प्रोफेसर गणेश पांडेय-
हमारे समय की पत्रकारिता का एक जहाज़ शायद डूब रहा है। चाहता तो यह हूँ कि सहारा अख़बार के साथ कोई चमत्कार हो जाए और डूबने से बच जाए। दूर से आती हुई एक गीत की मद्धिम आवाज़ कानों में गूँज रही है-
‘साहिल पे खड़े हो तुम्हें क्या ग़म चले जाना
मैं डूब रहा हूँ अभी डूबा तो नहीं हूँ।’
लगता है कि किसी कवि की यह पंक्ति आज अख़बार में काम करने वाले साथियों की भावनाओं से मेल नहीं खा रही है। वे ख़ुद को डूबा हुआ मान रहे होंगे। अपना माल-असबाब डूबा हुआ मान रहे होंगे। उन्होंने जिस जहाज़ को बनाने में अपना ख़ून-पसीना लगाया, आज उसी से उन्हें भय है कि वह जहाज़ उन लोगों को समंदर में डुबा देगा।
कभी सहारा अख़बार का उद्घाटन करने अमिताभ बच्चन आये थे। पूरा शहर उमड़ पड़ा था। हम सबने सहारा का स्वर्णकाल देखा है। भले ही जीविका की शुरुआत में दैनिक जागरण से जुड़ा। बाद में एक सरकारी नौकरी में गया। फिर विश्वविद्यालय में आ गया। अख़बार के मेरे कई घनिष्ठ मित्र सहारा में आ चुके थे। दीप्त भानु डे बाद में स्थानीय संपादक हुए। शुरुआत से ही सहारा से जुड़े पीयूष बंका ने लंबे समय तक प्रबंधक का काम देखा। फिर वरिष्ठ स्थानीय संपादक हुए।
सहारा गोरखपुर से गहरा लगाव रहा है। रामेंद्र सिन्हा जब स्थानीय संपादक थे, अक्सर उनके साथ चाय का सिलसिला चलता रहा। रामेंद्र सिन्हा एक मज़बूत संपादक रहे। टीम के सदस्यों से बहुत अच्छा काम लेना जानते थे। उन्होंने एक शानदार टीम तैयार की, जिसमें दीप्तभानु डे, संजय सिंह, राजीव ओझा, देवकीनंदन मिश्र, कलानिधि मिश्र, संजय तिवारी, राजशेखर त्रिपाठी, रितेश मिश्र आदि रिपोर्टर थे। संजय सिंह, राजशेखर त्रिपाठी, देवकीनंदन मिश्र, राजीव ओझा वग़ैरा बाहर अच्छी जगहों पर पहुँचे। कलानिधि मिश्र कुछ समय के लिए सहारा लखनऊ के स्थानीय संपादक बने।
रामेंद्र सिन्हा के बाद अनिल भास्कर ने सहारा गोरखपुर में रामेंद्र सिन्हा की परंपरा को आगे बढ़ाया। इसके बाद मेरा आना-जाना कम होता गया। कभी गया भी तो मित्र दीप्तभानु डे से मिलने। बाहर सोफे पर बैठकर चाय पीते हुए बात की और थोड़ी देर में लौट आया। सहारा के लिए ख़ास मौक़ों पर कई फ़ीचर लिखे। हर्ष सिन्हा ने तो जापानी बुख़ार पर लिखी लंबी कविता ‘जापानी बुख़ार’ अपने पेज पर छाप दी।
राष्ट्रीय स्तर पर सहारा ने चार पेज के ‘हस्तक्षेप’ में विचार-प्रधान गंभीर सामग्री हर हफ़्ते देकर हिन्दी की पत्रकारिता में हस्तक्षेप किया था। कभी सहारा अख़बार का एक शानदार वक़्त था। बिकने की सफलता से अधिक सामान्य से लेकर गंभीर पाठकों के बीच पढ़े जाने की सार्थकता पर ज़ोर था। इस अख़बार से बड़ी प्रतिभाएँ जुड़ीं। धीरे-धीरे सब बिखरने लगा। फिर भी वक़्त लगा। अब लगता है कि सब बिखर गया है। किसी भी अख़बार को बनाने की ज़िम्मेदारी उसके संपादकीय की होती है। प्रसार और विज्ञापन विभाग उसे शक्ति देते हैं, लेकिन किसी जहाज़ को सँभालने की ज़िम्मेदारी उसके कप्तान की होती है।
प्रधान संपादक हो या संपादक, ये किसी भी अख़बार के कप्तान नहीं होते हैं। वह काम प्रबंधन का होता है। सहारा अभी इतना भी नहीं बिखरा था कि अपनी राख से फिर से उठ खड़ा न हो। यह संभव था, लेकिन यह सब प्रबंधन को करना था। अभी भी लगता है कि प्रबंधन इसे सँभाल लेगा, लेकिन शायद यह एक सदिच्छा है।
अख़बार हो या कोई भी संस्थान, जब अचानक बंद होता है, तो बड़े सदमे की तरह होते हैं। हज़ारों कर्मचारी, पत्रकार और उनके बच्चे-बीवी, बूढ़े माता-पिता, सब इस सदमे की चपेट में आ जाते हैं। अगर कोई और विकल्प नहीं है या विकल्प की संभावना नहीं है, सहारा का हमेशा के लिए बंद होना लाजिमी है, तो उसके बंद होने से पहले पत्रकारों और कर्मचारियों को उनके बकाया भुगतान का काम जल्द से जल्द होना चाहिए।
गणेश पांडे गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर पद से अभी जल्दी ही रिटायर हुए हैं।
राष्ट्रीय सहारा अखबार के बंद हो जाने की खबर बहुत दुखद है। पचासों पत्रकार और सैकड़ों अखबार कर्मी सड़क पर आ गए। तनख्वाहें तो कई सालों से पूरी नहीं मिल रहीं थीं। मगर अब कुछ भी मिलना बंद हो जाएगा। दिल्ली एडिशन तो पहले ही बंद हो गया था मगर अब सारे एडिशन एक झटके से बंद कर दिए गए हैं। पत्रकारों और गैर पत्रकार कर्मियों को पुरानी तनखा, मुआवजा, ग्रेच्युटी और अन्य देय देने के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है। डबल इंजन की सरकार बहुत कहते हैं। सहारा के पास बहुत संपत्ति है। सहारा मीडिया संस्थान का नोएडा स्थित दफ्तर ही बहुत बड़ा है। उसके एक हिस्से को बेचकर ही पत्रकार और गैर पत्रकारों का सारा बकाया चुकाया जा सकता है। सरकार और न्यायालय दोनों को इस पर विचार करना चाहिए। – शकील अख्तर, वरिष्ठ पत्रकार
राकेश श्रीवास्तव-
‘‘राष्ट्रीय सहारा के प्रति मेरी संवेदना..’’
राष्ट्रीय सहारा से मेरा लगाव दशकों पुराना है। 16 फरवरी 1992 में जब राष्ट्रीय सहारा ने चमकते सितारे की भांति यूपी की धरती पर अपनी छटा बिखेरी, उस वक्त अन्य बड़े अखबारों में हलचल मच गयी थी क्योंकि राष्ट्रीय सहारा ने अपना पहला एडिशन जिस अन्दाज में निकाला था उसकी तुलना उस वक्त के अखबारों से नहीं की जा सकती थी। राष्ट्रीय सहारा ने अपने शुरुआती दौर में ही पत्रकारों को उनकी झोलाछाप छवि से बाहर निकालकर किसी मल्टीनेशन कम्पनी के कर्मचारियों की भांति जीना और काम करना सिखाया।
मीटिंग के दौरान गले में टाई, काम करने के लिए शानदार मेज कुर्सियां, वातानुकूलित कक्ष इस बात की तस्दीक करने के लिए काफी थे कि पत्रकार की हैसियत भी किसी से कम नहीं। मुझे याद है पैक्सफेड की कवर करने वाले एक पत्रकार को पैक्सफेड के तत्कालीन अधिकारी ने थप्पड़ मार दिया था। इस मामले में सुब्रत राय ने स्वयं कमान संभाली और अपने रुतबे का इस्तेमाल करते हुए थप्पड़ मारने वाले अधिकारी को अखबार के दफ्तर में बुलाकर उस पत्रकार के समक्ष खड़ा करके माफी मंगवाई थी जिसकी खबर भी अगले दिन प्रथम पन्ने पर प्रकाशित की गयी थी ताकि प्रशासन को इस बात का आभास हो जाए कि पत्रकार की हैसियत तथाकथित कमीशनखोर अफसरों से अधिक है।
1992 के शुरुआती दौर में ही मैंने प्रशिक्षु उप सम्पादक के रुप में राष्ट्रीय सहारा ज्वाइन किया था। उस वक्त के मेरे सीनियर रहे गोविन्द कपटियाल जी, मनोज तोमर जी और सुनन्दा डे जी मैंने पत्रकारिता के काफी गुर सीखे।
राष्ट्रीय सहारा को अपने आरंभिक काल में कई मुसीबतों का सामना करना पड़ा। मुझे याद है राष्ट्रीय सहारा की सप्लाई रोकने के लिए कुछ मीडिया घरानों ने राष्ट्रीय सहारा की न सिर्फ प्रतियां जला दी थीं बल्कि समाचार पत्र वितरकों और हॉकरों को भी राष्ट्रीय सहारा की सप्लाई लेने से मना कर दिया था। उस वक्त सहाराश्री के नाम से पहचान रखने वाले सुब्रत राय सहारा ने स्वयं कमान संभाली और नए हॉकरों को मोटी रकम देकर अखबार की सप्लाई शुरू करवायी। जब हॉकरों को लगने लगा कि उनके रोकने से राष्ट्रीय सहारा की रफ्तार रुकने वाली नहीं लिहाजा वे समझौते पर उतर आए। उसके बाद से राष्ट्रीय सहारा ने जो रफ्तार पकड़ी वह रफ्तार सहाराश्री के जीवनकाल तक चलती रही।
हालांकि उनकी मृत्यु से एक-दो वर्ष पूर्व से ही इस अखबार की माली हालत बिगड़ने लगी थी लेकिन सहाराश्री ने न तो अखबार से जुड़े कर्मचारियों और पत्रकारों के हौसलों को पस्त होने दिए और न ही उम्मीद, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद से लगने लगा था कि जल्द ही इस अखबार पर विपत्ति आने वाली है। ऐसा नहीं है कि इसकी जानकारी राष्ट्रीय सहारा से जुडे़ पत्रकारों और प्रबंधक समूह को नहीं थी। सभी जानते थे कि अब इस अखबार को बंद होने से कोई नहीं रोक सकता लिहाजा यह कहना कि अखबार के अचानक बंद होने से पत्रकार और कर्मचारी सड़क पर आ गए तो यह आरोप कतई उचित नहीं होगा। सभी जानते थे कि यह अखबार अब अपनी अंतिम सांसे ले रहा है।
हुआ भी वही जिसका पूर्वाभास था। लगभग तीन दशक का दमदार सफर तय करने के बाद 9 जनवरी 2026 को राष्ट्रीय सहारा ने पूर्ण रूप से बंदी की घोषणा कर दी। निश्चित तौर पर राष्ट्रीय सहारा की बंदी से मेरा मन व्यथित है।



