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सुख-दुख

विनोद जी करिश्माई शिल्पकार हैं लेकिन उनका जादू उनकी खरी सादगी और करुणामय मानवीयता में है, जो अत्यंत दुर्लभ है!

राजेश प्रियदर्शी-

विनोद कुमार शुक्ल के बारे में बहुत कुछ कहा जा रहा है, बहुत सारे कद्रदान अब हो गए हैं.

बिना इनाम-इकराम के आदमी को समझना हमें नहीं आता है, जितना मैं जानता हूँ, विनोद जी हमेशा इन बातों से बेपरवाह रहे हैं.

मैं उनसे दो बार मिला हूँ. एक बार जब वे लंदन आए थे, उसके बाद एक बार और भारत में.

मेरे साथ टहलते हुए लंदन में बीबीसी के दफ्तर (बुश हाउस) में वे हर चीज़ को बच्चों की तरह देख रहे थे. उन्होंने कैंटीन में काम करने वाले अफ़्रीकी मूल के लोगों के बारे में अनेक सवाल पूछे, बड़ी करुणा भरी जिज्ञासा के साथ, अनजान लोगों से उनका सहज आत्मीय और मानवीय जुड़ाव मुझे छू गया. मैं जिन लोगों को रोज़ देखता था, उनको देखना कैसे चाहिए, विनोद जी बिना कुछ कहे समझा गए.

उनकी लेखनी और उनके सार्वजनिक बर्ताव में मैं कभी कोई अंतर नहीं देख पाया, वीडियो-ऑडियो, इंटरव्यू कहीं भी.

वे जिस तरह साधारण बने रहे और जैसी असाधारण बातें कहते रहे वही उनके विलक्षण होने का अकाट्य प्रमाण है. वे जैसी बाते कहते हैं, उनको जैसे कहते हैं, वो विनोद कुमार शुक्ल हुए बिना कतई नहीं कही जा सकती. बहुत हद तक कबीर-रैदास वाली सादगी जो ओढ़ी हुई नहीं, जी हुई है.

कुँवर नारायण और नरेश सक्सेना से मैं मिला नहीं हूँ लेकिन उनकी कविताओं को पढ़ते हुए यही लगता है कि उनमें विनोद जी की तरह एक सहज संत भाव है जो बनावट से दूर है.

उनकी कविताएँ बनावट की नहीं बल्कि अनुभूति की कमीज़ पहनकर आती हैं जबकि ज़्यादातर बड़े कहे जाने वाले रचनाकार ‘मालिक की क़मीज़’ पहनने की ताक में रहते हैं.

विनोद जी करिश्माई शिल्पकार हैं लेकिन उनका जादू उनकी खरी सादगी और करुणामय मानवीयता में है, जो अत्यंत दुर्लभ है.

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