
Abhishek Srivastava-
1982 में एरिक हॉब्सबॉम ने बहुत अच्छे से एक लेक्चर में दक्षिणपंथी और अस्मितावादी राजनीति के आपसी रिश्ते को समझाया था. उस थ्योरेटिकल खांचे में देखें, तो मंडल और कमंडल के बीच वही complementarity वाला रिश्ता है जो भारतीय सेक्युलरिज्म और सांप्रदायिकता के बीच है.
क्या ही इत्तेफाक है, कि हमारे दौर में मंडल को कमंडल की न केवल काट माना गया यानि सेकुलर माना गया, बल्कि सेक्युलरिज्म की कसौटी तक बना दिया गया. आज हालत यहां पहुंच चुकी है कि identities को आलोचनात्मक दृष्टि से देखने वाला संघी कह दिया जाता है जबकि identities को पोसने वाला सेकुलर, प्रगतिशील बना बैठा है. मेरा मानना है कि लालू, मुलायम, इसके अपवाद नहीं हैं. बस, पॉलिटिकल प्रतिस्पर्धा की तात्कालिक ऑब्लिगेशन उन्हें सेकुलर छवि में गढ़ती है.
एक काम की बात और, कि मंडल-कमंडल के समानांतर नवउदारवाद आया था. तीनों का एक ही समय था. मंडल- कमंडल और भारतीय सेक्युलरिज्म-सांप्रदायिकता एक दूसरे के पूरक कैसे हुए, इसे neoliberal आर्थिकी के बगैर नहीं समझा जा सकता जिसने एक enabling ecosystem मुहैया करवाया. अगर मंडल कमंडल दस साल पहले हुआ होता, तो फेल हो जाता.
यह उस वक्त हुआ जब विश्व बैंक और IMF का सशर्त कर्ज आपदधर्म बन गया भारत के लिए. इस आपदधर्म ने ही ideological लड़ाई का अखाड़ा इकोनॉमी से कल्चर पर शिफ्ट कर दिया. इकोनॉमी की लड़ाई जब तक ideological रही, मंडल कमंडल वैधता नहीं पा सके थे. जब लेफ्ट राजनीति कल्चर के मैदान में खुलकर आ गई और उसने पॉलिटिकल इकोनॉमी को नवउदारवाद के भरोसे छोड़ कर idea of india बचाने का ठेका ले लिया, तो बाबरी गिर गई और अस्मिताएं उठ गईं.

यानी, नवउदारवाद ही वह रिंग था जिसमें मंडल और कमंडल नाम के दो पहलवान आपस में नूराकुश्ती कर रहे थे. WWF वाली. इसमें होने वाली जीत भी नकली थी, हार भी नकली. लेकिन हम लोगों को WWF देखने की आदत भी तो उसी समय डाली गई थी. वही नूराकुश्ती आज भी चल रही है, जबकि नवउदारवाद का प्रोजेक्ट इकोनॉमी के लेवल पर फेल हो चुका है पूरी दुनिया में. नवउदारवाद ने आर्थिक वादा कभी पूरा नहीं किया, लेकिन अपने पीछे सांस्कृतिक कचरा छोड़ गया. मंडल कमंडल और सेक्युलरिज्म कम्युनलिज्म का यह सांस्कृतिक कचरा रेडियोधर्मी टाइप है. इसकी उम्र बहुत लंबी है. हमारी और अगली पीढ़ियां इसके प्रभाव में मरने को अभिशप्त हैं, निजी disavowal के बावजूद.
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