देवप्रिय अवस्थी-
केंद्रीय डेस्क का गठन
जयपुर में भास्कर समूह की केंद्रीय डेस्क की स्थापना हिंदी के किसी बहु-संस्करण अखबार में अपने ढंग का पहला प्रयोग था. बाद में यह प्रयोग लगभग सभी बहु-संस्करण अखबारों में अपनाया गया. इस डेस्क के 15 साथियों की बैठक व्यवस्था एक अलग छोटे हाल में थी.
डेस्क समाचार एजेंसियों की सभी संस्करणों में छपने योग्य अंतरराष्ट्रीय-राष्ट्रीय ख़बरें और भास्कर के विभिन्न संस्करणों की विशेष ख़बरें मिलाकर रोजाना 60-70 खबरों का पैकेज तैयार करती. दिल्ली ब्यूरो, जम्मू, श्रीनगर, पटना और भुवनेश्वर संवाददाताओं की खबरों की जिम्मेदारी भी इसी डेस्क की थी. ये खबरें शाम 4:00 बजे से रात 12 बजे तक मोडम के जरिए प्रमुख प्रकाशन केंद्रों-जयपुर, भोपाल, इंदौर, चंडीगढ़ और रायपुर को भेजी जातीं. साथ ही दो-दो घंटे के अंतराल से न्यूज लिस्ट अपडेट की जाती. रात 12 बजे के बाद आने वाली खबरों की जिम्मेदारी संस्करणों की डेस्क की होती.. केंद्रीय डेस्क के पास ही डिजाइन और ग्राफिक्स सेल था जिसके प्रमुख सुमंत वर्मा हमेशा खबरों की टोह लेते रहते और जहां भी जरूरत समझते अपनी टीम से ग्राफिक्स तैयार करवाते.
केंद्रीय डेस्क के लिए जयपुर संस्करण में काम कर रहे पांच साथी-राकेश नारायण माथुर, जयंत चटर्जी, अशोक थपलियाल, आदिदेव भारद्वाज और राकेश शर्मा स्पेयर किए गए थे. चंडीगढ़ से सुदीप ठाकुर और भोपाल से ऋषिकेश राजोरिया का भी तबादला किया गया. बाद में विश्वदीप नाग, विनोद तैलंग, कृष्ण कुमार मिश्र,, सुभाष रानाडे, अखिलेश श्रीवास्तव, अजित सिंह राठौड़ भी इस टीम से जुड़े. बिहार के दो साथी नरेंद्र अनिकेत और पशुपति शर्मा भी अल्प समय के लिए टीम का हिस्सा रहे.
मेरे जयपुर रहने के दौरान जयपुर संस्करण में पहले संपादक बाबूलाल शर्मा थे. वे अपने कंप्यूटर पर हमेशा सतर्क नजर रखते और कोई भी बड़ी खबर देखते थे तो इंटरकाम से केंद्रीय डेस्क को सतर्क कर देते. वे खबर को बेहतर बनाने के लिए जब-तबअपना इनपुट भी देते. शर्मा जी के चंडीगढ़ स्थानांतरण के बाद उनकी जगह यशवंत व्यास आए. वे पहले दिल्ली में रहकर भास्कर के रविवारिय परिशिष्ट -रसरंग-का संपादन कर रहे थे. जयपुर संस्करण में उनकी पारी बहुत छोटी रही क्योंकि सुधीर अग्रवाल ने जल्दी ही उन्हें ‘अहा जिंदगी’ पत्रिका निकालने की जिम्मेदारी सौंप दी. इस पत्रिका ने कुछ ही महीनों में अपनी अलग पहचान बनाई. व्यास जी की जगह भोपाल से तबादला होकर आए नरेंद्र कुमार सिंह ने ली. उन्हें मध्यप्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री उमा भारती की नाराजगी की वजह से भोपाल से हटाया गया था. वे जयपुर आए तो बेमन से थे, लेकिन उन्होंने कुछ ही दिनों में यहां अपने नेतृत्व की प्रभावी छाप छोड़ी.
जयपुर संस्करण के संपादकीय विभाग के ज्यादातर साथियों से मेरा अच्छा परिचय-संपर्क हो गया था, लेकिन यहां उनके नाम-काम का ब्यौरा देना पोस्ट को अनावश्यक लंबा करना होगा. इसलिए उन सबका उल्लेख नहीं कर रहा हूं. फिर भी राजेंद्र बोड़ा, विनोद भारद्वाज, नवनीत गुर्जर, संजय पांडेय और अब्दुल गनी खान चौधरी का उल्लेख प्रासंगिक समझता हूं. बोड़ा जी बहुत अध्ययनशील, मिलनसार और संगीत-प्रेमी पत्रकार थे. वे उन दिनों राज्य ब्यूरो के प्रमुख थे. फीचर संपादक भारद्वाज जी जयपुर की साहित्यिक- सांस्कृतिक गतिविधियों पर अच्छी पकड़ रखते थे. नवनीत गुर्जर पहले पेज के प्रभारी थे. वे दफ्तर आते ही लीड खबर और उसके शीर्षक की तलाश में जुट जाते. उनके स्थानांतरण के बाद इंदौर से आए संजय पांडेय ने यही काम बखूबी किया. बेहद मिलनसार गनी साहब खेल डेस्क के प्रभारी होने के साथ मुस्लिम समाज की समस्याओं के विशेषज्ञ भी थे.
केंद्र में सत्ता परिवर्तन
जयपुर रहने के दौरान 2004 में आम चुनाव हुए जिसके नतीजे अप्रत्याशित थे. एनडीए की जगह यूपीए की सरकार बनी और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री. उस दौरान यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी की छवि गढ़ने के अभियान के तहत देश के कई बड़े अखबारों में उनका एक लंबा विशेष साक्षात्कार छपा. इस साक्षात्कार की खासियत थी कि विभिन्न अखबारों में छपे सवाल और जवाब तो समान थे, लेकिन साक्षात्कार लेने वाले संपादक/पत्रकार अलग-अलग. जाहिर है कि एक ही साक्षात्कार की प्रति सभी संपादकों/पत्रकारों को उपलब्ध कराई गई थी. प्रबंधन के निर्देश पर भास्कर के तमाम संस्करणों में वह साक्षात्कार दो बार अलग-अलग बाईलाइन के साथ छपा.
दुखद घटनाएं, बीमारी
जयपुर में केंद्रीय डेस्क के कार्यकाल में डेस्क के दो वरिष्ठ साथियों-जयंत चटर्जी और कृष्ण कुमार मिश्र का असमय निधन हुआ. चटर्जी कैंसर की चपेट में आकर और मिश्र सड़क दुघर्टना में काल कवलित हुए. एक अन्य साथी राकेश नारायण माथुर की 12 बरस की बेटी भी सड़क दुर्घटना में नहीं रही. मुझे भी दो बार अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. एक बार डीवीटी और दूसरी बार हल्का हार्ट अटैक होने के कारण. कानपुर में मेरे पिताजी विनय भाई भी इसी दौरान नहीं रहे.
मार्च 2005 के शुरू में प्रबंधन ने केंद्रीय डेस्क को 1 अप्रैल से भोपाल शिफ्ट करने का फैसला किया. तब मेरी इच्छा भोपाल जाने की बजाय दिल्ली में काम तलाशने की थी. मैंने अपनी यह इच्छा श्रवण गर्ग को बता दी. वे तब समूह संपादक पद पर पदोन्नत होकर भोपाल मुख्यालय में बैठने लगे थे. उन्होंने कहा कि दिल्ली जाने का इरादा फिजूल है. भोपाल आइए. यहां केंद्रीय डेस्क का और विस्तार किया जाना है जिसमें आपकी भूमिका अहम होगी. श्रवण जी ने जिस अपनत्व और जिस लहजे में यह बात कही, उस पर भरोसा न करने का कोई कारण नहीं था, इसलिए मैंने दिल्ली में काम तलाशने का इरादा छोड़ दिया.
मार्च 2005 के आखिरी हफ्ते में मैंने भोपाल पहुंचकर विस्तारित केंद्रीय डेस्क की जिम्मेदारी संभाल ली. इस पड़ाव की खट्टी-मीठी यादों का ब्योरा अगली किस्त में पढ़िए.
पिछला भाग…
मेरी पत्रकारिता यात्रा (15): भास्कर समूह का यह अकेला संस्करण था जिसकी प्रिंट लाइन में संपादक की जगह समूह के चेयरमैन रमेशचंद्र अग्रवाल का नाम छपता था!


