रों के हवाले से श्रीमि ने लिखा है कि चोटी की 100 कंपनियों ने जो अग्रिम कर जमा किया है और जो टैक्स विभाग ने अनुमान लगाया था, उसमें काफी अंतर है। मिलान करने में देरी के कारण अभी तक यह आंकड़ा सामने नहीं आया है।

राम जाने यह भी कोई बहाना न हो। इस वक्त नवंबर की जीएसटी वसूली काफी घटी है। वित्तीय घाटा बढ़ गया है। सरकार ने 50,000 करोड़ का कर्ज़ लिया है। ऐसे में अग्रिम कर वसूली का आंकड़ा भी कम आएगा तो विज्ञापनबाज़ी का मज़ा ख़राब हो जाएगा। बिजनेस स्टैंडर्ड से बात करते हुए कर अधिकारियों ने कहा है कि हर तिमाही में हमारे आंकलन और वास्तविक अग्रिम कर जमा में 5 से 7 फीसदी का अंतर आ ही जाता है मगर इस बार यह अंतर 15 और 20 फीसदी तक दिख रहा है। इसका कारण क्या है और इस ख़बर का मतलब क्या निकलता है, इसकी बात ख़बर में नहीं थी। कई बार ख़बरें इसी तरह हमें अधर में छोड़ देताी हैं।

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत सरकार ने 60 शहरों के लिए 9,860 करोड़ रुपये जारी किए थे। इसका मात्र 7 प्रतिशत ख़र्च हुआ है। करीब 645 करोड़ ही। रांची ने तो मात्र 35 लाख ही ख़र्च किए हैं। झारखंड के मुख्यमंत्री अखबारों में तो ऐसे विज्ञापन दे रहे हैं जैसे हकीकत किसी को मालूम ही न हो। स्मार्ट सिटी के तहत 90 शहरों का चयन किया गया है। हर शहर को स्मार्ट होने के लिए 500 करोड़ दिए गए हैं। आप थोड़ा सा दिमाग़ लगाएंगे तो समझ सकते हैं कि इस पैसे से क्या हो सकता है। फर्ज़ी दिखावे के लिए दो चार काम हो जाएंगे, कहीं दस पांच डस्टबिन और फ्री वाई फाई लगा दिया जाएगा बस हो गया स्मार्ट सिटी। इसके नाम पर शहरों में रैलियां निकलती हैं, लोग रोते हैं कि हमारे शहर का नाम स्मार्ट सिटी में नहीं आया, नाम आ जाता है, मिठाई बंट जाती है और काम उसी रफ्तार से जिस रफ्तार से होता रहा है।

स्मार्ट सिटी के एलान वाली ख़बर तो पहले पन्ने पर छपती है क्योंकि इससे आपको सपना दिखाया जाता है। सात प्रतिशत ख़र्च का मतलब है कि स्मार्ट सिटी फेल है। इसकी ख़बर पहले पन्ने पर क्यों नहीं छपती है, आखिरी पन्ने पर क्यों छपती है। आप अपने अपने अखबारों में चेक कीजिए कि स्मार्ट सिटी वाली ये ख़बर किस पन्ने पर छपी है। पीटीआई की है तो सबको मिली ही होगी। बाकी सारा काम नारों में हो रहा है। आई टी सेल की धमकियों से हो रहा है और झूठ तंत्र के सहारे हो रहा है। जय हिन्द। यही सबकी बात है। यही मन की बात है।

नोट: अख़बार ख़रीदना अख़बार पढ़ना नहीं होता है। पढ़ने के लिए अख़बार में ख़बर खोजनी पड़ती है। किसी भी सरकार का मूल्यांकन सबसे पहले इस बात से कीजिए कि उसके राज में मीडिया कितना स्वतंत्र था। सूचना ही सही नहीं है तो आपकी समझ कैसे सही हो सकती है।

एनडीटीवी के चर्चित पत्रकार रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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पुरस्कार थोड़ा बड़ा-सा हो तो रवीश कुमार किसी के हाथों ले सकते हैं..

Yashwant Singh : पुरस्कार थोड़ा बड़ा-सा हो तो क्या भाजपा और क्या कांग्रेस, किसी से भी ले लेने में कोई दिक्कत नहीं। बाद में कह दीजिएगा, अपने लिए नहीं, दूसरे बेचारे गरीब पत्रकारों के लिए ले लिया था। हिप्पोक्रेट कुमार गाल बहुत बजाते हैं और हम सबको उल्लू बनाते हैं। रविश ndtv में 300 की छंटनी के खिलाफ नहीं लिख बोल सकते, रामनाथ अवार्ड नहीं ठुकरा सकते, क्योंकि वो ndtv के गोदी पत्रकार हैं। इसलिए बेचारे दासता को क्रांति के नाम पर बेचने को मजबूर हैं।

भड़ास के एडिटर यशवंत के उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं….

Dinesh Mansera वेंकैय्या जी अब बीजेपी में नहीं रहे.. वे उप राष्ट्रपति हैं…

    Yashwant Singh योगी जी cm हैं और मोदी जी pm हैं। भाजपा अब रही कहां। वो संवैधानिक पन्नों कुर्सियों में समा गई।

    Nitin Thakur हां तो जब आप योगी से ले रहे थे तब हमने आपको हिप्पोक्रेट कतई नहीं कहा था.

    Yashwant Singh हिप्पोक्रेट को ही हिप्पोक्रेट कहा जाता है।

    Nitin Thakur यशवंत जी, मेरी नज़र में आप दोनों हिप्पोक्रेट नहीं हैं लेकिन जिस आधार पर आप रवीश को हिप्पोक्रेट ठहरा रहे हैं उस आधार पर आप उनसे पहले इस श्रेणी में बाज़ी मार चुके हैं.

    Yashwant Singh गोदी मीडिया, फासिज़्म, आपातकाल, सेंसरशिप…. और फिर इन्हीं सबों के जनक लोगों से कलम हासिल करना.. और फिर कहना, दूसरे पत्रकारों के लिए लिया हूं। आप करें तो क्रांति, दूसरा करे तो गोदी मीडिया। 😀 मेरा अपना खुद का फंडा क्लीयर है। हर मंच का भड़ास हित मे इस्तेमाल करना है। जो भी गलत हुआ, उसके खिलाफ बोलना है, चाहें गोदी मीडिया वाले हों या कांगी-वामी मीडिया वाले। रविश ndtv में 300 की छंटनी के खिलाफ नहीं लिख बोल सकते, रामनाथ अवार्ड नहीं ठुकरा सकते, क्योंकि वो ndtv के गोदी पत्रकार हैं। इसलिए बेचारे दासता को क्रांति के नाम पर बेचने को मजबूर हैं।

    Avinish Mishra वैंकेया जी का पिछले दिनों का बयान सब सुनिए फिर पता चल जाएगा कि वो अभी भी भाजपाई का ही बर्ताव कर रहे हैं… मेरा इसमें एक और सवाल है। रवीश कुमार में अगर इतनी ही नैतिकता है। तो उन्हें ये बताना चाहिए कि उन्होंने रेणु साहित्य सम्मान किस टैलेंट पर लिए है?

   Ashutosh Pandey कुमार की पत्रकारिता को नमन…जो भी लोग कहें…दम है भाई…

   Satyendra PS अच्छा ये बताइए कि गरियाया किसको किसको जा सकता है। कुछ लोग कहते हैं कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति वगैरा को नही गरियाना चाहिए, पीएम सीएम को गरिया सकते हैं?

   Neeraj Rawat Yashwant ji personal mat hoiye aap m v kabiliyat h pr avi utani nahi …ye wahi baat h tu kare to saal. Mai karu to character dhila h…present seniors ravish is best

   Ved Ratna Shukla यशवंत भैया अब चारसौबीसी न बतियावा।

पंकज शर्मा यही हाल है इनका और इन जैसे तथाकथित लोगो का। ओम थानवी भी कल्याण सिंह से पुरुस्कार लेने से गुरेज नहीं करते

Harsh Vardhan Tripathi आप गलत समझ रहे हैं, वे सरकार से हमारे-आपके लिए ही तो लड़ते रहते हैं। पुरस्कार रहता है तो, थोड़ा मजबूती से लड़ पाते हैं। हम जैसे गैर पुरस्कृत पत्रकारों को ये बात भला कहां समझ आने वाली..

Aditya Pandey  धमकाते रहो, चमकाते रहो और दुकान चलाते रहो…. जस्टिस लोया पर तीन प्राइम टाइम करो और हर बात झूठी साबित हो जाये तो मासूम सा चेहरा बना कर चुप बैठ जाओ… जिस समय ये महाशय अपनी ‘झूठ सच पत्रकारिता’ का इनाम ले रहे हैं तब अपने मैनेजमेंट के उस निर्णय की जानकारी है जिसमें इनके 300 साथियों को बेरोज़गार हो जाने वाले हैं…कहीं नज़र आ रहा है कोई अवसाद या दुःख? साल में करोड़ों की कमाई लेकिन गरीबों का नाम ले ले कर ग्लिसरीन आंसू बहाने वाले और हर बार अपने मालिक की कारगुज़ारियों पर चुप रह जाने वाले रविश बाबू को गोयनका इनाम की बधाई…

प्रयाग पाण्डे पुरस्कार लौटाने के लिए भी तो कुछ पुरस्कार होने चाहिए अपने पास ।हम यह सोच -सोच दुबलाए जा रहे हैं कि जब कभी पुरस्कार वापसी की मुहिम शुरू हुई तो हमारे पास लौटाने को कोई पुरस्कार है ही नहीं। दरअसल पुरस्कार प्राप्त करना और पुरस्कार वापसी दोनों इंसान के कद को बढ़ाते हैं।

Mangla Prasad Tiwari इस दौर के शानदार पत्रकार रवीश कुमार को एक बार फिर रामनाथ गोयनका अवार्ड मिला है . बधाई . यूँ ही अलख जगाए रखिए . सत्ता के लिए मुनादी तो कोई भी कर सकता है . झाल -मृदंग लेकर झूम रहे पादुका पूजकों के दौर में Ravish Kumar जी को तन कर खड़े रहने के लिए एक बार फिर बधाई

Harendra Moral भाईसाब ये पुरस्कार पत्रकारिता पर मिला है उसे लेने में क्या दिक्कत है। आखिर एक पत्रकार की यही तो असली कमाई और जमा पूंजी है। और वैसे भी ये पुरस्कार भाजपा नेता नहीं उप राष्ट्रपति ने दिया है।

Neeraj Rawat  लहरों का सुकुन तो सभी को पसंद है मगर। तूफानों से कश्ती निकालने का मजा ही कुछ और है। बधाई रविश जी को…

Tahir Khan अवार्ड लेने में कोई बुराई नहीं है सर किसी से भी लिया जा सकता है सर कलकों अगर PM साहब आपको अवार्ड दें तो आप कौन सा मना कर देंगे!

Manmohan Sharma Award paney key liye awardee ko kimit deni hoti hey. Vasey patarkarta key liye award koi jari nahi hota
Faisal Rajput  Indian mansikta. “Jalan” ya kisi ki kamiyabi par jalna is Very dangerous deseas…. This is part of Indian culture.. “Hamko Nahi Mila to usko Q Mila?”

Neeraj Rawat साँरी पर अपने को रविश के साथ तुलना करना थोडा बेमानी होगी। आप भी अच्छे है। पर रविश जैसे बिल्कुल भी नहीं।

O.p. Pandey  यशवंत जी आपका हम फेन हूँ लेकिन इस बात पर बहस की पूरी गुंजाइस भी है कि दरसल सरकार की नीतियों के खिलाफ होना और सरकार को ही नकारना दो पहलू है शायद आप हम सभी किसी ना किसी तरह से उन्ही सरकारों के नुमाइंदों के साथ ही मंच शेयर करते हैं? पुरुस्कार लेना और देना दोनों ही बहस के इस दौर में अप्रासंगिक लग जरूर रहे हैं लेकिन अप्रसांगिक है नही । शायद उसी तरह जैसे पूजी के खिलाफ लिखने वाला पूजी के द्वारा पोषित मच और उस मंच पर दिए जाने वाले किसी भी व्यक्तिविशेष जोकि पूजी का समर्थक है से प्राप्त करता है और बिना पूजी वाला तो ना पुरुस्कार देने में सक्षम है और ना पूजी प्राप्त करने में । इस व्यवस्था में ही सब होना है इसलिए मेरी राय में यह ज्यादा बड़ा मुद्दा नहीं है।

Yashwant Singh अपना फंडा क्लीयर है। हर मंच का भड़ास हित मे इस्तेमाल करना है। जो भी गलत हुआ, उसके खिलाफ बोलना है, चाहें गोदी मीडिया वाले हों या कांगी-वामी मीडिया वाले। रविश ndtv में 300 की छंटनी के खिलाफ नहीं लिख बोल सकते, रामनाथ अवार्ड नहीं ठुकरा सकते, क्योंकि वो ndtv के गोदी पत्रकार हैं। इसलिए बेचारे दासता को क्रांति के नाम पर बेचने को मजबूर हैं।

Sarvesh Singh  हिप्पोक्रेट कुमार अपने मालिक के सबसे ईमानदार नौकर हैं। रॉय साहेब का इतना महंगा नमक खा रहे हैं तो अदा भी वही करेंगे। हिप्पोक्रेट कुमार जो क्रांतिकारी पत्रकारिता करते हैं असल में वह नमक अदायगी मात्र है। भक्ति काल के पहले वाले युग में हिप्पोक्रेट कुमार की इतनी प्रखर और​ मुखर पत्रकारिता मैंने तो नहीं देखी। मुझे लगता है कि आज लुभावने और क्रांतिकारी भाव पैदा करने वाले बोल बोलने का भी युग चल रहा है जो जितना लोगों की भावनाओं से खेलेगा वह उतना ही अच्छा पत्रकार और नेता कहलाएगा।

Pawan Singh वाह क्या “कतरन” पोस्ट की है…वाह यशवंत ….

Care Naman पुरुस्कार लेंगे तभी तो पुरुस्कार वापसी वाले गैंग में शामिल होंगे कस्बा आखिर कस्बा ही तो है ?

Devendra Kumar Nauhwar You are right sir…

Manish Singh अब तक की सबसे सही विवेचना ।शानदार

Abhishek Singh लेंगे तभी तो वापसी कर पाएँगे॥

Arun Sathi बात में दम है

Vishwakarma Harimohan काश! इनका कोई जमीर होता।

Dharmpal Yadav सही कहा आपने। बाहर से जो दिखता है वह अंदर नहीं होता।

Ankur Verma उपराष्ट्रपति पुरस्कार दे रहे हैं, न कि कोई bjp नेता। फिर अच्छे काम के लिये अगर रिवॉर्ड मिल रहा है तो उसको बेवजह ठुकराने का कोई तर्क नहीं दिखता।

    Yashwant Singh इसीलिए मैंने भी cm योगी के हाथों अवार्ड लिया था 🙂 😀

   Sishupal Khatri सर्वश्रेष्ट हमेशा सर्वश्रेष्ट ही रहता है चाहे कितनी भी कठिनाईया क्यों न हो , रवीश ने दिखाया है कि पत्रकारिता कैसे की जाती है , , चाहे कितनी गालिया ओर धमकियां र तरह तरह के आरोप लगे हो , पर चाटुकारिता पर पत्रकारिता भारी पड़ी है ,, जय हिंद
    Ankur Verma काम को लेकर आलोचना करना अलग विषय है, लेकिन होता तो cm भी संवैधानिक रूप से राज्य कार्यपालिका प्रमुख ही है। उससे अवार्ड लेने में कोई बुराई नहीं है।

   Rahul Sharma CM yogi bhajapa ka neta he aur deputy president BJP neta nahi

Pawan Kumar Pandey एक झटके में सब को गोदी मीडिया भी ठहरा जाते हैं.हथेली पे लिखते है और खुद ही मिटा देते हैं.ऐसा करते वक्त भूल जाते हैं देश के दूर दराज और दुर्गम जगहों पर लोग कैसे पत्रकारिता के पेशे का निर्वहन कर रहे हैं

Sunil Kumar Singh जो रहीम उत्तम प्रकृति , का करि सकल कुसंग। चंदन विष व्यापत नही लिपटे रहत भुजंग।।

Bijender Rai इनसे लेने का अपना ही मजा है

S.K. Misra यह पुरुस्कार रवीश को तीसरी बार मिल रहा है… क्या यह साधारण बात है? और कितने ऐसे लोग होंगे।

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रवीश कुमार ने वेंकैया नायडू के हाथों ‘कलम’ थामने के बाद सफाई में क्या लिखा, आप भी पढ़ें

Ravish Kumar : बाग़ों में बहार तो नहीं है मगर फिर भी…. तस्वीरें अपनी नियति देखने वालों की निगाह में तय करती हैं। इंडियन एक्सप्रेस के प्रवीण जैन के कैमरे से उतारी गई इस तस्वीर को देखने वालों ने तस्वीर से ज़्यादा देखा। एक फ्रेम में कैद इस लम्हे को कोई एक साल पहले के वाक़ये से जोड़ कर देख रहा है तो कोई उन किस्सों से जिसे आज के माहौल ने गढ़ा है। दिसंबर की शाम बाग़ों में बहार का स्वागत कर रही थी। गालियों के गुलदस्ते से गुलाब जल की ख़ुश्बू आ रही थी। तारीफ़ों के गुलदस्ते पर भौरें मंडरा रहे थे। मैं उस बाग़ में बेगाना मगर जाना-पहचाना घूम टहल रहा था।

मैं स्थितप्रज्ञ होने लगा हूं। हर तूफ़ान के बीच समभाव को पकड़ना चाहता हूं। कभी पकड़ लेता हूं, कभी छूट जाता है। इनाम और इनायत के लिए आभार कहता हुआ 2007 के उस लम्हे को खोज रहा था जब पिताजी के साथ पहली बार रामनाथ गोयनका पुरस्कार लेने गया था। यादें आपको भीड़ में अकेला कर देती हैं। पास आती आवाज़ें मेरे बारे में कह रही थीं मगर वो मेरे बारे में नहीं थीं। क़रीब आकर कुछ कह कर गुज़र जाने वाले ये लोग तमाम छोटे-बड़े पत्रकारों के काम को सलाम भेज रहे थे। शायद उम्र का असर होगा, अब लगता है कि मैं बहुतों के बदले पुरस्कार ले रहा हूं। अनगिनत पत्रकारों ने मुझे सराहा है और धक्का देकर वहां रखा है जहां से कभी भी किसी के फ़िसल जाने का ख़तरा बना रहता है या फिर किसी के धक्का मार कर हटा दिए जाने की आशंका।

आईटीसी मौर्या के पोर्टिको में उतरते ही वहां होटल की वर्दी में खड़े लोग क्यों दौड़े चले गए होंगे? जबकि सब अपने काम में काफी मशरूफ थे। सबने अपने काम से कुछ सेकेंड निकालकर मेरे कान में कुछ कहा। एक कार आती थी, दूसरी कार जाती थी। इन सबके बीच एक एक कर सब आते गए। किसी ने प्यार से नमस्कार किया तो कोई देखकर ही खुश हो गया। सबने कहा कि मीडिया बिक गया है। यहां आपको देखकर अच्छा लगा। आप किस लिए आए हैं? जब बताया तो वे सारे और भी ख़ुश हो गए।

ज़ीरो टीआरपी एंकर को जब भी लगता है कि कोई नहीं देखता होगा, अचानक से बीस-पचास लोग कान में धीरे से कह जाते हैं कि हम आपको ही देखते हैं। कोई रिसर्च की तारीफ कर रहा था कोई पंक्तियों की तो कोई शांति से बोले जाने की शैली की। आख़िर टीवी देखने का इनका स्वाद कैसे बचा रह गया होगा? क्या इन लोगों ने पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों की पढ़ाई की है? नहीं। पांच सितारा होटल के बाहर खड़े होकर कारों की प्रतीक्षा करना, उन्हें बेसमेंट तक ले जाना और ले आना। ये सब करते करते जब ये घर जाते होंगे तो टीवी देखने लायक नहीं बचते होंगे। ऐसे लोगों के बारे में हमें बताया जाता है कि थक-हार कर कोई घर जाता है, दिमाग़ नहीं लगाना चाहता, इसलिए हल्ला हंगामा देखना चाहता है ताकि उसकी दिन भर की थकान और हताशा निकल जाए।

मैं अंदर जाते वक्त और बाहर आते वक्त उनसे मिलता रहा। कुछ सामने आकर मिले तो कुछ ने दूर से ही निगाहों से मुलाकात की रस्म अदा कर दी। एक उम्र दराज़ वर्दीधारी दो तीन बार आए। उत्तराखंड के चंपावत में कई साल से सड़क न होने के कारण दुखी थे। ज़ोर देकर कहा कि आप चंपावत की थोड़ी ख़बर दिखाइये ताकि सरकार की नज़र जाए। सरकार में बैठे लोगों और उनके इशारे पर चलने वाले आई टी सेल के लोगों ने इसी बुनियादी काम को सरकार विरोधी बना दिया है। मैंने उनसे कहा कि हमारे चैनल पर सुशील बहुगुणा ने हाल ही में पंचेश्वर बांध के बारे में लंबी रिपोर्ट की है। तुरंत कहा कि हमने देखी है वो रिपोर्ट, वैसा कुछ चंपावत पर बना दीजिए। मैं यही सोचता रहा कि इतनी थकान लेकर घर गए होंगे और तब भी इन्होंने बहुत मेहनत और रिसर्च से तैयार की गई पंचेश्वर बांध की कोई पचीस तीस मिनट की लंबी रिपोर्ट देखी। मुमकिन है उस कार्यक्रम की रेटिंग ज़ीरो हो, होगी भी।

हमने पत्रकारिता को टीआरपी मीटर का गुलाम बना दिया है। टीआरपी मीटर ने एक साज़िश की है। उसने अपने दायरे के लाखों करोड़ों लोगों को दर्शक होने की पहचान से ही बाहर कर दिया है। कई बार सोचता हूं कि जिनके घर टीआरपी मीटर नहीं लगे हैं, वो टीवी देखने का पैसा क्यों देते हैं? क्या वे टीवी का दर्शक होने की गिनती से बेदखल होने के लिए तीन से चार सौ रुपये महीने का देते हैं। करोड़ों लोग टीवी देखते हैं मगर सभी टीआरपी तय नहीं करते हैं। उनके बदले चंद लोग करते हैं। कभी आप पता कीजिएगा, जिस चैनल को नंबर वन टीआरपी आई है, उसे ऐसे कितने घरों के लोग ने देखा जहां मीटर लगा है। दो या तीन मीटर के आधार पर आप नंबर वन बन सकते हैं।

मैं उस दर्शक का क्या करूं जो टीआरपी में गिना तो नहीं गया है मगर उसने पंचेश्वर बांध पर बनाया गया शो देखा है और चंपावत पर रिपोर्ट देखना चाहता है? मेरे पास इसका जवाब नहीं है क्योंकि मीडिया का यथार्थ इसी टीआरपी से तय किया जा रहा है। सरकार आलोचना करती है मगर वह खुद ही टीआरपी के आधार पर विज्ञापन देती है। सवाल करने के आधार पर विज्ञापन नहीं देती है।

टीआरपी एक सिस्टम है जो करोड़ों लोगों को निहत्था कर देता है ताकि वे दर्शक होने का दावा ही न कर सकें। चंपावत की सड़क पर रिपोर्ट देखने की उनकी मांग हर चैनल रिजेक्ट कर देगा यह बोलते हुए कि कौन देखेगा, जबकि देखने वाला सामने खड़ा है। हज़ारों लोग बधाई देने के लिए जो मेसेज भेज रहे हैं, क्या वो पत्रकारिता की अलग परिभाषा जानते हैं? क्या ये सभी दर्शक नहीं हैं?

हम संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। इस कारण अपने बहुत अच्छे साथियों से बिछड़ने का दर्द भी झेल रहे हैं। पत्रकार बने रहने का जो इको-सिस्टम है वह वैसा नहीं रहा जैसा आईटीसी मौर्या की पार्किंग में खड़े वर्दीधारी कर्मचारी सोच रहे हैं। एक वातावरण तैयार कर दिया गया ताकि कोई भी आर्थिक रूप से बाज़ार में न टिक सके। बाज़ार में टिके रहना भी तो सरकार की मर्ज़ी पर निर्भर करता है। आप देख ही रहे हैं, बैंक भी सरकार की मर्ज़ी पर टिके हैं। प्रतिस्पर्धा के नाम पर उसे मार देने का चक्र रचा गया है जो सर उठाकर बोल रहा है।

आईटीसी मौर्या के हॉल में क़रीब आते लोगों से वही कहते सुना, जो होटल की पार्किंग में खड़े कर्मचारी कह रहे थे। सबने दो बातें कही। इस डर के माहौल में आपको देखकर हिम्मत मिलती है। एक एनडीटीवी ही है जहां कुछ बचा है, बाकी तो हर जगह ख़त्म हो चुका है। ऐसा कहने वालों में से कोई भी साधारण नहीं था। लगा कि अपने पास डर रख लिया है और हिम्मत आउटसोर्स कर दिया है।

उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू जी का भाषण अच्छा था। उन्होंने भी एक दूसरे के मत को सम्मान से सुने जाने पर ज़ोर दिया। विपक्ष को कहने दो और सरकार को करने दो। यही सार था उनका। आपातकाल की याद दिला रहे थे, लोग आज के संदर्भ में याद कर रहे थे। एक्सप्रेस के संपादक राजकमल झा का भाषण तो बहुत ही अच्छा था। रामनाथ गोयनका का परिचय से बिहार के दरंभगा से शुरू होता है तो थोड़ा सा अच्छा लगता है!

क्या वाकई लोगों की हड्डियों में डर घुस गया है? हम पत्रकार लोग तो और भी असुरक्षित हैं। कल पत्रकारिता के लायक रहेंगे या नहीं, घर चलाने लायक रहेंगे या नहीं, पता नहीं है फिर भी जो सही लगता है बोल देते हैं। लिख देते हैं। हॉल मे करीब आने वाले लोगों के सूट बहुत अच्छे थे। करीने से सिले हुए और कपड़ा भी अच्छी क्वालिटी का था। मगर उस पर रंग डर का जमा नज़र आया। टेलर ने कितनी मेहनत से शरीर के नाप के अनुसार सिला होगा ताकि पहनने वाले पर फिट आ जाए। लोगों ने टेलर की मेहनत पर भी पानी फेर दिया है। अपने सूट के भीतर डर का घर बना लिया है।

आईटीसी मौर्या के शेफ का शुक्रिया जिन्होंने इतनी व्यस्तता के बीच मेरे लिए स्पेशल जूस बनवाया और सेल्फी लेते वक्त धीरे से कहा आपकी आवाज़ सुनकर लगता है कोई बोल रहा है। कीमा शानदार बना था। मीडिया में खेल के सारे नियम ध्वस्त किये जा चुके हैं। जहां सारे नियम बिखरे हुए हैं वहां पर नियम से चलने का दबाव भी जानलेवा है। इम्तहान वो नहीं दे रहे हैं जो नियम तोड़ रहे हैं, देना उन्हें है जिन्होंने इसकी तरफ इशारा किया है। भारत का नब्बे फीसदी मीडिया गोदी मीडिया हो चुका है। गोदी मीडिया के आंगन में खड़े होकर एक भीड़ चंद पत्रकारों को ललकार रही है। पत्रकारिता और तटस्थता बरतने की चुनौती दे रही है। अजीब है जो झूठा है वही सत्य के लिए ललकार रहा है कि देखो हमने तुम्हारी टांग तोड़ दी है, अब सत्य बोल कर दिखा दो। एक दारोगा भी ख़ुद को ज़िला का मालिक समझता है, सरकार से ख़ुशनुमा सोहबत पाने वाले मीडिया के एंकर ख़ुद को देश का मालिक समझ बैठे तो कोई क्या कर लेगा।

बहरहाल, बुधवार की शाम उन्हीं दुविधाओं से तैरते हुए किसी द्वीप पर खड़े भर होने की थी। मैंने कोई तीर नहीं मारा है। विनम्रता में नहीं कह रहा। मैं किस्मत वाला हूं कि थोड़ा बहुत अच्छा कर लिया मगर बधाई उसके अनुपात से कहीं ज़्यादा मिल गई। हिन्दी के बहुत से पत्रकारों ने मुझसे कहीं ज़्यादा बेहतर काम किए हैं। जिनके काम पर दुनिया की नज़र नहीं गई। वह किसी छोटे शहर में या किसी बड़े संस्थान के छोटे से कोने में चुपचाप अपने काम को साधता रहता है। पत्रकारिता करता रहता है। जानते हुए कि उसके पास कुछ है नहीं। न पैसा न शोहरत और न नौकरी की गारंटी। समाज पत्रकारिता से बहुत कुछ चाहता है मगर पत्रकारों की गारंटी के लिए कुछ नहीं करता। उसके सामने इस पेशे का क़त्ल किया जा रहा है।

मैं अब अपने लिए पुरस्कार नहीं लेता। उन पत्रकारों के लिए लेता हूं जिनके सपनों को संस्थान और सरकार मिलकर मार देते हैं। इसके बाद भी वे तमाम मुश्किलों से गुज़रते हुए पत्रकारिता करते रहते हैं। इसलिए मैं इनाम ले लेता हूं ताकि उनके सपनों में बहार आ जाए। वाकई मैं किसी पुरस्कार के बाद कोई गर्व भाव लेकर नहीं लौटता। वैसे ही आता हूं जैसे हर रोज़ घर आता हूं। फर्क यही होता है कि उस दिन आपका बहुत सारा प्यार भी घर साथ आता है। आप सभी का प्यार बेशकीमती है और वो तस्वीर भी जिससे मैंने अपनी बात शुरू की थी। शुक्रिया।

एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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रवीश कुमार ने पूछा- मीडिया क्यों सरकार से दलाली खा रहा है?

Ravish Kumar : नागरिक निहत्था होता जा रहा है…. राजस्थान के डॉक्टरों की हड़ताल की ख़बर पर देर से नज़र पड़ी। सरकार ने वादा पूरा नहीं किया है।हमने प्रयास भी किया कि किसी तरह से प्राइम टाइम का हिस्सा बना सकें। मगर हम सब ख़ुद ही अपने साथियों से बिछड़ने की उदासी से घिरे हुए थे। हर दूसरे दिन संसाधन कम होते जा रहे हैं। हम कम तो हुए ही हैं, ख़ाली भी हो गए हैं। साथियों को जाते देखना आसान नहीं था। वर्ना डॉक्टरों को इनबाक्स और व्हाट्स अप में इतने संदेश भेजने की ज़रूरत नहीं होती। आगरा से आलू किसान और दुग्ध उत्पादक भी इसी तरह परेशान हैं। दूध का दाम गिर गया है और आलू का मूल्य शून्य हो गया है। इन ख़बरों को न कर पाना गहरे अफसोस से भर देता है। कोई इंदौर से लगातार फोन कर रहा है।

सबने यही कहा कि एनडीटीवी के अलावा तो कोई हमारी स्टोरी करेगा नहीं। सबको इसी वक्त पत्रकारिता की याद क्यों आती है? आप समझते तो हैं फिर भी क्यों ऐसे अख़बार और चैनल के लिए पैसे देते हैं जहाँ पत्रकारिता के नाम पर तमाशा हो रहा है। हम सवाल करने की कीमत चुका रहे हैं। गुणगान करने वालों को कोई तकलीफ नहीं है। उनके पास सारे संसाधन हैं मगर उन चैनलों पर आम लोगों की खोजकर लाई गई कहानी नहीं होती है। तभी तो आप परेशान वक्त में एनडीटीवी की तरफ देखते हैं। हम किसकी तरफ देखें।
अपवादों को छोड़ दें तो टीवी मीडिया के लिए किसान अब आलू से भी गया गुज़रा हो गया है। मीडिया के लिए डॉक्टरों की भी हैसियत नहीं रही। राजस्थान के डाक्टर महसूस कर ही रहे होंगे। वे भी आलू किसानों की तरह अपने हालात पर चर्चा के लिए परेशान हैं। क्या इस दौरान डॉक्टरों ने मीडिया और उसके साथ नागरिकं के रिश्ते के बारे में सोचा ? आप सरकार चुनते हैं, आपकी जगह मीडिया क्यों सरकार का दोस्त बन जाता है? मीडिया क्यों सरकार से दलाली खा रहा है? क्या मीडिया ने सरकार चुना है?

क्या डॉक्टर आलू किसानों की पीड़ा की ख़बरों को पढ़ते हैं? अपने राजनीतिक फैसले में इस बात को महत्व देते हैं कि फ़लाँ सरकार ने किसानों को सताया है। क्या आलू किसान डाक्टरों से हो रही नाइंसाफी से नाराज़ होते होंगे? नागरिकता का बोध खंडित हो चुका है। सिस्टम एकजुट है। गोदी मीडिया उस सिस्टम का हिस्सा हो चुका है। नागरिक निहत्था हो चुका है। चैनलों को पता है कि लोग उसका परोसा हुआ तमाशा देखेंगे, डॉक्टर और आलू किसान न देखें तो कोई बात नहीं। बाकी बहुत लोग देख रहे हैं। ट्वीटर पर ख़बरें फ्री मिल जाती हैं मगर आप तब भी अख़बार मँगाते हैं जबकि उसमें काम का कुछ नहीं होता। टीवी के साथ भी यही है। जब आपकी ख़बरें नहीं हैं तो बकवास बहसों के लिए आप क्यों पैसे देते हैं?

आप किस चैनल में रिपोर्टिंग देखते हैं ? कितना डिबेट देखेंगे? मीडिया ने आपको भांग की गोली खिला दी है। आप भी नशे में हैं। मैं भले सबकी स्टोरी नहीं कर पा रहा और अब तो और भी कम कर पाऊँगा लेकिन साफ साफ दिख रहा है कि लोग कितने परेशान हैं। वो अपनी आवाज़ सुनाना चाहते हैं मगर कोई चैनल नहीं है। कहीं आवाज़ उठा भी दी जाती है तो किसी पर असर नहीं है। असर तभी पैदा होगा जब आप ख़ुद को इस मीडिया से मुक्त कर लें क्योंकि मीडिया ने ख़ुद को आपसे मुक्त कर लिया है। आप उसके लिए कुछ नहीं है।

एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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आरके सिन्हा का अख़बारों ने भावनात्मक दोहन किया है : रवीश कुमार

Ravish Kumar : क्यों छपी बीजेपी सांसद सिन्हा की सफाई विज्ञापन की शक्ल में… पैराडाइस पेपर्स में भाजपा के राज्य सभा सांसद आर के सिन्हा का भी नाम आया था। इंडियन एक्सप्रेस अख़बार ने उनकी सफाई के साथ ख़बर छापी थी। पैराडाइस पैराडाइस पेपर्स की रिपोर्ट के साथ यह भी सब जगह छपा है कि इसे कैसे पढ़ें और समझें। साफ साफ लिखा है कि ऑफशोर कंपनी कानून के तहत ही बनाए जाते हैं और ज़रूरी नहीं कि सभी लेन-देन संदिग्ध ही हो मगर इसकी आड़ में जो खेल खेला जाता है उसे भी समझने की ज़रूरत है। सरकार को भी भारी भरकम जांच टीम बनानी पड़ी है। ख़ैर इस पर लिखना मेरा मकसद नहीं है।

आज कई अख़बारों में आर के सिन्हा का बयान विज्ञापन की शक्ल में छपा देखा। यह चिन्ता की बात है। मुझे जानकारी नहीं कि अख़बार ने इसके लिए पैसे लिए हैं या नहीं। अगर मुफ्त में भी छापा है तो भी इस तरह से छापना ग़लत है। आर के सिन्हा ने बतौर सांसद राज्य सभा के अध्यक्ष वेंकैया नायडू को पत्र लिखा है और इस पत्र को विज्ञापन की शक्ल में छापा गया है।

मेरी नज़र में यह फिरौती वसूलना है। पेड न्यूज़ भी है। क्या जिन अख़बारों ने सिन्हा की सफाई छापी है, उन्होंने पैराडाइस पेपर्स की रिपोर्ट छापी थी? अगर नहीं तो यह और भी गहरा नैतिक अपराध है? ख़बर नहीं छापी मगर सफाई के नाम पर धंधा कर लिया? मीडिया और राजनेता का संबंध विचारों और बयानों के आदान प्रदान का होना चाहिए। इस आधार पर कोई अखबार किसी नेता का हर बयान नहीं छापेगा मगर छापने के लिए पैसे नहीं ले सकता है, यह तय है। एक्सप्रेस ने विज्ञापन वाली सफाई नहीं छापी है। अगर नहीं छापी है तो ठीक किया है।

हमारे देश में किसी संस्था की कोई विश्वसनीयता नहीं रह गई है, वरना इस पर उन अखबारों के ख़िलाफ़ एक्शन हो जाना चाहिए था जिन्होंने सिन्हा का विज्ञापन छापा। ठीक है कि सिन्हा ही लेकर आए होंगे मगर अखबारों को मना करना चाहिए था और कहना चाहिए कि हम ऐसे ही आपकी सफाई छापेंगे।

कई बार कंपनियां अपनी सफाई में विज्ञापन देती हैं ताकि सारी बात उनके हिसाब से छप जाए जिसे कोई नहीं पढ़ता है। हो सकता है कि कुछ लोग पढ़ लेते। कायदे से इस पर भी खबर छपनी चाहिए कि फला कंपनी ने हमारे अखबार में 5 लाख का विज्ञापन देकर विस्तार से सफाई छापी है, उसे भी पेज नंबर दस पर जाकर पढ़ें। वैसे भी सिन्हा की सफाई तो बतौर सांसद है। उसमें राजनीतिक आरोप भी है। उनकी कंपनी की तरफ से सफाई नहीं छपी है। क्या राजनेताओं से उनकी सफाई के लिए पैसे लिए जाएंगे?

मेरी राय में अख़बारों को आर के सिन्हा का पैसा लौटा देना चाहिए। सिन्हा ख़ुद चलकर फिरौती देने आए, इससे अपहरण का अपराध कम नहीं जाता और न फिरौती नैतिक हो जाती है। किसी के कमज़ोर वक्त में फ़ायदा नहीं उठाना चाहिए। हम कार्टून बना सकते हैं, उन पर हंस सकते हैं उनके खिलाफ लिख सकते हैं तो उनकी सफाई भी बिना पैसे के छपनी चाहिए। इससे राजनेता और मीडिया का संबंध बदल जाएगा। अख़बार फिरौती वसूलने लगेंगे। नेता ख़बर दबाने के लिए पहले ही विज्ञापन दे देगा और सफाई छाप देगा कि एक पत्रकार उनकी कंपनी को बदनाम करने में लगा है। कई नेताओं की अपनी कंपनियां होती हैं। तब क्या होगा।

मैं मानता हूं कि आरके सिन्हा का अख़बारों ने भावनात्मक दोहन किया है। उन्हें फ्री में सफाई का स्पेस मिलना चाहिए था। वैसे भी सिन्हा भागवत यज्ञ के बीच में है । मौन धारण किए हुए हैं। विज्ञापन की शक्ल में इतनी लंबी सफाई लिख डाली। यज्ञ से उनका ध्यान हट गया है। किसी का भी हट जाएगा। क्या उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस बुलाई थी? संपादकों तक भी भिजवा सकते थे। मुझे इसकी जानकारी नहीं है कि उन्होंने ऐसा किया या नहीं। फिर भी मुझे लगता है कि सफाई को विज्ञापन के मामले में छाप कर या छपवा कर दोनों ने ग़लत किया है।

एनडीटीवी के एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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हिन्दी के पाठकों को आज का अंग्रेज़ी वाला इंडियन एक्सप्रेस ख़रीद कर रख लेना चाहिए

Ravish Kumar : इंडियन एक्सप्रेस में छपे पैराडाइस पेपर्स और द वायर की रिपोर्ट pando.com के बिना अधूरा है… हिन्दी के पाठकों को आज का अंग्रेज़ी वाला इंडियन एक्सप्रेस ख़रीद कर रख लेना चाहिए। एक पाठक के रूप में आप बेहतर होंगे। हिन्दी में तो यह सब मिलेगा नहीं क्योंकि ज्यादातर हिन्दी अख़बार के संपादक अपने दौर की सरकार के किरानी होते हैं। कारपोरेट के दस्तावेज़ों को समझना और उसमें कमियां पकड़ना ये बहुत ही कौशल का काम है। इसके भीतर के राज़ को समझने की योग्यता हर किसी में नहीं होती है। मैं तो कई बार इस कारण से भी हाथ खड़े कर देता हूं। न्यूज़ रूम में ऐसी दक्षता के लोग भी नहीं होते हैं जिनसे आप पूछकर आगे बढ़ सकें वर्ना कोई आसानी से आपको मैनुपुलेट कर सकता है।

इसका हल निकाला है INTERNATIONAL CONSORTIUM OF INVESTIGATIVE JOURNALISTS ने। दुनिया भर के 96 समाचार संगठनों को मिलाकर एक समूह बना दिया है। इसमें कारपोरेट खातों को समझने वाले वकील चार्टर्ड अकाउंटेंट भी हैं। एक्सप्रेस इसका हिस्सा है। आपको कोई हिन्दी का अख़बार इसका हिस्सेदार नहीं मिलेगा। बिना पत्रकारों के ग्लोबल नेटवर्क के आप अब कोरपोरेट की रिपोर्टिंग ही नहीं कर सकते हैं।

1 करोड़ 30 लाख कारपोरेट दस्तावेज़ों को पढ़ने समझने के बाद दुनिया भर के अख़बारों में छपना शुरू हुआ है। इंडियन एक्सप्रेस में आज इसे कई पन्नों पर छापा है। आगे भी छापेगा। पनामा पेपर्स और पैराडाइस पेपर्स को मिलाकर देखेंगे तो पांच सौ हज़ार लोगों का पैसे के तंत्र पर कब्ज़ा है। आप खुद ही अपनी नैतिकता का कुर्ता फाड़ते रह जाएंगे मगर ये क्रूर कुलीन तंत्र सत्ता का दामन थामे रहेगा। उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। उसके यहां कोई नैतिकता नहीं है। वो नैतिकता का फ्रंट भर है।

राज्य सभा में सबसे अमीर और बीजेपी के सांसद आर के सिन्हा का भी नाम है। जयंत सिन्हा का भी नाम है। दोनों ने जवाब भी दिया है। नोटबंदी की बरसी पर काला धन मिटने का जश्न मनाया जाने वाला है। ऐसे मौके पर पैराडाइस पेपर्स का यह ख़ुलासा हमें भावुकता में बहने से रोकेगा। अमिताभ बच्चन, अशोक गहलोत, डॉ अशोक सेठ, कोचिंग कंपनी फिट्जी, नीरा राडिया का भी नाम है। आने वाले दिनों में पता नहीं किस किस का नाम आएगा, मीडिया कंपनी से लेकर दवा कंपनी तक मालूम नहीं।

एक्सप्रेस की रिपोर्ट में जयंत सिन्हा की सफाई पढ़ेंगे तो लगेगा कि कोई ख़ास मामला नहीं है। जब आप इसी ख़बर को PANDO.COM पर 26 मई 2014 को MARKS AMES के विश्लेषण को पढ़ेंगे तो लगेगा कि आपके साथ तो खेल हो चुका है। अब न ताली पीटने लायक बचे हैं न गाली देने लायक। जो आज छपा है उसे तो MARK AMES ने 26 मई 2014 को ही लिख दिया था कि ओमेदियार नेटवर्क मोदी की जीत के लिए काम कर रहा था। यही कि 2009 में ओमेदियार नेटवर्क ने भारत में सबसे अधिक निवेश किया, इस निवेश में इसके निदेशक जयंत सिन्हा की बड़ी भूमिका थी।

2013 में जयंत सिन्हा ने इस्तीफा देकर मोदी के विजय अभियान में शामिल होने का एलान कर दिया। उसी साल नरेंद्र मोदी ने व्यापारियों की एक सभा मे भाषण दिया कि ई-कामर्स को खोलने की ज़रूरत है। यह भाजपा की नीति से ठीक उलट था। उस वक्त भाजपा संसद में रिटेल सेक्टर में विदेश निवेश का ज़ोरदार विरोध कर रही थी। भाजपा समर्थक व्यापारी वर्ग पार्टी के साथ दमदार तरीके से खड़ा था कि उसके हितों की रक्षा भाजपा ही कर रही है मगर उसे भी नहीं पता था कि इस पार्टी में एक ऐसे नेटवर्क का प्रभाव हो चुका है जिसका मकसद सिर्फ एख ही है। ई कामर्स में विदेश निवेश के मौके को बढ़ाना।

मुझे PANDO.COM के बारे में आज ही पता चला। मैं नहीं जानता हूं क्या है लेकिन आप भी सोचिए कि 26 मई 2014 को ही पर्दे के पीछे हो रहे इस खेल को समझ रहा था। हम और आप इस तरह के खेल को कभी समझ ही नहीं पाएंगे और न समझने योग्य हैं। तभी नेता हमारे सामने हिन्दू मुस्लिम की बासी रोटी फेंकर हमारा तमाशा देखता है। जब मोदी जीते थे तब ओमेदियार नेटवर्क ने ट्वीट कर बधाई दी थी। टेलिग्राफ में हज़ारीबाग में हे एक प्रेस कांफ्रेंस की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। जिसमें स्थानीय बीजेपी नेता शिव शंकर प्रसाद गुप्त कहते हैं कि जयंत सिन्हा 2012-13 में दो साल मोदी की टीम के साथ काम कर चुके हैं। इस दौरान जयंत सिन्हा ओमिदियार नेटवर्क में भी काम कर रहे थे। उन्होंने अपने जवाब में कहा है कि 2013 में इस्तीफा दिया।

इसमें मार्क ने लिखा है कि जयंत सिन्हा ओमेदियार नेटवर्क के अधिकारी होते हुए भी बीजेपी से जुड़े थिंक टैंक इंडिया फाउंडेशन में निदेशक हैं। इसी फाउंडेशन के बारे में इन दिनों वायर में ख़बर छपी है। शौर्य डोवल जो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवल के बेटे हैं, वो इस फाउंडेशन के सर्वेसर्वा हैं। जयंत सिन्हा ई कामर्स में विदेशी निवेश की छूट की वकालत करते रहते थे जबकि उनकी पार्टी रिटेल सेक्टर में विदेशी निवेश को लेकर ज़ोरदार विरोध करने का नाटक करती थी। जनता इस खेल को कैसे देखे। क्या समझे। बहुत मुश्किल है। एक्सप्रेस की रिपोर्ट को the wire.in और PANDO.COM के साथ पढ़ा जाना चाहिए।

क्या सही में आप इस तरह के खेल को समझने योग्य हैं? मेरा तो दिल बैठ गया है। जब हम वायर की रिपोर्ट पढ़ रहे थे तब हमारे सामने PANDO.COM की तीन साल पुरानी रिपोर्ट नहीं थी। तब हमारे सामने पैराडाइस पेपर्स नहीं थे। क्या हम वाकई जानते हैं कि ये जो नेता दिन रात हमारे सामने दिखते हैं वे किसी कंपनी या नेटवर्क के फ्रंट नहीं हैं? क्या हम जानते हैं कि 2014 की जीत के पीछे लगे इस प्रकार के नेटवर्क के क्या हित रहे होंगे? वो इतिहास का सबसे महंगा चुनाव था।

क्या कोई इन नेटवर्कों को एजेंट बनकर हमारे सामने दावे कर रहा था? जिसे हम अपना बना रहे थे क्या वो पहले ही किसी और का हो चुका था? इसलिए जानते रहिए। किसी हिन्दी अख़बार में ये सब नहीं मिलने वाला है। इसलिए गाली देने से पहले पढ़िए। अब मैं इस पर नहीं लिखूंगा। यह बहुत डरावना है। हमें हमारी व्यक्तिगत नैतिकता से ही कुचल कर मार दिया जाएगा मगर इन कुलीनों और नेटवर्कों का कुछ नहीं होगा। इनका मुलुक एक ही है। पैसा। मौन रहकर तमाशा देखिए।

वरिष्ठ पत्रकार और एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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रवीश जी, अगर Yashwant Singh से कुछ पर्सनल खुन्नस है तो कम से कम उनके काम की तो तारीफ कर दीजिये!

Divakar Singh : रवीश जी, आपने सही लिखा हमारी मीडिया रीढविहीन है. साथ ही नेता भी चाहते हैं मीडिया उनकी चाटुकारिता करती रहे. आप बधाई के पात्र हैं यह मुद्दे उठाने के लिए. पर क्या बस इतना बोलने से डबल स्टैंडर्ड्स को स्वीकार कर लिया जाए? आप कहते हैं कि ED या CBI की जांच नहीं हुई तो कोई मानहानि नहीं हुई. आप स्वयं जानते होंगे कितनी हलकी बात कह दी है आपने. दूसरा लॉजिक ये कि अमित शाह स्वयं क्यों नहीं आये बोलने. अगर वो आते तो आप कहते वो पिता हैं मुजरिम के, इसलिए उनकी बात का कोई महत्त्व नहीं. तीसरी बात आप इतने उत्तेजित रोबर्ट वाड्रा वगैरह के मामले में नहीं हुए. यहाँ आप तुरंत अत्यधिक सक्रिय हो गए और अतार्किक बातें करने लगे. ठीक है नेता भ्रष्ट होते हैं, मानते हैं, पर कम से कम तार्किक तो रहिये, अगर निष्पक्ष नहीं रह सकते.

हालांकि हम जैसे लोग जो आपका शो पसंद करते हैं, चाहते हैं कि आप निष्पक्ष भी रहें. किसी ईमानदार पत्रकार का एक गुट के विरोध में और दूसरे के समर्थन में हर समय बोलते रहना एक गंभीर समस्या है, जिसमें आप जैसे आदरणीय (मेरी निगाह में) पत्रकार हठधर्मिता के साथ शामिल हैं. मोदी सरकार के कट्टर समर्थक मीडिया को आप बुरा मानते हैं, तो कट्टर विरोधी जोकि तर्कहीन होकर आलोचना करने लग जाते हैं, उतने ही बुरे हैं. एक और बात भी आपसे कहना चाह रहा था. आप को शायद बुरा लगा कि भारत की मीडिया कुछ कर नहीं पा रही है और ऑस्ट्रेलिया की मीडिया बहुत बढ़िया है.

क्या आप जानते हैं कि आप जिस इंडस्ट्री में है, उसके लिए भारत में सबसे धाकड़ मीडिया स्तम्भ कौन सा है? कुछ महीने पहले आपने हिंदी मीडिया के कुछ पोर्टल गिनाये थे, कल फिर कुछ गिनाये थे. Yashwant Singh से कुछ पर्सनल खुन्नस है तो कम से कम उनके काम की तो तारीफ कर दीजिये, जो वो तमाम पत्रकारों के हित में करते हैं. उनको भी थोडा महत्त्व दें जब आप हिंदी मीडिया की बात करते हैं. नहीं तो आप भी मोदी और शाह के लीक में शामिल नहीं हैं जो अपने आलोचक को तवज्जो नहीं देते? तो सर मुख्य समस्या डबल स्टैंडर्ड्स की है. सोचियेगा जरूर. न सोचेंगे तो भी ठीक. जो है सो हईये है.

एक आईटी कंपनी के मालिक दिवाकर सिंह ने उपरोक्त कमेंट एनडीटीवी के एंकर रवीश कुमार के जिस एफबी पोस्ट पर किया है, वह इस प्रकार है—

Ravish Kumar : मानहानि- मानहानि: घोघो रानी, कितना पानी… आस्ट्रेलिया के जिन शहरों का नाम हम लोग क्रिकेट मैच के कारण जानते थे, वहां पर एक भारतीय कंपनी के ख़िलाफ़ लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। शनिवार को एडिलेड, कैनबरा, सिडनी, ब्रिसबेन, मेलबर्न, गोल्ड कोस्ट, पोर्ट डगलस में प्रदर्शन हुए हैं। शनिवार को आस्ट्रेलिया भर में 45 प्रदर्शन हुए हैं। अदानी वापस जाओ और अदानी को रोको टाइप के नारे लग रहे हैं। वहां के करदाता नहीं चाहते हैं कि इस प्रोजेक्ट की सब्सिडी उनके पैसे से दी जाए।

अदानी ग्रुप के सीईओ का बयान छपा है कि प्रदर्शन सही तस्वीर नहीं है। स्तानीय लोग महारा समर्थन कर रहे हैं। जेयाकुरा जनकराज का कहना है कि जल्दी ही काम शुरू होगा और नौकरियां मिलने लगेंगी। यहां का कोयला भारत जाकर वहां के गांवों को बिजली से रौशन करेगा। पिछले हफ्ते आस्ट्रेलिया के चैनल एबीसी ने अदानी ग्रुप पर एक लंबी डाक्यूमेंट्री बना कर दिखाई। इसका लिंक आपको शेयर किया था। युवा पत्रकार उस लिंक को ज़रूर देखें, भारत में अब ऐसी रिपोर्टिंग बंद ही हो चुकी है। इसलिए देख कर आहें भर सकते हैं। अच्छी बात है कि उस डाक्यूमेंट्री में प्रशांत भूषण हैं, प्रांजॉय गुहा ठाकुरता हैं।

प्रांजॉय गुहा ठाकुरता ने जब EPW में अदानी ग्रुप के बारे में ख़बर छापी तो उन पर कंपनी ने मानहानि कर दिया और नौकरी भी चली गई। अभी तक ऐसी कोई ख़बर निगाह से नहीं गुज़री है कि अदानी ग्रुप ने एबीसी चैनल पर मानहानि का दावा किया हो। स्वदेशी पत्रकारों पर मानहानि। विदेशी पत्रकारों पर मानहानि नहीं। अगर वायर की ख़बर एबीसी चैनल दिखाता तो शायद अमित शाह के बेटे जय शाह मानहानि भी नहीं करते। क्या हमारे वकील, कंपनी वाले विदेशी संपादकों या चैनलों पर मानहानि करने से डरते हैं?

एक सवाल मेरा भी है। क्या अंग्रेज़ी अख़बारों में छपी ख़बरों का हिन्दी में अनुवाद करने पर भी मानहानि हो जाती है? अनुवाद की ख़बरों या पोस्ट से मानहानि का रेट कैसे तय होता है, शेयर करने वालों या शेयर किए गए पोस्ट पर लाइक करने वालों पर मानहानि का रेट कैसे तय होता है? चार आना, पांच आना के हिसाब से या एक एक रुपया प्रति लाइक के हिसाब से?

पीयूष गोयल को प्रेस कांफ्रेंस कर इसका भी रेट बता देना चाहिए कि ताकि हम लोग न तो अनुवाद करें, न शेयर करें न लाइक करें। सरकार जिसके साथ रहे, उसका मान ही मान करें। सम्मान ही सम्मान करें। न सवाल करें न सर उठाएं। हम बच्चे भी खेलते हुए गाएं- मानहानि मानहानि, घोघो रानी कितना पानी। पांच लाख, दस लाख, एक करोड़, सौ करोड़।
यह सब इसलिए किया जा रहा है कि भीतरखाने की ख़बरों को छापने का जोखिम कोई नहीं उठा सके। इससे सभी को संकेत चला जाता है कि दंडवत हो, दंडवत ही रहो। विज्ञापन रूकवा कर धनहानि करवा देंगे और दूसरा कोर्ट में लेकर मानहानि करवा देंगे। अब यह सब होगा तो पत्रकार तो किसी बड़े शख्स पर हाथ ही नहीं डालेगा। ये नेता लोग जो दिन भर झूठ बोलते रहते हैं,

क्या इनके ख़िलाफ़ मानहानि होती रहे?

अमित शाह एक राजनीतिक शख्स हैं। तमाम आरोप लगते रहे हैं। वे उसका सामना भी करते हैं, जवाब भी देते हैं और नज़रअंदाज़ भी करते हैं। वायर की ख़बर में आरोप तो हैं नहीं। जो कंपनी ने रिकार्ड जमा किए हैं उसी का विश्लेषण है। फिर कंपनी रजिस्ट्रार को दस्तावेज़ जमा कराने और उस आधार पर लिखने या बोलने से समस्या है तो ये भी बंद करवा दीजिए।

अमित शाह के बेटे के बारे में ख़बर छपी। पिता पर तो फेक एनकाउंटर मामलों में आरोप लगे और बरी भी हुए। सोहराबुद्दीन मामले में तो सीबीआई ट्रायल कोर्ट के फैसले पर अपील ही नहीं कर रही है। उन पर करप्शन के आरोप नहीं लगे हैं। इसके बाद भी अमित शाह आए दिन राजनीतिक आरोपों का सामना करते रहते हैं। जवाब भी देते हैं और नज़रअंदाज़ भी करते हैं। कायदे से उन्हें ही आकर बोलना चाहिए था कि पुत्र ने मेरी हैसियत का कोई लाभ नहीं लिया है। मगर रेल मंत्री बोलने आ गए। मानहानि का फैसला अगर पुत्र का था तो रेल मंत्री क्यों एलान कर रहे थे?

इस ख़बर से ऐसी क्या मानहानि हो गई? किसी टीवी चैनल ने इस पर चर्चा कर दी? नहीं न। सब तो चुप ही थे। चुप रहते भी। रहेंगे भी। कई बार ख़बरें समझ नहीं आती, दूसरे के दस्तावेज़ पर कोई तीसरा जिम्मा नहीं उठाता, कई बार चैनल या अखबार रूक कर देखना चाहते हैं कि यह ख़बर कैसे आकार ले रही है? राजनीति में किस तरह से और तथ्यात्मक रूप से किस तरह से। यह ज़रूरी नहीं कि टीवी दूसरे संस्थान की ख़बर को करे ही। वैसे टीवी कई बार करता है। कई बार नहीं करता है। हमीं एक हफ्ते से उच्च शिक्षा की हालत पर प्राइम टाइम कर रहे हैं, किसी ने नोटिस नहीं लिया।

लेकिन, जब चैनलों ने कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल की प्रेस कांफ्रेंस का बहिष्कार किया तो उन्हें पीयूष गोयल की प्रेस कांफ्रेंस का भी बहिष्कार करना चाहिए था। जब सिब्बल का नहीं दिखाए तो गोयल का क्यों दिखा रहे थे? अव्वल तो दोनों को ही दिखाना चाहिए था। लाइव या बाद में उसका कुछ हिस्सा दिखा सकते थे या दोनों का लाइव दिखा कर बाद में नहीं दिखाते। यह मामला तो सीधे सीधे विपक्ष को जनता तक पहुंचने से रोकने का है। सिब्बल वकील हैं। उन्हें भी अदालत में विपक्ष के स्पेस के लिए जाना चाहिए। बहस छेड़नी चाहिए।
इस तरह से दो काम हो रहे हैं। मीडिया में विपक्ष को दिखाया नहीं जा रहा है और फिर पूछा जा रहा है कि विपक्ष है कहां। वो तो दिखाई ही नहीं देता है। दूसरा, प्रेस को डराया जा रहा है कि ऐसी ख़बरों पर हाथ मत डालो, ताकि हम कह सके कि हमारे ख़िलाफ़ एक भी करप्शन का आरोप नहीं है। ये सब होने के बाद भी चुनाव में पैसा उसी तरह बह रहा है। उससे ज़्यादा बहने वाला है। देख लीजिएगा और हो सके तो गिन लीजिए।

एक सवाल और है। क्या वायर की ख़बर पढ़ने के बाद सीबीआई अमित शाह के बेटे के घर पहुंच गई, आयकर अधिकारी पहुंच गए? जब ऐसा हुआ नहीं और जब ऐसा होगा भी नहीं तो फिर क्या डरना। फिर मानहानि कैसे हो गई? फर्ज़ी मुकदमा होने का भी चांस नहीं है। असली तो दूर की बात है। एबीसी चैनल ने अदानी ग्रुप की ख़बर दिखाई तो

ENFORCEMENT DEPARTMENT यानी ED अदानी के यहां छापे मारने लगा क्या? नहीं न। तो फिर मानहानि क्या हुई?

अदालत को भी आदेश देना चाहिए कि ख़बर सही है या ग़लत, इसकी जांच सीबीआई करे, ईडी करे, आयकर विभाग करे फिर सबूत लेकर आए, उन सबूतों पर फैसला हो। ख़बर सही थी या नहीं। ख़बर ग़लत इरादे से छापी गई या यह एक विशुद्ध पत्रकारीय कर्म था।

एक तरीका यह भी हो सकता था। इस ख़बर का बदला लेने के लिए किसी विपक्ष के नेता के यहां लाइव रेड करवा दिया जाता। जैसा कि हो रहा है और जैसा कि होता रहेगा। सीबीआई, आयकर विभाग, ईडी इनके अधिकारी तो पान खाने के नाम पर भी विपक्ष के नेता के यहां रेड मार आते हैं। किसी विपक्ष के नेता की सीडी तो बनी ही होगी, गुजरात में चुनाव होने वाले हैं, किसी न किसी को बन ही गई होगी। बिहार चुनाव में भी सीडी बनी थी। जिनकी बनी थी पता नहीं क्या हुआ उन मामलों में। ये सब आज से ही शुरू कर दिया जाए और आई टी सेल लगाकर काउंटर कर दिया जाए।

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