नई दिल्ली। सहारा मीडिया के पत्रकारों और कर्मचारियों का वेतन एवं अन्य बकाया भुगतान को लेकर चल रहा अनिश्चितकालीन धरना अब एक वर्ष पूरा होने की ओर है। नोएडा सेक्टर-11 स्थित सहारा मीडिया परिसर में कर्मचारी पिछले 358 दिनों से शांतिपूर्ण धरने पर बैठे हैं। उनका आरोप है कि कंपनी पर 2014 से वेतन और अन्य देनदारियां बकाया हैं, लेकिन अब तक न तो प्रबंधन और न ही सरकारी एजेंसियों की ओर से कोई ठोस समाधान निकला है।
कर्मचारियों ने 17 जुलाई 2025 को गौतमबुद्ध नगर जिला प्रशासन, श्रम विभाग और सहारा प्रबंधन को ज्ञापन देने के बाद धरना शुरू किया था। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि अब उन्हें आंशिक भुगतान या मौखिक आश्वासन नहीं चाहिए, बल्कि प्रत्येक कर्मचारी के बकाया का लिखित विवरण, भुगतान की समय-सीमा और उनकी नौकरी की स्थिति पर स्पष्ट जवाब चाहिए।
हालांकि, कर्मचारियों द्वारा बताए गए कुल बकाया की राशि की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
2014 से अनियमित वेतन भुगतान का आरोप
धरने पर बैठे कर्मचारियों का दावा है कि जनवरी 2014 से नियमित वेतन भुगतान बाधित होना शुरू हो गया था। उनका आरोप है कि इसके बाद कर्मचारियों को पूरा वेतन देने के बजाय समय-समय पर केवल ‘टोकन मनी’ दी जाती रही। यह भुगतान भी धीरे-धीरे घटकर मासिक वेतन का लगभग 30 से 40 प्रतिशत रह गया और जुलाई 2025 में धरना शुरू होने से पहले करीब तीन महीने तक पूरी तरह बंद हो गया।
कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने वर्षों तक इस उम्मीद में काम जारी रखा कि कंपनी की आर्थिक स्थिति सुधरेगी और उनका बकाया वेतन एक दिन चुका दिया जाएगा।
धरने के बावजूद नहीं रोका कामकाज
प्रदर्शनकारी कर्मचारियों का कहना है कि धरना शुरू करते समय उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि समाचार बुलेटिन, विज्ञापन और अन्य दैनिक कार्य बाधित न हों। उनका उद्देश्य अनुशासनहीनता या काम छोड़ने का आरोप लगने के बजाय अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठाना था।
वेतन ही नहीं, PF, ग्रेच्युटी और फुल एंड फाइनल सेटलमेंट भी बकाया
कर्मचारियों का कहना है कि उनका मामला केवल मासिक वेतन तक सीमित नहीं है। उन्होंने भत्ते, भविष्य निधि (PF), ग्रेच्युटी और नौकरी छोड़ चुके, सेवानिवृत्त या संस्थान से अलग हो चुके कर्मचारियों के फुल एंड फाइनल सेटलमेंट का मुद्दा भी उठाया है।
कुछ कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि उन पर बिना बकाया भुगतान किए इस्तीफा देने का दबाव बनाया गया। वहीं, जो कर्मचारी अब भी संस्थान से जुड़े हैं, वे अपनी सेवा की स्थिति को लेकर अनिश्चितता में हैं।
प्रशासन और श्रम विभाग से भी नहीं मिला समाधान
धरना शुरू करने से पहले कर्मचारियों ने जिला अधिकारी, उप श्रम आयुक्त और सहारा प्रबंधन से गुहार लगाई थी। कर्मचारियों का दावा है कि नोएडा के उप श्रम आयुक्त ने प्रबंधन को अप्रैल और मई 2025 का वेतन देने का निर्देश भी दिया था, लेकिन उसका पालन नहीं हुआ। मामला श्रम न्यायालय तक भी पहुंचा, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका।
धरने के दौरान सहारा प्रबंधन ने कर्मचारियों को नोटिस जारी कर प्रदर्शन समाप्त करने को कहा था और चेतावनी दी थी कि धरना जारी रहने पर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि, उस नोटिस में वेतन भुगतान की कोई समय-सीमा या कर्मचारियों के बकाया दावों पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया था।
वर्किंग जर्नलिस्ट्स फेडरेशन का भी मिला समर्थन
धरने को इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (IFWJ) का भी समर्थन मिला। संगठन ने सहारा प्रबंधन से कर्मचारियों का बकाया वेतन चुकाने और सरकार व श्रम विभाग से हस्तक्षेप करने की मांग की थी।
कर्मचारियों की प्रमुख मांगें
प्रदर्शनकारी कर्मचारियों की मांग है कि प्रबंधन प्रत्येक कर्मचारी का पूरा बकाया, वैधानिक देनदारियां और फुल एंड फाइनल सेटलमेंट का लिखित ब्यौरा जारी करे। साथ ही यह स्पष्ट किया जाए कि वर्तमान कर्मचारी अभी भी कंपनी की सेवा में हैं या नहीं, कहीं छंटनी या संस्थान बंद करने की प्रक्रिया तो शुरू नहीं हुई, और पूर्व कर्मचारियों के दावों का निपटारा कैसे किया जाएगा।
कर्मचारियों का कहना है कि लिखित स्थिति स्पष्ट न होने के कारण उन्हें यह भी समझ नहीं आ रहा कि वे नौकरी जारी मानें, व्यक्तिगत कानूनी कार्रवाई करें या अपनी सेवा समाप्त मान लें।
कर्मचारियों ने स्पष्ट किया कि उनका आंदोलन भारत एक्सप्रेस द्वारा सहारा मीडिया के टीवी चैनलों और राष्ट्रीय सहारा अखबार को पुनर्जीवित करने की घोषणा से कई महीने पहले शुरू हो चुका था।
मार्च 2026 में भारत एक्सप्रेस के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ उपेंद्र राय ने सहारा के टीवी और प्रिंट मीडिया कारोबार को फिर से शुरू करने की योजना की घोषणा की थी। बाद में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के ब्रॉडकास्ट सेवा पोर्टल पर सहारा समय के कई लाइसेंस अपडेट भी दिखाई दिए।
हालांकि, अब तक सार्वजनिक रूप से यह घोषणा नहीं हुई है कि भारत एक्सप्रेस ने लाइसेंसधारी कंपनी का अधिग्रहण किया है या सहारा के पुराने कर्मचारियों की देनदारियों की जिम्मेदारी ली है।
धरने पर बैठे कर्मचारियों का कहना है कि यदि सहारा मीडिया के संचालन को किसी नए स्वरूप में दोबारा शुरू किया जाता है, तो उससे पहले उनके वर्षों पुराने वेतन और अन्य बकाया दावों का समाधान किया जाना चाहिए।



