यशवंत सिंह-
युवाओं को सलाम! जंतर मंतर पर सैलाब उमड़ पड़ा है। सारी पाबंदियों सारे डराऊ आदेशों को धता बताते हुए आए नौजवानों ने जता दिया है, एग्जाम तक सही ढंग से न करा पाने वाली सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। सीपी दिल्ली गोलचा की नौकरी तो छात्र ले ही चुके हैं। अब शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान जाएँगे। फिर जाएगी मोदी सरकार। युवाओं के गुस्से के आगे बड़े बड़े तानाशाह भूलुण्ठित मिलते हैं। दुर्भाग्य है कांग्रेस इस सीन में आज कहीं नहीं हैं। इसीलिए कहता हूँ कांग्रेसी तो बीजेपी की बी टीम के मेम्बर हैं। असली मौके से गायब मिलते हैं। किधर हो राहुल गांधी। पहुँचो न जंतर मंतर। देश के नौजवान तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं और तुम छिपे हो अपने घर में। विदेश से लौट आए न मौज मस्ती करके। अब तो आ जाओ सड़क पर।
विवेक श्रीवास्तव-
राजीव चौक मेट्रो से जंतर-मंतर की ओर बढ़ते युवाओं के कदम सिर्फ़ एक मार्च नहीं, बल्कि टूटते विश्वास की आहट हैं। पेपर लीक ने लाखों मेहनती युवाओं के सपनों को बार-बार कुचला है। उनका आक्रोश स्वाभाविक है, क्योंकि जब मेहनत का मूल्य संदिग्ध हो जाए, तो व्यवस्था पर सवाल उठना तय है।
2014 में भी देश ने व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीद के साथ जनादेश दिया था। आज यदि कुछ लोगों की लापरवाही, स्वार्थ या गलत कृत्यों के कारण वही सरकार कठघरे में खड़ी दिखाई दे रही है, तो यह गंभीर आत्ममंथन का विषय है।
प्रेम भारद्वाज-
पुलिस द्वारा जंतर मंतर पर लाठी चार्ज किया गया हैं, दिल्ली के कुछ इलाकों में इंटरनेट को बंद कर दिया गया हैं, कई मेट्रो स्टेशन भी बंद किये गए हैं ताकि लोग जंतर मंतर पहुंच न पाएं!
सरकार लाठिया चलवा कर सत्ता के ताबूत में आखिरी कील ठोकने का काम कर रही हैं, छात्रों को रोकने में जितना जोर लगाया जा रहा हैं उतना जोर पेपर लीक रोकने में लगाया होता तो आज ये नौबत नहीं आती!
भरी बारिश में हजारों की संख्या में लोग पहुंचे हैं, सरकार अगर भला चाहती हैं तो उन्हें अपना प्रदर्शन शांतिपूर्वक करने दे!
बल प्रयोग करवा के अब आवाज दबाना बहुत मुश्किल हो गया है!
रवीश कुमार-
यह जंतर-मंतर का वीडियो है। आज दिल्ली की उमस भरी गर्मी जान ले रही है। उस हाल में वहाँ लोग ठसा-ठस भरे हैं। हाथ का पंखा लेकर नौजवान एक दूसरे को हवा का मरहम लगा रहे हैं। घर में पंखे के नीचे राहत नहीं है, वहाँ तो क्या ही हालत होगी। इस गर्मी में वहां मौजूद लोगों की हालत भी ख़राब हो रही होगी। सोनम वांगचुक को जबरन हटाने के बाद भी धरना कमज़ोर नहीं हुआ है। लोगों ने आगे आकर इस धरने को थाम लिया है। कौन नेता है, कैसा नेता है, यह सब सवाल पीछे चला गया है। आज पूरे दिन जंतर-मंतर पर भारी भीड़ रही। धरना स्थल तक जाने के लिए लोग कतार में बिना शिकायत खड़े हैं। वहाँ से लौटने वाले लोगों की लाइन राजीव चौक मेट्रो में भी बढ़ती जा रही है। सोमवार को सरकार का इम्तहान है। कल वह मार्च में बाधा डालेगी या मार्च होने देगी।
आप नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुरुग्राम, ग़ाज़ियाबाद इन महानगरों, महाज़िलों में रहने वाले जेन ज़ी, जेन बी जेन एक्स, जेन जो भी, किसी से पूछ लीजिए। क्या यहाँ एक भी सरकारी शैक्षणिक संस्थान है, जिसकी दुनिया छोड़िए, भारत में पहचान हो। जिसकी गुणवत्ता की तारीफ होती हो। जिसमें पढ़ने का सपना देखा जाता हो। एक भी नहीं है। सोचिए लाखों करोड़ों की आबादी के बीच एक ढंग का कॉलेज नहीं है। जहाँ भारत का एस्पिरेशनल क्लास रहता है। वह 12 साल से व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी में डूबा रह गया। बच्चों के लिए अमेरिका का वीज़ा बनवाता रहा लेकिन मुड़ कर नहीं देखा कि उसके शहर में एक भी कॉलेज काम का क्यों नहीं है। इसके कारण मिडिल क्लास के साथ साथ नियो मिडिल क्लास के बच्चे भी घिस रहे हैं, पिस रहे हैं, मिट रहे हैं। जो मेहनत मज़दूरी करने वाला तबका है, जिसे लग रहा है कि पढ़ाई से उसके परिवार का भविष्य बदल सकता है, वह कड़ी मेहनत कर अपने बच्चों को किसी तरह स्कूल और कालेज भेज रहा है। उसे पता ही नहीं है कि वह अपने बच्चों को जिन सपनों के लिए तैयार कर रहा है, वह कब का रौंदा जा चुका है।
नोएडा, ग्रेटर नोएडा, ग़ाज़ियाबाद और गुरुग्राम के घरों में काम करने वाली महिलाओं से पूछ लीजिए। हाड़ तोड़ मेहनत कर रही हैं और अपने बेटी की पढ़ाई के लिए फीस भर रही हैं। उनके बच्चे भी ख़ूब मेहनत करते हैं लेकिन सामाजिक पूंजी नहीं होने के कारण उन्हें गाइड नहीं मिल पाता। हर दिन लाखों सपनों की हत्या हो रही है। समाज के इस तबके को अभी शिक्षा से जुड़े मुद्दे की समझ नहीं है, कभी तो उन्हें भी पता चलेगा कि सारा सिस्टम इसी तरह डिज़ाइन किया गया है कि उनके बाद उनकी बेटियाँ भी घरों में काम करती रहेंगी । शिक्षा को बर्बाद किया गया ताकि लाखों लोगों का भविष्य बर्बाद हो सके और वे कम से कम पैसे में काम करने के लिए हमेशा मजबूर रहें।
भारत के भविष्य के साथ लंबे समय तक यह धोखा हुआ है। हो सकता है भारत का युवा धर्म की राजनीति में फिर से सनक जाएगा, वह गौरव और पहचान राजनीति में धर्म से पाने लगेगा, यह सब हो सकता है, हो ही रहा है, लेकिन अगले तीस साल में भी वह अपने सपनों को पूरा करने के लिए बड़े स्तर के शैक्षणिक संस्थानों को नहीं पा सकता है। यह लड़ाई आज की नहीं है, अगले पचास साल की है।



