तथ्य यह है इससे सरकार को 22,000 करोड़ रुपए की कमाई होने का अनुमान है। सरकार को यह बताना चाहिए था कि उसे इन पैसों की जरूरत नहीं है तो शुल्क लगाने की क्या मजबूरी है और मजबूरी नहीं है तो 22,000 करोड़ रुपए वसूलने की व्यवस्था क्यों की जा रही है। क्या अमेरिकी दबाव और मजबूरी का आरोप सही है? हम उसे ही मान लें? तो बाकी सब दिखावा किसलिए?
संजय कुमार सिंह
आज की खबरों से सरकार की मजबूरी, मनमानी के साथ लोकप्रियता बनाए रखने की कोशिशें साफ दिख रही हैं। यूपीआई पर फीस की खबर सरकार की मजबूरी है, विरोध के बावजूद लागू किया जाना मनमानी है लेकिन उड़ीशा के दारा सिंह की सजा कम करने की अपील खारिज करना डर है। अमित शाह ने देश भर के सभी एनडीए शासित राज्यों में यूसीसी (यूनिफॉर्म सिविल कोड) लागू करने की घोषणा कर रखी है तो इसका भी कुछ मकसद होगा। लेकिन द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, यह मामला ऐसे समय में आया है जब पंजाब में अगले साल होने वाले चुनाव के लिए भाजपा शिरोमणि अकाली दल के साथ वार्ता कर रही है। मुसीबत यह है कि इसने पहले इसका विरोध किया था। यह अलग बात है कि अकाली इस नई कोशिश पर अभी तक शांत हैं।
कहा जा सकता है कि भाजपा चुनाव जीतने के लिए हर संभव उपाय करने की अपनी कोशिशों पर कायम है लेकिन इसका सच-झूठ अब ज्यादा आम है। आज की मुख्य खबरें ज्यादातर अखबारों के पहले पन्ने पर प्रमुखता से है। कहां, कौन सी खबर कितनी प्रमुखता से छपी है उससे अलग, इन खबरों से सरकार की मजबूरी, परेशानी और डर का कारण उसके दूसरे फैसले हो सकते हैं। अब खबरों से यह सब दिखने लगा है भले सब एक साथ न छपें। मोटे तौर पर यह भी कहा जा सकता है कि सरकार अपने ही जाल में फंस गई है। पुराने टंटे भरोसे के नहीं रहे और नए वाले उल्टा न पड़ जाएं इसलिए बचाव और पर्दा साथ है। आज की इन खबरों को हाल के सरकार के निर्णयों तथा उसके परिणामों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। ऐसा करें तो मामला बिल्कुल स्पष्ट लगता है।
अंग्रेजी अखबारों में, दि एशियन एज की लीड प्रधानमंत्री के जन्मदिन के कार्यक्रम को लेकर है। हर साल जन्म दिन के आयोजनों के आलोक में इस बार यह कमजोर पड़ा तो अलग संदेश जाएगा और इसक अलग मायने होंगे जो पहले नहीं होते। इसकी वजह यह भी है कि यूसीसी से संबंधित जल्दबाजी पर जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी सवाल उठाया है। यह दि एशियन एज में चार कॉलम में है। सरकार की इस व्यवस्था में अगर लोगों को कानून का डर नहीं है तो पूंजी बाजार भी बेलगाम है। नवोदय टाइम्स की खबर के अनुसार सेंसक्स 778 अंक लुढ़का। निफ्टी पांच महीने के निचले स्तर पर है। दूसरी ओर, दिल्ली में 10 हजार बच्चों के लिए हॉस्टल बनने की घोषणा हो गई है। आज इसकी भी खबर है।
हालांकि, दि इंडियन एक्सप्रेस की विशेष खबर के अनुसार, दिल्ली विश्वविद्यालय की हॉस्टल परियोजनाएं रुकी हुई हैं, घिसट रही हैं। द हिन्दू में मणिपुर की खबर फोटो के साथ तीन कॉलम में है। शीर्षक है, मणिपुर में हथियारबंद हमलावरों ने दो कुकी महिलाओं की हत्या की। खबर में कहा गया है, नागा-बहुल तामेंगलोंग ज़िले के अधिकारियों ने पुष्टि की कि अज्ञात हथियारबंद लोगों ने दोपहर करीब तीन बजे लेइसंगफाई गांव पर हमला किया, जिसमें दो कुकी महिलाओं की मौत हो गई। सरकार की मुश्किलों में एक, जंतर-मंतर आंदोलन के समय पेलेट गन चलने चलवाने का मुद्दा भी है।
आप जानते हैं कि इसमें सरकार कैसे फंसी हुई है। आज यह खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में सेकेंड लीड है। इसके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के बनाए पैनल के लिए यह खास फोकस वाले क्षेत्रों में है। सरकार समर्थकों को परेशान करने वाली एक खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर है। इसमें अपनी नौकरानी को पीट कर मार डालने वाले डॉक्टर मनीष गुप्ता की कहानी है। खबरों के अनुसार अदालत ने मानसिक स्वास्थ्य के इतिहास के उनके शुरुआती बचाव को मानने से मना कर दिया है। टाइम्स ऑफ इंडिया में दारा सिंह की खबर सेकेंड लीड है।
तरुण तेजपाल की सजा बढ़ाने की अपील, निचली अदालत से बरी हो जाने के बाद हाईकोर्ट से सजा मिलने पर की गई है। सुप्रीम कोर्ट से जमानत भी नहीं मिली तो कल खबर थी कि तरुण तेजपाल को समर्पण करना पड़ा। कल ही खबर थी कि अपने अपराध और आकाओं को कैमरे पर एक्सपोज करने के बाद लगभग मजबूरी में गिरफ्तार हुए स्वतंत्र भारद्वाज को 10 दिन में जमानत मिल गई और कल ही उमर खालिद को जेल काटते छह साल पूरे हुए हैं। ठीक है कि सबके खिलाफ मामले अलग हैं और अदालतों की निष्पक्षता पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन सरकार समर्थकों को जमानत मिलती जाए और किसी की जमानत मांगने के अधिकार को भी एक साल के लिए रोक दिया जाए तो मानना पड़ेगा कि सब सामान्य नहीं है।
मुझे लगता है कि अभी तक खबरें नहीं छपती थीं। अभी भी जैसे छपनी चाहिए वैसे नहीं छप रही है लेकिन जो छप रही है उसका संदेश समझ में आ रहा है। स्थितियां डेरा सच्चा सौदा के विज्ञापन, उसे प्रकाशित करने-कराने की हिमाकत, उस पर विवाद या छापने वाले अखबारों में एक, द हिन्दू का रुख – उड़ीशा की डबल इंजन सरकार द्वारा दारा सिंह की अपील खारिज किए जाने का कारण हो सकता है। अब देखना है सुप्रीम कोर्ट में क्या होता है। आपको याद होगा, दारा सिंह 1999 में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बच्चों को उनकी गाड़ी में जलाकर मार डालने का अपराधी है। उसे उम्र कैद की सजा हुई है और वह जेल में है। राज्य सरकार की समिति से उसने सजा कम करने की अपील की है और यह अपील छठी बार थी।
खबरों के अनुसार, 24 साल से अधिक जेल काट चुके दारा सिंह ने ‘उड़ीशा राज्य समय पूर्व रिहाई नीति 2022’ के तहत 2024 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सुप्रीम कोर्ट ने उड़ीशा सरकार को दारा सिंह की समय पूर्व रिहाई की अर्जी पर बिना देरी किए फैसला लेने का निर्देश दिया। राज्य सरकार ने अब फैसला लिया है जिसकी खबर आज छपी है। उड़ीशा में जून 2024 से भाजपा की सरकार है। इससे पहले वर्ष 2000 से 2009 के दौरान भाजपा, बीजू जनता दल के साथ गठबंधन सरकार में शामिल रही थी। विशेष सीबीआई अदालत ने 2003 में दारा सिंह को दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई थी। उड़ीशा हाईकोर्ट ने 2005 में मौत की सजा को घटाकर आजीवन कारावास में बदल दिया था। 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने उड़ीशा हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर लगाते हुए दारा सिंह की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा था।
तरुण तेजपाल का मामला थोड़ा अलग है। उनके संपादन में भाजपा के खिलाफ खबर छपी। उनपर किसी सहकर्मी ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। निचली अदालत ने तरुण तेजपाल को बरी कर दिया। सरकार ने हाईकोर्ट में अपील की 10 साल की सजा हुई। अब इस सजा को बढ़ाने के लिए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है जबकि तरुण तेजपाल ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने के निर्णय़ की घोषणा की है। तरुण तेजपाल के खिलाफ मामला नवंबर 2013 में गोवा के एक रिसॉर्ट से शुरू होता है। गोवा में तब भी भाजपा की सरकार थी। भिन्न मामलों में भाजपा की सरकार जो करती आई है वह मनमानी भी लगती है टैक्स, शुल्क आदि लगाने या उसमें वृद्धि मजबूरी में भी की जाती रही है। दूसरी ओर जीएसटी कम करके उसका भी प्रचार किया जाता रहा है।
अभी तक की खबरों से लगता था कि सरकार यह मान कर चल रही थी कि उसके विरोध का कोई मतलब नहीं है जो नकारात्मक असर होगा उसे आईटी सेल और व्हाट्सऐप्प यूनिवर्सिटी संभाल लेगा। है मोटा-मोटी कार्यशैली अभी भी वही दिख रही लेकिन अब एक जन विरोधी निर्णय के साथ जनता को भरमाने वाले कई फैसले हैं। अभी तक जनता को नाराज करने वाली खबरों को प्राथमिकता कम मिलती थी लेकिन ऐसे उपाय ज्यादा दिखते थे। आज यूपीआई लेन-देन पर शुल्क की खबर दैनिक भास्कर, नवोदय टाइम्स में लीड है। हिन्दी के दो अन्य अखबारों अमर उजाला और देशबन्धु में यह लीड नहीं है। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, दिल्ली-यूपी और हरियाणा को अब ज्यादा पानी, यमुना की सांसें लौटेंगी। अमर उजाला की खबर का फ्लैग शीर्षक है, 1940 की किशाऊ बांध परियोजना पर छह राज्यों ने किए हस्ताक्षर।
देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, दबाव के आगे फिर झुके मोदी। खबर के अनुसार, विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा है कि सरकार ने चुपचाप यूपीआई पर फीस लगाने का रास्ता खोल दिया है। अमेरिकी पेमेंट कंपनियां लंबे समय से भारत की शून्य एमडीआर नीति का विरोध करती रही हैं। अमेरिकी दबाव में फिर एक सरेंडर किया गया है। अमर उजाला में यह खबर दूसरे पहले पन्ने की लीड है। शीर्षक ही है, 2000 रुपए से ऊपर पेमेंट पर कारोबारी भरेंगे शुल्क। यह भी हाईलाइट किया गया है, किसी भी यूपीआई लेनदेन पर ग्राहकों से शुल्क नहीं। कहने की जरूरत नहीं है कि शुल्क उपभोक्ता को ही देना होता है और सरकार किसी से ले, देना तो उपयोगकर्ता को ही है।
जीएसटी उपयोगकर्ता से लेकर व्यवसायी जमा कराता है तो 0.4 प्रतिशत की एमडीआर भी जमा करा देगा लेकिन जमा कराने का खर्च और झंझट तो वह झेलेगा ही, टैक्स (शुल्क) भी खुद ही दे? और देगा तो किसी अन्य तरीके से भरपाई नहीं करेगा? नहीं करेगा तो काम नहीं कर पाएगा, करेगा तो मुनाफा कम हो जाएगा। अगर ऐसा ही था और उपभोक्ता की इतनी चिन्ता है तो यह टैक्स फिलहाल टाल दिया जाना चाहिए था लेकिन लागू करने की मजबूरी समझी जा सकती है। कांग्रेस ने जो आरोप लगाया है वह भी अपनी जगह है। इस तरह सरकार की मजबूरी साफ दिख रही है। इसे 75 हजार से अधिक के भुगतान पर अधिकतम 300 रुपए ही लगेगा चार्ज जैसे शीर्षकों और जानकारियों से ढंका गया है। अगर यह इतना कम है तो लिया क्यों जा रहा है?

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


