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दिल्ली

यूएनआई पर NCLT के फैसले को लेकर कर्मचारियों का नजरिया क्या है? पढ़ें

गभग 65 वर्ष पुरानी समाचार एजेंसी यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया (UNI) के कॉर्पोरेट इन्साल्वन्सी रिज़ोल्यूशन प्रोसेस (सीआईआरपी) मामले में नेशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल (NCLT) का फैसला फरवरी में आ गया। द स्टेट्समैन समूह का 72 करोड़ रुपये का रिज़ोल्यूशन प्लान एनसीएलटी ने मंजूर कर लिया।

यूएनआई वर्कर्स यूनियन, नई दिल्ली, ने 2022 में एनसीएलटी से गुहार लगाई थी कि कर्मचारियों/पूर्व कर्मचारियों का कंपनी पर बकाया वेतन, ग्रेच्युटी और अन्य भत्तों के मद में 103 करोड़ रुपये बकाया है। एनसीएलटी ने 19 मई 2023 के आदेश से यूएनआई को दिवालिया घोषित कर सीआईआरपी शुरू करने का निर्देश दिया। इंतरिम रिज़ोल्यूशन प्रोफेशनल की नियुक्ति की गई और यूएनआई के “पुनरुत्थान” की प्रक्रिया शुरू हुई। जिसका फैसला 12 फरवरी को आया है और 27 फरवरी को आदेश की प्रमाणित प्रति कर्मचारियों के सामने आई है।

यह फैसला कई मायने में ऐतिहासिक और अनूठा है। डेढ़ दशक से आर्थिक संकट झेल रही एक राष्ट्रीय समाचार एजेंसी, जिसकी छह दशक की समृद्ध विरासत है, को नया जीवन मिला है। लेकिन कर्मचारियों और पूर्व कर्मचारियों के दृष्टिकोण से बात की जाए और सवाल पूछा जाए कि क्या वह पूरी तरह संतुष्ट या खुश हैं? तो जवाब स्पष्ट “हाँ” तो नहीं ही होगा। मोटे तौर पर कर्मचारियों को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है। एक, जो राहत की सांस ले रहे हैं कि एक नासूर बन चुकी समस्या का कुछ तो हल निकला और जो मिल रहा है, ले लो। दूसरा वर्ग वह जो वेतन और अन्य भत्तों के मद में स्वीकृत दावों के लगभग 90 करोड़ की एवज में केवल 8 करोड़ यानी 8 फीसदी के भुगतान से संतुष्ट नहीं है। कुल स्वीकृत दावे 104 करोड़ थे जिसमें से 15 करोड़ से अधिक ग्रेच्युटी के हैं। एक कर्मचारी के दृष्टिकोण से बात करें तो उसे अपने चार से छह साल के बकाया वेतन व अन्य भत्तों की राशि 20 से 35 लाख के बकाया के एवज में दो से साढ़े तीन लाख तक नहीं मिलेंगे। अब आगे क्या हो सकता है पहले संक्षेप में 72 करोड़ के ब्रेकअप के बारे में जान लें।

72 करोड़ में से कर्मचारियों को 23+ करोड़ (15+ करोड़ ग्रेच्युटी और 8 करोड़ वेतन व अन्य भत्ते) 104 करोड़ के दावों पर मिलेंगे। 16.52 करोड़ भविष्य निधि कार्यालय को जाएंगे। एक करोड़ 40 लाख रुपये स्टेट बैंक को जाएंगे। 18 करोड़+ सीआईआरपी कॉस्ट (कर्मचारियों को 19 मई 2023 के बाद किए काम का वेतन, प्रति माह मिले 15 हजार रुपये काटकर) मिलेंगे। इन 18 करोड़ में (अगस्त 2024 तक कैल्कुलेट किए 13 करोड़+ और 5 करोड़ का कॉन्टीजेन्सी फंड शामिल है। 11+ करोड़ वर्तमान कर्मचारियों की ग्रेच्युटी के लिए हैं, जो छोड़ने/सेवानिवृत्त होने पर मिलेगी।

जाहिर है, कर्मचारियों के बकाया का बड़ा हिस्सा लगभग 85 फीसदी मार्च 2017 से 19 मई 2023 तक बकाया वेतन व अन्य भत्तों का था। तो उसका जब केवल आठ फीसदी मिलेगा तो कोई खुशी से नाच तो नहीं ही रहा होगा। अब सवाल है कि आगे क्या हो सकता है।

तीन बिन्दु हैं जिस पर साथी (दिल्ली समेत देश भर के) वकीलों/कानून के जानकारों से बात कर सकते हैं और आगे बढ़ने के रास्ते टटोल सकते हैं:

  1. भविष्य निधि कार्यालय को दिए जा रहे 16.52 करोड़ रुपये में से सिर्फ साढ़े चार करोड़ रुपये (अनुमानित) कर्मचारियों के खातों में जाएगा। शेष लगभग 12 करोड़ रुपये जुर्माने और ब्याज के तौर पर जा रहा है। हमें एक्सप्लोर यह करना है कि क्या ईपीएफओ यह रकम माफ नहीं कर सकता? या एनसीएलटी ईपीएफओ को सुझाव/निर्देश नहीं दे सकता? ऐसा हो सकता है तो यह रकम कर्मचारियों को ही मिलेगी। इस में ऐसा भी किया जा सकता है कि पेनल्टी ईपीएफओ ले ले और ब्याज कर्मचारियों को दिया जाए क्योंकि उन्हें दोहरा नुक्सान हुआ है। समय पर निधि अंशदान जमा न कराने से ब्याज का भी घाटा हुआ और पेंशन भी कम बनी।
  2. जो कंपनी का वैल्यूऐशन कराया गया है क्या उसमें दिल्ली स्थित मुख्यालय (9 रफी मार्ग) की जमीन को भी शामिल किया गया है? जमीन को लेकर उच्च न्यायालय में मामला चल रहा है इसलिए संभावना ज्यादा यही है कि इस जमीन को वैल्यूऐशन में शामिल नहीं किया गया। ऐसा है तो हमारा सवाल यह बनता है कि अदालत के स्थगन आदेश के कारण जमीन अभी यूएनआई के कब्जे में ही है और अब सफल समाधान आवेदक अर्थात स्टेट्समैन के कब्जे में आएगी। अदालत का अंतिम निर्णय यदि यूएनआई के पक्ष में आया तो क्या कर्मचारियों को अनुपात में उनके बकाया का हिस्सा भुगतान किए जाने की संभावना है?
  3. प्रसार भारती पर जो यूएनआई का आठ करोड़ रुपये था, उसका क्या हुआ? पूरी सीआईआरपी प्रक्रिया के दौरान इसकी वसूली नहीं की जा सकी, लेकिन क्या रिजोल्यूशन प्लान अमल के बाद यह रकम मिली तो कर्मचारियों में वितरित हो सकती है या फिर स्टेट्समैन को मिलेगी?

इसके अलावा थ्रिफ्ट सोसाइटी के पौने दो करोड़ रुपए का भी सवाल है। 2021 में सोसाइटी बंद कर दी गयी थी। आज सोसाइटी सीओसी में हो सकती थी। कर्मचारियों का पैसा मिल सकता था। इन बिंदुओं पर हमें आपस में भी और वकीलों/कानून के जानकारों से बात करने की जरूरत है। और यह कार्य थोड़ा जल्दी करना होगा क्योंकि आदेश पर अपालेट ट्राइब्यूनल में अपील के लिए समय सीमा है। ध्यान रहे, यहाँ रिजोल्यूशन प्लान को कोई चुनौती देने की बात नहीं की जा रही, उसमें केवल संशोधन का अनुरोध किया जा रहा है ताकि लगभग 700 कर्मचारियों/पूर्व कर्मचारियों को सही मायने में न्याय मिल सके।

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