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सुख-दुख

बीयर पीने के लिए छोड़ दी ट्रेन और बच गई जान!

Ashwini Kumar shrivastava-

किसी वजह से अचानक किसी स्टेशन पर ट्रेन से उतर गए, सीट बदल दी या डिब्बा बदल दिया अथवा देर होने के कारण ट्रेन नहीं पकड़ पाए। ऐसे कुछ किस्से उड़ीसा में हुए ट्रेन हादसे के बाद इस हादसे से चमत्कारिक रूप से बचे लोगों के पढ़ने को मिल रहे हैं। जब भी कोई हवाई दुर्घटना, भूकंप, आग, रेल या बस आदि के हादसे होते हैं, कुछ ऐसे लोगों के किस्से आते ही हैं।

साल 1998 में जब काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस दिल्ली से आते समय हरदोई के पास बरेली पैसेंजर पर पीछे से चढ़ गई थी तो उसमें सैकड़ों लोग मारे गए थे। काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस की दो बोगी ऐसी भी थीं, जो पूरी तरह तहस नहस हो गई थीं और उसमें शायद ही कोई बच पाया होगा। उन दो बोगियों में से एक में मैं खुद नई दिल्ली स्टेशन पर बैठकर रेंगती हुई ट्रेन से उतर गया था।
तब मैं बचपन के अपने एक मित्र बॉबी के साथ दिल्ली गया था क्योंकि उसी साल इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से मैं स्नातक हो गया था और इलाहाबाद में कर रहे एप्टेक के कम्प्यूटर कोर्स को दिल्ली एप्टेक की किसी ब्रांच में ट्रांसफर करवाने की प्रक्रिया पूरी करने के लिए मैं पहली बार तब दिल्ली गया था।

इलाहाबाद से लखनऊ आकर मैंने अपने मित्र बॉबी को अपने साथ चलने के लिए तैयार। वह बहुत मुश्किल से तैयार हुआ क्योंकि वह हर रोज घंटों कर्मकांड से पूजा करता था और दिल्ली जाने – आने में उसकी पूजा में विघ्न आ रहा था। मैंने उससे कहा कि रात में चलेंगे, सुबह कहीं होटल में किसी तरह थोड़ी बहुत पूजा कर लेना और कुछ घंटे में काम निपटा कर काशी विश्वनाथ से वापसी कर लेंगे।

प्लान बिल्कुल उसी तरह पूरा भी हुआ और सुबह नौ बजे से दस बजे तक एप्टेक में काम निपटा कर हम दोनों सुबह 11 बजे ही आकर S2 बोगी में बैठ गए। मैं तब बीयर पीने का बहुत शौकीन था इसलिए मेरा मन अचानक यह करने लगा कि दिल्ली पहली बार आए हैं तो यहां के किसी फेमस बार में बैठकर एक दो बियर पी ली जाए।

अपनी इस इच्छा को पूरी करने के लिए मैंने अपने मित्र को दिल्ली घूमने के लिए प्रेरित करना शुरू कर दिया यह कहकर कि पहली बार आए हैं पास में कनॉट प्लेस है, वहीं थोड़ी देर घूम लेते हैं। मित्र का कहना था कि शाम या रात वाली कोई ट्रेन पकड़ी तो तड़के होने वाली उसकी पूजा दूसरे दिन भी छूट जाएगी।

मैंने जिद पकड़ ली और रेंगती हुई ट्रेन से बिना उसकी सहमति का इंतजार किए उतर गया तो बेमन से वह दोस्त भी ट्रेन से उतर आया। दिलचस्प बात यह थी कि वह शराब, सिगरेट आदि नहीं पीता था इसलिए जैसे ही कनॉट प्लेस में स्थित नरूला बार में घुसा उसका मूड ऑफ हो गया। खैर, पियक्कड़ों का कहां किसी की परवाह होती है इसलिए मैंने तो खूब एंजॉय किया और शाम की ट्रेन ही पकड़ी।

उसके बाद रात में ट्रेन अचानक रुक गई तो रेडियो पर सुनकर लोगों ने बताया कि हरदोई के पास काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस हादसे का शिकार हो गई है। बाद में जैसे- जैसे डिटेल आई हम दोनों ईश्वर का धन्यवाद करने लगे।

तड़के वाली उसकी पूजा मिस जरूर हुई लेकिन आगे पूजा करने का अवसर उसे ईश्वर ने दे दिया।

ट्रेन में बैठकर अचानक मेरे दिल में दिल्ली के किसी बार में बियर पीने का जो ख्याल आया, वह ईश्वर का चमत्कार ही था। वरना अमूमन शाम को ही बियर पीने का सिलसिला उस दौर में होता था। उस बोगी में बैठे तमाम अन्य लोग मौत की तरफ जा रहे थे और हमें ईश्वर ने उस ट्रेन में बैठने के बाद उतार दिया तो यह चमत्कार ही था।

लोग कहते हैं कि दिल की आवाज कभी अनसुनी नहीं करनी चाहिए क्योंकि उसमें ईश्वर का संदेश होता है। इस घटना से मुझे तो ऐसा ही लगा।

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