
संजय कुमार सिंह
नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से अखबारों में जो चल रहा था वह अब भी जारी है। मैं पहले दिन से कह रहा हूं कि सेना के अभियान को चुनाव से पहले ऑपरेशन सिन्दूर नाम देना सही नहीं है। अब तो स्थिति यह हो गई है कि उसका खुले आम प्रचार किया जा रहा है। प्रधानमंत्री फौज की वर्दी में आदमकद होर्डिंग पर टंग गये हैं या टांग दिये गये हैं। बात इतने पर ही नहीं रुकी, रेलवे टिकट में भी ऑपरेशन सिन्दूर का प्रचार है। कुल मिलाकर 2019 में पुलवामा के बाद घुस कर मारूंगा का चुनावी फायदा भले हुआ हो आतंकवाद पर कोई असर नहीं पड़ा। संयोग हो या प्रयोग ऐन चुनाव से पहले पहलगाम हो गया। खुफिया जानकारी होने के बावजूद हमले को रोका नहीं जा सका। कुल मिलाकर, हमला देश की हार है, देश के लिए शर्मनाक है खासकर तब जब 2019 के मामले में चुनाव जीतने के बाद चुप्पी साध ली गई थी और अभी भी सक्रियता चुनाव के पहले की ही लगती है। मुझे लगता है कि हमलावर पकड़े नहीं गये हैं तो सरकार का काम है कि सब कुछ छोड़कर हमलावरों का पता लगाये उनके खिलाफ कार्रवाई करे पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई होती रही है पर उसे काबू नहीं किया जा सका है। इस बार वह कैसे काबू हो जायेगा या किस आधार पर उम्मीद है इसकी भी कोई जानकारी नहीं है। प्रधानमंत्री एक तरफा जो मन में आता है करते और कहते हैं। अखबारों में वह वैसे ही छप जाता है।
इंडियन एक्सप्रेस ने लीड तो वही बनाया है जो प्रधानमंत्री ने कहा है और अगर खबर की बात की जाये तो प्रधानमंत्री ने जब कहा था कि वे नॉन बायोलॉजिकल हैं तब भी खबर तो थी ही। आम आदमी कहे तो भले इसे महत्व नहीं दिया जायेगा। खबरों की दुनिया में क्या कहा से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है किसने कहा। इसलिए खबर तो छपनी ही थी उसमें कोई बुराई नहीं है। देश का प्रधानमंत्री कुछ भी कहे, मजाक, चुटकुला भी खबर हो सकती है। लेकिन आज की दूसरी खबर इससे ज्यादा महत्वपूर्ण थी और प्रधानमंत्री के दावे का सच भी बताती है। इसलिए लीड बनने से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मोदी सरकार के राज में ईडी सभी सीमाएं पार कर रही है। यह मोदी सरकार की कार्यशैली, मनमानी और कमजोरी भी बताती है। फिर भी आज मेरे आठ अखबारों में अकेले द हिन्दू में ईडी की खबर लीड है। दि एशियन एज की लीड भी यही खबर है, शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होता, प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान को चेताया : मेरी रगों में खून नहीं सिन्दूर दौड़ता है। इसका क्या मतलब हुआ और क्यों लीड है मैं समझ नहीं पाया। इंडियन एक्सप्रेस ने पांच कॉलम की लीड के साथ तीन कॉलम में राष्ट्रपति की फोटो छापी है – मौका नायक दिलावर खान को मरणोपरांत कीर्ति चक्र दिये जाने का है। राष्ट्रपति के साथ 23 जुलाई 2024 को शहीद हुए सैनिक की मां और पत्नी की फोटो है। प्रधानमंत्री ने जो कहा और जिस खबर के साथ यह फोटो छपी है वह काफी कुछ कहती है पर कोई समझना-सुनना चाहे तभी।
आज के अखबारों में एक दिलचस्प शीर्षक है जो तथ्य के लिहाज से अजूबा है। शीर्षक है, मेरी नसों में गर्म सिन्दूर बहता है (नवोदय टाइम्स)। यही नहीं, यह दावा भी किया गया है कि 22 तारीख के हमले के जवाब में 22 मिनट में आतंकियों के नौ ठिकाने तबाह किये। सबको पता है कि पाकिस्तान जब जवाबी कार्रवाई कर रहा था तो कहा जा रहा था कि वह बात बढ़ा रहा है। सबको पता है कि जम्मू के रिहायशी इलाकों में हमले हुए हैं। इसका विस्तृत और पूर्ण विवरण देने की बजाय सरकार अपनी पीठ खुद थपथपा रही है और अखबार उसका पूरा प्रचार कर रहे हैं। इसपर राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा है – मोदी जी, खोखले भाषण देना बंद कीजिए। सिर्फ इतना बताइए:1. आतंकवाद पर आपने पाकिस्तान की बात पर भरोसा क्यों किया? 2. ट्रंप के सामने झुककर आपने भारत के हितों की कुर्बानी क्यों दी? और 3. आपका ख़ून सिर्फ़ कैमरों के सामने ही क्यों गरम होता है? अंत में आपने भारत के सम्मान से समझौता कर लिया! कहने की जरूरत नहीं है कि युद्ध शुरू करके किसी तीसरे पक्ष के कहने पर युद्ध विराम कर देना किसी भी तरह से ठीक नहीं है। लेकिन अखबार सिर्फ सरकार का प्रचार कर रहे हैं।
अकले द टेलीग्राफ ने लिखा है, मोदी ने सिन्दूर खून का मुद्दा छेड़ा फ्लैग शीर्षक है, सीमा पार की कार्रवाई के बाद ऑपरेशन बैलट। इसके साथ एक खबर का शीर्षक है, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है, पाकिस्तान गले तक आतंकवाद में डूबा हुआ है। पर सवाल है कि इतने समय से चली आ रही समस्या कुछ दिन की कार्रवाई से ठीक हो जायेगी? पुलवामा के बाद क्यों नहीं की गई अब बीच में क्यों रोक दी गई? सरकार के पास संतोषजनक जवाब नहीं है पर जवाब देने की बजाय चुनावी तैयारियां की जा रही हैं। अखबर खुद सवाल नहीं ही कर रहे हैं विपक्ष के नेता के सवाल को भी नहीं छाप रहे हैं, जवाब मांगना तो बहुत दूर। इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने बीकानेर में कहा, मोदी का दिमाग ठंडा रहता है, पर खून गर्म है, मेरी रगों में सिन्दूर है। कहने की जरूरत नहीं है कि सेना के अभियान का नाम ऑपरेशन सिन्दूर रखना राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश थी और अब अभियान खत्म होने के एक महीने बाद उसकी चर्चा करना उसे लोगों के दिमाग में जिन्दा रखने की कोशिश है जबकि ऑपरेशन सिन्दूर से सिर्फ पाकिस्तान को नुकसान नहीं हुआ है। फिर भी अमर उजाला का शीर्षक है, सेना पाकिस्तान को घुटनों पर ले आई सिन्दूर बारूद बना तो नतीजा सबने देखा। तथ्य है कि रेत, मिट्टी, पानी ही नहीं मिठाई और गोबर भी बारूद बन जाये तो असर बारूद वाला ही होगा और जब भी बनेगा दुनिया देखेगी। अभी जबरन श्रेय लेने की जल्दी क्यों है?
अमर उजाला और दूसरे कई अखबारों में आज पहले पन्ने पर अगर प्रधानमंत्री का भाषण या चुनाव प्रचार है तो सेकेंड लीड सुप्रीम कोर्ट की खबर है, ईडी ने सारी हदें पार कीं, संघीय ढांचे का कर रहा है उल्लंघन। जाहिर है, सुप्रीम कोर्ट की राय में केंद्र सरकार के नेतृत्व में ईडी ने सारी हदें पार कर ली हैं। यह अच्छी स्थिति नहीं है। हम सब लोग जानते हैं और देख रहे हैं। अब सुप्रीम कोर्ट ने कह भी दिया है लेकिन आज अखबारों ने इसे छोड़कर प्रधानमत्री की आत्म प्रशंसा को लीड बनाया है जिसमें असल में कुछ नहीं है। और आज की दूसरी खबर भी ऐसी नहीं है कि सरकार या प्रधानमंत्री को मनमाना प्रचार दिया जाये। यह दिलचस्प है कि प्रधानमंत्री जब आतंकवाद खत्म करने और पाकिस्तान को सबक सिखाने की बात कर रहे हैं तब आज भी उसी पन्ने पर एक खबर है, किश्तवाड़ में जवान बलिदान, तीन से चार आतंकी घिरे। जाहिर है, अगर खबर सही है तो प्रधानमंत्री के तमाम दावों के बावजूद अभी भी तीन-से चार आतंकी तो थे (हैं) ही और प्रधानमंत्री जब पाकिस्तान के सभी आतंकी ठिकानों को नष्ट करने की बात कर रहे हैं तब आतंकियों को बेअसर करने या पकड़ने की कोशिश में न सिर्फ एक जवान बलिदान हो गया, दो घायल भी हुए हैं। कुल मिलाकर मामला 2019 जैसा भी नहीं है कि दूसरी बड़ी वारदात छह साल बाद हुई। ये तो महीने भर पहले की बात है। सबको पता है और हर कोई सवाल पूछ रहा है कि युद्ध छेड़ ही दी थी तो अचानक युद्धविराम के लिए क्यों मान गये और मान गये तो अब उसे कब तक भुनाएंगे।
प्रधानमंत्री अपनी तारीफ खुद करने का कोई मौका नहीं चूकते हैं और कल पहलगाम घटना के एक महीने पूरे होने पर जो कहा वह आज सभी अखबारों में लीड है तो दूसरी खबरें नहीं बताती हैं कि देश में सब चंगा सी। अमर उजाला में पहले पन्ने पर एक और खबर का शीर्षक है, खतरे में थी 220 यात्रियों की जान, पाकिस्तान ने इंडिगो के पायलट को नहीं दी अपने हवाई क्षेत्र से गुजरने की अनुमति। कहने की जरूरत नहीं है कि नरेन्द्र मोदी की विदेश नीति और दूसरे देशों से संबंध की भी आलोचना होती है और पाकिस्तान के साथ संबंध की जो स्थिति है उसमें उसने 220 यात्रियों की जान की परवाह नहीं की। प्रधानमंत्री की वीरता के आगे देश के आम लोगों के लिए यह कोई अच्छी स्थिति तो नहीं ही है। सब एक ही दिन की खबर है फिर भी प्रधानमंत्री का अपनी तारीफ में खुद अपनी पीठ थपथपाना अखबारों को अटपटा नहीं लगा और लगभग सबने किसी सवाल के बिना उनके दावे को जस का तस छाप दिया है जबकि खून की जगह सिन्दूर दौड़ने का कोई मतलब नहीं है और सिन्दूर की जगह खून नहीं लगाया जाता है। आज अमर उजाला में पहले पन्ने पर एक और खबर का शीर्षक है, किरू हाइड्रो पावर भष्टाचार मामले में पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक के खिलाफ आरोप पत्र। सबको पता है कि सत्यपाल मलिक को न नरेन्द्र मोदी ने राज्यपाल बनाया था। अगर उन्होंने कोई भ्रष्टाचार किया तो उनकी नाक के नीचे, उन्हीं के चुने राज्यपाल ने भ्रष्टाचार कर दिया। वह भी तब जब वे खुद कह चुके थे, ना खाउंगा ना खाने दूंगा। इसके बावजूद अगर भ्रष्टाचार हुआ, तब पता नहीं चला और अब जब वे खुलकर आपके खिलाफ हैं, विरोध कर रहे हैं तो आरोप पत्र का मतलब कौन नहीं समझता है। देश में ईमानदारी औरे सेना के सम्मान की व्यवस्था इतनी अच्छी होती तो ब्रजभूषण सिंह से लेकर विजय शाह तक के खिलाफ कार्रवाई हुई होती। कार्रवाई हुई प्रोफेसर के खिलाफ और प्रधानमंत्री का यह सब दिखाया और मीडिया का उनका साथ देना। यह स्थिति देश के बहुत नुकसानदेह है। ताज्जुब की बात है कि आम नागरिक से लेकर संपादक तक इसे समझ नहीं रहे हैं।
हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, मोदी पाकिस्तान पर गरजे : सिन्दूर हमारा बारूद बना। मुझे नहीं समझ में आ रहा है कि यह सब कैसे हुआ और हुआ भी तो सेना के काम का श्रेय प्रधानमंत्री क्यों ले रहे हैं और लेना ही था तो सेना के साथ या वैसे भी सीमा पर सिन्दूर लगाने वाली महिलाओं का एक जुटान तो किया ही जाना चाहिये था। इसके बिना प्रधानमंत्री के दावे का कोई मतलब नहीं है चुनाव के लिहाज से अनुचित है लेकिन जब चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रधानमंत्री करेंगे, सुप्रीम कोर्ट के पास मामले की सुनवाई का समय नहीं होगा तो यही होगा और यह सब इसलिए हो रहा है कि सवालों से डरने वाला खुद को बहादुर बता रहा है। किसी एक महिला के सिन्दूर का ख्याल रखने का उदाहरण नहीं होने के बावजूद देश भर की महिलाओं के सिन्दूर की चिन्ता करने का दिखावा कर रहा है। उसमें जो नुकसान हुआ उसपर चुप्पी है। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने कहा पाकिस्तानी आतंकवाद के लिए सजा देने से भारत को कोई भी शक्ति नहीं रोक सकती। स्पष्ट है कि यह अमेरिका द्वारा युद्ध खत्म किये जाने के दावों से सबंधित लगता है और प्रधानमंत्री ने कहा है, शीर्षक है तो बातें याद रह जाती हैं। इन सबसे अलग द हिन्दू का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा – ईडी ने सारी सीमायें पार कर लीं। कहने की जरूरत नहीं है कि अखबारों का मकसद प्रधानमंत्री का प्रचार करना नहीं होता तो आज ईडी के कारनामों का कुछ और विवरण हो सकता था। काश! भाजपा ने पहलगाम का बदला लेने के लिए सीमा पर विवाहित या महिलाओं का कोई आंदोलन चलाया होता।



