
चंद्रभूषण-
ठेली पर परोसा जाता हिंदू राष्ट्र, इस बार निशाना दबंग पिछड़ों पर…. आजकल रोज सबेरे पांच-छह अंकल जी एक छोटी-सी ठेली पर एक साउंड बॉक्स और कॉम्पैक्ट बैटरी धरे मोबाइल पर ब्लूटूथ के सौजन्य से ‘हिंदू जगाने’ निकले दिखाई पड़ते हैं। उनका शारीरिक ढांचा खारी बावली मार्केट में गद्दी संभालने वाले आढ़तियों जैसा दिखता है। हिंदू-हिंदू एक हैं, एक हैं तो सेफ हैं- सेफ हैं, सेफ हैं’ और ‘केसरिया जब, केसरिया जब, केसरिया लहराएंगे/ गद्दारों के, गद्दारों के होश ठिकाने आएंगे’ जैसे दिलचस्प नारे मशीन से गूंजते हैं। अंकल जी लोग सिर्फ लय में हाथ उठाते हैं और साथ में धीरे-धीरे यही सब बोलते हैं।
पिछले संडे उनके पीछे-पीछे दस-बारह उत्साही मॉर्निंग-वॉकर भी चल पड़े थे। इस बार ठंड ने या शायद नमूना लगने की फिक्र ने उन्हें दूर ही रखा। फिर भी, यह कवायद अगर पूरे देश में चल रही होगी तो निश्चित रूप से इसके अपने खतरे होंगे। संसद में फिलहाल संविधान पर बहस चल रही है और ये नारे मारते संघी टट्टू भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने निकले हैं। इस काम में ये कितने सफल होंगे, बाद की बात है, लेकिन गिनती के एक-दो बुजुर्ग मुस्लिम मॉर्निंग-वॉकर्स को सैर का यह खास इलाका छुड़ा देने में ये अभी ही कामयाब हो चुके हैं।
और ऐसी कवायदों का एक क्लास कैरेक्टर तो शुरू से रहा है, लेकिन अभी धीरे-धीरे इनका एक नया कास्ट कैरेक्टर भी उभर रहा है। अश्वमेध के इस केसरिया घोड़े को इस बार एक अलग सामाजिक दायरा जीतना है। इलाहाबाद हाइकोर्ट के वीएचपी वाले सिटिंग जज या राज्यसभा के अध्यक्ष अपवाद नहीं हैं। जिस बस्ती में ऊपर वाली कवायद चल रही थी, वह भी एक यादव डेवलपर की ही विकसित की हुई है और हाल में इन सज्जन ने यहां एक भव्य मंदिर भी बनवाया है। संघ का फौरी निशाना हिंदू राष्ट्र के इसी एकमात्र राजनीतिक अवरोध पर है।
पिछड़ावादी राजनीति के कमजोर पड़ने के साथ संघी सोशल इंजीनियरिंग ने यादव, कोइरी और कुर्मी (कहीं-कहीं जाट-गूजर) एलीट पर अपना ध्यान केंद्रित किया है। वैश्य वर्ण में शामिल होने को लालायित कई अति-पिछड़ी जातियां पहले ही संघ के आउटर सर्किल में आ चुकी हैं। वाइस चांसलर, हाइकोर्ट जज और गवर्नर जैसे पदों पर लाए जा रहे दबंग पिछड़ों का तीखा हिंदुत्ववादी प्रतिरोध अखिलेश और तेजस्वी कितना झेल पाएंगे, भविष्य बताएगा। खासकर तब, जब इन जातियों के बिल्डर और ठेकेदार तेजी से पाला बदलने लगे हों।
संविधान को कूड़ेदान में डालकर मनुस्मृति लागू करने की मूर्खता संघी नहीं करेंगे। यह सिर्फ कांग्रेस के मतिमंद रणनीतिकारों की कल्पना है। सौ साल से शाखा लगा रहे संघी कहीं ज्यादा शातिर ढंग से काम करते हैं। वे लेबल वही पड़ा रहने देते हैं और कभी-कभी बोतल भी। बस, उसमें रखी दारू बदल देते हैं। उन्हें यकीन है, देश पूरा का पूरा हिंदू-पाकिस्तान बन जाएगा, तब भी इसके संविधान पर दस्तखत आंबेडकर का ही रखे रहने में उनका फायदा है, क्योंकि कांग्रेस की सरकार ने आंबेडकर को भारत रत्न तो दिया नहीं। न ही बाबा साहेब और सरदार पटेल की सैकड़ों फुट ऊंची मूर्तियां उससे बनवाते बनीं!
दोनों कद्दावर नेता मोदी-योगी का बुलडोजर राज चाहते हुए पचास के दशक में ही दुनिया से विदा हो गए, जो जैसे-तैसे अब इक्कीसवीं सदी में आकर उनकी आत्मा को शांति प्रदान कर रहा है! बहरहाल, रामप्रस्थ कॉलोनी का एक चक्कर लगाकर हम लौट रहे थे तो चौराहे पर ठेली लिए अंकल जी लोगों के दल को चुप और परेशान देखा, क्योंकि ब्लूटूथ गद्दारी कर बैठा था। मेरी पत्नी इससे खुश हुईं और बोलीं कि बहुत अच्छा हुआ। लेकिन मैं ज्यादा खुश नहीं हो पाया। इन जहरखुरानों की छोटी-छोटी ‘पराजयों’ पर खुश होते-होते ही हालात आज यहां तक पहुंच गए हैं। आगे कब क्या हो जाएगा, कौन जानता है?
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