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सुख-दुख

चेहरे पर हमेशा मुस्कान और उत्साह लिए संजय का पहला सवाल होता था— “और गुरु, क्या हाल-चाल है?”

उमेश चतुर्वेदी-

धाकड़ और दबंग पत्रकार Sanjay Dikshit नहीं रहे..एक सांझ प्रेस क्लब Press Club Of India के बाहर मिले थे। मिलते ही हाल के दिनों में छपे मेरे कुछ लेखों की प्रशंसा की और लगे हाथों अपनी पत्रिका के लिए लिखने का इसरार कर बैठे..उन्होंने कहा था कि फोन करेंगे..उनका फोन नहीं आया और आज उनके जाने का मर्माहत करने वाला समाचार आ गया। तब से नियति को लेकर सोच रहा हूं।

Close-up of a man with a mustache wearing a black-and-white scarf at a crowded indoor event.
संजय दीक्षित

संजय से परिचय शायद ढाई दशक पहले ही हुआ था। वे जागरण समूह की पत्रिका जागरण उदय में काम करते थे। तब दिल्ली के रफी मार्ग स्थित आईएनएस बिल्डिंग के सामने की संजय की चाय की दुकान पर रोजाना संझा को देश के छोटे से लेकर बड़े पत्रकारों का मजमा जमता था। अब तो वह संजय की दुकान भी नहीं रही। खंडहर हो गई है। उसी मजमे में किसी ने उनसे मेरा परिचय कराया था। तब मैं दैनिक भास्कर में शावक पत्रकार था..शावक यानी सबसे जूनियर। तब से गाहे-बगाहे मेल-मिलाप का दौर चलता रहा। बातें होती रहीं।

शायद 2006 या 2007 की बात है। देश के एक बड़े अखबार के दिल्ली ब्यूरो में जगह थी। संजय उन दिनों बेरोजगार थे और उस दफ्तर में अपने लिए उम्मीद देख रहे थे। उस अखबार के कई संपादकों में से एक के जिम्मे उन दिनों दिल्ली ब्यूरो के लिए लोगों की भर्ती की जिम्मेदारी थी। उन संपादक से मेरे थोड़े-बहुत रिश्तों की जानकारी संजय को थी।

एक दिन जी न्यूज Zee News की सुबह की शिफ्ट पूरा कर घर लौट रहा था। जैसे ही डीएनडी के फ्लाईओवर के नजदीक पहुंचा, संजय का फोन आया। उस संपादक का नंबर मांग रहे थे। लगे हाथों उनसे बात करने का भी अनुरोध किया।

मैंने संजय को उनका नंबर दिया और उसके तुरंत बाद संपादक जी से उनके बारे में बात की। संपादक जी ने संजय को दिल्ली स्थित अखबार के एक अन्य दफ्तर में बुलाया। लेकिन संजय से संपादक जी मुलाकात सहज नहीं रही।

बाद में संजय ने मुझे बताया कि उस संपादक जी ने उनसे कहा था कि उनके दिल्ली ब्यूरो में जगह तो है, लेकिन इसके लिए वे प्रधानमंत्री कार्यालय से अपने लिए उन्हें यानी संपादक जी को फोन करा दो।

संजय को यह बात पची नहीं। जैसा कि उन्होंने मुझे बताया था। संजय ने संपादक जी से कह दिया कि अगर वे प्रधानमंत्री कार्यालय से फोन कराने की स्थिति में होते तो आपको फोन क्यों कराते, आपकी सीट के लिए आपसे ऊंची कुर्सी को फोन करा देते।

संजय लौट आए थे और उस संपादक से जिंदगी में कभी बात नहीं करने का प्रण ले लिया।

वे संपादक जी भी दुनिया में नहीं हैं और अब संजय भी नहीं रहे.. बहुत याद आएंगे दीक्षित जी..मैं उन्हें दीक्षित जी ही कहता था। विनम्र श्रद्धांजलि


संजय राय-

वरिष्ठ पत्रकार संजय दीक्षित के असामयिक निधन का समाचार सुनकर मन अत्यंत व्यथित और हृदय पीड़ा से भर गया।

किसी संस्थान में उनके साथ काम करने का अवसर तो नहीं मिला, लेकिन खबरों की रिपोर्टिंग के दौरान फील्ड में अक्सर मुलाकात होती रहती थी। इन्हीं मुलाकातों ने एक आत्मीय मित्रता का रूप ले लिया, जो अंतिम समय तक बनी रही।

चेहरे पर हमेशा मुस्कान और उत्साह रहता था। मिलते ही उनका पहला सवाल होता— “और गुरु, क्या हाल-चाल है?” इसके बाद खबरों से लेकर घर-परिवार तक हर विषय पर खुलकर बातें होती थीं।

संजय जी का स्वभाव अक्खड़ था, लेकिन आत्मसम्मान उनकी सबसे बड़ी पूंजी था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के अनेक वरिष्ठ नेताओं से उनके आत्मीय संबंध थे, फिर भी उन्होंने कभी अपने निजी स्वार्थ के लिए किसी से कुछ नहीं माँगा।

हिंदी पत्रकारिता से जुड़े प्रिंट मीडिया के अधिकतर पत्रकारों की तरह वे भी आर्थिक संघर्षों से अछूते नहीं रहे। मजबूरी में यदि कभी किसी से सहायता माँगी भी, तो केवल अपने बेहद करीबी मित्रों से, वह भी पूरे अधिकार और आत्मीयता के साथ।

यह सब लिखते हुए आँखें नम हो गई हैं। एक सच्चे, स्वाभिमानी और संघर्षशील पत्रकार का इस तरह अचानक चले जाना भीतर तक झकझोर गया है।

मित्र, आपकी यादें हमेशा हमारे दिलों में जीवित रहेंगी। ॐ शांति।

मूल खबर…

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