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सियासत

भाजपा विधायक से अपनी जमीन छुड़वाने के लिए असगर अली को मोदी से मिलकर अपने याराने की दुहाई देनी पड़ी!

Two men with beards shake hands in a formal office setting, capturing a handshake moment during a meeting.

अविनाश दास-

असगर अली को अपनी ही ज़मीन वापस पाने के लिए संविधान या क़ानून की नहीं, बल्कि वज़ीरे-आज़म से पुराने याराने की दरकार पड़ी। यह इंसाफ़ की बहाली नहीं, बल्कि एक आधुनिक गणराज्य का मध्यकालीन सामंतवाद में तब्दील हो जाने का प्रमाण है। जिस सत्ता की छत्रछाया में एक विधायक बरसों से एक नागरिक की मिल्कियत दबाये बैठा था, वह ज़मीन महज़ एक मुलाक़ात के बाद ख़ाली हो गयी। इससे साफ़ होता है कि ज़मीनी सतह पर नागरिक अधिकार दफ़्न हो चुके हैं और वे केवल आक़ा की इनायत पर ज़िंदा हैं।

अगर आपको अपने घर-बार की हिफ़ाज़त करनी है, तो तख़्त-ओ-ताज तक पहुंच का कोई निजी पर्चा होना चाहिए।

असगर अली की ज़मीन तो बच गयी, मगर बाक़ी बेबस नागरिकों का क्या, जिनकी मिल्कियतें और वजूद इसी निज़ाम के बुलडोज़रों तले रौंदे जा रहे हैं? यह व्यवस्था की संपूर्ण विफलता और संस्थागत सड़ांध का साफ़ सबूत है। जब क़ानून का राज ख़त्म होकर हुक्मरान के क्षणिक रहमों-करम पर टिक जाए, तो लोकतंत्र की अदालतें महज़ बेजान तमाशा बनकर रह जाती हैं।

भाजपा विधायक का पीछे हटना क़ानून का डर नहीं, बल्कि शीर्ष सत्ता की त्योरियों से उपजा वह सियासी ख़ौफ़ था, जो उसके निजी मुनाफ़े को निगल सकता था। नागरिक चेतना को इस हद तक लाचार कर दिया गया है कि वह अधिकारों के लिए लड़ना छोड़, सत्ता की दया के लिए अतीत के पन्नों में रिश्ते खंगालती है।

यह किसी समावेशी राजनीति का मानवीय चेहरा नहीं, बल्कि उस बहुसंख्यकवादी तंत्र का पाखंड है जो चंद चुनिंदा तस्वीरों से अपने दाग़ धोना चाहता है। सत्ता ने बड़ी धूर्तता से बेइंसाफ़ी को ही एक जनसंपर्क तमाशे में बदल दिया है, जहां शोषक तंत्र ही अंततः उद्धारक के चोले में पेश किया जाएगा। इस पूरे वाक़ये ने यह तल्ख़ हक़ीक़त उजागर कर दी कि इस दौर में न्याय कोई बुनियादी हक़ नहीं, बल्कि सत्ता की दी हुई एक शाही खैरात है।

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