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उन्होंने पेड़ काट डाले और तूफान ने उन्हें नष्ट कर डाला!

Amarendra Kishore : आज से पचास वर्ष बाद क्या स्थिति होगी? ”कोलैप्स : हाउ सोसाइटीज चूज़ टू फेल और सक्सीड’ नामक किताब के लेखक है जार्ड डायमंड। बिगड़ते पर्यावरण, सरकार की कॉर्पोरेट के प्रति नरम रवैया और व्यापारिक हितों को ध्यान में रखकर बनायी जाने वाली सरकारी नीतियों पर केंद्रित यह किताब भारत के आदिवासी इलाकों के हालात से प्रभवित होकर लिखी गयी लगती है। जिक्र है कि एक ईस्टर आइलैंड है जो प्रशांत महासागर में है– यहां काफी बड़े-बड़े पेड़ों को वहां रहने वाले लोग अपने रिवाज कि लिए काटा करते थे, जबकि उन्हें मालूम था कि तेज समुद्री हवाओं से ये बड़े पेड़ उन्हें बचाते हैं, लेकिन फिर भी उन्होंने एक-एक करके पेड़ों को काट डाला। अंत में समुद्री तूफान से वह आइलैंड नष्ट हो गया। कमोबेश आदिवासी भारत में भी यही स्थिति बनती जा रही है.

Amarendra Kishore : आज से पचास वर्ष बाद क्या स्थिति होगी? ”कोलैप्स : हाउ सोसाइटीज चूज़ टू फेल और सक्सीड’ नामक किताब के लेखक है जार्ड डायमंड। बिगड़ते पर्यावरण, सरकार की कॉर्पोरेट के प्रति नरम रवैया और व्यापारिक हितों को ध्यान में रखकर बनायी जाने वाली सरकारी नीतियों पर केंद्रित यह किताब भारत के आदिवासी इलाकों के हालात से प्रभवित होकर लिखी गयी लगती है। जिक्र है कि एक ईस्टर आइलैंड है जो प्रशांत महासागर में है– यहां काफी बड़े-बड़े पेड़ों को वहां रहने वाले लोग अपने रिवाज कि लिए काटा करते थे, जबकि उन्हें मालूम था कि तेज समुद्री हवाओं से ये बड़े पेड़ उन्हें बचाते हैं, लेकिन फिर भी उन्होंने एक-एक करके पेड़ों को काट डाला। अंत में समुद्री तूफान से वह आइलैंड नष्ट हो गया। कमोबेश आदिवासी भारत में भी यही स्थिति बनती जा रही है.

सरकार शॉर्ट टर्म फायदा के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों को माइनिंग करने की इजाजत दे रही है और ये कंपनियां अंधाधुंध प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रही हैं, जिसका कुप्रभाव हमें कुछ वर्षों के बाद दिखायी देगा। हालाँकि ‘बुलडोजर और महुआ के फूल’ किताब का मूल विषय भी यही है। हॉवर्ड विश्वविद्यालय से स्नाकोत्तर और पुलित्ज़र अवार्ड से सम्मानित जार्ड डायमंड यह सवाल उठाते हुए कहते हैं कि मानव और जानवर में यही अंतर है कि जानवर भविष्य नहीं देखते हैं और मानव भविष्य के बारे में सोचते हैं। लेकिन यहां समस्या यह है कि सरकार ज्यादा लंबा भविष्य न देखकर कम समय का भविष्य देख रही है। यह सही है कि आज इन्हें बहुराष्ट्रीय कंपनियां माइनिंग के बदले काफी धन दे रही हैं, लेकिन आज से पचास वर्ष बाद क्या स्थिति होगी? 592 पृष्ठ की यह किताब बेहद रोचक है।

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नौकरशाही में बैठे बहुत कम लोग ही अपनी साफगोई केलिए जाने जाते हैं, अन्यथा गोलमटोल जवाब देकर निकला सबको आता है। जल-संसाधन मंत्रालय के सचिव श्री शशिशेखर ने माना कि नदियों की सेहत बचाने और उनके अस्तित्व की हिफाजत करने में सरकार असफल रही है। तमिलनाडु कैडर के श्री शशिशेखर १९८१ बैच के आईएस अधिकारी अपने साफ़-सपाट बयान और प्रतिबद्ध कार्यशैली केलिए जाने जाते हैं। ऐसे में संस्कृति के साथ नदियों का नाता जोड़कर उनकी हिफ़ाजत का परचम लहराने में व्यस्त मौजूदा केंद्र सरकार के सामने शशिशेखर का यह बयान कई सारे प्रश्न खड़े करता है।

हिंदुस्तान टाइम्स और राष्ट्रीय सहारा समेत कई अखबारों-मैग्जीनों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके आईआईएमसी से शिक्षित-प्रशिक्षित पत्रकार अमरेंद्र किशोर की एफबी वॉल से.

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