टीवी पत्रकारों के निजी और पेशेवर जीवन के सुख-दुख की गाथा है प्रियदर्शन का हिंदी उपन्यास ‘जिंदगी लाइव’

Prabhat Ranjan : प्रियदर्शन जी का उपन्यास ‘जिंदगी लाइव’ कई मायनों में पहला उपन्यास है. यह प्रियदर्शन का पहला उपन्यास है. हिंदी-अंग्रेजी दोनों भाषाओं में पुस्तकें प्रकाशित करने वाले प्रकाशन समूह जगरनॉट का भी संभवतः पहला हिंदी उपन्यास है. यह पहला उपन्यास है जिसमें टीवी पत्रकारों के निजी और पेशेवर जीवन का द्वंद्व उभरकर आया है. प्रियदर्शन ने अपनी छवि से हटकर इस उपन्यास में 26/11 के हादसे से साथ जोड़कर एक महिला टीवी एंकर और उसके रिपोर्टर पति के जीवन की निजी त्रासदी को संदर्भित करते हुए एक रोमांचक उपन्यास लिखा है.

उपन्यास में यह बहुत विश्वसनीय तरीके से दिखाया गया है कि किस तरह से टीवी के पत्रकारों को निजी तनाओं के बीच अपने पेशे के साथ न्याय करना होता है. 245 पृष्ठ का यह उपन्यास लोकप्रिय और गंभीर उपन्यासों के बीच एक सेतु की तरह है. अंत तक रोमांच बना रहता है. एक बार हाथ में लेने पर उपन्यास को ख़त्म किये बिना मन को चैन नहीं पड़ता. ईमानदारी से कहूं तो इस साल जीते उपन्यास पढ़े यह उसमें सबसे अच्छा लगा. अपने नए कथा-भूगोल के कारण भी और बेहद रोमांचक शैली के कारण भी.

Priya Darshan : हिंदी के विशिष्ट कवि-कथाकार उदय प्रकाश ने मेरे उपन्यास के कुछ हिस्से उद्धृत किए। मेरे लिए यह बड़ी बात है। खास बात यह कि ये वे हिस्से हैं जो उपन्यास के मूल कथ्य को सबसे ज्यादा संप्रेषित करते हैं। आभार- हालांकि कई बार यह छोटा शब्द जान पड़ता है।

Uday Prakash : प्रियदर्शन के उपन्यास ‘ज़िन्दगी लाइव’ के दो छोटे टुकड़े…

”विशाल और तन्मय ने फिर एक दूसरे को देखा. फफूंद की तरह उगते टीवी चैनलों से वे खूब परिचित थे. पेट्रोल पंप के मालिक, चिटफंड वाले , बिल्डर सब स्कूल और टीवी चैनल खोल रहे हैं . उन्हें मालूम है, चैनल खोल देने के बाद उनके काले धंधों पर कोई सवाल नहीं उठाएगा. विशाल को प्रशांत का एक लेख याद आया…..

प्रशांत ने लिखा था कि पिछले दो दशकों में भारत का आद्योगिक विकास उसका अपराधिक विकास भी है. सारे संदिग्ध और दुस्साहसी किस्म के लोग नेताओं और अफसरों से गंठजोड़ कर, पुलिस और प्रशासन को साथ लेकर तरह-तरह के धंधों, ठेकों, सौदों में लगे हुए हैं और अमीर हुए जा रहे हैं. यह अमीरी अब पैसे से पैसा बना रही है. यही बदमाश लोग अब सिखा रहे हैं कि देश तरक्की कैसे करेगा, बीसवीं सदी की ताक़त कैसे बनेगा.

इनके यहाँ भव्य शादियाँ होती हैं. इनकी भव्य अट्टालिकाओं की चर्चा होती है, लेकिन इस बात की चर्चा नहीं होती कि ये लोग कितने सारे क़ानून तोड़ते हैं, कितने लोगों को रिश्वत देकर बे-ईमान बनाते हैं और मिलिनेयर बन जाते हैं…”

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”प्रशांत हलके से मुस्कुराए, ‘ तन्मय, इस देश का पूरा यथार्थ — माफ़ करना मैं एक पिटे हुए पत्रकार की तरह बोल रहा हूँ, तुम लोग जिसे डाउन मार्केट कहते हो — तो इस देश का पूरा यथार्थ इतना नाटकीय है कि उस पर विश्वास नहीं हो सकता….

…जो बहुत चमकती हुई दुनिया है, उसके पीछे एक बजबजाता हुआ संसार है. दोनों दुनियाओं का काम एक-दूसरे के बिना नहीं चलता. और दोनों दुनियाएं एक-दूसरे के अपराधों से परिचित रहती हैं, लेकिन खामोश रहती हैं– बल्कि कई बार एक-दूसरे की मददगार होती हैं…

…और तुमको तो पता ही नहीं चलेगा कि तुम किस दुनिया में हो, कि इस चमचमाती हुई दुनिया का एक साफ़-सुथरा किरदार दरअसल उस बजबजाती दुनिया को नियंत्रित करता है, बल्कि उसे वैसा ही बनाए रखता है…”

प्रभात रंजन, प्रियदर्शन और उदय प्रकाश की एफबी वॉल से.



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