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आज के अखबार : मंत्री के चार प्रमुख सहायकों को एक साथ हटाने की ‘खबर’ का फॉलोअप सिर्फ टेलीग्राफ में

Front page of a Hindi newspaper with two portrait photos and a quote box related to a political issue.

गडकरी और पुरी की चुनौती या हेडलाइन मैनेजमेंट। बिना जांच, परीक्षण और लाभ दिए प्रयोग करने की बेशर्मी उसमें ‘एक’ उदाहरण की मांग जबकि सोशल मीडिया उदाहरणों से भरा पड़ा है।

संजय कुमार सिंह

भारी मांग और दबाव के बाद तमाम तैयारियों के बावजूद मंत्रिमंडल विस्तार या पुनर्गठन लटका हुआ है। 2029 जीतने की तैयारियों में लगाए गए और मुख्य भूमिका निभा रहे केंद्रीय मंत्री के सहायकों को हटा दिया गया है जबकि केंद्रीय मंत्रियों से इस्तीफा लेने की मांग और कारणों के बावजूद उनका बाल भी बांका नहीं हुआ है लेकिन केंद्रीय मंत्री के सहायकों को हटा दिए जाने की खबर है। कांग्रेस ने इस सफाई पर सवाल किया है लेकिन अखबारों में भरपूर सन्नाटा है। हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए इथेनॉल का मुद्दा उठाकर सरकार पेट्रोल महंगा बेच रही है। आज भी नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर गडकरी और पुरी की चुनौती छपी है। मुद्दा यह है कि प्रयोग पूरी हुए बगैर मिलावट सही नहीं है। मिलावट से नुकसान की खबरें हैं उनपर सुवनाई किए बगैर, संतोषजनक जवाब दिए बगैर चुनौती दी जा रही है ताकि सबलोग इसी में लगें और दूसरे मुद्दे पीछे चले जाएं। इसमें पेट्रोल की कीमत कम नहीं होना भी एक मुद्दा है। इसपर आज सिर्फ दैनिक भास्कर में अच्छी खबर है। अमर उजाला प्रचार कर रहा है कि भारत ने इंडोनेशिया को अन्य चीजों के साथ ईवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) बेचने के लिए समझौता किया है। नवोदय टाइम्स ने शीर्षक में ईवीएम नहीं लिखा है और ‘ब्रह्मोस’ तथा ‘अस्त्र’ बेचने (देने) का प्रचार किया है। देशबन्धु ने प्रधानमंत्री के इसी इंडोनेशिया दौरे की जो खबर दी है वह इंडोनेशियाई संसद में उनका भाषण है। शीर्षक है – विस्तारवाद नहीं, विकासवाद की नीति पर चलता है भारत। अंग्रेजी अखबारों में भी आज प्रधानमंत्री की इंडोनेशिया यात्रा की ही खबर लीड है। द टेलीग्राफ अपवाद है और उसकी लीड बंगाल की खबर है। द हिन्दू की लीड वायनाड की खबर है। मुख्य शीर्षक है, वायनाड में टनल (सुरंग) बनाने की जगह पर मलबा खिसकने से तीन लोगों की मौत हो गई। खबर के अनुसार, केरल में टनल बनाने की जगह पर खोदी गई मिट्टी का ढेर बारिश के दौरान ढह गया। मुख्यमंत्री ने जांच का एलान किया है। मंत्री का कहना है कि निजी निर्माण कंपनी ने ज़िला प्रशासन की चेतावनियों को नज़रअंदाज़ किया।

हिन्दुस्तान टाइम्स ने बारिश से गुरुग्राम की हालत के साथ इस हादसे का भी जिक्र किया है। तस्वीर से पता चलता है कि डबल इंजन वाले गुरुग्राम में विकास का हाल कैसा है। यह फोटो आज कई अखबारों में है लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स में सबसे बड़ी और सबसे प्रमुखता से देश भर की खबर की तरह छपी है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर 2008 के अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट के लिए 38 लोगों की मौत और 11 को उम्र कैद की सजा बहाल रखने की खबर दी है। इस हादसे में 56 लोगों की मौत हो गई थी 246 जख्मी हुए थे। विशेष अभियोजक, मितेश अमीन के अनुसार यह किसी हाईकोर्ट द्वारा मृत्यु दंड को कायम रखी जाने वाली सबसे बड़ी संख्या है। दि एशियन एज ने इंडोनेशिया की खबर लीड बनाई है। लेकिन पहले पन्ने पर डबल इंजन वाले महाराष्ट्र के नासिक जिले में बह गए एक अस्थायी पुल के बाद की स्थिति है। केंद्र सरकार के कई मंत्रियों को हटाने की मांग के बाद एक मंत्री के चार प्रमुख सहायकों को एक साथ हटा दिए जाने की खबर पर्याप्त गंभीर है। इंडियन एक्सप्रेस की कल की इस खबर का फॉलोअप आज इंडियन एक्सप्रेस के अलावा सिर्फ द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर है। द टेलीग्राफ ने यह भी बताया है कि भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने मंगलवार को जम्मू की अपनी यात्रा अचानक समाप्त कर दी और दिल्ली लौट आए। यात्रा के दौरान माता वैष्णो देवी का उनका तीर्थ भी निर्धारित था लेकिन वे पहले ही वापस आ गए। भाजपा के एक सूत्र ने इसका कारण आधिकारिक प्रतिबद्धताएं कहा। सूत्रों के अनुसार, राजधानी में एक आपात बैठक होने वाली है और वे इसी में शामिल होने के लिए जल्दी वापस आए हैं। हालांकि, सूत्रों ने इस आपात बैठक का एजंडा बताने से इनकार कर दिया।

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री के चार सहायकों को एक साथ हटाए जाने पर कांग्रेस ने भी सवाल उठाए हैं लेकिन इसकी खबर भी अन्य अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। द टेलीग्राफ के अनुसार, सरकार ने मंत्री के चार सहायकों को एक साथ हटाने का कोई कारण नहीं बताया है जबकि मंत्रालय तो महत्वपूर्ण है ही, हाल में केंद्रीय मंत्री भूपेन्दर यादव भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक भूमिका में थे। खबरों के अनुसार, बंगाल विधान सभा चुनाव के समय वे भारतीय जनता पार्टी के मुख्य चुनाव प्रभारी थे और बाद में दल बदल या तृणमूल कांग्रेस में तोड़फोड़ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। टेलीग्राफ के अनुसार भूपेन्दर यादव का मंत्रालय मुख्य भूमिका निभाता है क्योंकि ज्यादातर उद्योगों को प्लांट स्थापित करने से पहले पर्यावरण क्लियरेंस लेना होता है। ऐसे मंत्री के सहायकों की सफाई छंटाई सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री कार्यालय के निर्देशों पर की गई है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि भूपेन्दर यादव भाजपा के सबसे प्रमुख ओबीसी नेताओं में से एक हैं और संगठन संबंधी प्रमुख रणनीतिकारों में भी एक माने जाते हैं। टीएमसी में तोड़फोड़, पश्चिम बंगाल में राज्यसभा चुनाव उपचुनाव की अचानक घोषणा, असली तृणमूल के दावों के बीच एक केंद्रीय मंत्री के सहायकों को अचानक हटा दिया जाना और केंद्रीय मंत्रियों को हटाने की मांग पर कोई कार्रवाई न होना अपने आप में महत्वपूर्ण खबर है लेकिन मुझे अपने 10 अखबारों में सिर्फ दो में पहले पन्ने पर दिख रही है। केंद्रीय मंत्री के जो चार सहायक हटाए गए हैं उन्हें 3 जुलाई के अलग आदेश के जरिए या तो शंट किया गया है या फिर सैक (नौकरी से बाहर) कर दिया गया है। इसकी जानकारी सोमवार की रात या मंगलवार को सार्वजनिक हुई। टेलीग्राफ ने लिखा है कि नरेन्द्र मोदी के 12 साल के कार्यकाल में इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ है। खबरों के अनुसार हटाए गए सहायकों को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया है और आदेश की प्रतिलिपि प्रधानमंत्री कार्यालय को भी भेजी गई है। खबर के अनुसार, इनमें एक, सिद्धार्थ यादव मंत्री के सबसे पुराने और करीबी सहायकों में से एक हैं इनके संबंध और शुरुआती जुड़ाव आरएसएस के समय से हैं।

ऐसे व्यक्ति को सरकारी नौकरी में रखे जाने और हटाए जाने पर कोई कारण नहीं बताना सरकारी कार्यशैली की पारदर्शिता का उदाहरण है जो प्रेस कांफ्रेंस बंद करके मन की बात के रूप में शुरू हुआ है। इसी कार्यशैली की बदौलत चढ़ावा चोरी मामले में आरएसएस के लोग बचा लिए गए। बाकी जो होगा और जब होगा तब होगा। दूसरी ओर, हरदीप पुरियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होना बताता है कि भाजपा में अंदरखाने सब ठीक और सामान्य नहीं है। पर अखबारों को लकवा मार गया है क्योंकि पत्रकार अब बचे नहीं और जो पक्षकार या विरोधी घोषित किए जा चुके हैं उनकी खबरों से पता चल जाएगा कि खबर किस ने दी होगी। पेगासस का डर ऊपर से। इसलिए पत्रकार चाहे न डरे खबर मिलना मुश्किल हो गया है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ राष्ट्रीय प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने एक्स पर कहा: “जब रातों-रात किसी मंत्री के दफ़्तर का ‘पूरी तरह से सफ़ाया’ हो जाए तो यह एक ऐसा मामला है जिसे बताया जाना चाहिए। प्राइवेट सेक्रेटरी और कई अधिकारियों को तुरंत हटा दिया गया? यह कोई मामूली प्रशासनिक बात नहीं है; यह एक बड़ी खबर (हेडलाइन) है। सुर्खियां होनी चाहिए, जनता को जवाब मिलना चाहिए: क्या गड़बड़ हुई? क्या पता चला? इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है?” पर अखबारों में नील बटा सन्नाटा है। द टेलीग्राफ ने लिखा है कि भूपेन्द्र यादव ने अपने निजी कर्मचारियों को हटाए जाने पर अभी तक चुप्पी साधे रहने का चुनाव किया है। यादव के सहायकों में एक अमर सिंह, 2010 बैच के आईआरएस हैं उन्हें प्रशासनिक कारणों से उनके राजस्व विभाग में भेज दिया गया है।

टेलीग्राफ ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि कुछ अन्य केंद्रीय मंत्रियों के कार्यालय में भी ऐसी कार्रवाई हो सकती है क्योंकि प्रधानमंत्री अपने मंत्रिमंडल के विस्तृत ओवरहॉल की तैयारी कर रहे हैं। दूसरी संभावना यह भी है कि प्रधानमंत्री पद छोड़ना नहीं चाहते हैं और इस मामले में कोई भी गलती बर्दाश्त करने लायक नहीं है। जो खबरें आ रही हैं, जो घटनाएं घट रही हैं और सहयोगी जो सब कर रहे हैं उसमें किसी भी नुकसान से सबसे ज्यादा परेशानी प्रधानमंत्री को ही होने वाली है इसलिए वे सब कुछ फिर से ठीक करने का दावा करके कुछ समय पा सकते हैं। साथ वालों की मजबूरी होगी कि सत्ता के लिए शांत रहें। सरकार वैसे भी कर कुछ नहीं रही है सिर्फ कुर्सी पर बने रहने के उपाय हो रहे हैं उसमें किसी की जाए, किसी को मिले एक ही कुर्सी सबसे महत्वपूर्ण हो गई है और यह समर्थकों-प्रचारकों के लिए भी है। इसलिए कुछ हो या नहीं सब दिलचस्प बना रहेगा। अगर आप समझ गए हों कि खबरें क्यों नहीं होती हैं तो आइए बताएं कि खबर क्या है। इससे आप समझ जाएंगे कि इन खबरों को प्रकाशित होने के लिए क्या सब किया जाता है। आम बोलचाल में इसे हेडलाइन मैनेजमेंट कहते हैं। आज दैनिक भास्कर की लीड सबसे अलग है। खबर के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत 68.69 डॉलर / बैरल है और कंपनियां 36 दिन से लगातार मुनाफा कमा रही हैं। शीर्षक है, तेल कंपनियां अब ₹11 प्रति लीटर कमा रहीं हैं लेकिन आम लोगों को राहत नहीं दी जा रही है वह भी तब जब क्रूड सबसे महंगा था तब भी कंपनियों ने 70% तक मुनाफा कमाया है। अखबार ने लिखा है, 2018 में कच्चे तेल की कीमत 80.08 डॉलर बैरल थी। तब दिल्ली में पेट्रोल 72.15 रुपए और डीजल 70.21 रुपए प्रति लीटर था। 2020 में कच्चा तेल 43.41 डॉलर प्रति बैरल हो गया। लेकिन पेट्रोल 68.20 रुपए प्रति लीटर ही रहा। 2022 में कच्चे तेल के दाम 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। तब पेट्रोल 96.72 रुपए प्रति लीटर और डीजल 89.62 रुपए प्रति लीटर हो गया। जनवरी 2023 में कच्चे तेल की कीमत 75 डॉलर तक पहुंच गई लेकिन पेट्रोल की कीमत जस के तस रही। तेल कंपनियों का तर्क था कि अभी पुराने घाटे की भरपाई हो रही है।

ऐसे बाजार में सरकार एथनॉल मिला पेट्रोल बेच रही है जबकि टैंक में पानी की मौजूदगी के कारण एथनॉल पेट्रोल से अलग हो जाता है और मिश्रण समसर्वत्र नहीं होता है। इसलिए पेट्रोल में एथेनॉल मिलाना व्यावहारिक नहीं है पर सरकार जबरदस्ती महंगे पेट्रोल को गाड़ियों के लिए खतरनाक बना रही है। इसका असर देश की अर्थव्यवस्था के साथ आवाजाही पर पडे़गा जो घटिया और महंगे एक्सप्रेस वे के कारण पहले ही खतरनाक बन चुका है। मुंबई डेटलाइन से गुरुदत तिवारी की बाईलाइन वाली दैनिक भास्कर की आज की खबर इस प्रकार है, अमेरिका-ईरान युद्ध के दौरान रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचे कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) के दाम अब 6 माह के निचले स्तर पर पहुंच चुके हैं। इंडियन बास्केट का कच्चा तेल 68.69 डॉलर प्रति बैरल तक आ गया है। यह युद्ध के दौरान बने 157 डॉलर के शिखर से करीब 56% कम है। इसके बावजूद आम आदमी को पेट्रोल-डीजल के खुदरा दामों में कोई राहत नहीं मिली है। डीएएम कैपिटल के मुताबिक मौजूदा कीमत पर तेल कंपनियां पेट्रोल पर 10.5 और डीजल पर 11 रुपए प्रति लीटर तक मार्जिन कमा रही हैं। कच्चे तेल के दाम एक जून के बाद से 87 डॉलर से नीचे हैं। इस रेट पर तेल कंपनियां ब्रेक ईवन (न नफा, न नुकसान) में रहती हैं। यानी कंपनियां पूरे 36 दिन से मुनाफे में हैं। ईरान-अमेरिका युद्ध 27 फरवरी से शुरू हुआ था। पूरे मार्च सहित शुरुआती 40 दिन ये चरम पर था। तेल के दाम भी इसी दौरान विराम लागू होने के बाद बढ़े। आठ अप्रैल को पहला युद्ध विराम लागू होने के बाद बेतहाशा बढ़ोत्तरी का दौर थम गया। इसके बाद कच्चे तेल के दाम 115 डॉलर से नीचे रहे। सबसे तेज बढ़ोतरी के दिनों में भी तेल कंपनियों के चौथी तिमाही (जनवरी से मार्च 2026) के नतीजे नकारात्मक नहीं आए। पिछले साल 2024-25 की चौथी तिमाही देश की चार बड़ी तेल कंपनियों का मुनाफा की तुलना में 22% तक ज्यादा रहा। सबसे तीन युद्ध के 33 दिन इसी तिमाही में शामिल थे। इस दौरान इंडियन बास्केट में कच्चे तेल के दाम 157 डॉलर/बैरल तक पहुंचे थे। मार्च में कच्चे तेल के औसत दाम 125.7 डॉलर/बैरल थे। इसके बाद 60 दिन के दौरान कच्चे तेल के औसत दाम 111 डॉलर / बैरल तक रहे।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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