मनीष दुबे-
सालों इंतजार और खस्ता हालत के बीच देश की दूसरी सबसे बड़ी समाचार एजेंसी यूएनआई के बिकने पर एनसीएलटी (NCLT) की अंतिम मुहर लग गई है। द स्टेट्समैन (The Statesman) ने इसका अधिग्रहण कर लिया है। ये पूरी प्रक्रिया कर्मचारियों का बकाया चुकाने के नाम पर हुई है।
एजेंसी बिकने के बाद वादों और शब्दों का ऐसा मायाजाल बुना जा रहा है जैसे स्टेट्समैन वालों के पास कोई जादू की छड़ी हो और घुमाते ही सभी कर्मचारियों की सैलरी से लेकर मुसीबतों तक सब एकदम हल हो जाएगा। जबकि इससे पहले इस सौदे से अदाणी ग्रुप भी हाथ हटा चुका है।
जानकारों की माने तो जिस इमारत में यूएनआई संचालित हो रहा था वह बिल्डिंग उसकी है ही नहीं। सरकार ने यह जमीन लीज पर allot की है और शहरी विकास मंत्रलाय ने खाली करने का आदेश दिया है। जिसे लेकर विवाद भी हाईकोर्ट में चल रहा है, फिलहाल इस प्रकरण में स्टे मिला हुआ है।
NCLT द्वारा नियुक्त रेजोल्यूशन प्रोफेशनल (RP) पूजा बाहरी ने इस डील के बाद कहा- “आज इतिहास रच दिया गया है। IBC की बदौलत UNI जैसी ऐतिहासिक संस्था के पुनरुद्धार और पुनर्संगठन का आदेश मिला है। यह इस कानून की ताकत को दर्शाता है।”
इसके अलावा पूजा बाहरी ने वह कागज किसी को नहीं दिखाया जिसपर एनसीएलटी ने मंजूरी की मुहर लगाई है। जिससे साफ हो सके कि किस समझौते के तहत क्या डील हुई है?..
पूजा बाहरी ने सभी कर्मचारियों को पूरी सैलरी देने का वादा तो किया है, लेकिन सूत्रों की माने तो यह बात सिर्फ उन कर्मचारियों के लिए की गई है जो पूजा बाहरी की नियुक्ति के बाद वाले हैं। इससे पहले वाले कर्मचारियों के लिए क्या फैसला लिया गया है, यह भी इस डील में साफ नहीं किया गया है। क्योंकि कर्मचारियों के बीच इस तरह की चर्चा है कि- पुराने जिन कर्मचारियों की सैलरी व पीएफ ग्रेच्युटी बकाया है उसे मात्र 8 से 10 प्रतिशत ही मिल पाएगा।
मतलब कि जिसका 25 लाख रुपया बकाया होगा उसे मात्र 2.5 लाख रुपया ही मिलेगा। हालांकि इस सूरत में Gratuity और फंड तो मिलेगा पर कर्मचारियों का पूरा बकाया वेतन नहीं मिल पायेगा।
सबसे बड़ी बात जिस स्टेट्समैन ने यूएनआई को खरीदा है उसकी हालत क्या है? और उससे भी बड़ा सवाल ये कि क्या स्टेट्समैन के मालिकाना हक के बाद यूएनआई… एजेंसी होने के अपने पुराने रुतबे को कायम रख सकेगी?..
क्या यूएनआई की खबरों के ग्राहक बने रहेंगे?
भड़ास4मीडिया को यूएनआई में ही पूर्व में बड़े पद पर कार्यरत रहे एक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि- “UNI के ग्राहक सूची में एचटी सिंडिकेशन, हिंदुस्तान (हिंदी दैनिक), दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, पंजाब केसरी, राष्ट्रीय सहारा, सामना, विभिन्न राज्य सरकारें, राजभवन और प्रमुख राजनीतिक दलों समेत 600 से ज्यादा मीडिया संस्थानों और संगठनों को समाचार और फोटो सेवाएं प्रदान करती रही है। अब बिकने के बाद कौन अखबार मालिक, समाचार संस्थान अथवा पॉलिटिकल पार्टी वाला चाहेगा कि वह स्टेट्समैन से खबरें ले, जो खुद पढ़े जाने के लिए संघर्ष करता अखबार है।
यह पूरी कवायद उस जमीन के लिए की गई है जिस पर यूएनआई चल रहा है। खरबों रुपये की कीमत वाली यह जमीन बेहद प्राइम लोकेशन पर है। हालांकि, जो नए आदेश हैं उसके तहत इस जमीन पर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया (PCI) और यूएनआई का संयुक्त कार्यालय बनना है। ये तमाम स्थितियां हैं जो अभी साफ होनी बाकी हैं।”
यूएनआई के पांव काटने में प्रधानमंत्री मोदी का हाथ
प्रसार भारती यूएनआई और पीटीआई को न्यूज सर्विस के बदले प्रतिवर्ष 7-9 करोड़ रुपये देती थी। मोदीजी ने प्रसार भारती का राजस्व दोनों एजेंसियों की तरफ से मोड़कर हिंदुस्थान समाचार की तरफ घुमा दिया। उर्दू सेवा का जो 25-50 लाख रुपया सालाना आता था वह भी बंद हो गया। नतीजतन यूएनआई दिवालिया की कंडीशन को प्राप्त हो गई।
कर्मचारियों के भविष्य को लेकर बड़ा सवाल
वर्तमान में UNI में 250 से अधिक कर्मचारी, जिनमें पत्रकार, फोटो पत्रकार और अन्य गैर-पत्रकार शामिल हैं, काम कर रहे हैं। इसके अलावा, देशभर के जिलों तक फैला फ्रीलांसर और स्ट्रिंगर नेटवर्क मिलाकर करीब 900 कर्मचारी इसकी रीढ़ बने हुए हैं। अब जब UNI को स्टेट्मैन ने खरीद लिया है तो क्या भविष्य में स्टेट्मैन कर्मचारियों को वाजिब स्थान दे पाएगा? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि खुद स्टैट्मैन की पत्रकारीय स्थिति ठीक नहीं है। ऐसा में सबसे पहला और बड़ा सवाल यही है कि कर्मचारियों के कांधे पर बंदूक रखकर हुआ यह फैसला उनका बेड़ागर्क करेगा या नैया पार ललगाएगा, आने वाला समय ही बताएगा।
यूएनआई के बिकने पर कुछ सवाल ये भी हैं…
- कितना पैसा देगा स्टेट्समैन यह बताया नहीं गया है, जबकि मुकदमा ही यही था कि कर्मचारियों को बकाया मिले। पूजा बाहरी ने इस बारे में कोई फैक्ट नहीं दिया।
- दूसरी बात यह है कि जो पैसा नए मालिक ने दिया है उसका बंटवारा कब तक और कितना होगा यह भी बात नहीं आई है।
- मुकदमे के पक्षकारों के बयान भी नहीं है कि क्या वे फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देंगे या नहीं।
- क्या पक्षकार अपीलेट ट्रिब्यूनल जाएंगे यह पता नहीं है।
- कानून में कहा गया है कि अगर कोई एक पक्ष फैसले से सहमत नहीं है तो वो ट्रिब्यूनल में अपील दायर कर सकता है।
भड़ास को मिली एक प्रतिक्रिया… पढ़ें
विजय कुमार-
कोई खुशी की लहर नहीं है। इस प्लान में कर्मचारियों को सीआईआरपी कास्ट और पीएफ ग्रेच्युटी के अलावा बकाया वेतन का 8 से 9 प्रतिशत ही मिल पाएगा। लोगों को 30 से 35 लाख रुपए का नुकसान हो रहा है। बड़ी संख्या में लोग ब्लैक डे मनाने की तैयारी कर रहे हैं। असली खुशी 72 करोड़ रुपये में 1500 करोड़ की संपत्ति हासिल करने वाले को हो रही है।
पढ़ें- यूएनआई के बिकने पर वरिष्ठ पत्रकार विमल कुमार जी की दर्दनाक कविता….
आखिर मेरा दफ्तर एक दिन बिक गया
खरीद लिया उसे एक ताकतवर आदमी ने
उसे बिकना ही था
लगनी थी मुहर
अदालत की
जब ताकतवर लोग खरीद रहे थे
इस देश को
अब यह कम्पनी बिकी है
मिल गया उसे कोई खरीददार
जब बिक रहे थे हवाई अड्डे
रेलवे स्टेशन
अखबार नवीस
बस इंतजार था
मेरा दफ्तर कब बिकेगा
यह नियति का कोई खेल था
या हश्र था एक साजिश का
हुक्मरानों को नहीं पसंद था
यह दफ्तर
जहाँ से नहीं मिलाई जाती थी
हां में हां किसी की
बिकने का यह खेल
खेला जा रहा था बरसों से
जिसमें बहुत चीजों के बिकने की कहानी लिखी जा चुकी थी
बहुत साल पहले मेरा दफ्तर
जर्जर हो गया था
कराहने लगा था
झरने लगे थे उसके पलस्तर
जहां में 35 साल तक काम करता रहा
खून पसीने लगाकर
जहां मैं सीखा था लिखना
कोई खबर कैसे लिखी जाती है
जहां रहते हुए मैंने कई लोगों से
ली थीं भेंटवार्ताएं
सीखा था सवाल पूछना सत्ता से
कई प्रेस कॉन्फ्रेंस में गया था
आखिर एक दिन
मेरा दफ्तर बिक गया
21वीं सदी के 25 साल जब गुजर चुके थे
जब कई चुनाव में धांधली के आरोप लग चुके थे
जब लोगों का कहना था
बिक गया चुनाव आयोग
अदालत और मीडिया
ऐसे में एक दिन पता चला
मेरा दफ्तर भी बिक गया मूंगफली की तरह
वह कंपनी जो घाटे में चल रही थी कई सालों से
जिसको लेकर निकले थे कई जुलूस
जिसके बारे में अखबारों में भी खबरें छपी थी
लेकिन किसी को क्या फर्क पड़ता है
क्या बिक रहा है
क्या नहीं बिक रहा है
कौन खरीद रहा है
कौन बेच रहा है
एक पूंजीपति के हाथों
देश बिक गया
जब पूरी भारतीय राजनीति
खरीदने बिकने का खेल हो गई थी
ऐसे में मेरा दफ्तर कैसे बचा रह सकता था
कैसी बची रह सकती थी
वह कुर्सियां जिन पर बैठकर हमने काम किया था
कैसे बचे रह सकते वे दरवाजे
जिनको खोलकर हम अंदर जाते थे
वह नल और वॉश बेसिन भी बिक गया
जहां हमने गर्मियों में प्यास बुझाई थी
अभी भी दफ्तर में वह पेड़ खड़ा है
अभी भी थोड़ी बहुत बची हुई हरी घास है
अभी भी है वह दीवार है भले
थोड़ी कमजोर दिख रही है
देखते-देखते य दफ्तर बिका
तो हम सबके सपने बिके
बिकी उम्मीदें
उसी रास्ते से मैं रोज गुजरता हूं
और देखता हूं
जहां मैंने गुजारे थे इतने साल
वह जगह कैसे बिक गई
बिकने के बाद
क्या दफ्तर को नई सांस मिलेगी
या कहा जायेगा
मैं एक बिके हुए दफ्तर का मुलाजिम हूँ
अच्छा हुआ रिटायर हो गया
नहीं लगा मुझपर कोई तोहमत
कि दफ्तर के साथ मैँ भी बिक गया
अब भी कुछ लोग उसमें काम करेंगे
चुप रहेंगे या बेचैन रहेंगे
या कहेंगे
क्या फर्क पड़ता है
काम तो करना है
चाहे उसे कोई खरीदे
या बेचे


