
चुनाव की चोरी पकड़ने वाले डाटा को नष्ट करने की चुनाव आयोग की जल्दबाजी पर भी कुछ नहीं है। मोदी, ट्रम्प और मीडिया के मन की बात वाले इस मॉडल में संवाद एकतरफा है और सवालों से ध्यान हटा दिया जाता है। इसमें “शांति के सौदागर” बने ट्रम्प की नोबल योग्यता का प्रचार है, मध्यस्थ की माया और मीडिया के बड़े हिस्से का मूक बधिर होना शामिल है जिसमें विचार नहीं, प्रचार हावी है। ऐसे में ट्रम्प को भले नोबल चाहिए हमें सवाल ही पूछना है इसमें युद्ध, योग और यथार्थ को रेखांकित करना जरूरी है।
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों में एक खबर है, पाकिस्तान ट्रम्प को शांति का नोबल देने की सिफारिश करेगा। अमर उजाला में इस खबर का उपशीर्षक है, अमेरिका को खुश करने की कोई कोशिश नहीं छोड़ रहा है पड़ोसी देश (पाकिस्तान)। यह उड़ीशा आने के लिए ट्रम्प का दावा ठुकराया के बाद की खबर है। सबको पता है कि ‘माई फ्रेंड’ और ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ के बावजूद युद्ध विराम की घोषणा डोनाल्ड ट्रम्प ने ही सबसे पहले की थी और ट्रम्प को मोदी की दो टूक…पाकिस्तान पर भारत को न मध्यस्थता स्वीकार थी, न है और न कभी करेंगे – तब आया था जब वे अपना दावा 13 बार दोहरा चुके थे। यही नहीं, भारत में अखबारों ने बताया या नहीं, मोदी की दो टूक के बावजूद ट्रम्प ने अपना दावा दोहराया था। अखबारों ने यह भी बताया था कि (खून में व्यापार है और नसों में गर्म सिन्दूर बहता है के बाद) प्रधानमंत्री ने कहा था कि अचानक शुरू और खत्म हुए ऑपरेशन सिन्दूर या युद्ध विराम में ‘व्यापार की कोई भूमिका नहीं थी’। अचानक इसलिए कि किसी आतंकी हरकत के बाद ऑपरेशन सिन्दूर जैसा अभियान पहली बार हुआ फिर भी हमलावर आतंकियों का पता नहीं चला और यह 2019 के पुलवामा हमले जैसा ही है जब पाकिस्तान को घुस कर मारा गया था पर हमले का खुलासा अभी तक नहीं हुआ है। ऐसे में पाकिस्तान अगर युद्ध विराम का श्रेय अमेरिका या ट्रम्प को दे रहा है तो भारत के इस दावे का क्या मतलब कि …पाकिस्तान पर भारत को न मध्यस्थता स्वीकार थी, न है और न कभी करेंगे। जो भी हो, आज यह खबर द टेलीग्राफ में लीड है। इसका शीर्षक है, पाकिस्तान ट्रम्प को नोबल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित करेगा। वैसे भी, पाकिस्तानी सेना प्रमुख को व्हाइट हाउस में भोजन पर बुलाने के बाद यह ख्याल जिसका विचार हो नोबल (उत्तम) है और लगभग यही शीर्षक है जो मेरे किसी और अखबार में कम से कम आज तो नहीं है। दूसरी ओर, यह तथ्य है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कह चुके हैं कि उन्हें अमेरिका की मध्यस्थता स्वीकार नहीं है और वे ट्रम्प के बुलावे पर अमेरिका नहीं गये या उसे ठुकरा दिया।
इसमें नवोदय टाइम्स की इस खबर का अपना महत्व है कि ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामनेई ने अपने उत्तराधिकारी का चयन कर लिया है और इसमें बेटे का नाम नहीं है। आज मेरे आठ अखबारों में ज्यादातर का पहला पन्ना ये सब जानकारी देने या संबंधित सवाल करने की बजाय योग दिवस की खबरों से भरा है। दि एशियन एज में यह खबर लीड है। शीर्षक है, मोदी ने कहा, दुनिया संकट में, योग शांति और एकता का साधन। सरकार जब योग दिवस को महत्व दे रही है और मीडिया इतना प्रचार दे रहा है कि एक से एक तोन्दियल नेता सार्वजनिक रूप से योग करने और अपनी हंसी उड़वाने के लिए मजबूर हुए। जो जमीन पर बैठ नहीं सकते उनने कुर्सी पर बैठकर भी योग किया। प्रचारकों की सरकार के सारे काम प्रचार के लिए होते हैं सो अखबारों ने भी प्रचार देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हिन्दी पट्टी के प्रमुख अखबारों में एक, अमर उजाला ने पहले तो लीड के ऊपर, छह कॉलम की खबर छापी, मोदी आज तीन लाख लोगों के साथ विशाखापत्तनम में योग करेंगे और फिर अगले दिन उसी तरह टॉप पर सात कॉलम की खबर छपी है, तनाव अशांति और अस्थिरता से गुजरती दुनिया के लिए योग शांति। कहने की जरूरत नहीं है कि नरेंद्र मोदी को युद्ध छेड़कर, अचानक युद्ध विराम करने और योग से शांति लाने के लिए नहीं चुना गया था और न ही मन की बात करने के लिए। ठीक है कि प्रधानमंत्री हैं तो मन की बात भी कर सकते हैं लेकिन जो वादे थे उसका क्या हुआ, यह भी तो पूछा जाना चाहिये। मीडिया का यह विशेषाधिकार नहीं है कि वह प्रचारक बनकर लाभ उठाये। जवाब या ईडी का सामना उसे भी करना होगा।
देश में जब बेरोजगार और रिटायर लोगों के लिए जब मुफ्त इलाज की सुविधा नहीं है, शिक्षा व्यवस्था बेहाल है, अंग्रेजी बोलने पर शर्म आनी है और ‘अपना देश, अपनी संस्कृति, अपना इतिहास, अपने धर्म को समझने के लिए अपनी भाषा ही जरूरी है तो अखबारों को बताना चाहिये कि मंत्रियों के बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं और नरेन्द्र मोदी गुजराती में कह चुके हैं कि अंग्रेजी जानना चाहिये। वैसे भी अपनी भाषा या अपने धर्म से रोजगार नहीं मिलता है। इससे अलग, अखबार ट्रम्प का दर्द बता रहे हैं …. मैं कुछ भी कर लूं, (नोबल) नहीं मिलेगा अब तक 4-5 बार मिल जाना चाहिये था। मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री जब ट्रम्प का निमंत्रण ठुकरा चुके हैं, (जनसत्ता में कल यह खबर लीड थी। इसका राजनीतिक लाभ लेने के लिए कहा है, जो शीर्षक है, महाप्रभु (भगवान जगन्नाथ) की धरा पर आने के लिए ट्रम्प का निमंत्रण अस्वीकार किया)। भारत नहीं मानता है कि ट्रम्प ने मध्यस्थता की या उसने स्वीकार किया तो पाकिस्तान की सिफारिश को गंभीरता से लिया जाना चाहिये जैसे टेलीग्राफ ने लीड बनाकर लिया है या सरकार की तरह नजरअंदाज कर देना चाहिये। चूंकि सरकार ने इस पर ध्यान ही नहीं दिया है तो अखबारों को भी चाहिये था कि वे पाकिस्तान की सिफारिश को नजरअंदाज करते। लेकिन कई अखबारों की प्रस्तुति से लगता है कि वे प्रधानमंत्री से ज्यादा पाकिस्तान के खिलाफ हैं और यह वैसे ही है जैसे नवाज शरीफ के समय पाकिस्तान के मित्र बन गये थे। शायद ही किसी ने तब सवाल उठाया था कि नवाज शरीफ को निमंत्रण किसने-क्यों दिया? भारत और यहां की मीडिया का जब एक पड़ोसी पाकिस्तान के प्रति ऐसा बदलता रुख रहा है तब इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के अनुसार भारत पड़ोसी के लिए काम करेगा और ईरान में फंसे नेपाल व लंका के नागरिकों को भी निकालने का काम करेगा। यह अलग बात है कि दो पड़ोसी देशों के नागरिकों के मामले में कहा जाता है कि देश धर्मशाला नहीं है। कुल मिलाकर, देश में मन की बात ही चल रही है और अखबार सवाल करने की बजाय उसी का प्रचार और समर्थन कर रहे हैं।
100 करोड़ की जीएसटी धोखाधड़ी में मारे गये छापों में सोने की सात छड़ें जब्त की गई हैं। अमर उजाला में आज पहले पन्ने की एक खबर यह भी है। पहले ऐसी खबरों का भाव होता था कि कितनी चोरी-भ्रष्टाचार है। अब इन खबरों से बताया जाता है कि सरकार सतर्क है तभी तो चोरी पकड़ रही है। लेकिन अब चोरी अक्सर सैकड़ा करोड़ की होती है। आप जानते हैं कि जीएसटी को लागू किया गया था तो इसकी कितनी तारीफ हुई थी। धीरे-धीरे तमाम सेवाओं को इसकी जद में ले लिया गया है। नतीजतन तमाम सेवाएं कम से कम पांच प्रतिशत महंगी हुई हैं (0.25 और 3 प्रतिशत अपवाद है)। उल्लेखनीय है कि 2014 से पहले पेट्रोल डीजल की कीमत बढ़ती थी तो कहा जाता था कि इससे महंगाई बढ़ेगी। भाजपा के लिए महंगाई बड़ा मुद्दा हुआ करता था पर अब वह मुद्दा ही नहीं है। जीएसटी से सरकार या देश को वसूली और वसूली के नये उपायों के अलावा कोई फायदा हुआ हो तो पता नहीं है। महंगाई तेजी से बढ़ी है। पहले महंगाई के साथ आय भी बढ़ती थी अब उसकी भी बात नहीं होती है। टैक्स व्यवस्था के रूप में जीएसटी में भी उतने ही छेद हैं जितने पहले की किसी व्यवस्था में थे या हो सकते थे। इसलिये, यह भी नोटबंदी की तरह अपने तमाम नुकसान के बावजूद बेकार साबित हुई है। इसके बावजूद आज खबर है कि फर्जी जीएसटी फर्म रजिस्टर करवाकर करोड़ों की हेराफेरी की गई। इस मामले में दो लोग पकड़े गये हैं। यहां यह बताना जरूरी है कि जीएसटी की चोरी रोकने के लिए तमाम नियम बनाये गये हैं जिससे पैसे कमाने वाला कोई भी काम-व्यवसाय करना मुश्किल हो गया है। हाल में मैंने किसी कॉरपोरेट के लिए अनुवाद का कोई छोटा सा काम किया और अपने हिसाब से तमाम झंझटों का खर्चा जोड़कर करीब 2100 रुपये की मांग की। अभी तक उसका क्रय आदेश, ग्राहक को जानिये आदि जैसे काम नहीं हुए हैं और पैसे मिलना तो दूर, बिल स्वीकार किये जाने तक मुझे लग रहा है कि पांच हजार रुपये भी मांगे होते तो कम था। ठीक है कि यह पहला काम था इसलिए ऐसा हुआ लेकिन इस ग्राहक से दूसरा काम मिलने की उम्मीद कहां है और बहुत सारे काम में बहुत सारे ग्राहक एक ही बार के होते हैं। उससे पैसे भी ज्यादा मिलते हैं पर अब वह जीएसटी या सरकार की सेवा में चला जा रहा है। जब हर हाथ को काम की बात हो तो ऐसे काम न सिर्फ खत्म हुए हैं बल्कि उसका लाभ भी मारा जा रहा है। जीडीपी का बाजा यूं ही नहीं बजा हुआ है। इसके नुकसान की भरपाई के लिए बेमतलब का प्रचार किया गया कि अर्थव्यस्था में हम जापान से आगे निकल गये हैं। बेशक यह पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था होने जैसा बेकार का प्रचार है और तथ्य है कि समय निकलने के कई साल बाद भी हम अभी तक उस निशान को छू नहीं पाये हैं।
आयकर वसूली भी कम और धीमी – सरकार प्रचार चाहे जो करे और डाटा चाहे जो दे या न दे तथ्य यह है कि इस साल आयकर वसूली पिछले साल से कम हुई है। इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक एडवांस टैक्स कलेक्शन में वृद्धि 3.9 प्रतिशत कम हुई है और अभी तक की आयकर वसूली में 2.68 प्रतिशत की कमी आई है। यह खबर दूसरे अखबारों में भी है और आयकर विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के आधार पर है। टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के अनुसार न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के मामले की जांच करने वाली समिति ने पाया कि जली हुई नकदी के पास एक अनजाना व्यक्ति था। अखबार ने लिखा है कि इससे यह संदेह बढ़ता है कि क्या इसी व्यक्ति ने वहां से नकदी हटाई। पर मुद्दा यह है कि पुलिस वालों से लेकर गृहमंत्री तक किसी ने घटना स्थल को सील करने के लिए क्यों नहीं कहा और अगर उन्हें सूचना मिलने से पहले सफाई हो गई थी तो इसके लिए वही पुलिस वाले या दमकल कर्मी जिम्मेदार हैं जिन्होंने वीडियो बनाया है। सबूत के अभाव में जज के खिलाफ कार्रवाई हो या नहीं इन सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है या हुई है तो यह खबर क्यों नहीं है और यही इस मामले को सामान्य से अलग बनाता है।
चुनाव की चोरी का राहुल गांधी का आरोप आपको मालूम होगा। राहुल गांधी और विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग पर निष्पक्ष नहीं रहने और पक्षपात करने के कई आरोप लगाये हैं। एक बड़ा आरोप तो यही है कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति करने वाले पैनल में सरकार ने मनमानी बदली की है और इसके खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबे समय से लंबित है। चुनाव आयोग का लचर जवाब अपनी जगह है। अदालत के आदेश नहीं मानने और उससे बचने के उपाय तथा कानून बना दिये जाने के मामले और ऐसी खबरों के बीच हाल में खबर थी कि चुनावों के वीडियो फुटेज और तस्वीरें अब 45 दिन तक ही स्टोर किए जाएंगे। चुनाव आयोग ने इससे संबंधित नियम बदल दिये हैं। खबरों के अनुसार, परिणामों की घोषणा के बाद डेटा को संरक्षित रखने की अवधि को घटाकर अब 45 दिन कर दिया गया है। इसके बाद अगर कोई चुनाव याचिका दायर नहीं की जाती है तो डेटा को नष्ट किया जा सकता है। कोई भी कहेगा कि यह जल्दाबाजी शंका पैदा करने वाली है और चुनाव हारने वाले के लिए याचिका दायर करने का समय 45 दिन कम है। वैसे भी चुनाव हारने वाला अपने पैसे खत्म कर चुका होगा, जीत रहे उम्मीदवार को तिकड़म से हराया जाये तो हताश निराश होगा, उसके साथी-समर्थक दगा दे चुके होंगे और इन सबसे निपट कर 45 दिन के अंदर याचिका दायर कर देना चुनाव लड़ने और जीतने से कम मुश्किल नहीं है। अगर चुनाव याचिका दायर की जाती है तो मामले के पूरा होने तक फुटेज को संग्रहीत किया जाएगा। दूसरी ओर चुनाव में धांधली हो तो उसका रिकार्ड रहे, इसके लिए फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी होती है। पुष्टि के लिए रिकार्ड देने में टालमटोल के उदाहरणों के बाद अब यह नियम (और कुछ कानून भी) संदिग्ध बनाते हैं। खबरें प्रमुखता नहीं पाती हैं से अलग आज चुनाव आयोग के नये फैसले पर राहुल गांधी की प्रतिक्रिया द हिन्दू और दि एशियन एज में ही है।
जनसत्ता डॉट कॉम की एक खबर के अनुसार, चुनाव प्रक्रिया की इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) की जांच से लेकर मतदान और मतगणना के दिनों में उनके स्टोरेज, ट्रांसपोर्ट और काउंटिंग तक वीडियो और फ़ोटोग्राफ़ी द्वारा कवर की जाती है। मतदान केंद्रों के अंदर मतदान प्रक्रिया की निगरानी लाइव वेबकास्टिंग के ज़रिए की जाती है। उम्मीदवारों के खर्च पर नज़र रखने और आदर्श आचार संहिता के संभावित उल्लंघनों की निगरानी के लिए अभियान गतिविधियों को भी रिकॉर्ड किया जाता है। जाहिर है इसमें अच्छा खासा खर्च होता है फिर इसे संभाल कर रखने की व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिये। यह व्यवस्था इसलिए भी जरूरी है कि चुनाव की चोरी से सत्ता पाने वाली सरकार जांच न होने दे तो जब भी सत्ता में नहीं रहे जांच हो और उसके पूरे सबूत हों। न कि न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के मामले की तरह सबूत संभाल कर न रखें जायें और बाद में सीधे जोड़ने वाले संबंध न होने के बावजूद कार्रवाई की जाये (या न हो सके) और बदनाम तो किया ही जा सके। वैसे भी, चुनाव प्रक्रिया के सीसीटीवी फुटेज से संबंधित हाल के महीनों में चुनाव आयोग द्वारा किया गया यह दूसरा महत्वपूर्ण बदलाव है। पिछले साल दिसंबर में सरकार ने चुनाव संचालन नियमों के नियम 93(2)(ए) में संशोधन करके ऐसे फुटेज तक जनता की पहुंच सीमित कर दी थी। नियम के संशोधित संस्करण में अब कहा गया है, “इन नियमों में चुनाव से संबंधित निर्दिष्ट सभी अन्य कागजात सार्वजनिक निरीक्षण के लिए खुले होंगे।” यह 6 सितंबर, 2024 को जारी किए गए पूर्व निर्देशों से अलग है, इसमें चुनाव प्रक्रिया के विभिन्न चरणों के वीडियो फुटेज को सेफ रखने के लिए विशिष्ट समय सीमा तीन महीने से एक साल तक निर्धारित की गई थी। पहले के दिशा निर्देशों के अनुसार, नामांकन-पूर्व अवधि के फुटेज को तीन महीने तक सुरक्षित रखा जाना था जबकि नामांकन चरण, अभियान अवधि, मतदान केंद्रों के अन्दर और बाहर और मतगणना की रिकॉर्डिंग को चरण के आधार पर छह महीने से एक साल तक की अवधि के लिए सुरक्षित रखा जाना था। यह सब तब जब सत्ता में आने से पहले भाजपा ईवीएम के खिलाफ थी और इसके खिलाफ अभियान चलाया था।



