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सियासत

यूपी में 64000 करोड़ का घोटाला कर के दुबई में मौज काट रहे शाइन सिटी के एमडी राशिद नसीम की सम्पूर्ण कुंडली यहाँ है!

शाइन सिटी का फंडा : दिखेगा तो फंसेगा

साल में एक एकड़ में कितने का गेहूं पैदा करते हो और कितने का धान, 50 हजार का…? एग्रीमेंट करो एक लाख रुपए सालाना दूंगा और घर बैठो, कुछ करने की जरूरत नहीं। पैसा खाते में पहुंच जाएगा। इस तरह सैकड़ों बीघे (पचासों एकड़) की झंडी और झंडे से सजी आधा दर्जन से अधिक साइट दिखाकर एक और जहां कम पैसे वालों को एजेंट के जरिए ठगा जाता था, वहीं बड़े-बड़े इनवेस्टर को एग्रीमेंट के पेपर दिखाकर जमीन में इनवेस्ट कर रकम को दो साल में ही डबल करने का सब्जबाग सीधे 64000 करोड़ का घोटालेबाज शाइन सिटी का एमडी राशिद नसीम दिखाता था या कंपनी के डायरेक्टर टाइप के बड़े अधिकारी। छोटे-बड़े निवेशकों की संख्या कुल 69000 के आसपास बताई जा रही है।

पहले ही दिन से वह दिमाग से खेल रहा था और आठ आंखें रखने का दावा करने वाले भी उसे पढ़ नहीं पाए। वह रोजाना चाल पर चाल चलता था, पर हमेशा खुद पीछे रहकर वजीर, सेनापति, हाथी, घोड़े, ऊंट व पैदल (बाइकर एजेंट को कार का लाभ देकर) को आगे (फ्रंट पर) रखता था। मन में इरादे साफ होते ही वह एग्रीमेंट भी लोकल एजेंट के नाम से कराने लगा था। इसी का नतीजा है कि राजधानी के हर वर्ग के हर नामचीन आदमी के साथ उसके फोटो वायरल होते रहे हैं। पहले वह खुद वायरल करता था और अब पीड़ित या उनके मददगार कर रहे हैं।

सियासी दल इसलिए अपेक्षाकृत शांत रहे क्योंकि उसके हमाम में सब नंगे थे। लोग दुनिया से निकल लेते हैं, पर किसी शीर्षस्थ के साथ एक फोटो नहीं खिंचा पाते उम्र भर, उसने जिसके साथ चाहा, उसको बुके देते हुए या स्वागत करते हुए न सिर्फ फोटो खिंचाया, बल्कि आंखों में धूल झोककर दिनदहाड़े डकैती डालने में उन फोटो व उन नामों का इस्तेमाल भी किया। पूरा दिमाग लगाकर खेल करने के क्रम में नई जेल रोड, निगोहां, गोसाईगंज एवं किसान पथ पर नाममात्र जमीन खरीदी थी, उसमें शानदार गेट, डिवाइडर व निवेशकों-खरीददारों को आकर्षित करने के लिए जो भी जरूरी था, वह सब करवाने में काफी रकम गलाई क्योंकि उसका साफतौर पर मानना था कि दिखेगा तो बिकेगा नहीं, बल्कि फंसेगा।

इसी झांसे में जहां निम्न मध्यम व मध्यम वर्ग के लोग फंसे, वहीं उच्च वर्ग के लोगों से भी जमकर इनवेस्ट कराया और बाद में सबका लेकर भगोड़ा बनकर दुबई में बैठा है। शुरू में जिसने भी संपर्क करने की कोशिश की, उन्हें नई-नई तारीखें देता रहा, फिर बाद में वीडियों जारी कर अन्य भगोड़ों का हथकंडा अपनाया। फलां के साथ क्या हुआ, फलां के साथ क्या हुआ, सरकार सख्त है और जान को खतरा हो सकता है आदि की बातें करने की खबर मिली है? इस दरम्यान सैकड़ों छोटे व बड़े लोगों को चेक भी जारी किए गए, लेकिन कंगाल बैंक के होने के कारण वे सब बाउंस हो गए। शुरू में तो किसान भी समझ नहीं पाए, पर बाद में कोई झंडी उखाड़ने पहुंचा तो पीटा गया, कोई जुताई करने पहुंचा तो पीटा गया और कोई एग्रीमेंट का बकाया मांगने पहुंचा तो पीटा गया।

गुंडई चरम पर थी। अगर किसी खरीददार ने जल्द रजिस्ट्री कराने की बात कही और गलती से गोमतीनगर आफिस या साइट पर पहुंच गया तो इतना पीटा गया कि फिर कभी पैसे मांगने ही नहीं आया। इस क्रम में जो दबाव बनाने में सफल रहे, उन्हें शुरू में खरीदे गए खेत में से प्लॉट दे दिए गए थे। आखिर में जेल गए बीच वाले, जो किसान व शैतान के बीच ब्रिज का काम कर रहे थे। वे जिन्हें कार पर जल्दी चढ़ने, जल्दी आगे बढ़ने व समाज में बड़ा दिखने की बहुत जल्दी थी। माता-पिता व बीवी-बच्चों की जरूरतें पूरी हो रही थीं तो घर से भी दिन-रात भागने की पूरी छूट थी इन बेरोजगारों की। इनमें कई छोटे-मोटे काम कर रहे थे तो कई छोटी-मोटी नौकरी। वे सब कुछ छोड़कर कंपनी के एक इशारे पर किसी से भी भिड़ने व किसी से भी जूझने के लिए हर पल तैयार रहते थे। यह वह वर्ग था, जिसने अपने व पराये में भेद ही खत्म कर दिया था।

बाद में क्या हुआ? इस खेल में सभी को जेल मिली, कुछ को बेल मिली। बाकी के घरवाले चक्कर लगा रहे हैं। ठप्पा अलग से लग गया कि ऐसा कोई ठगा नहीं, जिसको ठगा नहीं।

दृष्टांत न्यूज 64 हजार करोड़ के उत्तर प्रदेश के इस सबसे बड़े घोटाले के पीड़िटन को इंसाफ दिलाने के लिए शातिर नटवर लाल के खिलाफ सीरीज चलाएगा।

दृष्टांत के कार्यक्रम में आए शाइन सिटी प्राइवेट लिमिटेड व राशिद नसीम की पूरी कुंडली खंगालने वाले हाईकोर्ट के वरिष्ट अधिवक्ता सत्येंद्र नाथ श्रीवास्तव के साथ सवालों के एनकाउंटर में उसके प्रत्यर्पण की भी बात पुरजोर तरीके से रखी गई। सरगना राशिद घोटालेबाज राशिद नसीम कैसे बना, इसकी सिलसिलेवार परतें दृष्टांत न्यूज उधेड़ेगा।

भगोड़ा राशिद नसीम

राशिद जब पैदा हुआ होगा तो उसके मां-बाप की खुशी का ठिकाना नहीं होगा। साथ ही सपना देखा होगा कि बेटा पढ़-लिख कर संसार में ख्यात होगा। 140 करोड़ देशवासियों की सेवा करेगा, पर यह क्या? वह सेवा के बजाय अमीरों व गरीबों की हजारों करोड़ की मेवा लेकर भाग गया और एजेंसियां हाथ पर हाथ धरे बैठी रहीं। विख्यात के बजाय उसकी नजर हमेशा से ही कुख्यात बनने पर रही। जैसे-जैसे वह इस रास्ते पर आगे बढ़ता गया, लूट के इरादे पुख्ता व खतरनाक होते चले गए। बड़ा आदमी बनने का सपना देखने के क्रम में भू माफिया व दूसरे गलत क्षेत्रों से कम समय में धन कमाने वाले लोगों का कारवां जुड़ता चला गया।

अब जब उसे देश का सबसे बड़ा भगोड़ा अपराधी घोषित किया जा चुका है तो बाकी दो नंबर वाले छिपे-छिपे घूम रहे हैं। इतना ही नहीं, कोई ऐसा दौलत व कलेजे वाला माई का लाल नहीं मिला, जो यह कह सके कि राशिद उसका इतने करोड़ लेकर भाग गया है। आज उस मां को भी लज्जा आती होगी। बेटा कहने से शर्म के मारे इंकार करती होगी। शायद इसी कारण उन्होंने संपत्ति से बेदखल कर दिया है। समाज में दोनों ही तरह के उदाहरण मौजूद हैं, जब माता-पिता ने बेटे की करतूत से परेशान होकर अतीत में हजारों बेटों को बेदखल किया है। हालांकि इस बेदखली को कई जानकार रणनीति का हिस्सा करार देते हैं। उस पर जब पैसा वापसी का दबाव बनने लगा तो निश्चित तौर पर भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के कुछ बड़े-बड़े नेताओं के संरक्षण के कारण वह देश छोड़ने में सफल रहा।

अब दुबई में वह भगोड़ा के बजाय एक संत व रॉबिनहुड की इमेज बनाने की कोशिश में लगा रहता है। कानूनी प्रक्रिया के तहत देश लाकर उसे सलाखों के अंदर डालने की कोशिश में लगे अधिवक्ता श्रीवास्तव ने लगातार मोर्चा खोल रखा है। उसे एक दिन भारत आना होगा, आना होगा, आना होगा और सलाखों के अंदर जाना होगा, जाना होगा और जाना होगा। यूएई से प्रत्यर्पण संधि न होने से ज्यादा सालता है सियासी दलों का चाल, चरित्र, चेहरा और कथनी-करनी में फर्क, जिसके कारण ही वह भागने में सफल रहा था व इसके ही कारण उसे लाने की दिशा में सरकार द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।

श्रीवास्तव बताते हैं कि साल 2014 में कानपुर में एक कंपनी रजिस्टर होती है। नाम रखा गया साइन सिटी इंफ्रा प्राइवेट प्रोजेक्ट लिमिटेड। कंपनी ने सपने बेचने शुरू किए कि हम रेजीडेंसियल व कॉमर्सियल प्लॉट और फ्लैट देंगे। फ्लैट किसे बनाने थे तो नाममात्र रकम से नाममात्र की जमीन खरीद कर प्लाट के नाम पर गेम शुरू किया। कालांतर में पर्दे के पीछे राजनीति व व्यापार के बहुत बड़े-बड़े खिलाड़ी जुड़ते गए। उनकी काली कमाई को नसीम ने इसमें लगाने का ढोंग किया था।

बिना बड़े इनवेस्टमेंट के इतना बड़ा न तो कोई भू माफिया बन सकता है और न ही घोटाला हो सकता है। ठगी का मास्टर प्रिंट तैयार किया गया। कुछ जमीनों का एग्रीमेंट कराया गया, कुछ खरीदी गईं और एक विस्तृत क्षेत्रफल दिखाकर निवेशकों से कहा गया कि सारा प्रोजेक्ट हमारा है। इसमें पैसा लगाइए जल्द डबल होगा। शुरू में 51 परसेंट शेयर होल्डिंग राशिद नसीम के पास थी तो बाकी उसके भाई आसिफ नसीम के पास। आगे कंपनी ग्रो करती गई और मोटी रकम लेकर आने वाले करीब दर्जन भर लोगों को असिस्टेंट डायरेक्टर के नाम पर प्रवेश कराया गया।

छुटभैया नौकर कैसे बना नटवर लाल : इससे पहले वह एक साधारण आदमी था और स्पीक एशिया, रामसर्वे कंपनी के लिए काम करता था। बाद में बजाज एलियांज की फ्रेंचाइजी ली थी। कूटरचित कागजों के जरिए वहां इसने प्रीमियम के पैसे डकारने से शुरुआत की थी। साल 2013 में राजधानी के एक अखबार ने फ्रॉड के बारे में बाकायदा छापा था, फिर भी जो राजनेता व आईएएस-आईपीएस उसके इतिहास के बारे में नहीं जानते थे, वे उसकी बातों में आकर फंसते चले गए।

लखनऊ की पहली साइट चालू की थी पैराडाइज गार्डेन। इनिशियली जब आप शुरुआत करते हैं किसी भी काम की तो ईमानदारी दिखानी पड़ती ही है। सभी भगौड़ों का ऐसा ही इतिहास रहा है। इसने भी किसानों से बाकायदा रजिस्ट्री कराई शाइन सिटी कंपनी के नाम। रजिस्ट्री एग्जीक्यूट होती है कुछ बीघे की। इसके बाद सैकड़ों किसानों को ज्यादा कमाई का लालच देकर एग्रीमेंट कराया जाता है, उन्हें जुताई-बुआई करने से रोक दिया जाता है। इसके लिए साम, दाम, दंड और भेद की नीति पर चलकर जमीन पर झंडे लगाने के लिए 50000 महीने तक रकम अदा की गई या जो नहीं मान रहे थे, उन्हें पार्टनर बना लिया गया। किसी जो जब कुछ देना ही नहीं था तो अपना पूरा कारोबार उन्हीं का बताने-दिखाने में हर्ज क्या था? गांव या क्षेत्र के बिचौलिए के कारण लालच में आए किसान यदि समय से जाग जाते तो प्रदेश के नागरिकों का इतना बड़ा नुकसान हो ही नहीं पाता।

सस्ते प्लॉट के विज्ञापन, निवेश और कार्रवाई के बारे में वह कहते हैं कि 2023 में एनफोर्समेंट व ईओडब्लू ने एक जांच करवाई उस समय एसपी स्वप्निल ममगईं थे। उन्होंने अपनी निगरानी में एक जांच कमेटी बनाई तो चार-पांच लोगों के नाम पता चले। उन्होंने तीन बैंकों के 35 अकाउंट की जांच कराई तो दो लाख 19 हजार लोगों से पैसे लेने के सुबूत मिले थे। इसमें कुछ बड़े पेमेंट थे तो बाकी धन जीडीबीसी से आया था, जो इनीशियल प्रोजेक्ट (खुदरा स्कीम) था। इसमें हजार से 3000 रुपए प्रति माह लोग जमा करते थे। हाईकोर्ट में रिट में जो डिटेलिंग आई है, उसमें 45 बैंकों के 121 अकाउंट के बारे में बताया गया है। अभी सारे बैंकों के डिटेल नहीं आए हैं, जिस दिन सारे डिटेल आ जाएंगे, तब पीड़ितों की संख्या तीन लाख से भी ऊपर पहुंच जाएगी और तभी पता चलेगा कि वस्तुतः कितने हजार करोड़ का ये घोटाला है।

प्रारंभिक तौर पर इसे 64-65000 करोड़ का जरूर बताया जा रहा है। इनवेस्टर किस श्रेणी के थे, के सवाल पर वह कहते हैं कि दोनों तरह के थे। खुदरा खरीदार भी थे और बड़ी मछलियां भी। सही मायने में बड़े-बड़े आईपीएस-आईएएस को ही इनवेस्टर कहना ठीक रहेगा क्योंकि बड़ी मात्रा में ब्लैक मनी खपाई गई थी। इनवेस्टर टॉप टू बॉटम हर तरीके की श्रेणी के थे। देहात के बेरोजगारों को जोड़ने के लिए फ्रिज व वाशिंग मशीन जीतने का विज्ञापन दिया गया था। उसने कई टीम बनाई थी, जो फ्रंट पर काम करती थीं और वह पर्दे के पीछे रहता था और बड़े-बड़े खिलाड़ियों को भी पर्दे के पीछे ही रखता था। जैसे- चैंपियंस टीम, स्पार्टन टीम और कोहिनूर आदि। उसने गोमतीनगर सीओ, कोतवाल और चौकी इंचार्ज तक को मैनेज कर रखा था और क्रमशः पांच, तीन व डेढ़ लाख रुपए प्रति माह पहुंचाए जाते थे। उसने पूरे सिस्टम को बूना बनाकर रख दिया था। इस आशय की ऑडियो रिकॉर्डिंग को कोर्ट में भी पेश किया गया है।

ज्ञात हो कि उसका कॉर्पोरेट ऑफिस गोमतीनगर थाने के ही तहत आता था। कोई जब जांच एजेंसी को ही खरीद लेता है हर माह तो लोगों की सुनवाई कहां होगी और कोई जांच करके अपने ही पैर पर भला क्यों कुल्हाड़ी मारेगा?

आपके कथन के अनुसार साफ है कि राशिद पहले से ही तय कर चुका था कि निवेशकों का पैसा लेकर भागना है। हाई कोर्ट के निर्देश के बाद क्लेम फाइल करना शुरू कराने पर पता चला है 2014 की रजिस्ट्री लिए लोग टहल रहे हैं और दस साल से कब्जा नहीं मिला है तो साफ है कि डे वन से ही उसके इरादे साफ थे और अगर कोई नहीं समझ पाया तो समझदार होने का दावा करने वाले पढ़े-लिखे लोग। रजिस्ट्री पर उसके हस्ताक्षर हैं। उसको संजीवनी कहां से मिल रही है, के सवाल पर बोले कि हर बड़े राजनेता के साथ उसके फोटोग्राफ हैं। हम दशकों तक कार्यकर्ता रहे एक सियासी दल के, पर किसी ने मौका नहीं दिया फोटो खिंचाने का। इसके विपरीत जिस पर कई एफआईआर हो और पीएमएलए में अभियुक्त हो, उसके साथ राम नाईक, रीता बहुगुणा जोशी, उप मुख्यमंत्री बृजेश पाठक व केशव प्रसाद मौर्य, जगदीश मुखी आदि फोटो खिंचाते थे।

पूर्व मुख्यमंत्री से लेकर कई मंत्रियों ने भी उसे संरक्षण दिया हुआ था। उनके चित्रों के साथ राजधानी में बड़े-बड़े होर्डिंग लगते थे। इस तरह उसने पूरे के पूरे सिस्टम को ही हैक कर लिया था। उसके ऑफिस में सेल्स टैक्स और इनकम टैक्स का छापा पड़ा, इस बात का प्रमाण है क्योंकि दोनों बार में ही उसका कोई बाल बांका नहीं कर पाया। कई बार विभागों ने पेनाल्टी इंपोज की, पर कहीं कुछ नहीं।

वह सिस्टम के सिर पर चढ़कर पेशाब कर रहा था। 2013 से मीडिया लिख रहा है कि यह आदमी ठग है, चोर है और इस पर दर्जनों मुकदमे पंजीकृत हैं, फिर भी लोग न जाने किस लालच में बेशर्मी से उसके साथ फोटो खिंचा रहे हैं। 2017 से भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, योगी आदित्यनाथ प्रदेश के मुखिया हैं। हर बड़े प्लेटफार्म और मंच से वह भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की बात करते हैं। ऐसे में उन्हें चाहिए कि इतने सुबूत हाथ में होने के बाद पार्लियामेंट्री रिपोर्ट बनवा कर गरीबोंके अरमानों के हत्यारे को दंडित करवाने में मदद करें और जब तक उस पर कार्रवाई नहीं होती, तब तक दृष्टांत न्यूज की मुहिम जारी रहेगी।

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