सेवा में,
संपादक महोदय, भड़ास4मीडिया
विषय: कानपुर कमिश्नरेट पुलिस द्वारा पत्रकारों पर की गई गैंगस्टर कार्रवाई के पीछे खाकी और खनन माफिया की संदिग्ध भूमिका
महोदय,
कानपुर कमिश्नरेट पुलिस द्वारा हाल ही में पांच पत्रकारों पर की गई गैंगस्टर एक्ट की कार्रवाई न केवल चौंकाने वाली है, बल्कि पुलिस की निष्पक्षता और कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। यह कार्रवाई कोई अचानक पैदा हुई स्थिति नहीं है, बल्कि इसके पीछे वर्षों से चला आ रहा एक ऐसा गठजोड़ है, जिसमें खाकी और खनन माफिया की सांठ-गांठ साफ दिखाई देती है।
रविवार को नौबस्ता थाना पुलिस ने जिन पांच पत्रकारों को “फर्जी यूट्यूबर” बताकर गैंगस्टर में निरुद्ध किया है, वे सभी पत्रकार वर्षों से कानपुर में सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं। इनमें यशोदा नगर निवासी आशीष अवस्थी को गैंग लीडर और बर्रा निवासी प्रदीप राठौर, शलभ उर्फ शुलभ जायसवाल, आयुष मिश्रा और जूही बारादेवी निवासी दीपक शर्मा को गैंग का सक्रिय सदस्य बताया गया है।
पुलिस का दावा है कि ये लोग पत्रकारिता की आड़ में मारपीट, गाली-गलौज और रंगदारी करते हैं, जबकि जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। खास तौर पर शलभ जायसवाल पिछले करीब 16 वर्षों से कानपुर नगर में पत्रकारिता कर रहे हैं और वर्तमान में “कर्म कसौटी” समाचार पत्र से जुड़े हैं। उनके खिलाफ शहर के किसी भी थाने में न तो कोई एफआईआर दर्ज है और न ही कोई शिकायत।


जिन दो मुकदमों को आधार बनाकर शलभ जायसवाल पर गैंगस्टर की कार्रवाई की गई है, वे दोनों मुकदमे खुद एक कुख्यात खनन माफिया मोहित बाजपेई द्वारा पेशबंदी में दर्ज कराए गए हैं। पहला मुकदमा संख्या 868/2022 और दूसरा मुकदमा संख्या 372/2024 नौबस्ता थाने में तत्कालीन थाना प्रभारियों की सांठ-गांठ से दर्ज कराया गया।
हकीकत यह है कि पहले शलभ जायसवाल ने मोहित बाजपेई और उसके साथियों के खिलाफ खबर कवरेज के दौरान मारपीट और लूट का मुकदमा संख्या 864/2022 दर्ज कराया था। इसके बाद बदले की भावना में मोहित बाजपेई ने पुलिस से मिलीभगत कर पत्रकारों पर झूठे मुकदमे दर्ज करा दिए।
सबसे गंभीर बात यह है कि मुकदमा संख्या 372/2024 की विवेचना में जिन गवाहों ने मोहित बाजपेई के यहां 7 और 5 साल से नौकरी करना बताया, वही गवाह मुकदमा संख्या 868/2022 में खुद को “राहगीर” बता चुके हैं। इन्हीं विरोधाभासी साक्ष्यों के आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुकदमा संख्या 372/2024 की सभी कार्यवाहियों पर रोक लगा रखी है।
इतना ही नहीं, पूर्व बर्रा इंस्पेक्टर नीरज ओझा ने भी गलत रिपोर्ट लगाकर शलभ जायसवाल पर गुंडा एक्ट और जिलाबदर की संस्तुति भेजी थी, जिसे ज्वाइंट कमिश्नर पुलिस ने गलत पाते हुए खारिज कर दिया और नोटिस वापस ले ली।
मामला भारतीय प्रेस परिषद तक भी पहुंच चुका है। शलभ जायसवाल द्वारा की गई शिकायत पर प्रेस परिषद ने मुख्य सचिव सहित अन्य अधिकारियों को नोटिस जारी किया है और मामला वर्तमान में सुनवाई में है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस मोहित बाजपेई पर खुद घाटमपुर, किदवई नगर और नौबस्ता समेत कई थानों में आधा दर्जन से ज्यादा गंभीर मुकदमे दर्ज हैं, उस पर कार्रवाई करने के बजाय पुलिस उसकी शिकायतों पर पत्रकारों को अपराधी बना रही है।
सूत्रों के अनुसार मोहित बाजपेई के “मोहित परिवहन” नाम से 60 से 70 ट्रक बिना नंबर प्लेट के ओवरलोड मौरंग ढोते हैं, जो यशोदा नगर बाईपास पर खुलेआम खड़े रहते हैं। बावजूद इसके पुलिस की नजर इन पर नहीं जाती। लेकिन जब किसी पत्रकार ने हिम्मत करके इस अवैध कारोबार को उजागर करने की कोशिश की, तो उसे ही गैंगस्टर बना दिया गया।
सवाल सीधा है—अगर एक-दो झूठे मुकदमों के आधार पर पत्रकारों को हिस्ट्रीशीटर, गुंडा और गैंगस्टर बनाया जा सकता है, तो फिर कई मुकदमों में नामजद खनन माफिया पर कानपुर कमिश्नरेट पुलिस मेहरबान क्यों है?
क्या अपराधियों से ज्यादा खतरा अब पत्रकारों से है? या फिर पत्रकारिता ही अब कानपुर में अपराध बन चुकी है?
यह पूरा मामला सिर्फ पांच पत्रकारों का नहीं, बल्कि प्रदेश में स्वतंत्र पत्रकारिता के गला घोंटने की एक खतरनाक मिसाल है, जिसमें खाकी माफिया की ढाल बनती नजर आ रही है।
भवदीय
(एक जागरूक पत्रकार की ओर से)


