पत्रकारिता फील्ड में आने वालों, इस किताब को पढ़ लो… फिर न कहना- ‘ये कहां फंस गए हम!’

पत्रकारिता की दुनिया को ‘संजय’ की नजर से देखने-समझने के लिए ‘पत्रकारिता – जो मैंने देखा, जाना, समझा’ को पढें…

वरिष्ठ पत्रकार और उद्यमी संजय कुमार सिंह की पुस्तक “पत्रकारिता – जो मैंने देखा, जाना, समझा“ उन तमाम लोगों के लिए आंख खोलने वाली है, जो आज भी पत्रकारों में बाबूराव विष्णु पड़ारकर या गणेश शंकर विद्यार्थी देखते हैं और जो ग्लैमर से प्रभावित होकर पत्रकारिता को पेशा बनाना चाहते हैं। यह सच है कि चीजें जैसी दिखाई पड़ती हैं, उनको वैसी ही वही मान ले सकता है जिसके पास अंतर्दृष्टि नहीं होगी। पर जिसके पास अंतर्दृष्टि है वह चीजों को उसके अंतिम छोर तक देखता है। चीजें जैसी दिखती हैं, वह उसे उसी रूप में कदापि स्वीकार नहीं करता। चिंतन-मनन करता है और अपनी अंतर्दृष्टि से सत्य की तलाश करता है।

(पुस्तक लेखक संजय कुमार सिंह. उपर है संजय की किताब का कवर पेज)


इस पुस्तक के लेखक ने भी अपनी इसी अंतर्दृष्टि से तस्वीर के दूसरे पहलू को सामने लाने का प्रयास किया है और मैं कह सकता हूं कि लेखक इसमें कामयाब है। वह इस पुस्तक के माध्यम से अपने तीन दशकों से ज्यादा के पत्रकारीय अनुभवों के आधार पर नई पीढ़ी के पत्रकारों या पत्रकारिता को पेशा बनाने की इच्छा रखने वाले युवाओं को इस पेशे की हकीकत से रू-ब-रू कराकर यह समझाने में सफल हैं कि करियर के लिहाज से यह पेशा कैसे ठीक नहीं है।

अस्सी के दशक में हिंदी पत्रकारिता को नया आयाम देने वाले “जनसत्ता” के संपादक प्रभाष जोशी ने इस पुस्तक के लेखक संजय कुमार सिंह के साथ हुई एक घटना का हवाला देते हुए संपादकीय लिखा था – “तेजाब से बची आंखें।”…और कहा था कि ये आंखें राह दिखाएंगी। उनकी यह टिप्पणी भले किसी और संदर्भ में थी। पर मैं आज देख रहा हूं कि संजय कुमार सिंह की अंतर्दृष्टि वाकई नई पीढ़ी को राह दिखा रही है।

यह आदर्श स्थिति है कि पत्रकारिता ऐसी हो जो मनुष्य के पूरे व्यक्तित्व का पोषण करे। यानी उसके शरीर, मन और आत्मा को पुष्ट करे। दूसरे शब्दों में पत्रकारिता ऐसी हो जो बेहतर मनुष्यता को निर्मित करने में संलग्न हो, सिर्फ घटनाओं के वृतांत इकट्ठे न करे। पर यह पुस्तक इस सत्य से बखूबी पर्दा हटाती है कि बदलते परिवेश में पत्रकारिता जैसी वीभत्स दिखती है, उससे भी गई-बीती है। पत्रकारों को इस स्थिति में ला खड़ा किया गया है कि उसे कुछ नकारात्मक नहीं मिलता है तो वह उसे पैदा करने की कोशिश में रहता है। कह सकते हैं कि उनके सामने हर प्रकार के झूठ निर्मित करने की मजबूरी है।

मुझे उम्मीद है कि यह पुस्तक पत्रकारिता के बाहरी स्वरूप को देखकर उसे अपना कैरियर बनाने का सपना देखने वाले युवाओं को नई दृष्टि प्रदान करेगी। इसके बावजूद जो युवा पत्रकारिता को पेशा बनाएंगे तो उन्हें इस बात का मलाल नहीं होगा कि क्या सोचा था और क्या हो गया। अच्छी बात है कि यह पुस्तक Amazon पर भी उपलब्ध है। सुविधा के लिए उसका लिंक नीचे दिया जा रहा है। लेकिन उसके पहले, description पर इस किताब के बारे में जो description दिया गया है, उसे पढ़ें…

‘स्वतंत्रता मिलने के बाद देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित हुई। प्रकारांतर में अखबारों की भूमिका लोकतंत्र के प्रहरी की हो गई और इसे कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका के बाद लोकतंत्र का ‘चौथा स्तंभ’ कहा जाने लगा। कालांतर में ऐसी स्थितियाँ बनीं कि खोजी खबरें अब होती नहीं हैं; मालिकान सिर्फ पैसे कमा रहे हैं। पत्रकारिता के उसूलों-सिद्धांतों का पालन अब कोई जरूरी नहीं रहा। फिर भी नए संस्करण निकल रहे हैं और इन सारी स्थितियों में कुल मिलाकर मीडिया की नौकरी में जोखिम कम हो गया है और यह एक प्रोफेशन यानी पेशा बन गया है। और शायद इसीलिए पत्रकारिता की पढ़ाई की लोकप्रियता बढ़ रही है, जबकि पहले माना जाता था कि यह सब सिखाया नहीं जा सकता है। अब जब छात्र भारी फीस चुकाकर इस पेशे को अपना रहे हैं तो उनकी अपेक्षा और उनका आउटपुट कुछ और होगा। दूसरी ओर मीडिया संस्थान पेशेवर होने की बजाय विज्ञापनों और खबरों के घोषित-अघोषित घाल-मेल में लगे हैं। ऐसे में इस पुस्तक का उद्देश्य पाठकों को यह बताना है कि कैसे यह पेशा तो है, पर अच्छा कॅरियर नहीं है और तमाम लोग आजीवन बगैर पूर्णकालिक नौकरी के खबरें भेजने का काम करते हैं और जिन संस्थानों के लिए काम करते हैं, वह उनसे लिखवाकर ले लेता है कि खबरें भेजना उनका व्यवसाय नहीं है।

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लेखक किशोर कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क +919811147422 या kk2801@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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आज के समय में व्यंग्य लिखना जोख़िम भरा काम है और मुकेश कुमार ने ये दुस्साहस किया है : उदय प्रकाश

नई दिल्ली। कोई भी सर्व सत्तावादी जिस चीज़ से सबसे ज़्यादा डरता है वह है व्यंग्य। वह व्यंग्य को बर्दाश्त नहीं कर पाता यहां तक कि कार्टून को बर्दाश्त नहीं कर पाता। ऐसे में व्यंग्य लिखना भारी जोखिम का काम है और वह मुकेश कुमार ने किया है। ये उनका दुस्साहस है कि उन्होंने फेक एनकाउंटर लिखा। ये विचार जाने-माने कथाकार एवं कवि उदयप्रकाश ने डॉ. मुकेश कुमार की किताब फेक एनकाउंटर के लोकार्पण के अवसर पर कही। शिवना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का ​लोकार्पण दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के सभागार में हुआ।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे उदयप्रकाश ने कहा, “ मैंने इस किताब को पढ़ा है और मैं ये कह सकता हूँ कि ये एक ऐसी किताब है जिसे शुरू करने के बाद रखना मुश्किल हो जाता है। मुकेश कुमार ने कभी भी  सामाजिक सरोकारों को छोड़ा नहीं और वह प्रतिबद्धता फ़ेक एनकाउंटर में भी देखी जा सकती है।“

उदयप्रकाश ने किताब की खूबियों पर रोशनी डालते हुए कहा कि सभी फ़ेक एनकाउंटर बहुत चित्रात्मक हैं, विजुअल हैं और  इसका नाट्य रूपांतर करके कोई टेलीविज़न शो किया जाए तो वह चैनलों पर चलने वाले कई व्यंग्यात्मक कार्यक्रमों से बेहतर होगा, वह अद्भुत होगा और  उसे बनाया जाना चाहिए।

इससे पहले कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ओम थानवी ने मौजूदा समय की चुनौतियों, बढ़ती असहिष्णुता सत्ताधारियों के चरित्र का ज़िक्र करते हुए कहा कि मुकेश जी के सौम्य व्यक्तित्व की झलक इस किताब की भाषा और उनके कहने के अंदाज़ में भी है। शोर-शराबे के इस दौर में मुकेश ऐसा कर रहे हैं ये अच्छी बात है। उन्होंने कहा कि फ़ेक एनकांउटर में काल्पनिक इंटरव्यू के ज़रिए उन्होंने मौजूदा दौर का खाक़ा खींचा है और कहना होगा कि उनकी रेंज बहुत बड़ी है। उन्होंने ओबामा से लेकर मोदी तक सबके साथ एनकाउंटर किया है और साथ ही साथ पत्रकारों की स्थिति को भी उजागर किया है। थानवी ने कहा कि ये बहुत ख़तरनाक़ दौर है और इस किताब के बहाने उस दौर की भी चर्चा की जानी चाहिए, उसे भी जाँचा-परखा जाना चाहिए।

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता की हैसियत से हिस्सा ले रहे वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक प्रियदर्शन ने कहा कि वे फ़ेक एनकाउंटर लगातार पढ़ते रहे हैं और उसे एक किताब के रूप में पढ़ना उनके लिए एक नया अनुभव था। उन्होंने कहा कि किताब में संकलित फर्ज़ी एनकाउंटर झूठ को बेनकाब करते हैं। मुकेश जी ने व्यंग्य के शिल्प को बहुत करीने से साधा है और वह पारंपरिक शिल्प नहीं है। हम लोग व्यंग्य की जिस परंपरा की बात करते हैं ये उनसे हटकर हैं। वे पत्रकारिता के भीतर इंटरव्यू के मार्फ़त उन स्थितियों को ऐसे रख देते हैं जो अपने ढंग से विडंबनामूलक हैं और हम उन्हें व्यंग्य की तरह पढ़ने लगते हैं। मुझे अंदेशा था कि कहीं पूरी की पूरी किताब उसी वैचारिक लाइन पर न हो जिसके लिए लेखकों को बदनाम कर दिया गया है। मैंने पाया कि ये शिथिलता बिल्कुल भी नहीं है और इसमें सारे पक्ष आ गए हैं। ये शिकायत कोई नहीं कर सकता कि ये किताब किसी एक विचारधारा की ओर झुकी हुई है।

किताब के लेखक डॉ. मुकेश कुमार ने कहा कि हम एक फ़ेक समय में रह रहे हैं। इस समय मे सब कुछ फ़ेक है। मीडिया तो फ़ेक है ही, फ़ेक राष्ट्रवाद है, फ़ेक दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक प्रेम है। उन्होंने कहा कि नेता राजनीति फ़ेक है और इस वजह से लोकतंत्र भी फ़ेक लगने लगा है। इस फ़ेक को काटने के लिए उन्होंने इन फर्जी एनकाउंटर का सहारा लिया और उन्हें खुशी है कि इन्हें देश भर में खूब पढ़ा और सराहा गया।

सुपरिचित कवयित्री एवं शिवना प्रकाशन की निदेशक पारुल सिंह ने किताब का परिचय देते हुए कहा कि फेक एनकाउंटर अनूठा व्यंग्य संग्रह है और व्यंग्य पत्रकारिता की पहली पुस्तक है। ये व्यंग्य संग्रह पहले बनाए गए दायरों को तोड़कर आगे निकल जाता है। मुकेश कुमार ने बहुत सारे नए प्रयोग किए हैं और इसलिए भी साहित्य एवं पत्रकारिता जगत में इसकी चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने मुकेश कुमार इसके लिए आभार व्यक्त किया कि उन्होंने ये व्यंग्य संग्रह प्रकाशन के लिए शिवना प्रकाशन को दिया।

लोकार्पण समारोह की एक बड़ी विशेषता जानी मानी टीवी ऐंकर आरफ़ा ख़ानम शेरवानी का संचालन रहा। अपने टीवी कार्यक्रमों की ही तरहअपने सधे हुए संचालन के ज़रिए उन्होंने किताब को मौजूदा संदर्भों, समस्याओं और विवादों से जोड़ते हुए बातचीत को सार्थक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उन्होंने किताब के कुछ अंश पढ़े और अपनी तीखी एवं चुटीली टिप्पणियों से मीडिया के चरित्र को उजागर किया भी किया।

आरफ़ा ने मुकेश कुमार की ऐंकरिंग की चर्चा करते हुए कहा कि मैं उन्हें बतौर ऐंकर अच्छे से जानती है वह आतंकित कर देने वाली ऐंकरिंग के विपरीत सौम्यता लिए हुए है। यही बात उनकी इस किताब में दिखती है। उन्होंने किताब के कुछ अंशों का पाठ भी किया। कार्यक्रम में साहित्य एवं पत्रकारिता के अलावा अन्य क्षेत्रों के सौ से अधिक लोग उपस्थित थे।

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वरिष्ठ पत्रकार संजय सिंह की किताब ‘राजरंग’ का गोरखपुर में विमोचन 24 सितंबर को

सहारा मीडिया के लिए दिल्ली में लंबे समय से वरिष्ठ पद पर तैनात और प्रेस क्लब आफ इंडिया के कई वर्षों से निदेशक संजय सिंह की नई किताब ‘राज-रंग’ का आगमन हो गया है. इसका विधिवत विमोचन उनके गृह जनपद गोरखपुर में होगा. इसके लिए 24 सितंबर की तारीख तय की गई है. समारोह अपराह्न तीन बजे से गोरखपुर क्लब के सभागार में होगा. इस आयोजन के मुख्य अतिथि हैं साहित्य अकादमी नई दिल्ली के अध्यक्ष विश्वनाथ त्रिपाठी.

कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे प्रो. रामदेव शुक्ल. मुख्य वक्ता जाने-माने साहित्यकार और आलोचक डा. ज्योतिष जोशी होंगे. संचालन की जिम्मेदारी निभाएंगे आकाशवाणी के उद्घोषक सर्वेश दुबे. इस आयोजन की जिम्मेदारी ली है गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब ने. ‘राज-रंग’ किताब के बारे में इसके लेखक संजय सिंह ने बताया कि राजनेताओं से अंतरंग बातचीत पर आधारित इस पुस्तक में ढेर सारे इंटरव्यूज है जो आज के हालात में काफी प्रासंगिक हैं.

किताब का प्रकाशन दिल्ली के लोकमित्र प्रकाशन ने किया है. इस किताब के कई अन्य पार्ट भी भविष्य में आएंगे. साथ ही किताब का विमोचन दिल्ली में भी जल्द किया जाएगा. गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब के अध्यक्ष मार्कंडेय मणि त्रिपाठी ने सभी मीडियाकर्मियों, लेखकों, प्रकाशकों, सुधी पाठकों, नागरिकों से आयोजन में शिरकत कर इसे सफल बनाने की अपील की.

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प्रियंका की किताब का खुलासा, बाबा रामदेव इन तीन हत्याओं के कारण बन पाए टाइकून!

Surya Pratap Singh :  एक बाबा के ‘फ़र्श से अर्श’ तक की कहानी के पीछे तीन हत्याओं / मौत के हादसे क्या कहते हैं? अमेरिका में पढ़ी-लिखी प्रसिद्ध लेखिका प्रियंका पाठक-नारायण ने आज देश के प्रसिद्ध योगगुरु व अत्यंत प्रभावशाली व्यक्ति, बाबा रामदेव की साइकिल से चवनप्रास बेचने से आज के एक व्यावसायिक योगगुरु बनने तक की कथा अपनी किताब में Crisp facts / प्रमाणों सहित लिखी है। इस पुस्तक में बाबा की आलोचना ही नहीं लिखी अपितु सभी उपलब्धियों के पहलुओं को भी Investigative Biography के रूप में लिखा है।

इस पुस्तक में सभी तथ्य बड़े सशक्त ढंग से लिखे है , कुछ भी ऐसा नहीं लगता जिसे बकवास कहकर दरकिनार कर दिया जाए, प्रथम धृष्टता ऐसा भी नहीं लगता कि यह किसी मल्टीनैशनल द्वारा प्रायोजित किताब है। वैसे बाबा रामदेव ने कोर्ट के injunction order से प्रकाशक को यह स्थगन दिलवाया हुआ है कि अब इस पुस्तक की कोई नई कॉपी न छापी जाए। ज़रूरी नहीं कि इस पुस्तक में सभी बातों पर विश्वास किया जाए, लेकिन सार्वजनिक जीवन में बाबा रामदेव का क़द बहुत बड़ा है और राजनीतिक/ सामाजिक रसूक़ भी बहुत बड़ा है, अतः जनमानस को उनके बारे में जानने की उत्सुकता होना स्वाभाविक है। प्रियंका पाठक नारायण की किताब का नाम है- “Godman to Tycoon : The Untold Story of Baba Ramdev”

इस किताब में तीन हत्याओँ/ मौतों का विस्तार से परिस्थितियों व शंकाओं का प्रमाण सहित ज़िक्र किया है:

१- बाबा रामदेव के ७७ वर्षीय गुरु शंकरदेव का ग़ायब होने से पूर्व बाबा रामदेव का एक माह तक विदेश में चले जाना। दिव्य योगपीठ ट्रस्ट की सभी सम्पत्ति शंकरदेव के नाम थी, जी अब बाबा रामदेव के पास है। (CBI की जाँच अत्यंत मद्धम गति से जारी है)

२- बाबा रामदेव को आयुर्वेद दवाओं का लाइसेंस देने वाले स्वामी योगानंद की वर्ष २००५ में रहस्मयी हत्या।

३- बाबा रामदेव के स्वदेशी आंदोलन के पथ प्रदर्शक राजीव दीक्षित की वर्ष २०१० में संदिग्ध मौत।

मैं इस किताब का प्रचार नहीं कर रहा… लेकिन इसको पढ़कर आपको कुछ शंकाओं का निराकरण तो अवश्य होगा कि कैसे योग ने राम कृष्ण यादव को बना दिया बाबा रामदेव… धर्म के नाम पर तेज़ी बढ़े बाबा के व्यापार पर ED/IMCOME TAX की भी नज़र है।

गुरु शंकरदेव की रहस्यमयी गुमशुदी के साथ-अन्य दो हत्याओं/मौतों को भी CBI के दायरे में लाना उपयुक्त होगा ….. राम रहीम पर आए कोर्ट के निर्णय से आम लोगों को अन्य ढोंगी बाबाओं पर भी सिकंजा कसने का विश्वास जगा है। CBI को उक्त जाँच में भी शीघ्रता कर दूध का दूध व पानी का पानी अवश्य करना चाहिए … वैसे उ.प्र. मी भी नॉएडा/यमुना इक्स्प्रेस्वे में बाबा को 455 एकड़ भूमि अखिलेश यादव ने दी थी, उसकी जाँच भी ज़रूरी है।

नोट: कुछ लोगों ने मुझे फ़ोन कर यह आगाह किया है / चेतावनी दी है कि बाबा रामदेव के बारे में और न लिखें, क्यों कि इनके पास धनबल के साथ अन्य सभी बल हैं। सभी बड़ी मीडिया कम्पनीओँ को इतने विज्ञापन/ धन बाबा रामदेव से मिलते हैं कि कोई उनके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं करता।

यूपी के चर्चित आईएएस अधिकारी रहे सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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चर्चित युवा कवि डॉ. अजीत का पहला संग्रह ‘तुम उदास करते हो कवि’ छप कर आया, जरूर पढ़ें

डॉ. अजीत तोमर

किसी भी लिखने वाले के लिए सबसे मुश्किल होता है अपनी किसी चीज़ के बारे में लिखना क्योंकि एक समय के बाद लिखी हुई चीज़ अपनी नहीं रह जाती है. वह पाठकों के जीवन और स्मृतियों का हिस्सा बन जाती है. जिस दुनिया से मैं आता हूँ वहां कला, कल्पना और कविता की गुंजाईश हमेशा से थोड़ी कम रही है. मगर अस्तित्व का अपना एक विचित्र नियोजन होता है और जब आप खुद उस पर भरोसा करने लगते हैं तो वो आपको अक्सर चमत्कृत करता है. औपचारिक रूप से अपने जीवन के एक ऐसे ही चमत्कार को आज आपके साथ सांझा कर रहा हूँ.

कविता लिखना मेरे लिए खुद से बातचीत करने का एक सलीका भरा रहा है मगर कभी सोचा नहीं था कि मैं कविता लिखते-लिखते इतनी दूर अकेला चला आऊँगा कि मेरी परछाई भी दुनिया भर के कवियों के अस्तित्व की एक लिपि के जैसी नजर आने लगेगी. सच कहूं तो थोड़ा डरा हुआ हूँ क्योंकि जब आप अपने लिखे हुए का एक दस्तावेजीकरण करते है तो साथ में एक उम्मीद और एक जिम्मेदारी का भी दस्तावेजीकरण करते हैं. मेरे दोस्त ही मेरे पाठक हैं और मेरे पाठक ही मेरे दोस्त हैं. मैं इसे 21 वीं सदी के किसी सफल बिजनेस मॉडल के रूप में नहीं देखता हूँ. मैं इसे उम्मीद और सहभागिता के स्नेह और आशा के एक जीवंत मॉडल के रूप में देखता हूँ.

यह दोस्तों के भरोसे और सतत आग्रह का ही परिणाम है कि मेरा कविताओं का पहला संकलन ‘तुम उदास करते हो कवि’ प्रकाशित होकर बाज़ार में आ गया है. ये बाज़ार शब्द अपने आप में बेहद डराता भी है क्योंकि यहाँ सफलता का आकलन बिक्री से भी होता है मगर मेरे लिए सफलता का आकलन आपके प्रेम से है. मैं चाहता हूँ कि मेरे जैसे लोग कविता लिखते रहें और वो पाठकों तक पहुँचती रहे.  इसके लिए जरूरी है प्रकाशक का कविता में निवेश का भरोसा कायम रहे और मेरे जैसे लोग अपनी बेहतर कोशिशें आप तक पहुंचाते रहें.

मुझे उम्मीद ही नहीं पूरा भरोसा है कि हम मिल-जुलकर इस जिम्मेदारी को उसके मुकाम तक जरुर लेकर जाएंगे. ‘तुम उदास करते हो कवि’ किताब अगर आपके पास रहेगी तो आप उदासी में मुस्कुरा सकेंगे बतौर कवि बस मैं इतनी ही प्रत्याभूति दे सकता हूँ. नीचे अमेजन का लिंक दे रहा हूँ यहाँ से आप किताब ऑर्डर करके मंगा सकते है. चूंकि सभी दोस्त जानते है कि फेसबुक पर मेरा लिखा हुआ ‘ओनली फॉर फ्रेंड्स’ रहता है इसलिए किताब की बात को अब आगे पहुंचाना अब आपके जिम्मे छोड़ता हूँ. आपके जरिए अधिकतम लोगों तक मेरी कविताएँ पहुंचे, ये एक छोटी सी आशा मेरी भी है.

अमेजन का लिंक: https://www.amazon.in/Tum-Udas-Karte-Ho-Kavi

फ्लिपकार्ट का लिंक: https://www.flipkart.com/tum-udas-karte-ho-kavi

सस्नेह

डॉ. अजित तोमर

https://www.facebook.com/nomadicajeet


पिता पर लिखी गई डा. अजीत तोमर की चार कविताएं पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें :

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अनिल यादव की किताब ‘यह भी कोई देस है महराज’ का अंग्रेजी संस्करण छपा

Dinesh Shrinet : “पुरानी दिल्ली के भयानक गंदगी, बदबू और भीड़ से भरे प्लेटफार्म नंबर नौ पर खड़ी मटमैली ब्रह्मपुत्र मेल को देखकर एकबारगी लगा कि यह ट्रेन एक जमाने से इसी तरह खड़ी है। अब यह कभी नहीं चलेगी। अंधेरे डिब्बों की टूटी खिड़कियों पर पर उल्टी से बनी धारियां झिलमिला रही थीं जो सूखकर पपड़ी हो गई थीं। रेलवे ट्रैक पर नेवले और बिल्ली के बीच के आकार के चूहे बेख़ौफ घूम रहे थे। 29 नवंबर, 2000 की उस रात भी शरीर के खुले हिस्से मच्छरों के डंक से चुनचुना रहे थे। इस ट्रेन को देखकर सहज निष्कर्ष चला आता था – चुंकि वह देश के सबसे रहस्यमय और उपेक्षित हिस्से की ओर जा रही थी इसलिए अंधेरे में उदास खड़ी थी।”

जब मैंने लखनऊ से निकलने वाली किसी छोटी सी पत्रिका में संभवतः उसके संपादक के अनुरोध पर लिखे जा रहे अनिल यादव के यात्रा संस्मरण की ये शुरुआती पंक्तियां पढ़ीं तो हतप्रभ सा हो गया। ऐसी तटस्थ मगर भीतर तक बेध जाने वाली भाषा, ऐसा गद्य हिन्दी में दुर्लभ था। यह 2007 की बात रही होगी। उन दिनों मैं लखनऊ में ही था। मैंने पढ़कर जब अनिल को फोन किया तो उन्होंने चिरपरिचित अलसाये अंदाज में पूछा- क्या तुम्हें वो अच्छा लगा? मैं कहा- हां, और ये तो यात्रा संस्मरण की पूरी एक किताब बन सकती है! यह सुझाव देने की वजह यह थी कि मैंने उनके और अनेहस शाश्वत की नार्थ ईस्ट की यायावरी के किस्से सुन रखे थे। दरअसल, लखनऊ में मेरे आने के पांच-छह साल पहले वे मेरे मित्र न थे न ही लेखक अऩिल यादव थे। वे अमर उजाला में मुझसे सीनियर थे। वे लखनऊ ब्यूरो में रहे लंबे समय तक। उनकी शार्प आब्जर्वेशन और तटस्थ मगर परतदार भाषा वाली रिपोर्ट्स अक्सर पहले पेज का एंकर बनती थीं। इनमें से ज्यादातर रिपोर्ट्स न सिर्फ पत्रकारिता के लिए बल्कि हमारी हिन्दी के लिए भी लाजवाब उदाहरण हैं, मगर अधिकतर को अनिल अपनी बेपरवाही के चलते गुम कर चुके हैं।

कुछ रिपोर्ट्स आज भी याद हैं। ‘भागवत के मौत के दिन की राजधानी’- जिसमें अनशन पर बैठे एक किसान की मौत के दिन का ब्योरा है। ‘कंपनी बाग में देसी फूल’- जिसमेंं छोटे शहरों से इलाहाबाद आए युवाओं की बेचैन करने वाली तस्वीर है (जिसे बाद में मैंने इग्नू के पाठ्यक्रम में बतौर कोर्स कोआर्टिनेटर काम करने के दौरान शामिल कर लिया)। या फिर सड़क किनारे पसीने में डूबे जल्दी-जल्दी कुछ खाकर अपना टारगेट पूरा करने निकल पड़ने वाले युवा सेल्स रिप्रेंजेंटेटिव्स की रिपोर्ट। अनिल ने धीरे-धीरे एक ऐसी भाषा को साधा जो हिन्दी का स्वभाव तो है मगर हिन्दी के लेखकों का नहीं। एक ऐसी निर्मम तटस्थता जिसमें अभिव्यंजना है और भाषा की कई लेयर्स हैं और उससे बढ़कर वह निगाह, जो अपने आसपास के यथार्थ उस तरह देख पाती है, जिस तरह हम कभी नहीं देख पाते। निःसंदेह उनका लेखन हमारी दृष्टि-संपन्नता को बढ़ाता है। अनुराग कश्यप अपनी समग्रता में मुझे पसंद नहीं आते मगर उनके काम के सर्वश्रेष्ठ हिस्से मुझे अऩिल के लेखन की याद दिला देते हैं।

तो अनिल का यात्रा संस्मरण बमुश्किल दो-तीन अंकों में छपा। उसके बाद या तो पत्रिका ही बंद हो गई या अनिल ने अपनी उकताहट में लिखना छोड़ दिया। तब तक मैं और अनिल सहज रूप से मित्र हो चुके थे। मेरी अब तक प्रकाशित दो कहानियों का स्वरूप तय करने में उनसे हुई लंबी बातचीत का बड़ा योगदान रहा है। मैं बैंगलोर और कानपुर से उन्हें नार्थ ईस्ट का यात्रा वृतांत पूरा करने के लिए खटखटाता रहा है। मेरे अलावा बहुत से लोग रहे होंगे जिन्हो्ंने अनिल को प्रेरित किया होगा, और उसी का नतीजा था जब 2012 में ‘यह भी कोई देस है महराज’ सामने आया। मैंने यात्रा वृतांत बहुत कम पढ़े हैं, बिना अतिशियोक्ति के यह कहना चाहूंगा कि ‘चीड़ों पर चांदनी’ के बाद यह दूसरा यात्रा संस्मरण है जो आपको पहले वाक्य से ग्रिप में ले लेता है। इसका कुछ कुछ अंदाजा तो शुरुआती पंक्तियों को पढ़कर ही लग गया होगा।

बहरहाल; स्पीकिंग टाइगर बुक्स से इसका अंग्रेजी संस्करण ‘Is That Even a Country, Sir!’ के नाम से आ गया है। यह एक उम्मीद जताता है कि हिन्दी में परिश्रम, शोध और जिद से भरा एक ऐसा मौलिक लेखन संभव है जो उसे भाषाओं की सरहदों के पार ले जा सके। अनिल को बधाई। स्क्रॉल ने इसका एक अंश प्रकाशित किया है। उसका लिंक यूं है :

www.scroll.in/anilYadavBook

पत्रकार दिनेश श्रीनेत की एफबी वॉल से.

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दीपक द्विवेदी की किताब ‘इम्पावरिंग द मार्जिन्लाइज्ड’ का उपराष्ट्रपति ने किया विमोचन

नई दिल्ली। दैनिक भास्कर उत्तर प्रदेश के चीफ एडीटर एवं नागरिक फाउन्डेशन के फाउन्डर प्रेसीडेन्ट दीपक द्विवेदी की पुस्तक इम्पावरिंग द मार्जिन्लाइज्ड का विमोचन उपराष्ट्रपति डा. हामिद अंसारी के आवास पर आयोजित एक समारोह में किया गया श्री द्विवेदी द्वारा लिखित इस पुस्तक में यूनाईटेड नेशन्स् समेत कई राष्टीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संस्थानों द्वारा देश के ग्रामीण क्षे़त्रों को विकसित करने के लिए किये जा रहे विभिन्न प्रयासों को रेखांकित किया गया हैं।

उपराष्ट्रपति डा.हामिद अंसारी ने अपने आवास पर आयोजित समारोह में पुस्तक का विमोचन करते हुए कहा कि एक पत्रकार की दृष्टि से ग्रामीण क्षेत्रों को विकसित करने के लिए किये जा रहे प्रयासों के क्रियान्वयन के बारे में एक नई सोच का संदेश दिया गया है। जो कि भविष्य में इन संस्थाओं के लिए  कार्यक्रम क्रियान्वयन की दिशा में प्रभावी बनाने  में एक कारगर प्रयोग साबित हो सकता है। उन्होंने का कि काफी समय के बाद पत्रकारों द्वारा राष्टीय विकास के प्रति नजरिया बदलने एवं सक्रिय भूमिका निभाने की जो दिलचस्प पहल सामने आई है वह बहुत ही प्रशंसनीय  एवं सराहनीय है। उन्होने आश्वस्त किया कि इस पुस्तक का वह खण्ड़ सबसे महत्वपूर्ण दिखता है जिसमें स्थानीय पत्रकारों की भूमिका को अहम बताया गया है और उनका उपयोग राष्ट्र निर्माण की दिशा में वालन्टियर के रूप में किये जाने के लिए उठाया गया एक ठोस कदम है।

पुस्तक के परिचय आलेख के लेखक पदमश्री जे एस राजपूत ने पुस्तक को राष्ट्र के विकास में  अत्यन्त उपयोगी बताते हुए कहा कि राष्ट के विकास में यह पुस्तक मील का पत्थर साबित होगी। उन्होंने कहा कि पत्रकारों की भूमिका सिर्फ खबरों तक ही सीमित नही होनी चाहिए। उन्होंने पत्रकारों के रचनात्मक सहयोग और उनके व्यवहारिक स्वरूप पर भी प्रकाश डाला और श्री द्विवेदी की मेहनत और उनकी सोंच की भी सराहना की।

इस मौके पर पुस्तक के लेखक वरिष्ठ पत्रकार दीपक द्विवेदी ने कहा कि निकट भविष्य में स्थानीय एवं जिला स्तरीय पत्रकारों को संगठित कर उन्हें राष्ट्रीय विकास की धुरी से जोडा जायेगा। इसके लिए ग्राम्य विकास के प्रत्येक कार्यक्रमों से पत्रकारों को जोडनें के लिए राष्ट्रीय मुहिम चलाई जायेगी ताकि पत्रकारों को राष्टनिर्माण में राष्टनायक के रूप में विशेष पहचान दिलाई जा सके। श्री द्विवेदी ने कहा कि उपराष्ट्रपति ने आज यहां पर जो दीप जलाया है उसका अन्तिम पडा़व गांव की पंचायतें होंगी ताकि हर गरीब को योजनाओं का वास्तविक लाभ मिल सकें। उन्होंने घोषणा की शीघ्र ही कई भाषाओं में यह पुस्तक और नागरिक डायलाग मैग्जीन प्रकाशित की जायेगी। इस मौके पर जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला, प्रतिष्ठित उद्योगपति अशोक चतुर्वेदी, सांसद नरेश अग्रवाल, राजीव शुक्ला सहित बड़ी संख्या में गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।

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जस्टिस कर्णन की जीवनी लिखने के लिए दिलीप मंडल को मिले पचास लाख रुपये!

चर्चित पत्रकार दिलीप मंडल के बारे में खबर आ रही है कि वे जस्टिस कर्णन पर किताब लिखेंगे जिसके लिए प्रकाशक ने उन्हें पचास लाख रुपये दिए हैं. दलित समुदाय से आने वाले जस्टिस कर्णन की जीवनी लिखने को लेकर प्रकाशक से डील पक्की होने के बाद दिलीप मंडल अपने मित्रों को लेकर जस्टिस कर्णन से मिलने कलकत्ता गए. आने-जाने, खिलाने-पिलाने का खर्च प्रकाशक ने उठाया. किताब हिदी, अंग्रेजी, तमिल और कन्नड़ में छपेगी. ज्ञात हो कि दिलीप मंडल ने अब अपना जीवन दलित उत्थान के लिए समर्पित कर दिया है और फेसबुक पर हर वक्त वह दलित दलित लिखते रहते हैं जिसेक कारण उनके प्रशंसक और विरोधी भारी मात्रा में पैदा हो गए हैं.

पिछले दिनों जेएनयू के कन्हैया की आत्मकथा के लिए जॉगरनॉट प्रकाशन ने 30 लाख रूपए दिए थे. कन्हैया की किताब छप चुकी है, और खूब बिक रही है. एक प्रकाशन ने हार्दिक पटेल की आत्मकथा के लिए भी एक बड़ा अमांउट ऑफर किया है. वह किताब शायद अभी प्रेस में है. बताया जा रहा है कि दिलीप मंडल को 50 लाख में से 30 लाख की पेमेंट हो चुकी है. बाकी 20 लाख किताब की पांडुलिपि सौंपने पर मिलेंगे. दिलीप ने वादा किया है कि वह दो महीने में आत्मकथा लिखकर प्रकाशक को सौंप देंगे. इसके लिए उन्हें कई बार जस्टिस कर्णन से मिलना होगा. सारा टीए-डीए प्रकाशक उठाएगा और एक लिपिक (नोट्स लेने के लिए) का पारिश्रमिक भी प्रकाशक ही देगा. एक महीने के काम का लगभग 40 हजार.

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संजय द्विवेदी द्वारा संपादित पुस्तक ‘मीडिया की ओर देखती स्त्री’ का लोकार्पण

भोपाल। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी द्वारा संपादित किताब ‘मीडिया की ओर देखती स्त्री’ का लोकार्पण ‘मीडिया विमर्श’ पत्रिका की ओर से गांधी भवन, भोपाल में आयोजित पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान समारोह में निशा राय (भास्कर डाटकाम), आर जे अनादि (बिग एफ.एम), कौशल वर्मा (कोएनजिसिस, दिल्ली), अनुराधा आर्य (महिला बाल विकास अधिकारी बिलासपुर), शिखा शर्मा (इन्सार्ट्स), अन्नी अंकिता (दिल्ली प्रेस, दिल्ली), ऋचा चांदी (मीडिया प्राध्यापक), शीबा परवेज (फारच्यूना पीआर, मुंबई), श्रीमती भूमिका द्विवेदी (प्रकाशकः मीडिया विमर्श) ने किया।

पुस्तक में कमल कुमार, विजय बहादुर सिंह, जया जादवानी, अष्टभुजा शुक्ल, उर्मिला शिरीष, मंगला अनुजा, अल्पना मिश्र, सच्चिदानंद जोशी, इरा झा, वर्तिका नंदा, रूपचंद गौतम, गोपा बागची, सुभद्रा राठौर, संजय कुमार, हिमांशु शेखर, जाहिद खान, रूमी नारायण, अमित त्यागी, स्मृति आदित्य, कीर्ति सिंह, मधु चौरसिया, लीना, संदीप भट्ट, सोमप्रभ सिंह, निशांत कौशिक, पंकज झा, सुशांत झा, माधवीश्री, अनिका अरोड़ा, फरीन इरशाद हसन, मधुमिता पाल, उमाशंकर मिश्र, महावीर सिंह, विनीत उत्पल, यशस्विनी पाण्डेय, आदित्य कुमार मिश्र के लेख शामिल हैं। इस पुस्तक में देश के जाने-माने साहित्यकारों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के 39 लेख समाहित हैं जिनसे आज के मीडिया में स्त्री की बहुआयामी छवि का मूल्यांकन किया गया है।

किताबः मीडिया की ओर देखती स्त्री
संपादकः संजय द्विवेदी
प्रकाशकः यश पब्लिकेशंस,1/10753, सुभाष पार्क, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032
मूल्यः 495 रूपए मात्र, पृष्ठः 184
पुस्तक अमेजान और फ्लिपकार्ड पर भी उपलब्ध है।

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अखिलेश यादव सरकार के भ्रष्टाचार की पोल खोलती विष्णु गुप्त की नई किताब बाजार में आई

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में वरिष्ठ पत्रकार और कॉलमनिष्ट विष्णुगुप्त की पुस्तक धमाल मचा रही है। विष्णुगुप्त की पुस्तक का नाम ‘अखिलेश की गुंडा समाजवादी सरकार’ है। इस पुस्तक में अखिलेश यादव की सरकार के पांच वर्ष का लेखा-जोखा है वह भी भ्रष्टाचार की कहानी और वंशवाद के विस्तृत विवरण के साथ में है। पुस्तक लखनउ के साथ ही साथ वाराणसी, इलाहाबाद, झांसी, कानपुर, मेरठ सहित सभी जगहों पर उपलब्ध है और तेजी से आम जन तक पहुंच रही है।

अखिलेश यादव और सपा विरोधी राजनीतिक कार्यकर्ता पुस्तक के प्रति काफी सक्रियता दिखा रहे हैं और पुस्तक की उपलब्धता आम जनता तक सुनिश्चित कर रहे हैं, ताकि आम जनता यह जान सके कि अखिलेश यादव की सरकार किस तरह जन विरोधी थी। एक पर एक भ्रष्टाचार की कहानियां किस प्रकार से लिखी गयी थी। भ्रष्टाचार से आम जनता के हितों को किस प्रकार से नुकसान पहुंचाया गया। अराजकता और अपराध का बोल बाला किस प्रकार से रहा है। ईमानदार अधिकारियों का किस प्रकार से उत्पीड़न हुआ। ईमानदार अधिकारियों को किस प्रकार से इस्तीफा देने के लिए बाध्य किया गया। बेईमान अधिकारियों को प्रोन्नति पर प्रोन्नति मिलती चली गयी। वंशवाद ने लोकतंत्र को जख्मी किस प्रकार से किया है।

लेखक विष्णुगुप्त का मत है कि उत्तर प्रदेश में भ्रष्ट, अराजक, जातिवादी और वंशवादी राजनीति की विदाई होनी चाहिए और ऐसी राजनीतिक धारा बहनी चाहिए जिसमे वंशवाद की कोई उम्मीद नहीं होनी चाहिए ताकि भ्रष्टचार और प्रशासनिक अराजकता दूर किया जा सके। साथ ही अपराध पर नियंत्रण रहे और विकास की राशि आम जन तक पहुंच सके।

अब यहां यह प्रश्न उठता है कि विष्णुगुप्त की पुस्तक अखिलेश यादव की राजनीतिक छवि को कितना दागदार कर पायेगी और समाजवादी पार्टी को कितना नुकसान पहुंचा पायेगी? क्या विष्णुगुप्त की पुस्तक का कोई राजनीतिक उदे्दश्य है? कोई निजी विचार-महत्वाकांक्षा भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है? एक ऐसा लेखक जो हमेशा आर्थिक फटेहाली में न सिर्फ सकिय रहता है, आर्थिक फटेहाली में भी अपने विचारों से समझौता नहीं करता बल्कि देशद्रोहियों के खिलाफ अभियान चलाता है। साथ ही कारपोरेट लुटेरों पर अपनी स्याही सुखाता है। ऐसा लेखक अगर पिछड़ी जाति के पुनर्जागरण के नाम पर सत्ता में आयी अखिलेश सरकार को चाकचौबंद ढंग से घेरे में लेता है तो फिर पुस्तक की बातों और तथ्यों पर गौर करना ही पडेगा।

लेखक यह भी जानते-समझते हैं कि वे किस छत्ते में हाथ डाले हैं, किस राजनीतिक घराने की अपसंस्कृति के खिलाफ लिख रहे हैं, किस राजनीतिक घराने के अपराध और कुनबेबाजी के खिलाफ लिख रहे हैं और इसके खतरे क्या है? ऐसे भी विष्णु गुप्त, खतरों के खिलाडी हैं, खतरे ये मोल लेते रहे हैं, अपनी जान जोखिम में डालकर पत्रकारिता और लेखन कार्य करते रहे हैं, इस सच्चाई को हर विचारवान पत्रकार और आम जन समझते हैं।

अब थोडी चर्चा विषय वस्तु और तथ्यों के चाकचौबंद पर। विष्णुगुप्त ने पुस्तक के विषय वस्तु निर्धारण करने में राजनीतिक दूरदर्शिता दिखायी है। पुस्तक का पहला चैप्टर वंशवाद को लेकर है। पहले चैप्टर का शीर्षक है ‘वंशवाद का नंग्न तांडव, अखिलेश का पत्नी प्रेम’। इस शीर्षक से लेखक ने न केवल मुलायम की बल्कि अखिलेश की वंशवादी राजनीति पर गंभीर चोट की है। लेखक ने साफ तौर पर कहा है कि राम मनोहर लोहिया के सिद्धांत का अनुयायी कहने वाले मुलायम सिंह यादव और उनके पुत्र अखिलेश यादव ने वंशवाद की राजनीति में जवाहर लाल नेहरू को भी मात दी दी है।

जवाहर लाल नेहरू ने सिर्फ अपनी बेटी इन्दिरा गांधी को ही राजनीति में स्थापित किया था जबकि मुलायम सिंह यादव ने अपने पूरे परिवार को राजनीति में स्थापित कर दिया। मुलायम सिंह यादव ने वंशवाद स्थापित कर राममनोहर लोहिया की कब्र खोदी है। लेखक ने उन लोगों को आईना दिखाया है जो अखिलेश यादव को वंशवाद प्रेमी नहीं कहते है। लेखक ने बुलंदी के साथ अखिलेश को मुलायम से बड़ा वंशवादी कहा। मुलायम ने अपनी पत्नी को राजनीति में स्थापित नहीं किया था पर अखिलेश ने अपनी पत्नी को राजनीति में स्थापित कर दिया।

सबसे बड़ी बात यादव सिंह के भ्रष्टाचार की कहानी का है। ‘यादव सिंह का संरक्षणकर्ता अखिलेश’ शीर्षक से प्रश्न किया है कि जो लोग अखिलेश को ईमानदार मानते हैं, स्वच्छ मानते हैं, सत्य हरिशचन्द्र का प्रतीक मानते हैं वे सभी यादव सिंह के भ्रष्टचार से जुडे तथ्य देख लें, समझ लें। यादव सिंह के खिलाफ सीबीआई जांच को रोकवाने के लिए कई संवैधानिक और गैर संवैधानिक हथकंडे अपनाये थे। अखिलेश सरकार की जांच में यादव सिंह को क्लीन चिट क्यों और किस मकसद से दिया गया था। कोर्ट अगर बहादुरी नहीं दिखायी होती तो फिर यादव सिंह को जेल जाना और यादव सिंह का भ्रष्टचार सामने आना मुश्किल होता। अगर जांच संपूर्णता में हो तो फिर यादव सिंह को संरक्षण देने के आरोप में अखिलेश यादव भी जेल के अंदर जा सकते हैं।

अखिलेश यादव का सबसे ड्रीम प्रोजेक्ट लखनउ-आगरा एक्सप्रेसवे की भी पुस्तक में पोल खोली गयी है। लेखक ने दावा किया है कि लखनउ-आगरा एक्सप्रेसवे अभी बन कर पूरी तरह से तैयार नहीं हुआ है, अधूरा है फिर भी उस एक्सप्रेस वे का  लोकार्पण कर दिया गया। यह एक्सप्रेसवे अनुपयोगी है और किसानों की आजीविका को कब्र बना कर बनाया गया है। किसानों से जबरदस्ती जमीन छीनी गयी है। अभी तक किसानों को पूरा मुआवजा भी नहीं मिला है। इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए यूपी के सबसे बदनाम और भ्रष्ट अधिकारी नवनीत सहगल को जिम्मेदारी दी गयी। नवनीत सहगल ने इस योजना को पूरी करने में करोड़ों का घोटाला किया है।

सैफई महोत्सव को लेकर भी इस किताब में काफी कुछ है। लेखक ने ‘मौज-मस्ती का सैफई महोत्सव’ शीर्षक से दावा किया है कि हर साल तीन सौ करोउ रूपये सैफई महोत्सव पर फूके जाते हैं। अमर सिंह के एक बयान को आधार बना कर यह दावा किया गया है। लेखक ने प्रश्न खडा किया है कि अखिलेश और मुलायम राज में कभी काशी, अयोध्या और प्रयाग महोत्सव का आयोजन नहीं किया गया पर सैफई महोत्सव का आयोजन हर साल सिर्फ मौज मस्ती के लिए किया जाता है और अपसंस्कृति फैलायी जाती है।

पुस्तक में कई अन्य रोचक और तथ्यपूर्ण विषय है जैसे अमर सिंह से क्यों डरते हैं अखिलेश-मुलायम, ईमानदार अधिकारियों जैसे अमिताभ ठाकुर, दुर्गा शक्ति नागपाल आदि का उत्पीडन और बेईमान अधिकारियों को संरक्षण, अखिलेश-मुलायम का विक्टोरिया बग्धी प्रेम, समाजवादी दंगों मे अखिलेश, मूलायम आजम खान का हाथ और अखलाक कांड आदि पर भी विचारोतेक पठनीय सामग्री है।

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हिन्दी के चर्चित और चहेते गद्यकार अनिल यादव की नई किताब ‘सोनम गुप्ता बेवफा नहीं है’ बाजार में आई

Siddharth Kalhans : पहली बार किसी ने दस रुपये के नोट पर लिखा होगा, सोनम गुप्ता बेवफा है, तब क्या घटित हुआ होगा? क्या नियति से आशिक, मिज़ाज से अविष्कारक कोई लड़का ठुकराया गया होगा, उसने डंक से तिलमिलाते हुए सोनम गुप्ता को बदनाम करने की गरज से उसे सरेबाजार ला दिया होगा? या वह सिर्फ फरियाद करना चाहता था, किसी और से कर लेना लेकिन सोनम से दिल न लागाना।

अनिल यादव

क्या पता सोनम को कुछ खबर ही न हो, वह सड़क की पटरी पर मुंह फाड़कर गोलगप्पे खा रही हो, जिंदगी में तीसरी बार लिपिस्टिक लगाकर होठों को किसी गाने में सुने जैसा महसूस कर रही हो। यह भी तो हो सकता है कि किसी चिबिल्ली लड़की ने ही अपनी सहेली सोनम से कट्टी करने के बाद उसे नोट पर उतार कर राहत पाई हो…

(अंतिका प्रकाशन से बस अभी-अभी छपी हिन्दी के सबसे चहेते गद्यकार अनिल यादव की नई किताब ‘सोनम गुप्ता बेवफा नहीं है’ से)

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस की एफबी वॉल से.

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उन्होंने पेड़ काट डाले और तूफान ने उन्हें नष्ट कर डाला!

Amarendra Kishore : आज से पचास वर्ष बाद क्या स्थिति होगी? ”कोलैप्स : हाउ सोसाइटीज चूज़ टू फेल और सक्सीड’ नामक किताब के लेखक है जार्ड डायमंड। बिगड़ते पर्यावरण, सरकार की कॉर्पोरेट के प्रति नरम रवैया और व्यापारिक हितों को ध्यान में रखकर बनायी जाने वाली सरकारी नीतियों पर केंद्रित यह किताब भारत के आदिवासी इलाकों के हालात से प्रभवित होकर लिखी गयी लगती है। जिक्र है कि एक ईस्टर आइलैंड है जो प्रशांत महासागर में है– यहां काफी बड़े-बड़े पेड़ों को वहां रहने वाले लोग अपने रिवाज कि लिए काटा करते थे, जबकि उन्हें मालूम था कि तेज समुद्री हवाओं से ये बड़े पेड़ उन्हें बचाते हैं, लेकिन फिर भी उन्होंने एक-एक करके पेड़ों को काट डाला। अंत में समुद्री तूफान से वह आइलैंड नष्ट हो गया। कमोबेश आदिवासी भारत में भी यही स्थिति बनती जा रही है.

सरकार शॉर्ट टर्म फायदा के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों को माइनिंग करने की इजाजत दे रही है और ये कंपनियां अंधाधुंध प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रही हैं, जिसका कुप्रभाव हमें कुछ वर्षों के बाद दिखायी देगा। हालाँकि ‘बुलडोजर और महुआ के फूल’ किताब का मूल विषय भी यही है। हॉवर्ड विश्वविद्यालय से स्नाकोत्तर और पुलित्ज़र अवार्ड से सम्मानित जार्ड डायमंड यह सवाल उठाते हुए कहते हैं कि मानव और जानवर में यही अंतर है कि जानवर भविष्य नहीं देखते हैं और मानव भविष्य के बारे में सोचते हैं। लेकिन यहां समस्या यह है कि सरकार ज्यादा लंबा भविष्य न देखकर कम समय का भविष्य देख रही है। यह सही है कि आज इन्हें बहुराष्ट्रीय कंपनियां माइनिंग के बदले काफी धन दे रही हैं, लेकिन आज से पचास वर्ष बाद क्या स्थिति होगी? 592 पृष्ठ की यह किताब बेहद रोचक है।

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नौकरशाही में बैठे बहुत कम लोग ही अपनी साफगोई केलिए जाने जाते हैं, अन्यथा गोलमटोल जवाब देकर निकला सबको आता है। जल-संसाधन मंत्रालय के सचिव श्री शशिशेखर ने माना कि नदियों की सेहत बचाने और उनके अस्तित्व की हिफाजत करने में सरकार असफल रही है। तमिलनाडु कैडर के श्री शशिशेखर १९८१ बैच के आईएस अधिकारी अपने साफ़-सपाट बयान और प्रतिबद्ध कार्यशैली केलिए जाने जाते हैं। ऐसे में संस्कृति के साथ नदियों का नाता जोड़कर उनकी हिफ़ाजत का परचम लहराने में व्यस्त मौजूदा केंद्र सरकार के सामने शशिशेखर का यह बयान कई सारे प्रश्न खड़े करता है।

हिंदुस्तान टाइम्स और राष्ट्रीय सहारा समेत कई अखबारों-मैग्जीनों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके आईआईएमसी से शिक्षित-प्रशिक्षित पत्रकार अमरेंद्र किशोर की एफबी वॉल से.

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राणा यशवंत की अगली किताब ‘अर्धसत्य’

Rana Yashwant : मेरी अगली किताब ‘अर्धसत्य’ पर काम जारी है. आमिर ख़ान पर जो एपिसोड था, उस पर जो लिखा है, उसका एक टुकड़ा आपके लिए. कांटेंट और टेक्सचर दोनों का थोड़ा ख्याल रखा है.

”लखनऊ से उत्तर की तरफ कार दौड़ लगा रही थी. सुबह के यही कोई दस बज रहे थे. दोनों तरफ के खेतों में रबी की बुआई चल रही थी या फिर हो गई थी. कुछ खेतों में ईंख की फसल खड़ी थी, लेकिन मरियल-सी, कमजोर. मैंने अपने ड्राइवर से पूछा- भई इधर ईंख ऐसा क्यों है ? जवाब आया- सर इधर की मिट्टी थोड़ी कमजोर है, लेकिन किसान के पास ईंख बोने के अलावा कोई और रास्ता है ही नहीं. दरअसल हम हरदोई जिले में घुस चुके हैं और यहां आबादी तो बहुत है सर लेकिन गरीबी भी उतनी ही है – ड्राइवर ने अपनी बात जोड़ी. अच्छा, यहां से शाहाबाद कितनी दूर? मैंने बात बदली. सर, बस आधा घंटा और मान लीजिए. शाहाबाद में एक गांव है अख्तियारपुर जहां हमें जाना था. यह गांव फिल्म स्टार आमिर खान का पुश्तैनी गांव है. आमिर खान का शो सत्यमेव जयते स्टार प्लस चैनल पर आता है और इसको लेकर देशभर में काफी चर्चा होती है. हाल ही में एक एपिसोड जो बुजुर्गों पर था, उसमें आमिर इतने भावुक हो गए कि उनकी आंखें छलक पड़ीं. एक एपिसोड में वो कह रहे थे कि हम कई मुद्दों पर लड़ने की बजाए उनपर पर्दा डाल देते हैं. मैं अपने शो अर्धसत्य के ज़रिए आमिर के दर्द को उनके अपनों के बीच समझना चाहता था. मेरी कार जब सड़क से नीचे उतरी तो ईंटवाली सड़क साथ चलने लगी. करीब पांच सौ मीटर जाने के बाद अख्तियारपुर शुरु हुआ. कार, आमिर के घर के बाहर रुकी. हमारे स्थानीय रिपोर्टर आलोक सिंह पिछले दो किलोमीटर से साथ थे और रास्ते की डोर उन्होंने ही पकड़ रखी थी. बस-बस यहीं रोकिए- आलोक ने ड्राइवर के कंधे पर हाथ दबाते हुए कहा और लगे हाथ दांयी तरफ उंगली उठाकर बताया – सर यही है आमिर का घर . किसी पुरानी हवेली का खंडहर-सा लगा. आगे का जो भी हिस्सा रहा होगा, ढह चुका था- सहन था. बांयी तरफ एक बड़ा-सा कमरा खड़ा था, जिसकी छत और चौखट नहीं थे. इस कमरे की पिछली दीवार से लगकर एक दीवार दांयी तरफ जा रही थी, जिसके बीचवाले हिस्से में दरवाज़ा था. अंदर जाने का इकलौता रास्ता. मैं अपने कैमरामैन शरद बारीक के साथ दरवाज़े पर खड़ा हो गया. यह दरवाज़ा एक कमरे में खुलता था जिसके अंदर दो खाट बिछी थी, दीवार पर ठुकी कीलों पर कुछ कपड़े टंगे थे और एक तरफ छत से कुछ नीचे लकड़ी के तख्ते पर बच्चों की किताबें रखी थीं. इस कमरे में एक और दरवाजा था जिससे आंगन लगा हुआ था. बस कुछ सेकंड के अंदर मैंने पूरा मुआयना कर लिया. बेटा घऱ में कोई बड़ा है? दरवाजे पर एक बच्ची खड़ी थी- मैंने उससे पूछा. मेरी बात अभी पूरी ही हुई थी कि आंगन से एक महिला कमरे में आईं. सिर पर पल्लू संभालते हुए मेरे नमस्कार कहने से पहले उन्होंने ही सिर झुका दिया. मैंने अपना परिचय दिया और कहा कि मैं चाहता हूं घर के अंदर आकर आपसे कुछ बात करुं. उन्होंने थोड़ा हिचकते हुए ही सही लेकिन हामी भर दी…”

इंडिया न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत की एफबी वॉल से.

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देव प्रकाश चौधरी की किताब ‘जिसका मन रंगरेज’ का विमोचन

पत्रकार और चित्रकार देव प्रकाश चौधरी की नई किताब ‘जिसका मन रंगरेज’ का स्वागत कला जगत के साथ-साथ पत्रकार जगत में भी जोर-शोर से हुआ है। पिछले 14 अक्टूबर को इस किताब का भव्य विमोचन जयपुर में आयोजित सार्क सूफी फेस्टिवल में मशहूर कथाकार अजीत कौर के हाथों हुआ। इस कार्यक्रम में देश-विदेश के दिग्गज विद्वानों की मौजूदगी रही। हिंदी में अपनी तरह की इकलौती और बेहद आकर्षक यह किताब ‘जिसका मन रंगरेज’ मशहूर चित्रकार अर्पणा कौर की कला दुनिया को नए सिरे से परिभाषित करती है।

किताब अंतरा इन्फोमीडिया ने प्रकाशित की है और इसकी कीमत 1200 रुपये है। किताब का विमोचन करते हुए कथाकार अजीत कौर ने कहा-‘जिंदगी एक चादर है तो उस चादर को जतन से ओढ़ना ही सूफीवाद है। इस मौके पर अफगानिस्तान से आए कवि ए. के राशिद ने कहा-‘अगर सबका मन रंगरेज की तरह हो जाए तो कितनी खूबसूरत होगी ये दुनिया।’

‘जिसका मन रंगरेज’ देव प्रकाश चौधरी की चौथी किताब है।  दैनिक अखबार अमर उजाला ग्रुप में फीचर और मैग्जीन प्रमुख के रूप में काम करने वाले देवप्रकाश चौधरी इससे पहले स्टार न्यूज और आईबीएन-7 जैसे संस्थानों में काम कर चुके हैं। कला पर उनकी और भी कई किताबें हैं। बिहार की मंजूषा लोककला पर लंबे शोध के बाद लिखी गई किताब ‘ लुभाता इतिहास पुकारती कला ‘ बेहद चर्चित और पुरस्कृत। एक किताब मशहूर सामजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे पर और अलकायदा चीफ ओसामा बिन लादेन पर भी एक किताब। आकाशवाणी और दूरदर्शन के लिए लगातार नाटक और डॉक्यूमेंटरी फिल्म के लिए उन्होंने लेखन का कार्य किया है।

फीचर फिल्मों के लिए भी लिखा और इन दिनों फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘रसप्रिया’ पर आधारित फिल्म के लिए भी संवाद लेखन कर रहे हैं। इसके अलावा उन्होंने देश और विदेश की कई महत्वपूर्ण प्रदर्शनियों में हिस्सा लिया, पुरस्कृत हुए हैं। संस्कृति मंत्रालय की फैलोशिप मिली है। साथ ही संस्कृति मंत्रालय के ही एक प्रोजेक्ट के तहत उन्होंने संताल संस्कृति का अध्ययन किया है। विमोचन के मौके पर ‘जिसका मन रंगरेज’ पर हुई बातचीत चर्चा के दौरान चित्रकार अर्पणा कौर, मशहूर नृत्यांगना सोनल मान सिंह अफगानिस्तान के सूफी विद्वान गुलाम एच नॉवीपॉर, पॉश्तो के विद्वान नडीब मानालॉई और बांग्लादेश की कवि नाज्मा आलम ने भी हिस्सा लिया।

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मधोक की किताब का अंश- ‘अटल बिहारी वाजपेयी ने 30, राजेंद्र प्रसाद रोड को व्यभिचार का अड्डा बना दिया है’

अपनी पुस्तक के तीसरे खंड के पृष्ठ संख्या 25 पर मधोक ने लिखा है “मुझे अटल बिहारी और नाना देशमुख की चारित्रिक दुर्बलताओं का ज्ञान हो चुका था। जगदीश प्रसाद माथुर ने मुझसे शिकायत की थी कि अटल (बिहारी वाजपेयी) ने 30, राजेंद्र प्रसाद रोड को व्यभिचार का अड्डा बना दिया है। वहां नित्य नई-नई लड़कियां आती हैं। अब सर से पानी गुजरने लगा है।

जनसंघ के वरिष्ठ नेता के नाते मैंने इस बात को नोटिस में लाने की हिम्मत की। मुझे अटल के चरित्र के बारे में कुछ जानकारी थी। पर बात इतनी बिगड़ चुकी है, ये मैं नहीं मानता था। मैंने अटल को अपने निवास पर बुलाया और बंद कमरे में उससे जगदीश माथुर द्वारा कही गई बातों के विषय में पूछा। उसने जो सफाई दी बात साफ हो गई। तब मैंने अटल (बिहारी वाजपेयी) को सुझाव दिया कि वह विवाह कर ले अन्यथा वह बदनाम तो होगा ही जनसंघ की छवि को भी धक्का लगेगा।”

उक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि संघ की धारणा है कि भारतीय समाज में पुरुष विवाह इस कारण करते हैं कि वह बदनाम न हो और जिन सामाजिक राजनैतिक संस्थानों में वह काम करता है उन की छवि को धक्का न लगे।

एडवोकेट दिनेश राय द्विवेदी की एफबी वॉल से.

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शाजी ज़मां की बीस साल की मेहनत है ‘अकबर’

Ajit Anjum : शाजी ज़मां हिन्दी टीवी चैनलों के सबसे संजीदा और संवेदनशील पत्रकारों में से एक हैं… शाजी कम बोलते हैं, कम दिखते हैं, कम लिखते हैं, कम लिखते हैं, कम मिलते हैं लेकिन जो भी सोचते और रचते हैं, वो सबसे अलहदा होता है… शायद इसलिए भी कि वो कहने-बताने से ज़्यादा चुपचाप करते रहने में यक़ीन करते हैं… शाजी को मैं क़रीब पंद्रह सालों से जानता हूँ और जितना जानता हूँ, उसके आधार पर कह सकता हूँ कि उनकी ये किताब साहित्य की दुनिया में हलचल मचाएगी… अकबर जैसे किरदार पर शाजी ने इतना काम करके कुछ रचा है तो ये हर साल छपने वाले उपन्यासों की भीड़ से अलग होगा…

Satyanand Nirupam : किसी लेखक की 20 सालों की मेहनत मायने रखती है। जाने वह एक ही विषय पर सामग्री का संधान किस जतन और धैर्य से करता है! 8 सालों की लिखाई-मंजाई के बाद वह उपन्यास का एक फाइनल ड्राफ्ट तैयार करता है। अब वही उपन्यास ‘अकबर’ नाम से छपने की राह में है। अकबर, जिसकी तलवार ने साम्राज्य की हदों को विस्तार दिया, जिसने मज़हबों को अक़्ल की कसौटी पर कसा, जिसने हुकूमत और तहज़ीब को नए मायने दिए, उसी बादशाह की रूहानी और सियासी ज़िन्दगी की जद्दोजहद का सम्पूर्ण खाका पेश करते इस उपन्यास को शाज़ी ज़माँ Shazi Zaman ने लिखा है।

शाज़ी ज़माँ दिल्ली के सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज से इतिहास में स्नातक हैं। बरसों से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में हैं। राजकमल से उनके दो उपन्यास ‘प्रेमगली अति सांकरी’ और ‘जिस्म जिस्म के लोग’ पहले से प्रकाशित हैं। अब तीसरा उपन्यास ‘अकबर’ जल्द ही सामने आने वाला है। इस उपन्यास को लेखक ने कल्पना के बूते नहीं, बाज़ार से दरबार तक के ऐतिहासिक प्रमाण के आधार पर रचा है। शाज़ी साहेब ने कोलकाता के इंडियन म्यूज़ियम से लेकर लंदन के विक्टोरिया ऐल्बर्ट तक बेशुमार संग्रहालयों में मौजूद अकबर की या अकबर द्वारा बनवायी गयी तस्वीरों पर ग़ौर किया है। बादशाह और उनके क़रीबी लोगों की इमारतों का मुआयना किया है और ‘अकबरनामा’ से लेकर ‘मुन्तख़बुत्तवारीख़’, ‘बाबरनामा’, ‘हुमायूंनामा’ और ‘तज़्किरातुल वाक़यात’ जैसी किताबों का और जैन और वैष्णव संतों और ईसाई पादरियों की लेखनी का भी अध्ययन किया है। बतौर संपादक मैं लेखक की इस तैयारी से गहरे मुत्मइन हूँ। उपन्यास पढ़ कर पाठक किस हद तक संतुष्ट होते हैं, यह आने वाले समय में देखना है।

पिछले 6 महीनों में लेखक-संपादक की हुई तमाम बैठकियों में उपन्यास के बहुत सारे बारीक रेशे सुलझाए गए। कई पहलुओं पर बात हुई। हम दोनों एकराय होते और आगे बढ़ते रहे। उपन्यास का आवरण इस दौरान Puja Ahuja ने तैयार किया है। इस पर आप जिस ढाल को देख रहे हैं, वह अकबर की असल ढाल है जो फ़िलहाल छत्रपति शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय (मुम्बई) में संरक्षित है। हमने वहीँ से इसका प्रकाशनाधिकार लिया है। पृष्ठभूमि में जो दीवार है वह फतेहपुर सिकरी के एक हिस्से का है। यह फोटो अनिल आहूजा के सौजन्य से हमें प्राप्त हुआ है। टाइटल की कैलिग्राफी Rajeev Prakash Khare ने की है। उपन्यास के अंदर न केवल कुछ दुर्लभ रंगीन चित्र होंगे, बल्कि पहली बार अकबर की जीवन-यात्रा को समझने के लिए एक संग्रहणीय नक्शा भी सामने आएगा। परिशिष्ट में और भी इंफोग्राफिक्स मुमकिन हैं।

उपन्यास के पेपरबैक और सजिल्द संस्करणों की प्री-बुकिंग अगले हफ्ते से शुरू होने वाली है। इसकी सूचना राजकमल प्रकाशन समूह के पेज से आपको सही समय पर मिल जाएगी। अक्टूबर महात्मा गाँधी और लालबहादुर शास्त्री का ही नहीं, अकबर का भी महीना है। देश की मिट्टी, हवा और पानी का हक़ अदा करने वालों में अकबर का नाम भी अग्रणी है। अकबर अक्टूबर में ही जन्मे, इसी महीने में मरे। यह पूरा महीना ‘अकबर’ उपन्यास के नाम!

वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम और सत्यानंद निरुपम की एफबी वॉल से.

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यशस्वी संपादक गिरीश मिश्र के साठवें जन्मदिन पर उनकी किताब ‘देखी-अनदेखी’ का विमोचन

दैनिक जागरण, दैनिक हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, लोकमत समेत कई अखबारों के संपादक रह चुके वरिष्ठ और यशस्वी पत्रकार गिरीश मिश्र ने बीते 16 जुलाई को अपना साठवां जन्मदिन सादगी के साथ मनाया. इस मौके पर उनके परिजन और चाहने वाले मौजूद थे. 16 जुलाई का दिन गिरीश मिश्र के लिए एक यादगार और दोहरी ख़ुशी का दिन था. इस दिन उनका जन्मदिन तो था ही, इसी दिन एक गरिमापूर्ण समारोह में उनकी पुस्तक ‘देखी अनदेखी’ का विमोचन भी किया गया.

इस छोटे से और बेहद व्यक्तिगत समारोह में कुछ थोड़े से नजदीकी रिश्तेदार, मित्र और गिरीशजी के पुराने छात्र शामिल हुए. इस किताब में गिरीशजी के ही लिखे गये 23 जनवरी 2011 से लेकर 14 जुलाई 2012 तक के लेख संकलित हैं. यहां कुछ तस्वीरों के जरिए गिरीश मिश्र की किताब और उसके विमोचन का दृश्य प्रस्तुत किया जा रहा है.

ज्ञात हो कि गिरीश मिश्र मूलत: लखनऊ के रहने वाले हैं और कुछ वर्षों से स्वास्थ्य कारणों से नोएडा में निवास कर रहे हैं. उनके पढ़ाए और ट्रेंड किए हुए छात्र देश भर में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत हैं. भड़ास4मीडिया के संस्थापक और संपादक यशवंत सिंह ने भी पत्रकारिता का शुरुआती शिक्षण-प्रशिक्षण गिरीश मिश्र के सानिध्य में दैनिक जागरण, लखनऊ में कार्य करते हुए लिया था.

गिरीश मिश्र बेहद इमानदार, सरोकारी और शालीन पत्रकार हैं जिन्होंने पत्रकारीय मापदंडों की खातिर प्रबंधन के दबावों को कतई स्वीकार नहीं किया. अपने जीवन में अनुशासन और ईमानदारी को जीने वाले गिरीश मिश्र यही पाठ अपने छात्रों और अधीनस्थों को भी सिखाते रहे हैं ताकि पत्रकारिता की शुचिता कायम रखी जा सके. गिरीश मिश्र के दो सगे भाई आशीष मिश्र और हरीश मिश्र भी वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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GUJARAT FILES पढ़ते हुए मन में कुछ सवाल पैदा हो रहे हैं…

Anil Pandey : GUJARAT FILES पढ़ते हुए मन में कुछ सवाल पैदा हो रहे हैं… पत्रकार राणा अयूब की किताब GUJARAT FILES पढ़ते हुए मन में कुछ सवाल पैदा हो रहे हैं। पहला यह कि तकरीबन पांच साल पहले गुजरात दंगों को लेकर किया गया स्टिंग मोदी सरकार के दो साल पूरे होने पर किताब कि शक्ल में क्यों प्रकाशित किया गया? दूसरा, इस किताब के प्रकाशन और प्रचार प्रसार पर इतना पैसा क्यों खर्च किया जा रहा है और यह पैसा कहां से आ रहा है? इस किताब को किसी प्रकाशक ने नहीं, खुद राणा अयूब ने प्रकाशित किया है।

किताब भी देश के सबसे बेहतरीन प्रिंटिंग प्रेस थामसन प्रेस से छपवाई गई है। क्या एक पत्रकार के पास अपनी गाढ़ी कमाई में से इतना पैसा बचता है कि वह लाखों खर्च कर किताब छपवाए और मोटी रकम देकर किताब का प्रचार प्रसार कराए!!! खैर, किताब तो अभी थोड़ी ही पढ़ी है, उसमें से कुछ डायलाग तो बॉलीवुड फिल्मों जैसे लगते हैं।

जब से यह किताब रिलीज हुई है तभी इसे पढ़ने की इच्छा मन में जग गई थी। हाल ही में खान मार्केट गया था सो “फुल सर्कल” में किताब की तलाश में पहुंच गया। नई दिल्ली के एलीट मार्केट के इस चर्चित बुक स्टोर में मुझे घुसते ही राणा अयूब की किताब के दर्शन हुए। यह किताब न केवल अच्छी तरह से डिस्प्ले की गई थी, बल्कि काउंटर पर भी इस तरह से सजा कर रखी गई थी, ताकि यह यहां आने वाले लोगों का ध्यान आकर्षित कर सके। जो लोग नहीं जानते उन्हें बता दूं कि बुक स्टोर और रेलवे स्टेशन आदि पर किताबों और मैगजीन के स्टाल वाले किताब और पत्रिकाओं के डिस्प्ले के लिए अच्छी खासी रकम लेते हैं। बडे स्टोर पर तो यह रकम मोटी होती है।

पत्रकार नेता अनिल पांडेय के उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं:

Pushya Mitra आप ऐसे सच को सामने ला रहे हैं, जिसके बारे में बात करना पाप की श्रेणी में रखा जाता है… सच यही है कि इस देश में मोदी का विरोध करना अपने आप में आज भी बेहतरीन कैरियर है… इतना ल्यूक्रेटिव कि आप साल भर में दो विदेश यात्रा कर सकते हैं और दिल्ली में थ्री-बीएचके फ्लैट खरीद सकते हैं…

Anil Pandey इसका मतलब मोदी विरोध के व्यापार में माल है?

Shashi Shekhar फिर तो मोदी समर्थन का भी कुछ दाम होगा?

Mohan Joshi पुष्य भैया : वैसे आज के दौर में मोदी पक्षधर होना भी लयुक्रेटिव बिज़नेस है। जिन लोगों ने मोदी पक्ष में बोला या लिखा उन्हें भी व्यापारिक फायदे या पद मिले हैं। अनिल सर की बात से सहमत हूँ किताब के मैरिट पर बात होनी चाहिए।

Pushya Mitra जो मुझे नजर आ रहा है उस हिसाब से मोदी विरोधी बेहतर स्थिति में हैं… तेजी से राइज करते हैं… मोदी समर्थक अभी अपना स्ट्रक्चर खड़ा करने की कोशिश में हैं… मोदी विरोधियों के सेमिनार में आने-जाने का किराया (थर्ड एसी) और दूसरी सुविधाएं मिल जाती हैं, समर्थकों के सेमिनार में अपनी जेब ढीली करनी पड़ती है… यह मेरा सामान्य ऑब्जर्वेशन है… मैं दोनों जगह जाता आता रहा हूं… इसलिए मुझे पता है… 🙂

Avinash Chandra आपकी शंकाएं लाजमी हैं.. लेकिन इसके कंटेंट पर भी चर्चा होनी चाहिए। कंटेंट फैब्रिकेटेड है या थोड़ी भी सत्यता है इसमें..? किसी भी चीज की पब्लिसिटी पर पैसा खर्च करने पर सिर्फ सरकार का एकाधिकार नहीं होना चाहिए..

Anil Pandey अविनाश पब्लिसिटी और एड पर पैसे खर्चने को कौन मना कर रहा है। सवाल इसके पीछे की मंशा और एजेंडे का है। मेरे मन में सवाल आ रहा है कि जब कोई पब्लिशर नहीं है, राणा ने खुद किताब छापी तो पैसा कहां से आ रहा है…. तीन चैप्टर पढ़े है, साफ लग रहा है कि बढ़ा चढ़ा कर लिखा जा रहा है…. आप भी पढ़िए और खुद ही फैसला करिए…

Vijay Jha तहलका ब्रांड सारे शूटरों का अंतिम मकसद गांधी परिवार के आड़े आनेवाले सभी व्यक्ति, संस्था आदि ध्वस्त करना रहा है। इसके लिए किसी ने स्टिंग को टूल्स के रूप में यूज किया, किसी ने किताब छापकर या किसी में कॉलम लिखकर तो किसने एंकरिग कर। अब ये सब कोई ढका छुपा नहीं है। सब पब्लिकली है, राजदीप-बरखा-खेतान-तेजपाल-राणा अयूब आदि किसके ड्राईंगरूम में कितने बार गया, क्यों गया, क्या मिला सब ओपन है। फिर ऐसे पात्र के लेखन – वाचन को बिना पन्ने पलटे हम पाठक अनुमान लगा लेते है इस रैपर के अंदर कौन सा बम रखा गया है और किसको उड़ाने के लिए रखा गया है। बाकी लेखकों-पत्रकारों का काम है पुस्तक पढ़कर समीक्षा लिखना, उनको अपना कर्तब्य करना चाहिए। हमारे जैसे पाठक अनिल जी के लिखे समीक्षे को धैर्य से पढ़ लेंगे, पढ़ते रहेंगे।

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इस बेखौफ और जांबाज महिला पत्रकार राणा अय्यूब को सलाम

Shikha :  एक बेख़ौफ़ लड़की, एक जांबाज़ पत्रकार, नाम राणा अय्यूब. 26 साल की तहलका मैगज़ीन की पत्रकार साल 2010 में तहकीकात करने एक अंडरकवर रिपोर्टर के रूप में गुजरात पहुँचती हैl अपनी तहकीकात के दौरान नाम बदलकर मैथिली त्यागी रखती है और कई स्टिंग ऑपरेशन को अंजाम देती है जो नीचे के छुटभैय्ये अफसर-नेताओं से लेकर ऊपर मोदी-अमित शाह तक के दर्जे के नेताओं की दंगों से लेकर अनेक फर्जी एनकाउंटरों में अपराधी-हत्यारी भूमिकाओं का पर्दाफ़ाश करती हैl

अपने छोटे से कमरे में पहचान छुपाकर अकेली रहती उस लड़की को न कोई सिक्यूरिटी न कोई मदद। उसे अक्सर महसूस होता कि कोई उसका पीछा कर रहा हैl लेकिन जब वापस अपनी स्टोरी को लेकर तहलका मैगज़ीन में आती है तो उसके मालिक हाथ खड़े कर देते हैंl शायद बंगारू लक्ष्मण स्टिंग ऑपरेशन के बाद तहलका पर हुए दमन से उभरा डर उन्हें सच का साथ देने की हिम्मत नहीं देताl पर एक अकेली 26 साल की लड़की को इस खतरनाक स्टोरी पर काम करने के लिए guinea pig बनाकर भेजते वक्त शायद ही उन्होंने ऐसा सोचा होगाl

इसके बाद वह लड़की हर अखबार, हर न्यूज़ चैनल, हर मीडिया हाउस व हर पब्लिकेशन के पास जाती है और हर जगह से उसे निराशा हाथ लगती हैl इस बीच वह पिछले पांच साल भयंकर अवसाद, डर और निराशा के साए में जीती है और अंत में खुद अपनी इस पुस्तक को प्रकाशित करती हैl

जी हाँ, हम बात कर रहे राणा अय्यूब की पुस्तक “gujrat files anatomy of a cover up” कीl कई दिल दहला देने वाले, रोंगटे खड़े कर देने वाले व इंसानियत की आत्मा को झकझोर देने वाले तथ्यों को उजागर करती इस पुस्तक को आप amazon से भी खरीद सकते हैं. लिंक नीचे है:

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उस जांबाज़ लड़की, उस जुझारू पत्रकार द्वारा बेनकाब किये गए सच और उस सच को दबाने, और चुप कर देने को खड़े बदमाशों के साथ उसकी इस लड़ाई की दास्ताँ, इस पुस्तक को खरीदें, न सिर्फ खरीदें, अधिक से अधिक लोगों को इस पुस्तक तक पहुंचाएंl इससे पहले कि सच खामोश हो जाए, या सच बोलने की जुर्रत करने वाले खामोश कर दिए जाएं, हमें उनके साथ खड़ा होना ही होगा, हम एक ऐसे असाधारण युग में जी रहे हैंl

कामरेड शिखा के फेसबुक वॉल से.

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दिल्ली में उर्दू पत्रकारिता और शाहिद की यह किताब

हाल में, बिहार के ही एक चर्चित उर्दू पत्रकार, शाहिदुल इस्लाम, ने उर्दू सहाफ़त (पत्रकारिता) को लेकर एक गंभीर, शोधपरक किताब लिखी है। शीर्षक है ‘दिल्ली में असरी उर्दू सहाफ़त‘, यानी दिल्ली की समकालीन उर्दू पत्रकारिता। एक उप-शीर्षक भी है इस किताब का: ‘तस्वीर का दूसरा रुख़‘। अपने निष्कर्षों में, यह किताब उर्दू पत्रकारिता के बारे में जागरूक पाठकों की आम धारणा को ही मजबूत आधार देती है। साथ ही, उर्दू अख़बारों के अपने दावों को गहरी चुनौती भी देती है, शाहिद की यह किताब।

किताब का संबंध, सीधे तौर पर, दिल्ली की उर्दू पत्रकारिता से है, लेकिन इसके शुरूआती अध्यायों में आज़ादी के पूर्व और बाद के जो हालात बयान किए गए हैं, और उर्दू पत्रकारिता का जो इतिहास दर्ज किया गया है, वो दिल्ली की सीमा से बाहर, पूरे उर्दू इलाक़े की भाषाई बदहाली को रेखांकित करते हैं। किताब में कई ऐसे सवालों का ज़िक्र है, जो संकीर्ण विचारों की ढकी-छिपी वकालत करने वाले बौद्धिकों के मुखौटे उतारते हैं। भाषा को किसी समुदाय विशेष से जोड़कर देखने के आदी लोगों की आज भी हमारे समाज में कमी नहीं। हद तो यहां तक है कि ‘ग़ालिब दो सदी’ (1997) के एक आयोजन में अली सरदार जाफ़री का मशहूर व्याख्यान ‘ग़ालिब का सोमनात-ए-ख़्याल’ भी उन्हें ‘सांप्रदायिक’ नज़र आता है! ग़ालिब और मीर की दुहाई देने वाले कुछ बौद्धिकों के लिए भी ये नाम ‘फ़िरक़ों‘ की याद दिलाने वाले ही लगते हैं। यह वैचारिक दुराग्रह नहीं, तो और क्या है? उन्हें, मिसाल के तौर पर, मीर का यह शेर याद रखना चाहिए –

उसके फ़रोग़े हुस्न से झमके है सब में नूर
शमए हरम हो या कि दिया सोमनाथ का

उर्दू की इस रौशन विरासत को दरकिनार करते हुए इसे सांप्रदायिक चश्मे से देखने वालों की हमारे राजनीतिक समाज में भी कमी नहीं।  सच को झूट बताने का कोई न कोई अवसर निकाल कर, वो उर्दू के हमदर्दों पर हमले करते रहते हैं। उन्हें याद नहीं रहता कि इन हमलों की आंच उर्दू के साथ-साथ हिंदी समेत तमाम भारतीय भाषाओं तक पहुंचती है। ये स्थितियां सामाजिक सहिष्णुता के स्वाभाविक तक़ाज़ों को भी चोट पहुंचाती रहती हैं।

आज़ादी के बाद, दिल्ली समेत पूरे देश की उर्दू पत्रकारिता को जो संकट के दिन देखने पड़े, उसका विस्तृत ब्योरा इस किताब में पेश किया गया है। क़दम-क़दम पर, उर्दू अख़बारों और उर्दू पत्रकारों को गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ा है। एक समय में, यह चुनौती इतनी घनीभूत हो गई थी कि कुलदीप नैयर जैसे विख्यात पत्रकार को भी उर्दू पत्रकारिता छोड़कर अंग्रेजी की राह पकड़नी पड़ी। उन्होंने अपना करियर अक्तूबर 1947 में उर्दू अख़बार ‘अंजाम‘ से शुरू किया था। स्वयं उनके शब्दों में, ख्यात उर्दू कवि हसरत मोहानी ने उन्हें उर्दू पत्रकारिता छोड़ने की सलाह दी थी। उन दिनों, मोहानी मानने लगे थे कि भारत में उर्दू पत्रकारिता का कोई भविष्य नहीं रह गया है। कुलदीप नैयार की राय में, हसरत मोहानी अपने राजनीतिक विश्लेषण में ग़लत नही थे। (पृष्ठ 73-76)।

शाहिदुल इस्लाम ने अपनी किताब में उर्दू सहाफ़त पर होने वाले ‘जुल्मो-सितम‘ की दास्तान ही नहीं लिखी, उन्होंने उर्दू अख़बारों की दुनिया में जारी फ़र्जी आंकड़ों के खेल पर भी गंभीर टिप्पणियां की हैं। सर्कुलेशन के संदिग्ध आंकड़ों की बुनियाद पर अख़बारों को मिलने वाले सरकारी विज्ञापन और अन्य रियायतें भी उनके निशाने पर हैं। वो इस मामले में बेहद निर्मम और सख़्त-जान हैं। उनकी क़लम हिचकना नहीं जानती।

मैं पिछले 15 वर्षों से शाहिद के निष्पक्ष समाचार-संवाद, तर्क-सम्मत विश्लेषण तथा वस्तुपरक वैचारिक कॉलम पढ़ता रहा हूं। ‘कौमी तंज़ीम‘ (पटना) से लेकर  ‘हिंदुस्तान एक्सप्रेस‘ (दिल्ली) तक उनके सहाफ़ती सफ़र में कई मुकाम अवश्य ऐसे आए, जब उन्हें गंभीर नीतिगत चुनौती का सामना हुआ, मगर वो हमेशा सच के साथ खड़े रहे। उनकी भाषा अपने तेवर और दृष्टि-संपन्नता के कारण पसंद की जाती है। वो पत्रकारिता को ‘सनसनी‘ का रूप देने के सख़्त ख़िलाफ़ हैं। उनके कॉलम घटनाओं के त्वरित विश्लेषण के लिए ध्यान से पढ़े जाते हैं।

इस अहम किताब के लिए उन्हें बधाई देते हुए कहना चाहता हूं: काश बिहार की उर्दू पत्रकारिता को लेकर भी ऐसी ही एक गंभीर किताब लिखी जाती! शीघ्र अगर इस किताब का हिन्दी संस्करण आ सके, तो अच्छा है। ज़ाहिर है, यह काम किसी संस्था के माध्यम ही हो सकेगा।

इस पुस्तक समीक्षा के लेखक जाबिर हुसैन बिहार विधान सभा के पूर्व सभापति एवं राज्य सभा के सदस्य रह चुके हैं. हिंदी एवं उर्दू साहित्या के अलावा पत्रकारिता से भी इनका गहरा संबंध रहा है. साहित्य की दुनिया में जाबिर हुसैन एक बड़ा नाम हैं. जाबिर हुसैन से संपर्क 09431602575 के जरिए किया जा सकता है.

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इस किताब में बेचैनी से भरा हुआ भारत अपने हर रंग-रूप और हर माहौल-मूड में दिखाई देगा

मित्रों,

यह लिंक http://www.amazon.in/dp/9384056022 अमेजन की है। इसे देख लीजिएगा। जैसा कि आप जानते हैं कि 2010 से 2015 के बीच दैनिक भास्कर के नेशनल न्यूजरूम में रहते हुए मैंने स्पेशल स्टोरी कवरेज के लिए भारत की करीब 8 यात्राएं की हैं। शायद ही कोई विषय हो, जो देश के किसी न किसी कोने से कवर न हुआ हो। अखबार के संडे जैकेट पर तीन भाषाओं में देशव्यापी कवरेज की एक झलक आप सबने देखी-पढ़ी।

लंबी और लगातार यात्राओं के अनुभव 500 पेज की एक किताब में आ गए हैं। यह किताब अमेजन पर उपलब्ध है, जिसमें करीब 65 यादगार रंगीन तस्वीरें भी हैं। ऊपर दी गई लिंक आज ही मिली है। इस किताब को मैंने ट्रेनों, होटलों, रेलवे स्टेशन के वेटिंग हॉल और एयरपोर्ट पर लंबे इंतजार के दौरान ही लिखा और पूरा किया है। इसमें बेचैनी से भरा हुआ भारत अपने हर रंग-रूप और हर माहौल-मूड में दिखाई देगा। उम्मीद है आपको पसंद आएगी।

विजय मनोहर तिवारी
vijaye9@gmail.com
09893043200

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चीन के बारे में लिखने वाले चुनिंदा पत्रकारों में शामिल हुए अनिल आज़ाद पांडेय

‘मेड इन चाइना’ से इतर छवि पेश करती है, ‘हैलो चीन’ किताब

किताब शीर्षक- ‘हैलो चीन : देश पुराना, नई पहचान’
लेखक- अनिल आज़ाद पांडेय
प्रकाशन- राजकमल प्रकाशन

वैसे दुनिया भर में मेड इन चाइना के तमाम किस्से हैं। लेकिन हैलो चीन किताब चीन के बनने की, एक ताकत के रूप में उभरने की, उसकी मुकम्मल पहचान की कहानी को सामने लाती है। हाल के वर्षों में चीन पहुंचने वाले भारतीयों की तादाद में काफी इजाफ़ा हुआ है। जिसमें चीन-भारत के बीच बिजनेस आदि के क्षेत्र में करने वाले सबसे अधिक हैं। जबकि चीन के विकास से आकर्षित होकर चीनी भाषा सीखने वाले छात्रों और निजी कंपनियों में काम करने वाले लोगों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। लेकिन चीन में रहकर उस अजनबी से देश को समझने वाले और उसके बारे में कलम चलाने वाले पत्रकारों की संख्या बहुत कम है। अपनी लेखनी को किताब का रूप देने वाले और भी कम हैं। लेखक अनिल आज़ाद पांडेय शायद चुनिंदा पत्रकारों में से एक हैं, जिनहोंने चीन के बारे में किताब लिखने का सफल प्रयास किया है। लेखक मानते हैं कि किताब में मौजूद जानकारी भारतीय लोगों की चीन और चीनियों के बारे में समझ को बढ़ाएगी।

सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और विकास के वर्तमान राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य को देखें तो चीन उतना ही दिलचस्प देश है, जितना भारत रहा है। लेकिन कई कारणों से हम चीन के बारे में ज्यादा नहीं जानते। चीन में बहुत कुछ ऐसा है, जिसे जानना न सिर्फ दोनों देशों के बेहतर रिश्तों के लिए जरुरी है, बल्कि ऐसे भी कई पहलू हैं, जिन्हें जानकर हम अपने देश में भी कुछ बेहतर नागरिक होने की कोशिश कर सकते हैं। मसलन नागरिक अनुशासन, स्वच्छता के प्रति सार्वजनिक सहमति और इसके लिए किए जाने वाले प्रयास।

निजी अनुभवों और अध्ययन के आधार पर लिखी गई यह पुस्तक हमें चीन के इतिहास, वहां के रीति-रिवाजों, पारिवारिक संरचना, विवाह परंपरा, परिवहन व्यवस्था,खान-पान की शैलियों के साथ-साथ चीन की वर्तमान संरचना और राजनयिक भूमिका से भी परिचित कराती है। इस पुस्तक में लेखक ने चीन में लगभग सात वर्षों तक रहते हुए अपने अनुभव, वहां के राजनीतिक-आर्थिक मुद्दों और चीन-भारत संबंधों पर भारत के राष्ट्रीय समाचार पत्रों में प्रकाशित लेखों को भी शामिल किया है।

भारत और चीन के संबंध प्रगाढ़ बनाने में योगदान देने वाली शख्सियतों के बारे में भी इसमें उल्लेख किया गया है। जिनमें विश्व गुरु रवींद्र नाथ टैगोर और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान चीन की मदद करने वाले डॉ. कोटनिस शामिल हैं।
 
पड़ोसी-
वैसे, भारत में रहकर चीन को समझना और जानना आसान नहीं है। भले ही दोनों देशों की सरहदें आपस में मिली हुर्ह हैं, दोनों के व्यापारिक संबंध भी कोई नए नहीं हैं। दोनों प्राचीन सभ्यता और संस्कृति वाले देश हैं। बौद्ध धर्म के बारे में जानने के लिए लगभग तीसरी शताब्दी में फाह्यान भारत पहुंचे। वहीं चीन में बौद्ध धर्म का प्रसार करने भारत से कई विद्वान और बौद्ध भिक्षु भी चीन गए।1962 के युद्ध को छोड़कर दोनों पड़ोसियों के बीच कोई बड़ी कटुता नहीं रही है। बावजूद इसके हम चीन को बहुत कम जानते हैं। इसकी एक वजह भाषा है, तो दूसरी भ्रांतियां हैं। हालांकि विकास के मामले में भारत में लोग चीन का उदाहरण जरूर देते हैं। चीन में रहते हुए लेखक ने महसूस किया कि भारतीय लोगों को चीन के बारे में रूबरू करवाना चाहिए।

आम चीनी लोगों की बात करें तो उनमें अदब है, अपने देश के लिए जज्बा है, श्रम के प्रति सम्मान है। उन्हें कानून को तोड़ने की नहीं बल्कि पालन करने की आदत है। इस सबका अहसास लेखक ने उनके साथ रहकर किया है। चीन में लेखक अनिल पांडेय का शुरुआती दौर था। एक दिन उनके किचन में ऊपर के फ्लैट से पानी टपक रहा था। रात का समय था, लेखक को समझ नहीं आ रहा था। इसी बीच किसी ने दरवाजा खटखटाया, लेखक ने दरवाजा खोला तो एक चायनीज़ खड़ा था। वह लेखक को देखकर हक्का बक्का रह गया। उसे यह आभास नहीं था कि इस कमरे में कोई विदेशी रहता है। उसने सॉरी बोला और सुबह कमरे की सफाई करने की बात कही। हालांकि कमरे में पानी ज्यादा नहीं था और इसमें उसकी कोई गलती नहीं थी। दरअसल बिल्डिंग के ड्रेनेज से पानी लीक हो गया था। लेखक से सॉरी कहने आया वह व्यक्ति एक प्राइवेट कंपनी में बड़ी पोस्ट पर था। वह चीन में लेखक का पहला दोस्त बना। कहने का मतलब है कि शिष्टाचार चीनियों की आदत में शुमार है।

इस किताब में चीनी लोगों की देश भक्ति और सेवा करने की आदतों का भी वरणन किया गया है। रेलवे स्टेशन और सड़कों पर तैनात स्वयं सेवकों में अधिकांश रिटायर्ड कर्मचारी होते हैं। ये लोग अपनी सामान्य दिनचर्या में से कुछ समय निकालकर देश सेवा में देते हैं। काम छोटा या बड़ा नहीं होता है, इसे भी चीन में महसूस किया जा सकता है। अच्छा काम करने वाले कर्मचारियों की फोटो अपार्टमेंट्स में तक लगी रहती है। हालांकि देखने में यह सब सामान्य चीजें हैं, मगर किसी देश को आगे ले जाने में इनका अहम योगदान होता है। चीन ने विकास के क्षेत्र में जो कायाकल्प किया है वो दुनिया के लिए आश्चर्य हो सकता है। आसमान छूती इमारतें और चौड़ी सड़कें यह सब कुछ चीनियों के जज्बे का परिणाम है। उम्मीद है कि यह किताब चीन को गहराई से जानने की जिज्ञासा पैदा करने में सहायक साबित होगी।
 
लेखक का अनुभव-
 
मैं पिछले सात सालों से चीन में हूं, और इसी अनुभव को समेटते हुए एक किताब लिखने का साहस किया है। 2009 में अमर उजाला के राष्ट्रीय ब्यूरो से चीन जाने से पहले मेरे मन में भी कुछ भ्रांतियां थी। लेकिन वहां पहुंचने के बाद ऐसा लगा, मीडिया में हम जो पढ़ते और देखते हैं, वह सच्चाई से पूरी तरह मेल नहीं खाता। हां, कुछ चीजें हैं, जिसमें वहां अब भी सुधार की आवश्यकता है। चीन में रहते हुए मुझे कई शहरों और छोटे गांवों में भी रहने का मौका मिला। गांवों में पलायन एक समस्या जरूर है, लेकिन विकास की दौड़ में ये क्षेत्र भी शामिल किए गए हैं। हालांकि गांवों के विकास मॉडल को अभी और विस्तार देने की जरूरत है।

चीन जिस तेज़ी से विकास कर रहा है, उसे मैंने खुद वहां रहकर महसूस किया है। गगनचुंबी  इमारतें और साफ-सुथरी व चौड़ी सड़कें यह सब कुछ चीनी लोगों की मेहनत का परिणाम है। तकनीक के क्षेत्र में भी चीन बहुत आगे बढ़ चुका है। भारत में हाई स्पीड ट्रेन चलाने को लेकर हो रही कोशिशों के बीच यह जानना आवशयक है कि दुनिया का सबसे लंबा हाई स्पीड रेल मार्ग, जो कि 19 हज़ार किमी. है, चीन में मौजूद है। चीन में तेज गति की ट्रेनों की रफ्तार 300 किमी. प्रति घंटा से अधिक होती है और सुरक्षित भी। वहां के ट्रेन स्टेशन एयरपोर्ट्स की तरह साफ-सुथरे और व्यवस्थित होते हैं। जबकि ट्रेनें भी पूरी तरह स्वच्छ। सबसे अधिक जिस बात ने मुझे प्रभावित किया है। वह है कि चीनी लोगों में अपने देश के लिए प्यार है और लोग समय के पाबंद हैं। समय की यही पाबंदी ट्रेनों आदि के संचालन में साफ दिखती है। मैंने ट्रेनों में कई बार सफ़र किया है, लेकिन ये निर्धारित समय से एक मिनट भी लेट नहीं चलती। लोगों की बात करें तो चीन के आम लोग भारत को एक सुंदर और रहस्यमयी देश मानते हैं। वे भारतीय खान-पान, बॉलीवुड, इतिहास आदि के बारे में बड़ी दिलचस्पी रखते हैं। किसी भी उम्रदराज व्यक्ति से मिलने पर, वह, आवारा हूं, गाना गुनगुनाने लगता है। एक भारतीय होने के नाते सुखद आश्चर्य देता है। मुझे वहां रहते हुए लोगों से मिलकर कभी भी महसूस नहीं हुआ कि चीन हमारा दुश्मन है।
 
लेखक का परिचय-
 
पिछले 12 वर्षों से पत्रकारिता जगत में सक्रिय। इस दौरान दिल्ली में, अमर उजाला और राजस्थान पत्रिका के नेशनल ब्यूरो में काम किया। दो साल से अधिक समय तक चीन-भारत संबधों पर निकलने वाली पत्रिका सेतु संबंध का संपादन किया। भारत के राष्ट्रीय अखबारों में समसामयिक मुद्दों पर संपादकीय और पत्रिकाओं में लेखन जारी। पिछले सात सालों से चायना रेडियो, बीजिंग में कार्यरत।

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अनिता भारती की किताब को ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान 2016’ की घोषणा

स्त्रीवादी पत्रिका ‘स्त्रीकाल, स्त्री का समय और सच’ के द्वारा वर्ष 2016 के लिए ‘सावित्री बाई फुले वैचारिकी सम्मान’ लेखिका अनिता भारती की किताब ‘समकालीन नारीवाद  और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ (स्वराज प्रकाशन) को देने की घोषणा की गई है. अर्चना वर्मा , सुधा अरोड़ा , अरविंद जैन,  हेमलता माहिश्वर, सुजाता पारमिता, परिमला आम्बेकर की सदस्यता वाले निर्णायक मंडल ने यह निर्णय 3 अप्रैल को 2016 को बैठक के बाद लिया . 2015 में पहली बार यह सम्मान शर्मिला रेगे को उनकी किताब ‘ अगेंस्ट द मैडनेस  ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकर्स  राइटिंग ऑन ब्रैहम्निकल पैट्रीआर्की ‘ (नवयाना प्रकाशन) के लिए दिया गया था.

इस सम्मान के लिए 2009 से 2015  तक हिन्दी में लिखी गई या अनूदित स्त्रीवादी वैचारिकी की  प्रकाशित किताबों पर विचार करते हुए निर्णायक मंडल ने अंतिम तौर पर प्रमिला केपी, सुधा सिंह, रेखा कास्तवार, कृष्ण कुमार,  रोहिणी अग्रवाल और अनिता भारती की किताबों, क्रमशः ‘ यौनिकता बनाम अध्यात्मिकता’ ‘ज्ञान का स्त्रीवादी पाठ’ ‘स्त्रीचिंतन की चुनौतियां’, ‘चूड़ी बाजार में लडकी’ ‘हिन्दी उपन्यास का स्त्रीवादी पाठ’ तथा ‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ पर विचार किया. निर्णय के लिए दो दर्जन से अधिक किताबों पर विचार किया गया.

निर्णायक मंडल ने अपने अंतरिम नोट में कहा कि: ‘दलित स्त्रीवाद की किसी आंगिक (ऑर्गनिक) विदुषी  द्वारा दलित स्त्रीवाद की सैद्धांतिकी निर्मित करने की दिशा में हिन्दी की यह पहली किताब है . इस किताब में 7 खण्ड हैं : क्रमश: दलित लेखिकाओं का स्त्रीवादी स्तर, खुद से गुजरते हुए, साहित्यकार प्रेमचन्द और दलितस्त्री, संघर्ष के विविध आयाम, छूटे पन्ने, पितृसत्ता को चुनौती, अम्बेडकरवाद और दलित साहित्य। इस प्रकार- किताब मूलत: स्त्रीवादी लेखन के इतिहास- वर्तमान को केन्द्रित कर समकालीन स्त्रीवाद में दलित स्त्री के प्रतिरोध को चिहनित और स्थापित करती है।’

‘यह सम्मान 20 जुलाई, 2016 को दिया जायेगा,’ यह जानकारी देते हुए स्त्रीकाल पत्रिका के संपादक संजीव चंदन ने कहा कि ‘यह दिन ऐतिहासिक दिन है. इस दिन ही 1942 में डा. बाबा साहेब आम्बेडकर के द्वारा प्रेरित महिलाओं का ऐतिहासिक सम्मलेन नागपुर में संपन्न हुआ था, जिसमें 25000 महिलाओं ने भाग लिया था.’ इस वर्ष देश बाबा साहेब आम्बेडकर का 125 वी जयंती भी मना रहा है. इस लिए भी दलित स्त्रीवाद की एक किताब के लिए दलित स्त्री लेखिका अनिता भारती को सम्मानित करने का निर्णायक मंडल का निर्णय महत्वपूर्ण है. इस सम्मान के लिए किताब की लेखिका / लेखक को स्त्रीवादी विचारक और अधिवक्ता अरविंद जैन के द्वारा 12 हजार रूपये की राशि दी जाती है.

‘Savitribai Phule Vaichariki Samman 2016’ to Anita Bharti’s book

The feminist magazine, ‘Streekal, Stree ka Samay aur Sach’ has announced to confer ‘Savitribai Phule Vaichariki Samman,2016’  to the writer Anita Bharti for her book ‘Samkaleen Nareevad Aur Dalit Stree Ka Pratirodh’ (Swaraj Prakashan). The selection committee comprising of Archana Verma, Sudha Arora, Arvind Jain, Hemlata Mahishwar, Sujata Parmita, Parimala Ambedkar took the decision after the meeting held on 3 April 2016.

This honour for the first time was conferred in 2015 to Sharmila Rege for her book ‘Against the madness of Manu; B.R. Ambedkar’s writing on Brahminical Hierarchy’ (Navyana Prakashan). This time the books that were lastly selected for consideration for the honor were ‘Yaunikta banam adhyatmikta’, ‘Gyan ka Streevadi Path’, ‘Streechintan ki Chunautiyan’,  ‘Chudi Bazar Me Ladki’, ‘Hindi Upanyas ka Streevadi Path’ and ”Samkaleen Nareevad Aur Dalit Stree Ka Pratirodh ‘ written respectively by Pramila K.P., Sudha Singh, Rekha Kastavar, Krishna Kumar, Rohini Agrawal and Anita Bharti and were from among many such books written in Hindi or translated between 2009 to 2015 in the genre of feminist thinking (ideology). More than two dozen books were considered for this honor.

The selection committee in its interim note said that ‘this is the first book in Hindi for the purpose of theorizing the concept of dalit feminism that has been written by an organic intellectual lady who is well known for her long association with the very idea of Dalit Feminism’. The book has 7 parts which are respectively related with the the ideas of the level of feminist urge in dalit female writers, the reflections while going through oneself, writer Premchand and dalit women, different dimensions of struggle, the pages which are left to be written, the challenge of patriarchy and Amberkarism and dalit literature. Thus the book locates and establishes the resistance of dalit women in the contemporary feminism keeping the history and the present of the feminist writing in center.’

‘The honor will be conferred on 20 July, 2016. While sharing the information Sanjeev Chandan,  the editor of the magazine Streekal said that, ‘ This is a historic moment. On the same date in 1942 the historic conference of women was organized on the inspiration of  Dr. Baba Saheb Ambedkar which was attended by 25000 women.’ The country is also celebrating this year the 125th birth anniversary of Baba Saheb Ambedkar. Therefore the decision of the selection committee to honor a Dalit woman  writer,  Anita Bharti, for a book on dalit feminism is of great importance. An amount of Rs 12000 is conferred to the writer by the feminist thinker and advocate,  Arvind Jain,  as a token for this honor.

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‘जानेमन जेल’ के लिए उत्सवधर्मी यशवंत भड़ासी को सलाम!

Ayush Shukla : लोग कई दशक तक पत्रकारिता करते रहते हैं और जेल जाने की नौबत तक नहीं आपाती, क्योकि वे ऐसा कुछ लिख-पढ़ नहीं पाते,  कुछ हंगामेदार कर नहीं पाते कि उन्हें भ्रष्ट लोग भ्रष्ट सिस्टम जेल भेज पाता। Yashwant Singh की जानेमन जेल से साभार। मजा आ गया पढ़ के। किसी भी जेल जाने वाले व्यक्ति को यह पुस्तक जरूर पढ़नी चाहिए। उत्सवधर्मी यशवंत भड़ासी को सलाम।
आयुष शुक्ला
क्लस्टर इनोवेशन सेंटर
दिल्ली विश्वविद्यालय

Mohammad Anas :  नेहरू और सावरकर दोनों ने जेल में दस साल गुज़ारे। नेहरू जेल में रहते हुए ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ लिखते हैं तो दूसरी तरफ़ महान स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर अंग्रेज़ों के पास छह बार अर्ज़ी लगाते हैं माफ़ी की। जेल में रहते हुए कुछ भी लिखा जा सकता है, हमारा एक दोस्त है Yashwant Singh वो जब जेल में था तो ‘जानेमन जेल’ लिख दिया। भक्त जन नेहरू और सावरकर में आदर्श व्यक्तित्व किसका मानते हैं, पता है आपको? सावरकर को, उसे वीर भी कहते हैं। झूठे इतिहास पर इतराने वाले पगलैट संघी देश भक्त बने फिरते हैं,जबकि पूर्वजों ने मुखबिरी और माफ़ी की लाइन लगा दी थी।

पत्रकार द्वय आयुष शुक्ला और मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से.

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किसानों की आत्‍महत्‍या पर केंद्रित पंकज सुबीर के नये उपन्‍यास ‘अकाल में उत्‍सव’ की समीक्षा

पंकज सुबीर हमारे समय के उन विशिष्ट उपन्यासकारों में है जिनके पास ‘कन्टेन्ट’ तो है ही उसे अभिव्यक्त करने की असीम सामर्थ्य भी है। किस्सा गोई की अद्भुत ताकत उनके पास है। ‘अकाल में उत्सव’ पंकज सुबीर का हाल में प्रकाशित उपन्यास है, जिसकी चर्चा हम यहां कर रहे हैं। पंकज सुबीर ने अपने पहले ही उपन्यास ‘ये वो सहर नहीं’ (वर्ष 2009) से जो उम्मीदें बोई थीं वे ‘अकाल में उत्सव’ तक आते-आते फलीभूत होती दिख रही हैं। नौजवान लेखक पंकज सुबीर इन अर्थों में विशिष्ट उपन्यासकार है कि वे अपने लेखन में किसी विषय विशेष को पकड़ते हैं और उस विषय को धुरी में रखकर अपने पात्रों के माध्यम से कथ्य का और विचारों का जितना बड़ा घेरा खींच सकते हैं, खींचने की कोशिश करते हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे विषयवस्तु, पात्रों और भाषा का चयन बड़ी संजीदगी से करते हैं और उसमें इतिहास और मनोविज्ञान का तड़का बड़ी खूबसूरती से लगाते हैं।

वे अपने कथ्य को भाषा के हथियार से और भी मारक बना देते हैं। संभवतः इसीलिए उनके पात्र लोक भाषा का प्रयोग करते हैं, आवश्यकता पड़ने पर अंग्रेजी भी बोल लेते हैं और वो अंग्रेजी जो आज की आम फहम जुबान है। तभी तो ‘अकाल में उत्सव’ के ग्रामीण पात्र जहां इन्दौर-भोपाल-सिहोर जनपदों के आस-पास के क्षेत्र में बोले जाने वाली अपभ्रंश ‘मालवी’ भाषा में बातचीत करते हैं, वहीं कलेक्टर और ए.डी.एम. जैसे इलीट क्लास केरेक्टर हिन्दी मिश्रित अंग्रेजी में बोलते नजर आते हैं। ‘अकाल में उत्सव’ में भाषा के इस बेहतरीन प्रयोग के साथ-साथ पंकज सुबीर ने किसानों और शहरी पात्रों की मानसिक दशा और उनके मन में चल रहे द्वन्दों-भावों को अभिव्यक्ति देने में जो चमत्कार उत्पन्न किया है वह सराहनीय है।

बात आगे बढ़ाते हैं और चर्चा करते हैं उपन्यास ‘अकाल में उत्सव’ की विषय वस्तु की। उपन्यास ग्रामीण परिवेश और शहरी जीवन की झांकी को एक साथ पेश करते हुए आगे बढ़ता है। अर्थात एक ही समय में दो कहानियों का मंचन एक साथ इस उपन्यास में होता दिखता है। एक ओर मुख्यमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र के एक गांव ‘सूखा पानी’ का एक आम किसान ‘रामप्रसाद’ इस उपन्यास का प्रमुख पात्र है जिसकी आंखों में आने वाली फसल की उम्मीदें जवान हैं तो दूसरी तरफ सरकारी अमले का मुखिया श्रीराम परिहार आई.ए.एस. नाम का एक पात्र है जो शहर का कलेक्टर है, जिसके इर्द-गिर्द कुछ अधिकारी-समाजसेवी -नेता-पत्रकार टाइप लोग हैं जो इसी दौरान शहर में ‘नगर उत्सव’ के आयोजन को लेकर सक्रिय हैं। जहां रामप्रसाद की उम्मीदें परिपक्व होने से पहले ही बेमौसम बरसात की वजह से उजाड़ हो जाती हैं वहीं दूसरी ओर ‘नगर उत्सव’ का आयोजन पूरी ठसक के साथ किया जाता है। रामप्रसाद के पारिवारिक जीवन में उसकी पत्नी, बच्चे, भाई, बहिनें, बहनोई इत्यादि हैं, जिनकी परिधि में वह केन्द्रीय पात्र के रूप में उभरता है। दूसरी ओर, जैसा कि अवगत हैं कि श्रीराम परिहार और उसके इर्द-गिर्द कुछ अधिकारी-समाजसेवी -नेता-पत्रकार टाइप लोग हैं जो ‘नगर उत्सव’ के आयोजन को लेकर अपना उल्लू सीधा करने में लगे हुए हैं। इस दुनिया की अपनी ही सोच-भाषा-दर्शन-जीवन शैली है, जिसमें वे जीते हैं। फरवरी-मार्च का महीना चल रहा है।

बजट लेप्स न हो जाए इसलिए सरकारी व्यय पर ‘नगर उत्सव’ का मनाया जाना और इसी दौरान ओलावृष्टि से किसान रामप्रसाद की न केवल फसल बल्कि जीवन का करूणांत इस उपन्यास का सार है। यद्यपि पाठक को शुरूआती कुछ पृष्ठों को पढ़ने के बाद ही पूरी कथा और कमोबेश कथा के अंत का अनुमान लग जाता है किन्तु पात्रों की भाषा-संवाद और उनकी मनोदशा पाठकों को इस उपन्यास से अंत तक जुड़े रखने के लिए बाध्य करती है। किसी उपन्यासकार के लिए भला इससे बड़ी सफलता और क्या हो सकती है? दिलचस्प बात ये है कि नितान्त अलग सी लगने वाली इन दोनों दुनियाओं का एक सम्मिलन स्थल भी है जहां इन दो दुनियाओं के मुख्य पात्र अनायास रूप से मिलते हैं। अर्थात उपन्यास में दो-तीन बार ऐसे अवसर आते हैं जब किसान रामप्रसाद, कलेक्टर श्रीराम परिहार से अनायास मिलता है। तीनों बार इन दोनों पात्रों के बीच कोई खास वार्तालाप तो नहीं होता लेकिन तीनों बार ही ये मुलाकातें उपन्यास की कथा वस्तु को बहुत ही दिलचस्प तरीके से विस्तार प्रदान करती हैं।

उपन्यास में ग्रामीण जीवन विशेषतया किसानों की जिन्दगी पर बहुत करीने से रोशनी डाली गयी है। किसान की सारी आर्थिक गतिविधियां कैसे उसकी छोटी जोत की फसल के चारों ओर केन्द्रित रहती हैं और किन-किन उम्मीदों के सहारे वो अपने आपको जीवित रखता है, यह इस उपन्यास का कथानक है। पंकज सुबीर ने इस उपन्यास में पकती फसल से लगी उम्मीदों के सहारे सुनहरे भविष्य की कल्पना में खोए किसान ‘रामप्रसाद’ के मार्फत आम भारतीय किसान का हाल उकेरा है। ‘रामप्रसाद’ के माध्यम से पंकज सुबीर बताते हैं कि आम किसान आज भी मौसम की मेहरबानी पर किस हद तक निर्भर है। मौसम के उतार-चढ़ाव के साथ ही किसानों की उम्मीदों का ग्राफ भी ऊपर नीचे होता रहता है। मौसम का परिवर्तन इस तेजी के साथ होता है कि किसान को संभलने का मौका भी नहीं मिलता। सेंसेक्स एक बार डूबे तो संभलने की उम्मीदें लगायी जा सकती हैं मगर किसान की फसल पर अगर पानी-पाला पड़ गया तो संभलने के सारे विकल्प समाप्त हो जाते हैं। मौसम की आंख मिचौलियों के बीच किसान न केवल तहसील-बिजली-बैंक-को’आपरेटिव जैसे विभागों के बकाये को चुकाता है बल्कि तमाम सामाजिक रस्मों को भी पूरा करता है। गांवों में आज भी विवाह और मृत्यु दोनों ही, परिवार को समान रूप से क़र्ज़ें में डुबा कर चले जाते हैं। विवाह में भी वही होता है, मेहमान जुटते हैं, पूरे गांव को और आस-पास के रिश्तेदारों को खाना दिया जाता है और मृत्यु होने पर भी वही होता है। अंतर सिर्फ़ इतना होता है कि विवाह के अवसर पर एक उल्लास होता है मन में और मृत्यु के अवसर पर दुःख होता है। किसान इन आयोजनों में आने वाले खर्चों को भी वहन करता है भले ही ये किसान की पत्नी के शरीर पर बचे एक मात्र गहने चांदी से बनी ‘तोड़ी’ से पूरे होते हों। किसान की जद्दो जहद ये भी है कि वह ‘तोड़ी’ को बेचे या गिरवी रखे . . . अर्थात यहां किसान के पास उपलब्ध विकल्प कितने तंग हैं, ये बस महसूस ही किये जा सकते हैं। इन गहनों को खरीदने-बेचने वाला एक ही समुदाय है जो ‘साहूकार’ के नाम से जाना जाता है।

किसान और साहूकार का आपसी रिश्ता पीढ़ियों पुराना होता है और पूरी तरह विश्वास पर आधारित होता है। साहूकारों ने तो अपना ही गणित और पहाड़े बना रखे हैं। किसान जब आता, तो वह अपना जोड़-भाग किसान को बताने लगता है ”देख भाई तीन महीने का हो गया ब्याज, तो ढाई सौ के हिसाब से ढाई सौ तीया पन्द्रह सौ और उसमें जोड़े चार सौ पिछले तो पन्द्रह सौ और चार सौ जुड़ के हो गए छब्बीस सौ। उसमें से तूने बीच में जमा किए तीन सौ, तो तीन सौ घटे छब्बीस सौ में से तो बाक़ी के बचे अट्ठाइस सौ, ले माँड दे अँगूठा अट्ठाइस सौ पे। समझ में आ गया ना हिसाब? कि फिर से समझाऊँ?’ किसान को क्या समझ में आना। वह चुपचाप से अपना अँगूठा लगा कर उठ के आ जाता है। रकम बढ़ती जाती, ब्याज बढ़ता जाता है और ज़ेवर धीरे-धीरे उस ब्याज के दल-दल में डूबता जाता, डूबता जाता है। किसान के जीवन में बढ़ते दुख उसकी पत्नी के शरीर पर घटते ज़ेवरों से आकलित किए जा सकते हैं। नई बहू जब आती है तो नए घाघरे, लुघड़े, पोलके के साथ तोड़ी, बजट्टी, ठुस्सी, झालर, लच्छे, बैंदा, करधनी में झमकती है। फिर धीरे-धीरे उम्र बढ़ने के साथ खेती-किसानी की सुरसा अपना मुँह फाड़ती है और महिलाओं के शरीर पर से एक-एक ज़ेवर कम होता जाता है। ज़ेवर जो शरीर से उतर कर किसी साहूकार की तिजौरी में गिरवी हो जाते हैं। और किसान के घर की चीज़ एक बार गिरवी रखा जाए तो छूटती कब है? पहले सोने के ज़ेवर जाते है, फिर उनके पीछे चाँदी के ज़ेवर। हर ज़ेवर जब गिरवी के लिए जाता है, तो इस पक्के मन के साथ जाता है कि दो महीने बाद जब फ़सल आएगी, तो सबसे पहला काम इस ज़ेवर को छुड़वाना ही है। लेकिन अगर यह पहला काम ही अगर सच में पहला हो जाता, तो इस देश में साहूकारों की तिजोरियाँ और उनकी तोंदें इतनी कैसे फूल पातीं।

लेखक ने बड़ी कुशलता से बल्कि सच कहूँ तो एक कृषि अर्थशास्त्री और सांख्यिकी विशेषज्ञ की हैसियत से किसान की उपज के मूल्य को आज के उपभोक्ता सूचकांको के सापेक्ष विश्लेषण की कसौटी पर जांचा है। लेखक बहुराष्ट्रीय कम्पनी के उत्पादों को कच्चे उत्पादों के बीच का गणित बहुत ही सरल अन्दाज से समझाता है ”पन्द्रह सौ रूपये क्विंटल के समर्थन मूल्य पर बिकने वाली मक्का का मुर्गी छाप कार्न फ्लैक्स 150 रूपये में 500 ग्राम की दर से बिकता है। मतलब यह कि 300 रूपये किलो या तीस हज़ार रूपये क्विंटल की दर से। पन्द्रह सौ और तीस हज़ार के बीच बीस गुना का फ़र्क़ है। क्या यह बीस गुना आज तक किसी वित्त या कृषि मंत्री को दिखाई नहीं दिया। क्या एक सीधा-सा लॉजिक किसी को नहीं दिखाता कि जो किसान धूप, बरसात, ठंड में, खेतों में अपनी ज़िंदगी को झोंकते हुए पाँच महीने में जो फ़सल पैदा करता है, उसे केवल 1500 रूपये क्विंटल मिल रहा है और जो वातानुकूलित चैम्बर में बैठ कर मशीन से उस मक्का को केवल पाँच मिनट में चपटा कर कॉर्न फ्लैक्स बना रहा है, उसे बीस गुना, तीस हजार रूपये? समर्थन मूल्य तो है मगर वह किसको समर्थन देने के लिए बनाया गया है, यह बेचारा किसान कहाँ जानता है। किसान की जिन्दगी में सचमुच परेशानियों का कोई अन्त नहीं होता। एक जाती है तो दूसरी आती है, मानो पहली वाली के टलने का रास्ता ही देख रही थी। जवाहर लाल नेहरू ने एक बार कहा था कि अगर देश को विकास की तरफ़ बढ़ते देखना है तो ग़रीबों को किसानों को ही सेक्रिफाइज़ करना पड़ेगा। आज़ादी को आज सत्तर साल होने को हैं लेकिन सेक्रिफाइज़ किसान ही कर रहा है। बाक़ी किसी को भी सेक्रिफाइज़ नहीं करना पड़ा। सबकी तनख़्वाहें बढ़ी, सब चीजों के भाव बढ़े लेकिन, उस हिसाब से किसान को जो न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलता है उसमें बढ़ोतरी नहीं हुई। 1975 में सोना 540 रूपये का दस ग्राम था जो अब 2015 में 30 हज़ार के आस-पास झूल रहा है, कुछ कम ज़्यादा होता रहता है। 1975 में किसान को गेहूँ का न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार की आरे से तय था लगभग सौ रूपये आज 2015 मिल रहा है लगभग 1500। यदि सोने को ही मुद्रा मानें, तो 1975 में किसान पाँच क्विंटल गेहूँ बेच कर दस ग्राम सोना ख़रीद सकता था। आज उसे दस ग्राम सोना ख़रीदने के लिए लगभग 20 क्विंटल गेहूँ बेचना पड़ेगा। सोना तो किसान क्या खरीदेगा, उसके काम की तो चाँदी होती है, चाँदी 1975 में लगभग 1200 रूपये किलो थी और आज 38 हजार रूपये प्रति किलो है। 1990 में डीज़ल का भाव था साढ़े तीन रूपये प्रति लीटर और गेहूँ का 225 रूपये प्रति क्विंटल। मतलब किसान को खेती के लिए यदि डीज़ल खरीदना है तो एक क्विंटल गेहूँ बेच कर वह लगभग पैंसठ लीटर डीज़ल ख़रीद लेता था। आज डीजल लगभग साठ रूपये है और गेहूँ 1500 रूपये, मतलब एक क्विंटल गेहूँ के बदले केवल 25 लीटर डीज़ल आयेगा।

1975 में एक सरकारी अधिकारी का जो वेतन 400 रूपये था, वह जाने कितने वेतन आयोगों की अनुशंसाओं के चलते अब लगभग चालीस हज़ार है, सौ गुना की वृद्धि उसमें हो चुकी है। और ख़बर है कि सातवें वेतन आयोग का भी गठन हो गया है। भारत के एक सांसद को सब मिलाकर लगभग तीन लाख रूपये प्रति माह मिलता है, जिसमें सब प्रकार की सुविधाएँ शामिल हैं, लेकिन हम आज तक कोई ऐसी व्यवस्था नहीं बना पाए कि हमारे लिए अन्न उपजाने वाले किसान को तीन हज़ार रूपये प्रति माह, उसके परिवार को चलाने का दिया जाए। एक सांसद साल भर में चार लाख की बिजली मुफ़्त फूँकने का अधिकारी है लेकिन, किसान के लिए चार हज़ार की भी नहीं है। और उसके बाद भी सबके लिए सब्सिडी दे रहा है किसान। कोई नहीं सोचता कि बाज़ार में अनाज का दाम बढ़े कि नहीं, इसके लिए किसान की जेब से सब्सिडी ली जा रही है। और उस पर भी यह तुर्रा कि हम एक कृषि प्रधान देश में रहते हैं। यह दुनिया की सबसे बड़ी कृषि आधारित अर्थ व्यवस्था है, जिसमें हर कोई किसान के पैसों पर अय्याशी कर रहा है। सरकार कहती है कि सब्सिडी वह बाँट रही है जबकि हक़ीक़त यह है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य के आँकड़े में उलझा किसान तो अपनी जेब से बाँट रहा है सबको सब्सिडी। यदि चालीस साल में सोना चालीस गुना बढ़ गया तो गेहूँ भी आज चार हज़ार के समर्थन मूल्य पर होना था, जो आज है पन्द्रह सौ। मतलब यह कि हर एक क्विंटल पर ढाई हजार रूपये किसान की जेब से सब्सिडी जा रही है।”

किसान की मजबूरियों का चिट्ठा आगे बढ़ाते हुए लेखक रहस्योद्घाटन करता है कि ”एक एकड़ में खरपतवार नाशक, कीट नाशक और खाद का ख़र्च होता है, लगभग पाँच हज़ार रूपये। पलेवा और सिंचाई पर बिजली या डीज़ल का ख़र्च क़रीब तीन हज़ार रूपये प्रति एकड़ होता है। इसके बाद गेहूँ की कटाई तथा थ्रेशर से निकालना भी, लगभग दो हज़ार रूपये प्रति एकड़ पड़ता है। और लगभग सात आठ सौ रूपये प्रति एकड़ मंडी तक की ढुलाई। एक हज़ार रूपये अन्य सभी प्रकार का ख़र्च होगा। इस प्रकार मोटा-मोटा हिसाब लगाया जाए तो प्रति एकड़ क़रीब पन्द्रह हज़ार रूपये का ख़र्च तो तय ही है। एक एकड़ में यदि सब कुछ बिल्कुल ठीक-ठाक रहा, तो लगभग सोलह से बीस क्विंटल के बीच गेहूँ का उत्पादन होता है। यदि हम अठारह क्विंटल के आँकड़े को ही औसत मान कर चलें, तो एक एकड़ का किसान अपने परिवार के साल भर खाने के लिए कम से कम सात आठ क्विंटल तो बचाएगा। बाक़ी बचा दस क्विंटल जिसको सरकारी समर्थन मूल्य पन्द्रह सौ रूपये प्रति क्विंटल के हिसाब से बेचने पर मिलगा पन्द्रह हज़ार रूपये, और लागत ? वही पन्द्रह हज़ार रूपये। यदि किसान का समर्थन मूल्य भी पिछले पच्चीस सालों में बढ़े सोने के हिसाब से बढ़ता, तो उसे आज पन्द्रह नहीं साठ हज़ार मिलते। और अगर अधिकारियों-कर्मचारियों, सांसदों-विधायकों के पैशाचिक वेतन आयोगों के हिसाब से सौ गुना बढ़ता, तो उनको आज दस क्विंटल के एक लाख मिलते। मगर नहीं, उसे मिलता है केवल वह आठ क्विंटल प्रति एकड़ गेहूँ, जो उसका परिवार साल भर खाएगा। उसके पास इतना भी नहीं बचा है कि अगर उसने खेत ठेके पर लिया है किसी खेत मालिक से, तो उसका ख़र्च अलग से होना है। सामान्य रूप से दज हज़ार रूपये प्रति एकड़ में उपजता है अठारह क्विंटल सा सत्ताइस हज़ार का गेहूँ और लागत पन्द्रह हज़ार, साथ में दस हज़ार ठेके का मिला कर पच्चीस हज़ार रूपये। मतलब बचत दो हज़ार रूपये इसीलिए छोटे किसान का पूरा परिवार ख़ेतों में मज़दूर की तरह लगा रहता है। ताकि मजदूरी वाले पैसे को ही बचा सके। इसके बाद भी अगर बीच में आसमानी-सुलतानी हो गई, मौसम की मार पड़ गई, और उपज घट गई, तो उन हालात में किसान का क्या होगा, यह आप ऊपर के आँकड़ों से अनुमान लगा सकते हैं। छोटा और सीमांत किसान जीवन भर क़र्ज़ं में रहता है, अपनी उपज मे से सारे देश को राक्षसी सब्सिडी बाँटता है और ख़ुद क़र्ज़ं में रहता है।”

किसान की दुर्दशा पर तब्सिरा करते वक्त लेखक ने ‘रामप्रसाद’ के उन निजी लम्हों पर भी रोशनी डालने का प्रयास किया है, जो प्रायः अंधेरे का शिकार होकर रह जाते हैं। तमाम लेखकों की लफ़्जों की रोशनी इस अंधेरे को चीरने में नाकामयाब रहती है लेकिन पंकज सुबीर ने यहां भी अपनी उपस्थिति दर्ज की है। किसान का जेहन यूँ तो हमेशा आर.आर.सी. (रिकवरी रिवन्यू सर्टीफिकेट), बरसात, धूप, खाद, पानी, सूद वगैरह में में ही घूमता रहता है परन्तु कभी-कभी वो अपने लिए भी जीता है। इन्हीं कुछ निजी लम्हों में किसान रामप्रसाद अपनी पत्नी कमला के बारे में सोचता है। लेखक के शब्दों में ”शीरीं-फरहाद, सोहनी-महिवाल, जैसे नामों के साथ आपको कमला-रामप्रसाद की ध्वनि बिल्कुल अच्छी नहीं लगेगी। लेकिन, यह दृश्य उन नामों के प्रणय दृश्यों से किसी भी तरह फीका नहीं है। इसमें भले ही चटख़ रंग नहीं है लेकिन, धूसर रंग तथा उन रंगों के बीच से अँखुआता प्रेम का उदास सा मटमैले रंग का अंकुर, उन चटख़ रंगों पर कई गुना भारी है। उतरती हुई फागुन की रात में, देहरी के बाहर बैठा प्रेमी और देहरी के अन्दर बैठी प्रेमिका। दोनों के अंदर एक गहरा दुःख है, एक जमी हुई उदासी है, कुछ ठहरे हुए से आँसू हैं। दुःख जीवन का और उदासी जीने की। उस दुःख और उदासी के धुँधलके में, दरवाज़े के बाहर बैठे प्रेमी के पास कुछ अलब्ध है, अप्राप्य है, अभीसिप्त है, जो वह अपनी प्रेमिका के लिए लाया है। झूठ बोलकर लाया है, बेशरम होकर लाया है, माँग कर लाया है, इस बात से प्रेम के होने पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है। कैसे बनाई जाएगी इस प्रेम दृश्य की पेंटिंग? क्या किसी चित्रकार के पास है वह दृष्टि? जो इस निश्छल प्रेम के दृश्य को ठीक-ठाक तरीके से अपने कैनवास पर उतार दे। इस दृश्य में गुलमोहर नहीं है, गुलाब नहीं है, मोरपंख नहीं है, बाँसुरी नहीं है, कुछ भी तो नहीं है जो प्रेम की पारंपरिक शब्दावलि में होता है। तो फिर कैसे बनाया जा सकेगा इस चित्र को। इस धूसर रंग के प्रेम को अच्छी तरह से समझने के लिए और भी तो जाने क्या-क्या समझना होगा चित्रकार को। रामप्रसाद और कमला, इनका चित्र शायद कोई भी चित्रकार बनाना न चाहे, बना न सके। आगत और विगत को कुछ समय के लिए पूरी तरह से विस्मृत करके यह दोनों इस समय केवल वर्तमान में हैं। केवल और केवल वर्तमान में।”  मुझे याद आता है कि इतिहास का वह पृष्ठ जिसमें एक महान इतिहासकार ने भारत के स्वर्णकाल कहे जाने वाले ‘गुप्तकाल’ की समीक्षा करते हुए लिखा था कि ये काल स्वर्णकाल था लेकिन उनके लिए जो राजाओं की प्रशस्ति ग्रंथ लिखते थे, गीत-संगीत में डूबे रहते थे, व्यापार करते थे, शहरों में रहते थे . . . यह काल उनके लिए ‘स्वर्णकाल’ नहीं था जो गांवो में रहते थे और कृषि करते थे, श्रम करते थे। लेखक इसी बात को सिद्ध करते हुए कहता है कि वास्तव में तो श्रम को कभी भी, कोई भी नहीं देखता है। श्रम हमेशा ही टेकेन फार ग्रान्टेड होता है।  (पृष्ठ-111)

लेखक ने लोक जीवन की झांकी को बिल्कुल जीवंत अंदाज में प्रस्तुत किया है। उदाहरण के तौर पर जब रामप्रकाश के बहनोई की माँ की मृत्यु हो जाती है तो मातम का दृश्य लेखक ने बड़ी ही कुशलता के साथ जिया है। सूखा पानी और आस-पास के ग्रामीण अंचलों में महिलाओं द्वारा मातम के अवसर पर रोने का अभी भी एक दिलचस्प तरीका है। मौत और दिलचस्प? हाँ यही सच है। यहाँ पर महिलाएँ रोती कम हैं, गाती ज़्यादा हैं। उस व्यक्ति का नाम ले-लेकर कोई भजन सा गाती हैं और अंत में रोने की ध्वनि उत्पन्न करती हैं। जो गाती हैं, उसमें मरने वाले के गुण, उसकी अच्छाईं एक-एक कर बताती हैं और रोती जाती हैं। उससे जुड़ी घटनाएँ उसके साथ के अपने व्यक्तिगत अनुभव, या वह मरने से पहले क्या कर रहा था, मतलब सब कुछ बाक़ायदा गा-गाकर बोलती हैं और हर पंक्ति के अंत में फिर रोती हैं, ज़ोर से। यह रोना दिखाव का नहीं होता है बल्कि सचमुच का होता है, वह सचमुच ही दुखी होती हैं। लेकिन पारंपरिक रूप से उनको अपना दुख गा-गाकर ही व्यक्त करना होता है। पुरूष इस बीच केवल तैयारियों में लगे होते हैं, वह बैठकर कोई मातम नहीं करते। वह ही ऊँचे स्वर में उसको गा दे और बाद में जब वह रे की ध्वनि उत्पन्न कर रोए तो रोने में सब की सब महिलाएँ स्वर में स्वर मिला दें। कुछ इस प्रकार –
‘अरी तुम तो भोत अच्छी थी, काँ चली गी रे ऽऽऽऽ’
‘अरे अभी तो मिली थी मोय बड़नगर वाली बइ की शादी में रे ऽऽऽऽ’
‘अच्छी खासी तो ले के गया था, डाग्दर होन ने मार डाली रे ऽऽऽऽ’
‘सुबह-सुबह रोज दिख जाती थी रे ऽऽऽऽ’
‘अरे म्हारा राम जी यो तमने कँइ कर दियो रे ऽऽऽऽ’
‘म्हारे से कहती थी कि सुमन तू म्हारे सबसे अच्छी लगे है रेऽऽऽऽ’

कर्जे और आर.आर.सी. की धनराशि चुकाने के समय किसान की मनोदशा का एक और उदाहरण मन में कहीं संताप, गहरी सी कुंठा छोड़ जाता है। ”कमला की तोड़ी बिक गई। बिकनी ही थी। छोटी जोत के किसान की पत्नी के शरीर पर के ज़ेवर क्रमशः घटने के लिए होते हैं। और हर घटाव का एक भौतिक अंत शून्य होता है, घटाव की प्रक्रिया शून्य होने तक जारी रहती है। चूँकि भौतिक अवस्था में गणित की तरह ऋणात्मक संख्या नहीं होती, इसलिए कह सकते हैं कि भौतिक रूप से घटाव की हर प्रक्रिया शून्य के उपजने तक होगी। इस प्रक्रिया की गति भले ही कम ज़्यादा हो सकती है लेकिन अंत लगभग तय होता है। राप्रसाद ने कमला की तोड़ी को सुनार की दुकान पर तौल होने के बाद एक बार अपने माथे पर लगाया, कमला ने जैसे लगाया था वैसे ही। महिला पुरखिनों की आख़िरी निशानी। हर किसान को विरास में उसके महिला पुरखे और पुरूष पुरखे दोनों ही कुछ न कुछ देकर जाते हैं। पुरूष पुरखे, खेत, ज़मीन और उन पर लदा हुआ क़र्ज़ छोड़ कर जाते हैं, तो महिला पुरखिनों की ओर से ज़ेवर मिलते हैं। कुछ धातुएँ। रामप्रसाद ने अपनी महिला पुरखिनों को उस दौरान याद भी किया और उनसे क्षमा भी माँग ली। क्षमा इसलिए माँग ली कि अब आगे परंपरा में कोई भी ज़ेवर, कमला अपनी बहू को नहीं दे पाएगी। वह परंपरा यहाँ पर, कमला पर आकर समाप्त हो रही है। जब परिवार की महिला के पास इन धातुओं का अंत हो जाता है, तब तय हो जाता है कि किसानी करने वाली बस यह अंतिम पीढ़ी है, इसके बाद अब जो होंगे, वह मज़दूर होंगे। यह धातुएँ बिक-बिक कर किसान को मज़दूर बनने से रोकती हैं।”’

उपन्यास का यू.एस.पी. इसकी भाषा है, और भाषा में भी मुहावरों और लोक कहावतों का प्रयोग है। ‘अकाल में उत्सव’ का एक प्रमुख पात्र मोहन राठी है जो प्रशासन का चाटुकार है, बेहतरीन मनोवैज्ञानिक है, अवसरवादी है और बेहतरीन वक्ता भी है। उसकी खासियत यह है कि वह अपनी बात मुहावरों से ही शुरू करता है। सच तो यह है कि कहावतें और मुहावरे तो भाषा का असली रस हैं। यदि उनको निकाल दिया जाए, तो भाषा नीरस हो जाएगी, उसमें कुछ भी आनंद नहीं बचेगा। मुर्दा है वह भाषा, जिसमें कहावतें और मुहावरे नहीं है। इनके प्रयोग से बात का वजन बढ़ जाता है और सुनने वाले पर अच्छा प्रभाव भी पड़ता है। लेखक ने इस पात्र के जरिये तमाम मुहावरों को उदृत किया है। उदाहरण के तौर पर –

‘कोरी का जमाई बड़ा जानपाड़ा, चाहे जो करवा लो…….!’
‘रांडया रोती रेवेगी और पावणा जीमता रेवेगा।’
‘बड़े-बड़े साँप-सँपोले आए, हम कहाँ आईं बिच्छन देह …….?’
‘उठ राँड, घर माँड, फिर राँड की राँड…….!’

मोहन राठी एक ऐसा पात्र है जो भाषा में नए प्रतिमान तो गढ़ता ही है एक मनोवैज्ञानिक की हैसियत से भी प्रकट होता है। लेखक इस पात्र के माध्यम से कहता है कि ”प्रशंसा, या विरोधी की निंदा सुनना है तो शारीरिक सुख जैसा ही आनंद लेकिन, उसमें और इसमें एक बड़ा अन्तर यह होता है कि यहाँ पर कोई चरम संतुष्टि का बिन्दु नहीं आता, यहाँ पर कोई स्खलन जैसा नहीं होता है। हर आनंद किसी बिन्दु पर जाकर समाप्त होता है लेकिन, यह किसी भी बिन्दु पर समाप्त नहीं हो सकता। यह तो एक सतत् प्रक्रिया है। यह त्वचा राग को नाखून से खुजाने जैसा आनंद है, आप जब तक खुजाते रहेंगे, तक तक आपको आनंद आता रहेगा, बल्कि बढ़ता रहेगा आनंद। आप खुजाना बंद करेंगे, तो आनंद आना बंद हो जाएगा, उसके स्थान पर फिर से खुजालने की उत्कंठा बढ़ जाएगी।”  इस तरह के मनोवैज्ञानिक कथन उपन्यास की गति को तो आगे बढ़ाते ही हैं प्रस्तुति में गजब का आकर्षण पैदा करते हैं। लेखक ने इस मर्म को पूरे उपन्यास में पकड़े रखा है। लेखक ने कलेक्टर श्रीराम परिहार, ए.डी.एम. राकेश पाण्डे तथा उनके दल के अन्य सरकारी गैर सरकारी साथियों के हवाले से शहरी परिवेश का वह हाल प्रस्तुत किया है कि जिसमें आये हुए अवसर को ‘आप्टिमम लेवल’ तक यूज करना है और अपना काम निकालना है। यहां हर पात्र स्वार्थसिद्धि तक ही सीमित है।

बहरहाल ‘अकाल में उत्सव’ हमारे समय का वह महत्वपूर्ण उपन्यास है जो यह दिखाता है कि हम समानान्तर रूप से एक ही देशकाल परिस्थिति में दो अलग-अलग जिन्दगियां जी रहे हैं। एक ओर दबा कुचला हिन्दुस्तान है और हिन्दुस्तान का किसान है जिसकी दुनिया अभी भी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही टिकी हुई है और दूसरी तरफ चमकता दमकता इण्डिया है जहां तकनीकी प्रगति है, धन है, अवसर है।

लेखक पंकज सुबीर ने ‘अकाल में उत्सव’ के माध्यम से एक ऐसी कृति दी है जो हमारे देश को समझने के लिए महत्वपूर्ण औजार साबित हो सकती है। उन्होने अपनी कृति के माध्यम से ऐसी चीखों को हम तक पहुँचाने का काम किया है जो कमोबेश अनसुनी ही दबी रह जाती हैं। प्रमुख पात्र रामप्रसाद के करूणान्त पर यही आह निकलकर रह जाती है कि ‘आख़िरी शब दीद के क़ाबिल थी बिस्मिल की तड़प, सुब्ह दम कोई अगर बाला-ए-बाम आया तो क्या………।’

किताब : ‘अकाल में उत्सव’

प्रकाशक – शिवना प्रकाशन, सम्राट कॉम्‍प्‍लैक्‍स बेसमेंट, सीहोर, मप्र 466001, दूरभाष 07562405545

मूल्‍य 150 रुपये, पृष्‍ठ 224, वर्ष 2016

समीक्षक पवन कुमार भा. प्र. से. के वरिष्ठ अधिकारी हैं तथा वर्तमान में सहारनपुर में डीएम के रूप में पदस्‍थ हैं.

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डॉ. बी. आर. आंबेडकर पर चार लाख पुस्तिकाएं छाप कर फंस गई गुजरात की भाजपा सरकार

Dilip C Mandal : गुजरात सरकार के सामने एक अजीब मुसीबत आ गई है. चार लाख की मुसीबत. वजन के हिसाब से, कई क्विंटल मुसीबत. गुजरात सरकार के शिक्षा विभाग ने आंबेडकर सालगिरह समारोह पर एक Quiz कराने का फैसला किया. पांचवीं से आठवीं क्लास के बच्चों के लिए. इसके सवाल एक बुकलेट से आने थे. बुकलेट छपी गई. चार लाख कॉपी. इन्हें स्कूलों में बांटा जाना तय हुआ.

बुकलेट का नाम है- राष्ट्रीय महापुरुष भारत रत्न डॉ. बी. आर. आंबेडकर. लेखक हैं पी. ए. परमार. किताब सूर्या प्रकाशन ने छापी. यहां तक दलित हितैषी बनने का एजेंडा सब ठीक चल रहा था. संघी तो पढ़ते नहीं हैं. छपते समय तक किसी ने देखा नहीं, या कुछ समझ नहीं आया. छपने के बाद, किसी की नजर पुस्तिका पर पड़ी. देखते ही तन – बदन में आग लग गई. किताब के आखिर में बाबा साहेब की 22 प्रतिज्ञाएं छपी थीं. ये वे प्रतिज्ञाएं हैं, जो बाबा साहेब ने 1956 में हिंदू धर्म त्याग कर, बौद्ध धम्म ग्रहण करते समय लाखों लोगों के साथ ली थीं.

पहली प्रतिज्ञा – मैं ब्रह्मा, विष्ण विष्णु और महेश में आस्था नहीं रखूंगा और न ही इनकी पूजा करूंगा…. (सभी 22 प्रतिज्ञा आप लोग गूगल में सर्च करके पढ़ लें.)

सरकार ने आनन फानन में सारी पुस्तिकाओं को समेट लिया…. और इस तरह बीजेपी का दलित हितैषी बनने का एक और प्रोजेक्ट फेल हो गया…. यहां तक की खबर तो आप कुछ अखबारों में पढ़ चुके हैं. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. अब दिक्कत यह है कि उन चार लाख पुस्तिकाओं का क्या किया जाए? फेंकना सही नहीं है. जलाने से भी हल्ला मचेगा. पानी में बहाने में भी वही दिक्कत है. रद्दी में बेचने से लोगों तक पहुंच जाएंगी…. आप समझ सकते हैं कि यह कितनी बड़ी समस्या है! बड़ी ही नहीं, भारी भरकम समस्या है. कई क्विंटल की समस्या. आप लोग प्लीज हंसिए मत, और बीजेपी सरकार को इस मुसीबत से निकलने का कोई रास्ता बताइए. बेचारे!

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.

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टेरर पालिटिक्स पर वार करती किताब ’आपरेशन अक्षरधाम’

देश में कमजोर तबकों दलित, आदिवासी, पिछड़ी जातियों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को दोयम दर्जे की स्थिति में बनाए रखने की तमाम साजिशें रचने तथा उसे अंजाम देने की एक परिपाटी विकसित हुई है। इसमें अल्पसंख्यकों विशेषकर मुस्लिम आबादी को निशाना बनना सबसे ऊपर है। सांप्रदायिक हिंसा से लेकर आतंकवाद के नाम पर बेगुनाह मुस्लिमों को ही प्रताडि़त किया जाता है। इसमें राज्य व्यवस्था की मौन सहमति व उसकी संलिप्तता का एक प्रचलन निरंतर कायम है। राज्य प्रायोजित हिंसा के खिलाफ आंदोलनरत पत्रकार और डाक्यूमेंन्ट्री फिल्म निर्माता राजीव यादव और शाहनवाज आलम राज्य व्यवस्था द्वारा रचित उन्हीं साजिशों का ’ऑपरेशन अक्षरधाम’ किताब से पर्दाफाश करते हैं। यह किताब उन साजिशों का तह-दर-तह खुलासा करती है जिस घटना में छह बेगुनाह मुस्लिमों को फंसाया गया। यह पुस्तक अक्षरधाम मामले की गलत तरीके से की गई जांच की पड़ताल करती है साथ ही यह पाठकों को अदालत में खड़ी करती है ताकि वे खुद ही गलत तरीके से निर्दोष लोगों को फंसाने की चलती-फिरती तस्वीर देख सकें।

इस किताब पर अपनी टिप्पणी में वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमडि़या कहते हैं कि पूरी दुनिया में ही हिंसा की बड़ी घटनाओं में अधिकतर ऐसी हैं जिन पर राज्य व्यवस्था द्वारा रचित होने का शक गहराया है। लेकिन रहस्य खुलने लगे हैं। राज्य व्यवस्था को नियंत्रित करने वाले समूह अपनी स्वाभाविक नियति को कृत्रिम घटनाओं से टालने की कोशिश करते हैं। वे अक्सर ऐसी घटनाओं के जरिये समाज में धर्मपरायण पृष्ठभूमि वाले लोगों के बीच अपनी तात्कालिक जरूरत को पूरा करने वाला एक संदेश भेजते हैं। लेकिन यह इंसानी फितरत है कि मूल्यों व संस्कृति को सुदृढ़ करने के मकसद से जीने वाले सामान्य जन एवं बौद्धिक हिस्सा उस तरह की तमाम घटनाओं का अंन्वेषण करता है और रचे गए झूठों को नकारने के लिए इतिहास की जरूरतों को पूरा करता है। जिस दिन 16वीं लोकसभा के लिए चुनाव के नतीजे सामने आ रहे थे और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को विजयी घोषित किया गया, ठीक उसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने अक्षरधाम मंदिर पर हमले मामले में निचली अदालत व उच्च न्यायालय द्वारा दोषी ठहराए गए सभी छह आरोपियों को बरी करने का आदेश दिया। इन छह लोगों को 24 सितंबर 2002 को किए गए अपराध की साजिश का हिस्सा बताया गया था, जिसमें मंदिर परिसर के भीतर दो फिदाईन मारे गए थे। गलत तरीके से दोषी ठहराये गए इन लोंगों में से तीन को मृत्युदंड भी सुनाया जा चुका था।

भारतीय राजतंत्र की एजेंसियों द्वारा मुसलमानों के उत्पीड़न को दो आयाम हैं। पहला यह कि मुसलमानों के खिलाफ संगीन से संगीन अपराध करने वाले व्यक्ति बिना किसी सजा के खुले घुमते हैं। बमुश्किल ही कोई मामला होगा जिनमें दोषियों को सजा हुई हो। यही वजह है कि जबलपुर से लेकर भिवंडी, अलीगढ़, जमशेदपुर, भागलपुर, मलियाना, हाशिमपुरा, बाबरी मस्जिद और मुंबई जनसंहार तक की लंबी फेहरिस्त इस तथ्य को उजागर करती है कि भारतीय राज्य सत्ता ऐसे अपराधों को अंजाम देने वालों को सजा देने में नाकाम रहने के कारण खुद कठघरे में है।

तथाकथित आतंकवादी मामलों में बरी किए जाने की दर में इजाफा इस बात को पुख्ता करता है कि दरअसल, सारी कवायदों का उद्देश्य ही मुस्लिम समुदाय को निरंतर भय, असुरक्षा और निगरानी में घेरे रखना है। संदिग्ध आधारों पर किसी को दोषी ठहराये जाने की यह कवायद इसलिए जारी रहती है क्योंकि ऐसा करने वालों को कानूनी संरक्षण हासिल है। हमारे लोकतंत्र में अधिकारियों को दंडित किए जाने से छूट मिली हुई है। भले ही भारतीय न्यायपालिका, खासकर उच्च अदालतों ने गलत तरीके से दोषी ठहराये गए लोगों को बरी किया है लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसे लोगों को अपनी आजादी वास्तव में कई बरस बाद मिल पाती है। कभी कभार तो एकाध दशक बाद यह आजादी हासिल हो पाती है। यानी वे ऐसे अपराध के लिए कैद रहते हैं जो उन्होंने कभी किया ही नहीं। और वे तब तक कैद में रहते हैं जब तक कि अदालतें उन्हें बरी करने का फैसला न लें या फिर जैसा कि होता है, वे उस अपराध के लिए लगातार सजा भोगते रहते हैं जो उन्होंने कभी किया ही नहीं।

हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम पलट कर अक्षरधाम मामले को दोबारा देखें। यह समझें कि कैसे इस मामले में जांच की गई या की ही नहीं गई। अक्षरधाम मंदिर पर हमला 24 सितंबर 2002 को हुआ था जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और केंद्र में भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार थी। मामला सबसे पहले अपराध शाखा को सौंपा गया लेकिन जल्दी ही इसे गुजरात एटीएस के सुपुर्द कर दिया गया क्योंकि इसे आतंकी मामला करार दे दिया गया था। एटीएस साल भर मामले को सुलझा नहीं पाई। जिसके बाद इसे वापस अपराध शाखा को भेजा गया। इस बार मामला हाथ में आने के 24 घंटे से कम समय में ही शाखा ने चमत्कारिक तरीके से दावा कर डाला कि यह साजिश 2002 में गुजरात में हुए मुसलमानों के संहार का बदला लेने के लिए सउदी अरब में रची गई थी। इस मामले में जांच अधिकारी जीएल सिंघल ने, जो कई फर्जी मुठभेड़ों के मामलों में जमानत पर रिहा होने के बाद हाल ही में पदस्थापित किए गए हैं, ने 25 सितंबर 2002 को अक्षरधाम हमला मामले की एफआईआर दर्ज कराई थी जिसमें मारे गए दोनों फिदाईन की पहचान और राष्ट्रीयता दर्ज नहीं थी।

हालांकि अक्टूबर 2002 में समीर खान पठान, जो कि एक मामूली चेन छिनैत से ज्यादा कुछ नहीं था, मुठभेड़ मामले में दर्ज एफआईआर में पुलिस ने लिखा था कि समीर खान पठान नरेंद्र मोदी जैसे प्रमुख नेताओं और अक्षरधाम जैसे हिन्दू मंदिरों को निशान बनाने की एक पाकिस्तानी साजिश का हिस्सा था। चूंकि बाद में सिंघल समेत कई पुलिस अधिकारियों पर पठान और अन्य को मुठभेड़ों में की गई हत्याओं के सिलसिले में मुकदमा कायम हुआ। इसलिए एफआईआर लिखने के आधार की सत्यता पर संदेह खड़ा होता है। जैसा दिख रहा था मामला उससे कुछ और गंभीर था। यहां तक कि अक्षरधाम मामले में यह बात भी कही जा सकती है जिसकी जांच सिंघल समेत दो और पुलिसकर्मियों डीजी वंजारा और नरेंद्र अमीन के जिम्मे थी। जिन्हें बाद में फर्जी मुठभेड़ मामले में दोषी ठहराया गया।

यह पुस्तक अक्षरधाम मामले का अनुसंधानपरक और मुक्कमल पर्दाफाश है। इस पुस्तक में हर एक पन्ना विवरणों से भरा हुआ है जो बिल्कुल साफ करता है कि कैसे अक्षरधाम मामले की जांच फर्जी तरीके से की गई। जांच से पहले कैसे निष्कर्ष निकाल लिए गए और खुद को आश्वस्त कर लिया गया कि मुकदमा चाहे कितना भी बेमेल या असंतुलित हो, लेकिन सभी छह आरोपी कई साल तक जेल में ही सड़ते रहेंगे। मसलन, जिस चिट्ठी के मामले का जिक्र है जिसे एक आतंकवावादी की जेब से बरामद दिखाया गया था, वह चमात्कारिक ढंग से बिल्कुल दुरुस्त थी जबकि उसका शरीर खून से लथपथ, क्षतिग्रस्त था। लेकिन चिट्ठी पर कोई दाग.धब्बा या शिकन नहीं था। इतना ही नहीं तत्कालीन गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने दावा किया था कि घटना के चश्मदीद मंदिर के एक पुजारी ने उन्हें निजी तौर पर बताया था कि फिदाईन सादे कपड़े में थे जबकि पुलिस ने अदालत में सबूत दिया कि वे वर्दीनुमा कपड़े में थे। जब एक आरोपित यासीन बट्ट जम्मू कश्मीर पुलिस की हिरासत में था, तो गुजरात पुलिस ने यह दावा क्यों किया कि वह उसका सुराग नहीं लगा पाई? मामले की चार्जशीट में सारी गड़बडि़यां शामिल हैं।

यह पुस्तक दिखाती है कि कैसे सैकड़ों मुसलमानों को उठाकर ऐसे ही अलग.अलग किस्म के आतंकी मामलों में फंसाया गया। पुस्तक इसका भी पर्दाफाश करती है कि कैसे निचली आदलत और गुजरात हाईकोर्ट ने तमाम असंबद्धताओं और असंभावनाओं को दरकिनार करते हुए छह लोगों को दोषी ठहराया और इनमें से तीन को मौत की सजा सुना दी। इन छह आरोपितों के बरी हो जाने के बावजूद 12 साल तक इन्हें इनकी आजादी से महरूम रखने, प्रताडि़त करने और झूठे सबूतों को गढ़ने के जिम्मेदार लोग झूठा मुकदमा कायम करने के अपराध में सजा पाने से अब तक बचे हुए हैं। यहीं से यह तर्क निकलता है कि अक्षरधाम हमले का मामला कोई अलग मामला नहीं था बल्कि सिलेसिलेवार ऐसे मामलों की महज एक कड़ी थी जिससे मुसलमानों के खिलाफ संदेह पैदा किया गया और आतंकवावाद से लड़ने की खोल में राज्य को बहुसंख्यकवाद थोपने का बहाना मिला। इसके अलावा राजनैतिक रंजिशों को निबटाने का भी यह एक बहाना था। हरेन पांड्या का केस इसका एक उदाहरण है। मसलन, सवाल यह है कि अक्षरधाम मंदिर के महंत परमेश्वर स्वामी की मौत कैसे हुई? पहली चार्जशीट कहती है कि महंत मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने के लिए मंदिर परिसर से बाहर गए और वापसी में तथाकथित आतंकी हमले में मारे गए। फिर इस तथ्य को दूसरी चार्जशीट में से क्यों हटा लिया गया?

शरणार्थी शिविरों में काम कर रहे मुस्लिमों या इन शिविरों को आर्थिक मदद दे रहे प्रवासी गुजराती मुस्लिमों पर गुजरात पुलिस की विशेष नजर थी और इन्हें बड़े पैमाने पर गिरफ्तार किया गया। तो क्या मुस्लिमों का खुद को बचाना कोई नाराजगी या पीड़ा से उपजे उन्माद का सबब रहा? आखिर इतनी बड़ी संख्या में ऐसे मुस्लिमों को ही आतंकी मामलों में क्यों फंसाया गया? पोटा अलदालत द्वारा दोषी करार दिए गए प्रत्येक छह व्यक्तियों मुफ्ती अब्दुल कय्यूम, आदम अजमेरी, मौलवी अब्दुल्लाह, मुहम्मद सलीम शेख, अल्ताफ हुसैन मलिक और चांद खान की दास्तानें किसी डरावनी कहानी की तरह हमारे सामने आती हैं। तीन मुफ्ती मुहम्मद कय्यूम, चांद खान और आदम अजमेरी को मृत्युदंड सुनाया गया। सलीम को आजीवन कारावास, मौलवी अब्दुल्लाह को 10 साल की कैद और अल्ताफ को 5 साल का कारावास। अदालती कार्यवाहियां स्पष्ट करती हैं कि कानून का राज निरंकुशता के जंगल राज में बड़ी आसानी से कैसे तब्दील किया जा सकता है। निचली अदालतों और उच्च न्यायालयों के फैसले की आलोचना में सुप्रीम कोर्ट के वाजिब तर्क इस रिपोर्ट की केंद्रीय दलील को विश्वसनीयता प्रदान करते हैं कि मुसलमानों के साथ हो रहा भेदभाव संस्थागत है, जहां अधूरे सच, नकली सबूतों और अंधी आस्थाओं की भरमार है। हमारे राजतंत्र और समाज के भीतर जो कुछ गहरे सड़.गल चुका है, जो भयंकर अन्यायपूर्ण और उत्पीड़क है, अक्षरधाम मामले पर यह बेहतरीन आलोचनात्मक विश्लेषण उस तस्वीर का एक छोटा सा अक्स है।

पुस्तक-ऑपरेशन अक्षरधाम (हिन्दी एवं उर्दू)
मूल्य- 250 रुपए
लेखक- राजीव यादव, शाहनवाज आलम
प्रकाशक- फरोस मीडिया एंड पब्लिशिंग प्राइवेट लिमिटेड

किताब समीक्षक वरुण शैलेश से संपर्क 09971234703 के जरिए किया जा सकता है.

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फादर कामिल बुल्के तुलसी के हनुमान हैं : केदारनाथ सिंह

वाराणसी। प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह ने कहा है कि कुछ चीजें रह जाती हैं जिसकी कसक जीवन भर, आखिरी सांस तक बनी रहती है। मेरे जीवन की कसक कोई पूछे तो कई सारी चीजों में एक है फादर कामिल बुल्के से न मिल पाने, न देख पाने की कसक। मैं उन दिनों बनारस में था जब वे इलाहाबाद में शोध कर रहे थे। धर्मवीर भारती, रघुवंश से अक्सर उनकी चर्चा सुनता था लेकिन उनसे न मिल पाने का सुयोग घटित न होना था तो न हुआ। वे तुलसी के हनुमान थे। हनुमान ने जो काम राम के लिए किया है, तुलसीदास और रामकथा के लिए वही काम फादर कामिल बुल्के ने किया।

केदारनाथ सिंह मंगलवार को पराड़कर स्मृति भवन में अयोध्या शोध संस्थान और सोसाइटी फार मीडिया एण्ड सोशल डेवलपमेण्ट के संयुक्त तत्वाववधान में फादर कामिल बुल्के जयन्ती समारोह में विचार व्यक्त कर रहे थे। इस मौके पर उन्होंने पत्रकार-कवि आलोक पराड़कर द्वारा सम्पादित ‘रामकथा : वैश्विक सन्दर्भ’ का लोकार्पण किया। श्री सिंह ने कहा कि फादर बुल्के के शोध ग्रन्थ रामकथा की काफी चर्चा रही है। वास्तव में इस ग्रन्थ से हिन्दी में तुलनात्मक साहित्य की शुरूआत होती है। उन्होंने इस ग्रन्थ में देश-विदेश की रामकथाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया है। वे बड़े शैलीकार भी थे। श्री सिंह ने कहा कि हिन्दी के उनका अनुराग इस कारण हुआ क्योंकि उन्होंने बेल्जियम में फ्रेंच के विरूद्ध फ्लेमिश की लड़ाई देखी थी। उन्होंने कहा कि फादर बु्ल्के ने कहीं लिखा है कि अगर मैं हिन्दी की सेवा में नहीं लगता तो फ्लेमिश का क्रान्तिकारी होता।

समारोह में काशी विद्यापीठ के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो.सर्वजीत राय ने कहा कि फादर कामिल बुल्के वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने देश में हिन्दी में शोध करने की शुरूआत की। इसके पहले विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी में शोध होते थे। हिन्दी विद्वान जितेन्द्र नाथ मिश्र ने कहा कि बेल्जियम में फ्लेमिश की उपेक्षा से द्रवित फादर बुल्के ने हिन्दी की उपेक्षा देखकर उसकी सेवा का निर्णय किया। वे कई भाषाओं के जानकार थे। उदय प्रताप कालेज के हिन्दी के पू्र्व विभागाध्यक्ष रामसुधार सिंह ने कहा कि रामकथा जैसा शोध आजतक नहीं हो सका है। समारोह में काशी विद्यापीठ के सेवानिवृत्त प्रोफेसर सुरेन्द्र प्रताप, बिशप फादर यूजिन जोसेफ के प्रतिनिधि ने भी विचार व्यक्त किए। इस मौके पर वाणी प्रकाशन के प्रबन्ध निदेशक अरुण माहेश्वरी भी उपस्थित थे।

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गुजराती छात्रों में वितरित अंबेडकर पर लिखी पुस्तक की लाखों प्रतियां सरकार ने लौटाईं

गुजरात में कथित रूप से हिंदू विरोधी सामग्री के कारण वहां के कक्षा छह से आठवीं के स्कूलों में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की 125वीं जयंतr पर बांटी गईं पुस्तकें प्रदेश सरकार ने प्रतिबंधित कर दी हैं। 

बताया जा रहा है कि प्रकाशक ने ग़लती से उन 22 प्रतिज्ञाओं को भी उन पुस्तकों में छाप दिया था, जो वर्ष 1956 में डॉक्टर अंबेडकर ने अपने हज़ारों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाते समय दिलाई थीं। पीए परमार द्वारा गुजराती में लिखी गई इस पुस्तक का नाम है – ‘राष्ट्रीय महापुरुष भारत रत्न डॉक्टर बीआर अंबेडकर’। इसके गुजराती लेखक  है। क्विज की तैयारी की दृष्टि से गुजराती छात्रों में वितरित की गई इस किताब की चार लाख प्रतियां प्रकाशित हुई थीं।

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पुस्तक-समीक्षा : पं.दीनदयाल उपाध्याय की याद दिलाती एक किताब

भारतीय जनता पार्टी के प्रति समाज में जो कुछ भी आदर का भाव है और अन्य राजनीतिक दलों से भाजपा जिस तरह अलग दिखती है, उसके पीछे महामानव पंडित दीनदयाल उपाध्याय की तपस्या है। दीनदयालजी के व्यक्तित्व, चिंतन, त्याग और तप का ही प्रतिफल है कि आज भारतीय जनता पार्टी देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर राजनीति के शीर्ष पर स्थापित हो सकी है। राज्यों की सरकारों से होते हुए केन्द्र की सत्ता में भी मजबूती के साथ भाजपा पहुंच गई है। राजनीतिक पंडित हमेशा संभावना व्यक्त करते हैं कि यदि दीनदयालजी की हत्या नहीं की गई होती तो आज भारतीय राजनीति का चरित्र कुछ और होता। दीनदयालजी श्रेष्ठ लेखक, पत्रकार, विचारक, प्रभावी वक्ता और प्रखर राष्ट्र भक्त थे। सादा जीवन और उच्च विचार के वे सच्चे प्रतीक थे। उन्होंने शुचिता की राजनीति के कई प्रतिमान स्थापित किए थे। उनकी प्रतिभा देखकर ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा था कि यदि मेरे पास एक और दीनदयाल उपाध्याय होता तो मैं भारतीय राजनीति का चरित्र ही बदल देता।

ऐसे राष्ट्रनायक पंडित दीनदयाल उपाध्याय की इस वर्ष जन्मशती प्रारम्भ हो रही है। उन्होंने मानव समाज की पश्चिम की सभी परिकल्पनाओं को नकारते हुए ‘एकात्म मानववाद’ जैसा अद्भुत और पूर्ण दर्शन दिया। यह वर्ष ‘एकात्म मानवदर्शन’ का स्वर्ण जयंती वर्ष भी है। पंडितजी की 100वीं जयंती 25 सितम्बर, 2015 से अगले वर्ष तक उन्हें याद किया जाने वाला है। उनकी अपनी पार्टी भाजपा तो सालभर कार्यक्रम करेगी ही अन्य सामाजिक संगठन और लेखक-विचारक भी उनके विचारदर्शन पर मनन-चिंतन-व्याख्यान करने वाले हैं।

ऐसे महत्वपूर्ण समय में दीनदयाल उपाध्याय के समग्र जीवन को ध्यान में रखकर राजनीतिक विचारक संजय द्विवेदी द्वारा संपादित पुस्तक ‘भारतीयता का संचारक, पं. दीनदयाल उपाध्याय’ का आना सुखद है। पुस्तक की चर्चा भी प्रासंगिक है। दरअसल, लम्बे समय तक सत्ता रूपी गुलाब जामुन के इर्द-गिर्द पसरी चासनी चाटकर पलते-बढ़ते वामपंथियों ने प्रोपेगंडा फैलाकर भारतीय जनता पार्टी और उसकी विचारधारा को ‘राजनीतिक अछूत’ की श्रेणी में रखा। अकादमिक संस्थाओं और संचार के संगठनों में बैठकर उन्होंने इस तरह के षड्यंत्र को अंजाम दिया। इस षड्यंत्र को ध्वस्त करने का काम दीनदयालजी ने किया। हालांकि यह भी सच है कि संचार माध्यमों पर वामपंथियों के एकाधिकार के कारण ही दीनदयालजी और उनके विचार को जितना विस्तार मिलना चाहिए था, नहीं मिल सका। अब समय आया है कि दीनदयालजी का असल मूल्यांकन हो। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आग्रह पर दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक जीवन से राजनीति में भेजे गए थे। उन्होंने भारतीय राजनीति को एक दर्शन दिया, एक नया विचार दिया और एक नया विकल्प दिया। राष्ट्रवादी विचारधारा के मजबूत स्तम्भ दीनदयालजी ने मानव जीवन के संबंध में दुनिया में प्रचलित परिकल्पनाओं की अपेक्षा कहीं अधिक संपूर्ण दर्शन दिया। वामपंथियों के ढकोसलावादी सिद्धांतों की अपेक्षा दीनदयालजी का एकात्म मानवदर्शन व्यावहारिक था। यही कारण है कि विरोधी विचारधाराओं द्वारा तमाम अवरोध खड़े करने के बाद भी एकात्म मानवदर्शन लोक स्वीकृति पा गया। इसमें सम्पूर्ण जीवन की एक रचनात्मक दृष्टि है। इसमें भारत का अपना जीवन दर्शन है, जो व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को टुकड़ों में नहीं, समग्रता में देखता है। दीनदयालजी अपने दर्शन में बताते हैं कि मन, बुद्धि, आत्मा और शरीर इन चारों का मनुष्य में रहना आवश्यक है। इन चारों को अलग-अलग करके विचार नहीं किया जा सकता।

बहरहाल, जब दीनदयाल उपाध्याय के विलक्षण व्यक्तित्व एवं उनके विचारदर्शन की व्यापक चर्चा का अवसर आया है तो राजनीति, मीडिया और जनसंचार के अध्येताओं को उनके संबंध में अधिक से अधिक संदर्भ सामग्री की आवश्यकता होगी। संजय द्विवेदी द्वारा संपादित पुस्तक ‘भारतीयता का संचारक’ राजनीतिज्ञों, संचारवृत्तिज्ञों और लेखकों की बौद्धिक भूख को कुछ हद तक शांत करने में सफल होगी। पुस्तक को चार खण्डों में बांटकर दीनदयाल जी के समग्र व्यक्तित्व का आंकलन किया गया है। पहले खण्ड में उनके विचार दर्शन पर चर्चा है। दूसरे खण्ड में उनके संचारक, लेखकीय और पत्रकारीय व्यक्तित्व पर विमर्श है। तीसरे खण्ड ‘दस्तावेज’ में डॉ. सम्पूर्णानंद, श्रीगुरुजी और नानाजी देशमुख द्वारा उन पर लिखी-बोली गई सामग्री संकलित की गई है। इसी हिस्से में दीनदयाल जी के दो महत्वपूर्ण लेख भी सम्मिलित किए गए हैं, जिनमें से एक भाषा पर है तो दूसरा पत्रकारिता पर है। चौथे अध्याय में एकात्म मानववाद को प्रवर्तित करते हुए दीनदयाल जी के व्याख्यान संकलित किए गए हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की ख्याति विश्व को एकात्म मानवदर्शन का चिंतन देने और भारतीय जनता पार्टी के विचार-पुरुष के रूप में हैं। भारतीय राजनीति में उनके अवदान से फिर भी दुनिया भली-भांति परिचित है। लेकिन, पत्रकारिता एवं जनसंचार के क्षेत्र में उनके योगदान को बहुत कम विद्वान जानते हैं। श्री द्विवेदी की पुस्तक के दूसरे अध्याय से गुजरते हुए दीनदयाल जी उपाध्याय की छवि ‘भारतीयता के संचारक’ के नाते सदैव के लिए अंकित हो जाती है। इस हिस्से में बताया गया है कि कैसे और किन परिस्थितियों में पंडितजी ने भारतीय विचार के प्रचार-प्रसार के लिए पत्रकारिता को माध्यम बनाया। संचार के माध्यमों पर वामपंथियों के कब्जे के बीच उन्होंने राष्ट्रवादी विचार को लोगों तक पहुंचाने के लिए स्वदेश, राष्ट्रधर्म और पाञ्चजन्य की शुरूआत की। पंडितजी ने कंपोजीटर से लेकर संवाददाता तक की भूमिका निभाई थी। इस अध्याय में देखने को मिलता है कि कैसे उन्होंने पत्रकारिता के सिद्धांतों की स्थापना की थी। पुस्तक दूसरे क्षेत्रों में भी उनके चिंतन के दर्शन कराती है। निश्चित ही दीनदयाल जी के आर्थिक चिंतन के बारे में बहुत कम लोग जानते होंगे। कृषि, उद्योग, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में भी उनके गहरे चिंतन की जानकारी हमें इस पुस्तक से मिलेगी। दीनदयाल जी संभवत: पहले राजनेता हैं जिनके चिंतन का केन्द्र अंतिम आदमी है। आदमी की बुनियादी जरूरतों के बारे में उन्होंने जिस गहराई से विचार किया, वहां तक भी पहले कोई नहीं पहुंचा था। पंडितजी अधिक व्यावहारिक धरातल पर उतरते हुए कहते हैं कि प्रत्येक अर्थव्यवस्था में न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति की गारंटी एवं व्यवस्था अवश्य रहनी चाहिए। न्यूनतम आवश्यकताओं में वे रोटी, कपड़ा और मकान तक ही सीमित नहीं रहते बल्कि उससे आगे जाकर शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा को भी सम्मिलित करते हैं। बहरहाल, अंत्योदय का विचार देने वाले राष्ट्रऋषि दीनदयाल उपाध्याय पर उनके जन्मशती वर्ष में एक सम्पूर्ण पुस्तक का आना वास्तव में शोधार्थियों, राजनीतिज्ञों, पत्रकारों और लेखकों के लिए महत्वपूर्ण है। दीनदयाल जी के समग्र व्यक्तित्व के दर्शन कराने में पुस्तक सफल है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस पुस्तक के बहाने पंडित दीनदयाल उपाध्याय का बिना किसी अवरोध-विरोध के ईमानदारी से विश्लेषण किया जा सकेगा।

पुस्तक : भारतीयता का संचारक : पं. दीनदयाल उपाध्याय (संपादकः संजय द्विवेदी)

मूल्य : 500 रुपये (सजिल्द संस्करण), पृष्ठ : 324

प्रकाशक : विज्डम पब्लिकेशन, सी-14, डी.एस.आई.डी.सी. वर्क सेंटर,

झिलमिल कॉलोनी, शाहदरा, दिल्ली-110095

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