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मंडल ही कमंडल था, मंडल ही कमंडल है : न्यायाधीश शेखर यादव का ढांचा मंडल का लेकिन कोट, टाई और चेहरे का पॉलिश कमंडल का!

विश्व दीपक-

मैगी बनने में पांच मिनट लगता है. चाय बनाने में दस मिनट. मटन पकाने में एक घंटा. एक सामाजिक समीकरण को पकने में कई बार दशकों लग जाते हैं. मंडल ही कमंडल है. यह पकवान 90 के दशक में ही चूल्हे पर चढ़ा दिया गया था. अब जाकर ठीक से पका है. सब इसका प्रसाद ग्रहण कर रहे हैं.

प्रायः समझा जाता है (समझाया गया) कि मंडल, कमंडल एक साथ नहीं पक सकते. विषम हैं एक दूसरे के. लेकिन यह गलत था. पॉलिटिकल करेक्टनेस के चक्कर में, हमारे दौर के बौद्धिकों ने बड़ा पाप किया. इस पाप का बोझ हमारी पीढ़ी क्यों वहन करे?
जो जहां है उसकी सही शिनाख्त होनी चाहिए.

बाबरी विध्वंस में मंडल की अहम भूमिका थी. इसकी शिनाख्त होनी चाहिए. उत्तर प्रदेश, बिहार के यादवों को छोड़कर, वो भी मुलायम-लालू की वजह से, ज्यादातर मंडल बाबरी विध्वंस के गुनहगार हैं. जो मंडल को, कमंडल का एंटीडोट समझ रहे थे वो गलत थे.इसीलिए कहता हूं कि मंडल ही कमंडल था. मंडल ही कमंडल है.


कल्याण सिंह. कमंडल आंदोलन का प्रमुख चेहरा. उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री.अब दिवंगत. 1990 के दशक में जिन मंडल जातियों ने सबसे पहले कमंडल थामा, लोध उनमें अग्रणी थे. कल्याण सिंह उसी लोध जाति से थे.

इस इंटरव्यू में वो खुलकर अपने दिल की बात बता रहे हैं.

Interview link-

https://www.facebook.com/share/r/cov33MGVv9YzGwGV/?mibextid=qDwCgo

बाबरी विध्वंस की घटना, कल्याण सिंह लोध की निगाह में शौर्य की बात थी. हालांकि तब तो मुख्यमंत्री थे. विध्वंस रोकना उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी थी.

इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप पूरे देश में दंगे भड़क उठे थे. दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, सूरत, कानपुर समेत हर शहर में दंगे हुए. अनुमानतः 3000 लोग दंगों में मारे गए. यहां तक कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी प्रतिक्रिया हुई. हिन्दुओं को निर्दयतापूर्वक मारा गया. जलाया गया. सैकड़ों मंदिरों ध्वस्त कर दिए गये.

मत भूलिएगा कि कल्याण सिंह लोध ने उसी संविधान की शपथ ली थी जिसके प्रमुख शिल्पकार डॉ अंबेडकर का आज परिनिर्वाण दिवस मनाया जा रहा है.

इसीलिए कहता हूं
मंडल ही कमंडल था, मंडल ही कमंडल है.


मंडल ही कमंडल था.
मंडल ही कमंडल है.

सोच रहा था कि सिलसिलेवार तरीके से लिखूंगा. दशकवार. लेकिन बीच में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज साहब आ गये. अगर आप सोच रहे हैं कि शेखर यादव अपवाद है तो आप गलत हैं. शेखर यादव ऊपर लिखे नियम की ताजा तरीन पुष्टि हैं. जहां जातीय लाभ/हित/संबंध मजबूत हैं वहां छोड़कर बाकी हर जगह मंडल ही कमंडल था. मंडल ही कमंडल है. कमंडल के नीचे मंडल की धातु है. मंडल के चेहरे पर कमंडल की पॉलिश.

याद रखिए मैगी पकने में पांच मिनट, चाय बनाने में दस मिनट लगता है. मटन पकाने में एक घंटा. मंडल ही कमंडल है. यह पकवान कुछ दशक में पका. लेकिन पक चुका है. आने वाले समय में इसका रस और गाढ़ा होगा. यह भी याद रखिए कि पॉलिटिकल करेक्टनेस के चक्कर में हमसे झूठ बोला गया था. अब झूठ के इस नकाब को नोचकर फेंक देना है.


जस्टिस सिन्हा. जस्टिस शेखर यादव. इलाहाबाद हाई कोर्ट का जस्टिस होना कोई मामूली बात नहीं. याद कीजिए: इसी इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक जस्टिस जगमोहनलाल सिन्हा भी थे. जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया था. बहुत ही मामूली बात थी. लेकिन सार्वजनिक जीवन में नैतिकता, शुचिता का तकाज़ा था. इंदिरा गांधी जैसी ताकतवर नेता, शख्शियत के खिलाफ दिए गये जस्टिस सिन्हा के उस फैसले ने भारत का भाग्य बदल दिया.

शेखर यादव भी जस्टिस ही हैं. अगर पहले से उनका परिचय नहीं पता होता तो उनके महान विचार सुनकर यही लगता कि संघ का कोई बौद्धिक चल रहा है.

देखें वीडियो-

https://www.facebook.com/share/r/TnZcfBYkwg9595Ub/?mibextid=qDwCgo

जस्टिस यादव कोई अपवाद नहीं हैं. वो उस सोच का हिस्सा हैं जो न्यायपालिका, मीडिया, नौकरशाही हर जगह नंगई के साथ खुद को प्रगट कर रहा है. हैरानी की बात यह है कि वह अपनी नंगई को, बहादुरी समझता है. न्यायाधीश महोदय का ढांचा मंडल का. कोट, टाई और चेहरे का पॉलिश कमंडल का.


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