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आजकल प्रेस वार्ताओं में पत्रकारों के अलावा इन्फ्लुएंसर्स को भी बुलाने का रिवाज चल पड़ा है!

डॉ प्रकाश हिन्दुस्तानी-

क्या इन्फ्लुएंसर्स पत्रकार होते हैं?

आजकल प्रेस वार्ताओं में पत्रकारों के अलावा इन्फ्लुएंसर्स को भी बुलाने का रिवाज चल पड़ा है। लेकिन कहाँ पत्रकार और कहाँ इन्फ्लुएंसर्स?

पत्रकार की सबसे बड़ी ताकत है—तथ्य। वह इतनी रिसर्च और फैक्ट-चेक करता है कि खबर छपते-छपते बासी हो जाए, पर ‘सत्य’ के नाम पर दाग नहीं लगने देता। जबकि इन्फ्लुएंसर्स लाइक्स और व्यूज़ की तलाश में भटकते जीव होते हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत उनका ‘कनेक्शन’ और ‘एंगेजमेंट’ होता है। वे ‘वाह-वाही’ और ‘लाइक्स’ की भाषा इतनी अच्छी तरह समझते हैं कि किसी गलत खबर को भी ‘इमोशनल टच’ के साथ इस तरह परोसते हैं कि जनता खुद-ब-खुद ‘शेयर’ का बटन दबा देती है। यह विश्वसनीयता बनाम वायरलिटी का मामला है।

भले ही ‘बीबी की वाइंस’ वाले भुवन बाम को करोड़ों व्यूज़ मिलते हों, अजय नागर उर्फ कैरी मिनाटी को लाखों लोग देखते हों, या ‘बीयरबाइसेप्स’ वाले रणवीर अल्लाहबादिया कितना भी बड़ा प्रभाव पैदा कर सकते हों, उनकी गंभीरता और विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न बना रहेगा।

इन जैसों की ‘जवाबदेही’ अक्सर ‘एल्गोरिदम’ के सामने दंडवत करती दिखाई देती है, क्योंकि उन्हें तो बस वायरल होना है। उनके लिए सच से ज्यादा महत्वपूर्ण यह होता है कि आज का ‘ट्रेंड’ क्या है। बिना पुख्ता सबूत के राय बनाना और उसका प्रचार करना उनके बाएँ हाथ का खेल है।

दूसरी तरफ पत्रकार हैं, जो तथ्यों, दस्तावेजों, स्रोतों और जमीनी अनुभव के आधार पर अपनी साख बनाते हैं। उनकी एक खबर सरकारें हिला सकती है, नीतियाँ बदल सकती है और इतिहास का हिस्सा बन सकती है।

पत्रकार तथ्यों के भारी-भरकम बोझ तले दबे रहते हैं, जबकि दूसरी ओर इन्फ्लुएंसर्स की फौज बिना किसी फिल्टर के सीधे आपकी स्क्रीन में घुस जाती है।

पत्रकार अक्सर संस्थागत सीमाओं, संपादकीय दबावों, मालिकानों के हितों और सत्यापन की लंबी प्रक्रिया में बँधा रहता है। कई बार जब तक पत्रकार तथ्य जुटाता है, तब तक सोशल मीडिया पर कहानी कई रूप बदल चुकी होती है।

इन्फ्लुएंसर कितना भी बड़ा हो जाए, वह राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी, रघुवीर सहाय, मार्क टली, एस.पी. सिंह या विनोद दुआ जैसी विश्वसनीयता शायद ही कभी प्राप्त कर पाएगा। पत्रकार इतिहास लिखता है, इन्फ्लुएंसर ट्रेंड बनाता है।

पत्रकार जिम्मेदार होते हैं। उन्हें समय रैना और रणवीर अल्लाहबादिया जैसे विवादों से सीख लेनी चाहिए, जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणियाँ कीं और जुर्माना भी लगाया। ऐसी फटकारों को याद रखा जाना चाहिए।

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