
कन्हैया शुक्ला-
देश के आर्थिक उदारीकरण के तीन दशक से अधिक समय में करीब तीन सौ लोग आए होंगे. कंपनी बनाकर जनता को बरगलाकर लूटने के लिए पोंजी स्कीम लेकर और हरे-भरे खेतों को छुट्टा सांड की तरह चरने के बाद निकल गए। उनमें न कहीं सरकार का डर दिखा और न ही कानून के शासन का खौफ। कुछ तो इतने ढीठ निकले कि यही चोला (कारोबार) बदल कर साथ के समाज पर राज कर रहे हैं तो कुछ लूटे गए धन से विदेश जाकर। चंद ही ऐसे हैं, जिन्हें सिस्टम जेल तक पहुंचाने में सफल रहा था। बिना कोई जिम्मेदारी निभाए, बिना जनता को लुटने से बचाए सेबी भी सेलेरी लेती रही और आरबीआई भी।
मुगलों और अंग्रेजों के बाद देश की यह तीसरी सबसे बड़ी लूट थी, वरना दुनिया में शायद आज हम ही सबसे बड़ी जीडीपी वाले देश होते। कहते हैं कि चोर चोरी से जाएगा, लेकिन हेरा-फेरी से नहीं। एक अदद आदमी ही टेंपो चलाता है और वही एक आदमी देश चलाता है। पर जरूरी होता है तरक्की के बाद उस मानसिकता से निकलना। आम तौर पर आदमी बचपन में जिस चीज का अभाव देखता है, उसी पर टूट पड़ता है। चूंकि उसने अभाव देखा था तो उसके लिए पैसा ही सब कुछ था।
टेंपो के हेल्पर से लेकर चालक और प्रापर्टी दलाल या डीलर से लेकर प्रापर्टी डेवलपर बनने तक के क्रम में वह घाट-घाट का पानी पहले ही पी चुका था इसलिए पहले ही दिन से संपर्क में आए लोगों को पानी पिलाना ही उसकी जिंदगी का उद्देश्य बन चुका था। देश भर को उंगली पर नचाने वाले डेमोक्रेट- ब्यूरोक्रेट को भी यह बेहद कम पढ़ा-लिखा आदमी उगली पर नचाने की न सिर्फ ख्वाहिश रखता था, बल्कि देश के सबसे ज्यादा कथित काबिल लोगों को अपने हिसाब से नचाता भी था।
बड़े से बड़े अधिकारी को खरीद लेता था और कहता था कि हर चीज की एक कीमत होती है, कीमत बोलो। इतना ही नहीं, उनके काले धन का नई साइट के व्यापार में व्यापक निवेश भी कराता था। आलिम फाजिल लोग अपेक्षाकृत बहुत कम पढ़े लिखे जाहिल के बहकावे में आकर भारी निवेश कर बैठते थे। बाद में सबका 64-65000 करोड़ लेकर भाग गया और इतने बड़े नटवर लाल के खिलाफ राजधानी में जोरदार तरीके से एक आवाज तक न उठना चौंकाता है व सवाल उठाता है कि क्या पूरा का पूरा सिस्टम उसका चेला है?
दरअसल, आवाज उठाने में सक्षम लोग तो जुटे हुए थे रातों-रात रकम डबल करने में। काले धन वाले चोर किस मुंह से आवाज उठाते और जिन निम्न मध्यम व निम्न वर्ग के लोगों ने खून-पसीने से पाई-पाई जोडकर प्लॉट के बदले में पैसे दिए थे, एकजुट न होने के कारण उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती ही साबित हुई? रजिस्ट्री के बाद भी निवेशकों को प्लॉट देना व कब्जा देना तो दूर, उल्टे पैसे लेकर छुट्टा सांड की तरह खरीददारों व किसानों के हरे खेत चरकर ऐसे चंपत हुआ, जैसे गधे के सिर से सींग और फिर लौटकर कभी नहीं आया।
सात-आठ साल से डबल इंजन की सरकार है, पर विधानसभा से लेकर संसद तक कही एक भी शब्द उसके खिलाफ सुनाई नहीं पड़ा। किसी ने सही ही कहा है कि सर्वाधिक ईमानदारी अब सिर्फ दो नंबर के ही काम में रह गई है। करीब उक्त अवधि से ही वह देश में नहीं है, फिर भी उसके खिलाफ किसी भी मंच पर एक बार भी आवाज मुखर होती नहीं दिखी है। एक भी विधायक ने अपने वोटर के हक में सदन में सवाल नहीं पूछा। रुहेलखंड, बुंदेलखंड और सेंट्रल यूपी के कुछ हिस्से को छोड़ दें तो शायद ही कोई ऐसा विधायक हो, जिसके यहां के एक से लेकर 1000 वोटर के पैसे लेकर न भागा हो वह, पर सबके मुंह में दही सा जमा हुआ है क्योंकि पीड़ितों की संख्या तीन लाख के करीब बताई जा रही है।
माना कि काले धन के कई धन्नासेठो, पीपीएस-आईपीएस, पीसीएस-आईएएस, व्यापारियों व नेताओं के पैसे लगवा रखे थे प्रदेश की करीब दर्जन भर साइट में, पर एक तो विधायक सांसद ऐसा होगा, जिसके पैसे नहीं लगे होंगे। क्या जनहित में उसका फर्ज नहीं बनता था आवाज उठाने का? इस तरह क्या वह पाप में बराबर का भागीदार नहीं बन रहा है? हजारों करोड़ की इस डकैती में पुलिस बराबर पाप की भागीदार थी। कवि रामधारी सिंह दिनकर कहते है कि नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र, जो तटस्थ है. समय लिखेगा उनका भी अपराध।।
उक्त घन धरा पर कही इकट्ठा आज भी घरा नहीं है, बल्कि उसका जिससे काम होता था. दूसरों से लूटा गया घन उन पर लुटाता था या उनकी सेवा में थाईलैंड से लेकर रूस, अजरबैजान व कजाखिस्तान तक पानी की तरह बहाता था। उसने लोगों की कमजोर नस पकड रखी थी, उसे ही दबाता रहता था जरूरत पर। वह जानता था कि कौन कैसे टूट सकता है और किससे किस तरह मदद लेनी है?
दर्जनों सरकारी लोगों को मंथली पैसा भेजता था तो धन वापसी वालों को दिए गए चेक धड़ाधड़ बाउंस हो रहे थे। एक-एक आदमी पर लाखों रुपए का खर्च था उसका, मसाज सेवा के लिए काम के लोगों को थाईलैंड भेजता था तो लाखों खर्च करके उक्त देशों से लडकियां लखनऊ बुलवा कर सेवा में पेश करता था। बात हो रही है प्रदेश क्या, देश के सबसे बड़े ठग, नटवर लाल और गर्म गोश्त के अंतर्राष्ट्रीय सौदागर राशिद नसीम की, जो अपने ऑफिस की लड़कियों का भी दोहरा इस्तेमाल करता था। लोगों को पैसा न लौटाना पड़े इसलिए उनसे यौन शोषण व छेड़छाड़ के फर्जी मुकदमे लिखवाता था क्योंकि ऑफिस से संबंधित गोमतीनगर थाने की पुलिस तो उसकी आवाज पर मुजरा तक करने के लिए तैयार रहती थी क्योंकि सीओ को पांच लाख, थाना प्रभारी को तीन लाख व चौकी प्रभारी को दो लाख रुपए प्रति माह वेतन की तरह बाटे जाते थे। उस पर दर्ज सैकड़ों मुकदमों से कई तो लड़कियों ने दर्ज कराए है दुष्कर्म व छेड़छाड़ के तो कई को अधिकारियों और नेताओं के सामने परोसा गया, पर बदनामी के डर से चुप रहने में ही उन्होंने भलाई समझी।


ठगी के स्वर्ण काल के दौरान कई लोगों के भविष्य लिए जहां यह आदमी नासूर, कैंसर, राहु, केतु और धूमकेतु से भी ज्यादा हानिकारक व कष्टकारक साबित हुआ, वहीं कई का भविष्य बना गया। कई लोगों को विशेष कृपा का वरदान भी दे गया। इसके अलावा कई अन्य को सड़क से उठाकर आदमी बना दिया यानी कि फर्श से अर्श पर पहुंचा दिया। इस तरह के संक्रामक रोगों से जन मानस को बचाने के लिए शासन के धनाढ्य महकमे करोड़ों रुपए खर्च कर ढेर सारा लिटरेचर साल भर जारी करते रहते हैं, जिसके प्रभाव से जागरुक हुए व पहले से जागरूक लोग ऐसे रोगों से बचने में सफल भी होते रहे हैं, पर जो ध्यान नहीं देते हैं या हल्के में लेते हैं, वे असमय ही काल के गाल में समा जाते हैं और महाकाल भी ऐसे लापरवाह लोगों की रक्षा करने से अतत: इंकार कर देते हैं।
उक्त घोटाले के कारण दर्जनों लडकियों के हाथ पीले करने में देर हुई तो कई लोग सदमे से बीमार रहने लगे व जल्दी चल बसे तो कई दोयम दर्जे की जिंदगी जीने पर मजबूर हुए है। इसके विपरीत उसी जन मानस को भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों से बचाने के लिए जिम्मेदार संस्थाएं अभी तक धरातल पर कुछ ठोस करते हुए नहीं दिखाई पड़ी हैं। बस, ले दे कर एक यूपी रेरा ही ऐसा है, जिससे राहत की दिशा में एक कदम कहा जा सकता है, पर ड्रैकुला जो धन डकार कर चला गया है, उसमें कुछ कर पाना तो फिलवक्त रेरा के लिए भी संभव नहीं है क्योंकि उक्त संदर्भ में वह नख-दंत विहीन और बहरा भी है। उक्त मामले में तब यदि पुलिस ने चाहा होता तो न्याय यही पर हो जाता और वह हजारों करोड़ छोड़िए, किसी के हजार रुपए भी लेकर भाग नहीं पाता।
अब कुछ लोगों ने संघर्षे शक्ति कलयुगे और संकल्पे साधुयति विजयम् की तर्ज पर संकल्प लिया है प्रत्यर्पण का। जनता को सांकेतिक, काल्पनिक व प्रतीकात्मक राहत प्रदान करने एवं सिस्टम की ठग रूपी दीमक से सुरक्षा का अहसास कराने के लिए ब्लाक, खासकर तहसीलों और कप्तान व जिलाधिकारी कार्यालयों में लगाई गई कुछ होर्डिंग एवं अखबारों के विज्ञापन राहत देते कम और मुंह चिढ़ाते ज्यादा नजर आते है। उल्टे अकबर का दीया व बीरबल की हांडी जैसी कथाओं का एहसास कराते है।
दृष्टात न्यूज ने जब नसीम की कुंडली खंगालनी शुरू की तो दस्तावेजों से पता चला कि वह इंसान के नाम पर एक कोड है। यह अकेले भू-माफिया, घोटालेबाज और दुबई भाग गया भगोड़ा नहीं है, बल्कि न जाने कितनी बहन-बेटियों की अस्मत लूटी भी है और लुटवाई भी है। जमीनों के मैनेजर से लेकर बड़े निवेशकों व अधिकारियों तक को बराबर अपने हक में जोड़े रखने के लिए लड़कियों का चारे की तरह इस्तेमाल किया है ताकि वह जमीनों के घोटालों को अंजाम देता रहे और निवेशकों के पैसे को विदेशी खाते में जमा करता रहता था क्योंकि खिलाड़ी वही, जो दूसरों से सीखे।
वह जानता था कि भागने के क्रम में सबसे पहले खाता ही सीज होगा। न जाने किन-किन के सामने देशी व विदेशी रूसी, उज्बेकी व अजरबैजान की लड़की परोसी गई। उसे गर्म गोश्त का सौदागर कहना ही ठीक रहेगा। दृष्टांत न्यूज के आईआईएम स्टूडियो और लखनऊ हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सत्येंद्र नाथ श्रीवास्तव ने बिंदुवार सारी बातें स्पष्ट की और बोले कि सुप्रीम कोर्ट गाइडलाइंस के कारण न तो लड़की का नाम बता पाऊंगा और न ही डिटेल दे पाऊंगा, पर इतना जरूर बताऊंगा कि वाराणसी के लंका थाने में 949/2017 एफआईआर दर्ज हुई थी, जो कि होटल रमाडा में एक बलात्कार के संबंध में थी।
रूह कांप जाएगी कि उसमें रात भर वहशीपन की बात कही गई थी। कोई इस तरीके से हैवानियत कर सकता है। उसका मेडिकल होता है, पर खेल वहीं से शुरू हो जाता है। पुलिस ही सब मैनेज करने में लग जाती है क्योंकि लैंड मैनेजर ने आईओ फरीद अहमद को सेट कर लिया था। पूरा खर्च करीब 30 का आता है और फाइनल रिपोर्ट लगा कर पूरा चैप्टर बंद कर दिया जाता है। न जाने लखनऊ में कितनी लड़कियों को उसने बर्बाद कर दिया। केस भी अब तक बलात्कार के दर्जनों दर्ज हो चुके होते, पर उसे मुंह बंद कराना भी आता था। इज्जत का लुटेरा अब दुबई में जा बैठा है। बदले में लैंड मैनेजर को ईनाम स्वरूप एराइज वेलवेट नाम की साइट का मालिक बना दिया जाता है।
लैंड मैनेजर की हैसियत समूह में वाइस प्रेसिडेंट होती थी क्योंकि वह साइट का संपूर्ण कर्ता-धर्ता होता था। उसे भी कजाख, उजबेक और रशियन लडकियां परोसी जाती थीं।
बताते हैं कि उन दिनों आम तौर पर एयरपोर्ट से लेकर हजरतगंज, गोमतीनगर व बड़े-बड़े होटलों में उक्त देशों की लड़कियां लखनऊ में दिखाई पड़ जाती थीं। होटल रमाडा, ताज जैसी बड़ी जगहों पर इनकी बड़ी-बड़ी मीटिंग होती ही रहती थी। आर स्क्वायर ऑफिस के आसपास के इलाके में जरूरत के लोगों की सेवा के लिए बड़े बड़े बार बनाए गए थे। यह सिस्टमिक अप्रोच किसी तरह लैंड मैनेजर को खुश करने के लिए अपनाई गई थी। ऑफिस की लड़कियों पर भी लैंड मैनेजर का रौब चलता था। लैंड मैनेजरों को धाईलैंड, रूस और दुबई का मुफ्त में टूर कराया जाता था। बस सौ बात की एक ही बात होती थी कि टारगेट अचीव करिए।
ये सब बातें मनगढ़ंत न होकर विभिन्न एफआईआर में दर्ज हैं, जो कि ओम्प्ट एविडेंस भी है। लखनऊ के गोमती नगर में सर्वाधिक एफआईआर ऑफिस की लडकियों ने खरीददारों के नाम छेड़छाड़, अभद्रता व मारपीट की कराई क्योंकि कुछ लोग पैसा मांगने ऑफिस तक पहुंच जाते थे। इसके विपरीत वाराणसी, लखनऊ व इलाहाबाद आदि में राशिद व उसकी टीम के खिलाफ दर्जनों एफआईआर दर्ज हैं और आज भी हो रही है। उसके भागने तक दर्जनों एफआईआर हजरतगंज और गोमती नगर व उक्त जिलों के थानों में मैनेज हुई हैं।
हजरतगंज थाने में तो 307 की एफआईआर भी मैनेज हो गई थी, तो लंका थाने में 376 की। तंत्र के एनवॉल्वमेट पर वह कहते है कि पैसे के अलावा तंत्र में उच्च पदों पर बैठे लोग यदि मदद नहीं करते तो वह इतना बेलगाम नहीं हो पाता। इससे कहा जा सकता है कि थाना ही नहीं, कानून भी बिकता है। पैसे वालों को वहीं कानून बरी कर देता है तो कुछ को 323 तक की कंप्लेंट में मिट्टी में मिला देता है। उसका भाई आसिफ नसीम ऐसे ही एक मामले में लखनऊ जिला जेल में था। बायलॉज कहता है कि कुछ भी अंदर-बाहर करना मना है. पर उसका कोई भी कागज जेल अथॉरिटी की परमिशन के बगैर बाहर आता था।
एक फर्जी जो लेटर बनाया गया, जिस पर जेलर के फर्जी साइन थे। उसके बाद अथराइज सिग्नेटरी को पॉइंट करके हजारों की सख्या में प्लॉट की रजिस्ट्री होती है। मामले में सप्लीमेंट्री एफीडेबिट लगाया। जज साहब ने सज्ञान लेने के बाद जांच के लिए एक अधिकारी को अधिकृत किया। वह भी मैनेज हो गया।
यह दीगर बात है कि बाद में वह सस्पेंड हुआ और डिमोट भी। राजधानी लखनऊ में थाने बिकते हैं सुना ही था, पर राशिद नसीम की एक रिकॉर्डिंग दृष्टांत न्यूज के हाथ लगी है. जिसमें वह कह रहा है कि गोमती नगर के थाने को खरीद रखा था। सिपाही से लेकर सीओ तक को प्रति माह वेतन के रूप में लिफाफे भेजता था। सूत्रों ने बताया कि 89 लाख के आसपास का पेमेंट तो पूरे माह का होता था, जिसे एक से 10 तारीख के बीच खुद उसके भाई लेकर जाते थे और राशिद से भी दुआ सलाम भी कराते थे। इस रिकॉर्डिंग को सुनने के बाद इस बात पर मोहर लग गई है कि हां थाने बिकते रहे हैं।
सिस्टम इतना सड़ गल गया है कि अपराधियों के दिल से डर खत्म हो गया है, पर यह कहते है कि जो चाहे कानून माने और जो न चाहे, न माने। आर्थिक लाठी वाले ही भैंस ले जा रहे हैं। हाई कोर्ट के आदेश को भी यह अपराधी कुछ नहीं समझ रहे है। डर तो उस आदमी को लगता है, जिसके अंदर ईमानदारी हो। डर उस आदमी को लगता है, जिसके अंदर कानून का भय बना हो। इस भू माफिया से आपको डर नहीं लगता, के सवाल पर बोले कि माफिया से लड़ते-लड़ते डर खत्म हो गया है। हां, यदि वकील नहीं होता तो सैड़कों मुकदमे जरूर सिस्टम ने लाद दिए होते।
शाइन सिटी के लाखों निवेशकों के केस देखते-देखते उनसे वादा किया है कि वह दुबई में बैठा हो या दुनिया के किसी भी कोने में सुप्रीम कोर्ट तक जाऊंगा, उसे भारत लेकर आऊंगा। डंके की चोट पर बेनकाब करूंगा। परत दर परत खुलासा करूंगा। निवेशकों के करोड़ों लेकर कैसे फरार हो सकता है? किसने उसको शरण दी और किसने बढ़ावा? कौन हैं, उसके राजनीतिक आका?


इस पर वह बोले कि कोई एक हो तो बताऊं। कौन नहीं था उस समय उसके साथ। सभी के पास जाता था बुके लेकर फोटो खिंचाता था और फिर उसी फोटो का इस्तेमाल चारे की तरह व्यापार में करता था। यदि हम मिलने जाए तो मिलने व एक फोटो देने में महीनों लग जाते हैं। वह बताते है कि नौ अगस्त 2020 को पहली बार अप्रोच के बाद उसके खिलाफ लुक आउट नोटिस जारी कराने में सफलता मिली थी। सीन क्या बनता है कि जब कोई लुक आउट जारी किया जाता है तो वहां की स्थानीय भाषा (अरबी) में छह सेट में एक प्रॉपर फॉर्म तैयार करके भेजा जाता है। वह होते-करते आता है चौकी इंचार्ज के पास, जो आर स्क्वायर के नीचे बैठकर सारा मैनेज करता था। एसआई अरविंद राय आता था और वो सही तरीके से उस प्रॉपर फॉर्मेट को तैयार नहीं करता था, लिहाजा फॉर्मेट ऐज इट इज वापस आ जाता था। कोर्ट में अपीयर होकर यही बात बताई तो साल 2022 से लुक आउट नोटिस जारी करने का प्रयास हुआ।
झूठ बोला जा रहा है कोर्ट के सामने क्योंकि 135 नंबर की एफआईआर की चार्जशीट में बाकायदा आया हुआ है कि साल 2020 से लुक आउट नोटिस जारी हो रहा है। इंटरपोल नोटिस जारी हो रहा है। रेड कॉर्नर नोटिस जारी हो रहा है और जारी होने के बाद होता कुछ नहीं है। आज की डेट में अगर रेड कॉर्नर नोटिस जारी हो गया तो एनफोर्समेंट डायरेक्टर से लेकर के सीबीआई की वेबसाइट पर नाम चढ़ जाता है। अभी-अभी चेक करिए दिख जाएगी, पर सीबीआई की ऑथराइज वेबसाइट पर राशिद के लुकआउट और इंटरनेट कॉर्नर नोटिस का कहीं कोई जिक्र तक नहीं मिलेगा। मेहुल चौकसी सहित आधा दर्जन नाम मिल जाएंगे। आर्गुमेंट करने के बाद आर्डर हुआ इसका सोशल मीडिया अकाउंट बद करने का। इसके बावजूद सोशल मीडिया अकाउंट चलता है। कोर्ट ने डायरेक्शन में कहा कि काउंसिल कह रहे हैं कि छह घंटे पहले वीडियो अपलोड हुआ है। एक अपराधी का कद इतना बड़ हो गया है कि टेलीकम्युनिकेशन व फॉरेन मिनिस्ट्री सेक्रेटरी को भी बुलाने की बात कोर्ट कहती है।
इससे लगता है कि भारत सरकार की सारी एजेंसियां बौनी साबित हो रही हैं। बंगाल में शारदा घोटाला होता है. उसके बारे में संसद में कई दिन तक हल्ला होता है क्योंकि उल्लू सीधा हो रहा था, पर यहां तो खुदरा निवेशक ही उल्लू बने हुए हैं। विधानसभा से लेकर संसद तक में कहीं भी एक सवाल नहीं सुनाई पड़ा है बीते दस साल में। आखिर ऐसी क्या खास बात है शाइन सिटी मामले में। भगोड़ा 64000 करोड़ लेकर भाग गया और संसद में एक शब्द तक नहीं बोला जा रहा है।
किसी मेंबर पार्लियामेंट में नैतिक बल नहीं है कि एक क्वेश्चन उठा दे। इससे लगता है कि देश में सब कुछ न सही, पर बहुत कुछ बिकता है। पार्लियामेंट्री रिपोर्ट की पूरी कॉपी पार्लियामेंट में भेजी है प्राइवेट क्वेश्चन उठाने के लिए। गेन चीज है, जो है, वह है नीति निर्धारक तत्व। पब्लिक डोमेन में उसे बेनकाब होना जरूरी है। एमपी एमएलए को जिम्मेदारी निभानी होगी। शारदा घोटाले में तो सिर्फ 24000 निवेशक थे। यहां तो तीन लाख के करीब है। कंपनी का क्राउन प्रेसिडेंट था डॉ. अमिताभ श्रीवास्तव, जो कि जेल में है। उसकी पत्नी भी डायरेक्टर थी। 2021 से वह भी जेल में है। लखनऊ वारंट पर बुलाया जाता है, जिसकी जानकारी कोर्ट में दी। कोर्ट के डायरेक्शन के बाद मोहनलालगंज में उसकी जांच होती है। रजिस्ट्रार मोहनलालगंज के ऊपर एफआईआर होती है कि वह जेल में रहते हुए रजिस्ट्री कैसे एग्जीक्यूट कर सकता है? उसके बाद मेसेज क्या दिया जाता है फोटो फर्जी हो सकता है, साइन फर्जी हो सकता है। क्या किसी का थंब इंप्रेशन भी फर्जी हो सकता है? रजिस्टर ऑफिस में लगाया गया आधार फर्जी था क्या?
आप जाकर देखिए, 50 सवाल पूछे जाएंगे, फिर साफ है कि रजिस्ट्रार ने जो कुछ किया था, पैसे लेकर किया था इसीलिए कहता हूं कि तत्र बिकता था नसीम के इशारे पर। एक रजिस्ट्री होती है। बाद में छठे दिन वही 30000 वर्ग फुट जमीन नसीमुद्दीन सिद्दीकी के लड़के के नाम लिख दी जाती है। वह भी महज 10 लाख रुपए में। कौन बिकता है, कौन नहीं, कौन बेईमान है और कौन ईमानदार पता नहीं, पर इतना जरूर पता है कि लखनऊ में 3000 वर्ग फुट भी जमीन 10 लाख में तब नहीं मिलती थी। अब की तो बात जाने दीजिए। 10 लाख में यह रजिस्ट्री आपके नाम क्यों नहीं हो गई? इसके पीछे का काकस और कोई है।
मुख्यमंत्री जी देखिए कैसे-कैसे राजनीतक बेहरे बेनकाब हो रहे है। आपने जब शपथ ली थी तो 24 करोड़ जनता को भरोसा दिलाया था कि बड़े-बड़े अपराधियों के खिलाफ मोर्चा खोलूंगा जीरो टॉलरेस की नीति लागू करूंगा। निश्चित तौर पर बड़े-बड़े अपराधी मारे गए या प्रदेश छोड़ गए, लेकिन भ्रष्टाचार थामने का वादा पूरा होना बाकी है। आखिर राशिद नसीम के खिलाफ कोई आवाज क्यों नहीं उठाई जा रही है? उसके प्रत्यर्पण की किसी भी स्तर पर चर्चा क्यों नहीं हो रही है?


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यूपी में 64000 करोड़ का घोटाला कर के दुबई में मौज काट रहे शाइन सिटी के एमडी राशिद नसीम की सम्पूर्ण कुंडली यहाँ है!


